अनियोजित प्रेग्नेंसी से कैसे निबटें ? असामयिक प्रसव से कैसे निबटें 

अनियोजित प्रेग्नेंसी से कैसे निबटें

अनियोजित प्रेग्नेंसी से कैसे निबटें ? असामयिक प्रसव से कैसे निबटें 

बहुत सी स्त्रियों को पहले ही यह आभास हो जाता है कि उन्हें असामयिक प्रसव (प्रीमेच्योर डिलीवरी) हो सकता है। ऐसे खतरे का आभास करने वाली स्त्री चाहे तो इस असामयिक प्रसव से निबटने का उपाय कर सकती है। गर्भवती स्त्री की जांच के बाद डॉक्टर संभावित खतरे से पहले ही उसे सावधान कर देती है। इनमें से कुछ खतरे ऐसे होते हैं, जिन्हें स्त्री स्वयं ही दूर कर सकती है। स्वस्थ शिशु को जन्म देने के लिए कुछ प्रयास तो स्त्री को करना ही चाहिए। 

अनियोजित प्रेग्नेंसी से कैसे निबटें

भावनात्मक तनाव 

असामयिक प्रसव पीड़ा (प्रीमेच्योर लेबर) से भावनात्मक तनाव का गहरा संबंध माना गया है। भावनात्मक तनाव के अनेक कारण ऐसे होते हैं, जिन्हें स्त्री गर्भवती स्त्री को भावनात्मक तनाव से बचना चाहिए चाहकर भी कम नहीं कर सकती, जैसे पति की नौकरी छूट जाना, परिवार में कोई दुर्घटना होना, शेयर में रकम डूब जाना अथवा नौकर द्वारा कोई नुकसान हो जाना आदि। अच्छे पोषण, योग, व्यायाम तथा आराम के सही संतुलन और मित्रों जीवन-साथी से बातचीत द्वारा इस तनाव को घटाया जा सकता है। भावनात्म तनाव दूर करके असामयिक प्रसव का खतरा कम किया जा सकता है।

पोषण की कमी 

प्रसवकाल में शरीर का वजन बढ़ना अच्छा माना जाता है, लेकिन वह शरी को देखते हुए सही अनुपात में होना चाहिए। अच्छा तो यह है कि डॉक्टर के परामर्श से ही वजन बढ़ाने का प्रयास किया जाए। स्वस्थ शिशु को उत्पन्न करने के लिए ऐसा आहार लें ताकि समय से पहले प्रसव का डर न रहे। 

ऐसी मान्यता है कि दिन में पांच बार नियमित रूप से भोजन करने पर समय से पहले प्रसव का खतरा टल जाता है। बहरहाल गर्भस्थ शिशु के अच्छे स्वास्थ के लिए माता को पौष्टिक और भरपूर आहार अवश्य लेना चाहिए। 

प्रायः यह कहना कुछ कठिन है कि गर्भावस्था में प्रत्येक स्त्री का वजन कितना होना चाहिए, क्योंकि हर स्त्री का रहन-सहन और भोजन का अपना अलग ढंग होता है। जिन स्त्रियों का वजन कम है, यदि गर्भावस्था में उनका वजन बढ़ जाए, तो ठीक रहता है। लेकिन जिनका वजन पहले से ही अधिक है, उनके लिए गर्भावस्था में अधिक वजन का बढ़ना खतरनाक हो सकता है। 

गर्भवती स्त्री को एक से तीन माह तक वजन नहीं बढ़ाना चाहिए। फिर तीन से पांच माह तक पच्चीस प्रतिशत, पांच से छह माह तक पच्चीस प्रतिशत, छह से साढ़े सात माह तक पच्चीस प्रतिशत तथा साढ़े सात से नौवे माह तक भी वजन बढ़ाना चाहिए, लेकिन नौ माह से प्रसव होने तक वजन नहीं बढ़ना चाहिए।

इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है-स्तनों का वजन एक से डेढ़ किलोग्राम तक, गर्भाशय का वजन आधा से एक किलोग्राम तक, जिगर में प्रोटीन एवं त्वचा के नीचे वसा (चर्बी) चार से साढ़े चार किलोग्राम तक, बच्चा और ओवल पांच किलोग्राम तक तथा जल, द्रव एवं लवण एक से डेढ़ किलोग्राम तक बढ़ना चाहिए। इसके लिए उत्तम आहार लेने के साथ-साथ गर्भवती स्त्री को समय-समय पर वजन करने की सलाह दी जाती है।

मादक द्रव्यों का सेवन 

गर्भावस्था में स्त्री को मादक द्रव्यों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इन द्रव्य से असामयिक प्रसव पीड़ा का खतरा बढ़ जाता है। शराब पीने के कारण कई परेशानियां हो सकती हैं। इससे असामयिक प्रसव हो सकता है, आने वाले शिशु को भी बहुत सी विकृतियों का सामना करना पड़ सकता है तथा उसके आकार कमी हो सकती है। अनेक स्त्रियों को इस लत के कारण गर्भपात भी हो जाता है| अत: गर्भकाल में तथा प्रसव होने तक शराब छोड़ देनी चाहिए। 

धूम्रपान करना 

धूम्रपान एक बुरी आदत है। लेकिन धूम्रपान करने वाली गर्भवती स्त्री के लिए यह बात संतोष देने वाली हो सकती है कि गर्भधारण से पहले किया गया धूम्रपान गर्भावस्था के बाद शिशु को कोई हानि नहीं पहुंचाता। किंतु गर्भावस्था में किए जाने वाले धूम्रपान का प्रभाव शिशु पर अवश्य पड़ता है। गर्भावस्था के चौथे मास के बाद भी धूम्रपान करने से गर्भस्थ शिशु का परिमाण कम हो जाता है। यदि स्त्री धूम्रपान करती है, तो गर्भस्थ शिशु को बहुत खतरा होता है। दरअसल वह भ्रूण को धुएं से भरी कोख में पालती है। इससे भ्रूण की हृदय गति बढ़ जाती है और ऑक्सीजन की कमी के कारण शिशु भली प्रकार विकसित नहीं हो पाता। 

धूम्रपान से गर्भावस्था के दौरान कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं, जिनमें इक्टोपिक प्रेग्नेंसी, प्लेसेंटल डिटैचमेंट तथा प्रीमेच्योर रप्चर ऑफ मेंब्रेन आदि शामिल हैं। यहां तक कि समय से पहले ही प्रसव भी हो सकता है। अनेक शिशु प्रसव के बाद रोगी हो जाते हैं। धूम्रपान से मां के शरीर में विटामिन-बी की कमी हो जाती है, जिस कारण बच्चे और मां दोनों को हानि पहुंचती है। 

सिगरेट आदि में निकोटिन और कॉर्बन मोनोऑक्साइड होते हैं, जो विष के समान कार्य करते हैं। इनके प्रभाव से रक्त के लाल सैल नष्ट हो जाते हैं। बच्चे और मां का संबंध जो ओवल द्वारा होता है, वह कम ऑक्सीजन से छूटने लगता है। इससे अनेक समस्याओं का श्रीगणेश हो जाता है, अतः प्रत्येक स्त्री को अपने शिशु को धुआं रहित स्वस्थ पर्यावरण देने का निर्णय कर लेना चाहिए तथा प्रसन्नता के साथ इस आदत का त्याग तत्काल कर देना चाहिए।

संक्रमण का खतरा 

सेक्स जनित रोगों के कारण भी समय से पहले प्रसव हो सकता है। यदि संक्रमण से शिशु को खतरा हो, तो स्त्री का शरीर शिशु की रक्षा के लिए समय से पहले प्रसव का उपाय खोज लेता है। संक्रमण से बचाव करके असामयिक प्रसव से बचा जा सकता है। सत्रह वर्ष से कम आयु की गर्भवती लड़कियों में असामयिक प्रसव का खतरा ज्यादा होता है। अच्छे पोषण एवं प्रसव से पूर्व अच्छी देखभाल से मां और शिशु का पूर्ण विकास किया जा सकता है। 

कई अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि मसूड़ों के रोगों से भी असामयिक प्रसव का गहरा संबंध है। इसका कारण यह है कि मसूड़ों के बैक्टीरिया रक्तधारा में प्रवाहित होकर प्रतिरोधक तंत्र को उत्तेजित कर देते हैं, जिससे सर्विक्स और गर्भाशय में जलन होने लगती है। इसी कारण समय से पहले प्रसव हो जाता है। अतः गर्भावस्था से पहले ही ऐसे संक्रमण का उपचार करा लेना चाहिए। 

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