कैसे स्वयं पर विश्वास करें |How to believe in yourself

कैसे स्वयं पर विश्वास करें

कैसे स्वयं पर विश्वास करें |पहले स्वयं पर विश्वास करें

विश्वास! आखिर यह है क्या? यह एक शक्तिशाली शब्द है, जिससे आपकी सोच प्रभावित होती है। पर कैसे? सूरज रोज निकलता है और रोज डूबता है, यह हमारा विश्वास है । यदि एक रोज न निकले तो? ‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता’ – यह भी विश्वास है। 

भूगोलशास्त्र के अनुसार सूरज तो स्थिर है, पृथ्वी सूरज के चारों ओर चक्कर लगाती है, लेकिन इस प्रक्रिया को भी देखा किसने है? 

यह वैज्ञानिक बताते हैं, पर उससे भी ज्यादा हमें विश्वास है कि सूरज रोज सुबह निकलेगा और शाम को अस्त होगा। 

संसार में दो प्रकार की सोच वाले व्यक्ति मिलते हैं – (1) सकारात्मक सोच वाला, जो विश्वास से भरा होता है क्योंकि वह प्रकृति के नियम (Law of Nature) में अटूट विश्वास रखता है। (2) नकारात्मक सोच वाला, जो किसी भी प्रकार के विश्वास से हीन होता है, क्योंकि वह ‘तर्क’ में ज्यादा विश्वास कर ‘संदेह’ से घिरा रहता है। ऐसे व्यक्ति में आत्मविश्वास की बेहद कमी होती है, जिसके कारण वह सोचता है, ‘मैं यह कार्य कैसे कर सकता हूं’ या ‘मैं नहीं कर सकता।’ 

अब आप जरा इन दोनों किस्म के व्यक्तियों पर गौर करें – बाहरी दृष्टि से दोनों ही स्वस्थ हैं, स्मार्ट हैं, लेकिन एक विश्वास का धनी है और दूसरा विश्वास से हीन है। यह अन्दरुनी स्थिति है जो बाहर से दिखाई नहीं देती, लेकिन विचारों और सोच से प्रकट होती है। प्रकृति का यह नियम है कि वही कुछ पा सकता है जो सोचता है कि वह पा सकता है, वही करने की क्षमता रखता है जो सोचता है कि वह कुछ भी कर सकता है।’ स्पष्ट है, ‘विश्वास’ से हमें ऊर्जा प्राप्त होती है, जिससे काम करने का रास्ता हमें स्वयं सूझ जाता है और निश्चय ही हम सफलता प्राप्त कर लेते हैं। 

अत: याद रखें – 

  • अपने विश्वास के आधार पर आप जो चाहें कर सकते हैं और जो चाहें पा सकते हैं, क्योंकि आप असीम शक्ति के मालिक हैं।
  • आपका विश्वास आपकी सफलता की बुनियाद है। आपने विश्वास के साथ सकारात्मक सोच से अपना लक्ष्य निर्धारित कर उसे पूरा करने का संकल्प लिया है, अतः आप उसी पर दृढ़ रहें।
  • आपका स्वयं में विश्वास होने के कारण ही दूसरे लोग आप में विश्वास करते हैं और दूसरों का विश्वास जीतना आपकी सफलता का निश्चित मापदण्ड है। 

ऋग्वेद में लिखा है – 

‘That man acquires strength of body and soul and attains to happiness, whose heart is free from suspicion and is filled with faith.’ 

– सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉक्टर जगदीशचंद्र बोस ने खोज की कि सभी पेड़-पौधों में जीव-जंतु एवं प्राणी की भांति प्राण होते हैं, वे दुःख-दर्द का अनुभव करते हैं । यदि पौधों को जहर दे दिया जाए, तो वे भी मर जाते हैं। अपने इस अनुसंधान का प्रदर्शन करने के दौरान, इंग्लैंड में उन्होंने एक इंजेक्शन में जहर भरकर उसे एक पौधे में लगा दिया, लेकिन पौधा मरा नहीं। वहां पर एकत्रित जनसमुदाय उनकी हंसी उड़ाने लगा। चूंकि उन्हें अपनी खोज और उससे कहीं ज्यादा स्वयं पर पूरा विश्वास था, उसी वक्त उन्होंने सोचा कि जब यह पौधा इस जहर से नहीं मर सकता, तो मैं भी इस जहर से कैसे मर सकता हूं? वे उसी जहर का इंजेक्शन स्वयं में भी लगाने को तैयार हुए कि आयोजकों में से एक व्यक्ति ने उनका हाथ रोककर कहा – “सर, हमने जहर के स्थान पर इस शीशी में रंगीन पानी भर दिया था। डॉक्टर बोस ने वह प्रयोग वास्तविक जहर से दुबारा किया और पौधा धीरे-धीरे मुरझा गया। उन्हें अपने प्रयास और स्वयं पर इतना अटूट विश्वास था कि अंत में पूरे विश्व को उनकी इस खोज पर पूर्ण मान्यता देनी पड़ी। 

श्री रामकृष्ण परमहंस ने कहा है – 

‘जिसके पास विश्वास है, उसके पास सबकुछ है, जिसके पास विश्वास नहीं, उसके पास कुछ भी नहीं। विश्वास ही जीवन है और अविश्वास मृत्यु।’ 

अविश्वसनीय न बनें : 

स्थिर बुद्धि, आत्मबल और विश्वास से हीन व्यक्ति अविश्वसनीय कहलाते हैं । ऐसा व्यक्ति – 

इतना दब्बू, डरा हुआ और अस्थिर बुद्धि का होता है कि प्रत्यक्ष दिखाई देती बात को भी स्वीकारने से कतराता है। 

दूसरे का समर्थन तो कर देता है, लेकिन स्वयं कोई निर्णय लेने में हिचकता है।

कितना भी भला क्यों न हो, मगर विश्वास के योग्य नहीं होता, क्योंकि न मालूम किस समय वह काम को अधूरा छोड़कर बैठ जाए । 

अपने निश्चय पर कायम नहीं रहता और इसी कारण उसे जिम्मेदारी का काम नहीं सौंपा जाता।

साहस और आत्मविश्वास की कमी के कारण अविश्वसनीय व्यक्ति दूसरों के साथ चलना पसंद करते हैं। दूसरों की नजर में अच्छा बने रहने के लिए वे भेड़ की तरह एक झुंड में चलते हैं। इनमें से कुछ लोग अपने को दूसरों से अच्छा समझते हैं, क्योंकि वे गलत काम का समर्थन नहीं करते। लेकिन उनमें गलत लोगों का विरोध करने का साहस और आत्मविश्वास नहीं होता । वे यह नहीं समझ पाते कि विरोध न करने का मतलब ‘समर्थन’ देना है और गलत काम को बढ़ावा देना है। 

अतः जीवन में सफल होने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि पहले आप स्वयं पर विश्वास करें, तभी दूसरे लोग आप पर विश्वास करेंगे, अन्यथा आप भी अविश्वसनीय कहलाएंगे और ऐसे लोगों के जीवन का कोई मूल्य नहीं होता।

– पर्वतारोहण (Mountaineering) के एक अभियान के लिए N.C.C. कैडेट छात्रों से नाम मांगे गए और उन नामों में से कुछों का चयन भी कर लिया गया। चयन प्रक्रिया के पूर्ण होने के पश्चात एक कैडेट-छात्र अभियान के आयोजक के पास पहुंचा और उसने अभियान में भाग लेने की इच्छा जाहिर की। अभियान दल के नेता ने पूछा – ‘उचित समय पर आपने अपना नाम हमें क्यों नहीं भेजा?’ उस छात्र ने उत्तर दिया – ‘उस समय मैं यह निश्चित नहीं कर पाया कि मैं सफलतापूर्वक इसमें भाग ले सकता हूं। अब मैं विचार करता हूं कि मुझे भी इसमें भाग लेना चाहिए। दल के नेता ने कहा – “जब आपको सफलतापूर्वक अभियान संपन्न करने का स्वयं पर विश्वास नहीं है, तो मैं कैसे विश्वास करूं कि आप बीच रास्ते में अभियान का साथ नहीं छोड़ेंगे?’ उस कैडेट-छात्र का चुनाव नहीं हो सका। 

FW Robertson ने कहा है – 

‘To believe is to be strong.’ विश्वास करना शक्तिशाली बनना है। 

कैसे स्वयं पर विश्वास करें

निष्कर्ष 

विश्वास हमारे जीवन का आधार है। एक-दूसरे पर विश्वास, सम्मान, मर्यादा, भक्ति, प्रेम, वात्सल्य, अनुराग, वैराग्य – ये जीवन के सभी मूल्य कहीं-न-कहीं विश्वास पर ही टिके हुए हैं। इसे हम यों कहें कि पूरा विश्व-जीवन ही इस 

एक शब्द पर टिका हुआ है। यह विश्वास अनंत है, सनातन है। यह विश्वास ही है जिसके आधार पर एक परिवार टिकता है, समाज बनता है, देश और राष्ट्र का निर्माण होता है। विश्वास मानव-चरित्र का आधार है। विश्वास ही है जो जीवन को जीने योग्य बनाता है। 

विश्वास में अपार शक्ति है। अपने विश्वास को बार-बार दोहराने से हमारे साहस में अभूतपूर्व वृद्धि होती है। साहस व्यक्ति के आत्मविश्वास की रीढ़ है। जिस समय आप यह कहते हैं – “मैं इस काम को अवश्य पूरा करूंगा’, तब इससे न केवल साहस और उत्साह बढ़ता है, आत्मविश्वास की शक्ति में भी प्रबलता आती है। इससे मार्ग में आने वाली बाधाएं स्वतः हट जाती हैं तथा अपनी योग्यता पर आपका दृढ़ विश्वास नकारात्मक विचारधारा को नष्ट कर देता है। अतः दृढ़ विश्वासी बनने के लिए आप – 

  • संशय अथवा अविश्वास को अपने मन में कहीं स्थान न दें।
  • अपने निर्णय पर अटल रहें, दृढ़ निश्चयी बनें। 
  • अपने लक्ष्यों के प्रति संकल्पकृत बने रहें। 
  • स्वयं को अनुशासित कर अपने मनोबल को सदा ऊंचा रखें।
  • स्वयं को दूसरों की अपेक्षा कम भाग्यशाली कभी न समझें।
  • ईश्वर में दृढ़ आस्था रखें और स्वयं को ईश्वर का पुत्र अथवा दूत समझें।
  • अपनी सकारात्मक सोच बनाए रखें और विश्वास करें, ‘जीत उसी की है जो दृढ़ विश्वासी है।’ 

अंत में, याद रखें, बेढब स्थितियों में भी विश्वास की जीत होती है, क्योंकि यह मानव और प्रकृति संरचना का मूलमंत्र है। अत: आपके पास जो विश्वास है, उसे सुरक्षित रखें, उसे बढ़ाएं और उसका सम्मान करें। 

याद रखें … 

यदि आप विश्वास के साथ किसी काम को करने की सोच रहे हैं, तो सिर्फ सोचने में ही आपके विश्वास की पूर्णता नहीं है, बल्कि आपको वह कार्य करना भी है और वो भी दृढ़ विश्वास के साथ । अब प्रश्न है, दृढ़ विश्वासी कैसे बनें? 

दृढ़ विश्वास उपजता है आस्था से, जिसका सीधा संबंध हमारी चेतना (Consciousness) से जुड़ा है। इसमें ‘सत्य’ और ‘प्रेम’ दोनों का समावेश है। अतः यह समझने के लिए कि ‘आस्था क्या हैं’, भगवान में आस्था का जिक्र यहां करना उचित रहेगा – 

प्रायः सभी भगवान में विश्वास करते हैं – रोज मंदिर जाते हैं, घर में पूजा-पाठ करते हैं, आदि। पर ये सब किसलिए? दरअसल, हम अपने स्वार्थ के लिए मंदिर जाते हैं और अपने सुख-वैभव के लिए भगवान से मनौती मांगते हैं, जैसे-नौकरी लग जाए, बिजनेस खूब चले, बच्चों की अच्छी जगह शादी हो जाए, इत्यादि । जब हम रोज सुबह-शाम भगवान से भौतिक सुख-संपदा ही मांगते रहेंगे, तब कहां रहा हमारा भगवान से प्रेम, भगवान में हमारी आस्था? आस्था वाला (भक्त) तो ‘देने की बात करता है, ‘लेने की नहीं, जैसे – भगवान कृष्ण के मांगने पर श्याम खाटू बाबा ने अपना शीश उनको दान कर दिया था, एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य के मांगने पर अपने सीधे हाथ का अंगूठा गुरु-दक्षिणा में उनको भेंट कर दिया था, आदि । 

‘खुद को कर इतना बुलंद कि हर तकदीर से पहले। 

खुदा बंदे से पूछे, बता तेरी रजा क्या है?’ 

अतः यदि हमें मांगना ही है, तो प्रेमाभक्ति मांगें, ‘लेने’ की बजाय ‘देना’ सीखें, तभी हमारी भगवान में आस्था’ कहलाएगी। 

अब आप यदि गौर से देखें, तो दुनिया में तीन श्रेणी के व्यक्ति मिलते हैं 

(1) जो कुछ करते हैं।

(2) जो कुछ होते हुए देखते हैं, पर करते नहीं।

(3) जो कुछ देखते हैरान होते हैं कि ‘यह हुआ क्या? 

प्रथम श्रेणी के व्यक्ति ‘आस्था’ से जुड़े हैं, Positive believ ing के स्वामी हैं । फिर तो आप यह मान लेंगे कि आस्था के बिना किया गया काम एक सपने की तरह है | सपने का कोई अस्तित्व नहीं होता, जबकि काम अस्तित्व में रहता है। इसी प्रकार आस्था में सक्रियता है, यह जीवंत है । आस्था के बारे में EL. Holmes ने कहा है – 

‘Faith is God at work.’ 

हर एक के जीवन में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो हमारी इच्छा के विपरीत होते हैं और हम प्रतिकूलता का अनुभव करते हैं | यह वो स्थिति है जिसमें सही निर्णय लेना कठिन प्रतीत होता है और हमारी आस्था को प्रभावित करने की कोशिश करती है, लेकिन सकारात्मक सोच में ये क्षण परिवर्तनशील हैं। अतः हम इन्हें अनदेखे समझकर अपनी भावनाओं को नियंत्रित करें और अपनी आस्था को गिरने से बचाए रखें। कारण – आस्था रहेगी, तो विश्वास भी बना रहेगा। 

अत: स्पष्ट है – 

  • आस्थावान व्यक्ति अपने कार्य तथा उद्देश्य से कभी नहीं हटते। 
  • आस्था से उत्पन्न हमारा विश्वास हमें कठिनाइयों से पार ले जाता है।
  • दृढ़ विश्वास के बल पर हम बुरे समय में भी मुस्कराते हैं और अपनी कार्य सिद्धि की शक्ति को प्रबल बनाते हैं।
  • जिस वस्तु का अस्तित्व नहीं है, उसे हम दृढ़ विश्वास से उत्पन्न कर सकते हैं – जैसा कि टेनीसन ने कहा है –

“सत्य, प्रेम और विश्वास के द्वारा ऐसी कोई चीज नहीं, जो पाई न जा सके। 

दृढ़ विश्वास वाले व्यक्ति आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर रहते हैं, क्योंकि वे आत्मसम्मान के प्रति पूरे सजग रहते हैं | उन्हें अपनी जीत का पूरा विश्वास होता है। उनके व्यवहार में आत्मविश्वास की झलक मिलती है। आत्मसम्मान से ही बढ़ता है आत्मविश्वास और इससे मिलती है आत्मनिर्भरता । ऐसे व्यक्ति अपने आचरण से अपने आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए अपने राष्ट्र को राष्ट्रीय अर्थ देते हैं। ऐसा ही एक सटीक उदाहरण आप यहां देखिए 

एक भारतीय सज्जन किसी काम से जापान गए थे। वहां रेल से यात्रा करते समय एक स्टेशन पर उनके निकट एक बालक जापानी मिठाई बेचने आया । उन्होंने उस बालक को बड़ा सिक्का देकर थोड़ी मिठाई खरीद ली। बालक शेष राशि लौटाने के लिए जब अपनी जेब देख रहा था, तभी ट्रेन चल दी। बालक उन्हें राशि नहीं लौटा पाया । राशि छोटी थी, इसलिए उन सज्जन ने उसे भुला दिया। 

अगले स्टेशन पर स्टेशन मास्टर भारतीय डिब्बे के पास आकर जोर से कहने लगा – ‘वे सज्जन कौन हैं, जिन्होंने पिछले स्टेशन पर बालक से मिठाई खरीदी थी?’ भारतीय ने बताया कि 

उन्होंने ही मिठाई खरीदी थी। इस पर स्टेशन मास्टर उन्हें कुछ रेजगारी देने लगा। भारतीय यात्री ने पूछा, “यह राशि कैसी?’ तब स्टेशन मास्टर ने उन्हें बताया कि ‘उस बालक का उन्हें अभी तार मिला है। आपकी कुछ राशि मैं आपको लौटा दूं।’ यात्री ने जब तार-खर्च के बारे में पूछा, तो स्टेशन मास्टर ने बताया कि जितनी राशि आपको उसने भेजी है, उससे अधिक राशि तार भेजने में उसे खर्च करनी पड़ी है। 

यह है चेतना का एक उदाहरण उस बालक का, जो सकारात्मक विश्वास (Positive Believing) का धनी था। क्या ऐसे व्यक्ति का दृढ़ विश्वास कभी डिग सकता है? 

स्पष्ट है, जीत उसी की है, जिसे ‘स्वयं’ पर विश्वास है। 

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