क्‍या आप जानते हैं, कैसे हुई थी श्रीकृष्ण की मृत्यु | कृष्ण भगवान की मृत्यु कैसे हुई थी बताइए?

कृष्ण भगवान की मृत्यु कैसे हुई थी बताइए?

क्‍या आप जानते हैं, कैसे हुई थी श्रीकृष्ण की मृत्यु –मुनियों का शाप

युधिष्ठिर को हस्तिनापुर का राजा बनाए जाने के बाद भगवान कृष्ण द्वारका नगरी वापस चले गए। उनके वंश के लोग यानी यादव वंशी द्वारका नगरी में बहुत आनंद से रह रहे थे। लेकिन शीघ्र ही वे लोग सदाचार, अनुशासन और नैतिक मूल्यों के बारे में भूल गए। 

एक बार मुनि विश्वामित्र और नारद द्वारका नगरी पधारे। तब वहां के लोगों ने दोनों मुनियों का घोर अपमान किया। भगवान कृष्ण के कुछ बेटों ने साम्ब (कृष्ण और जाम्बवंती के पुत्र) को गर्भवती महिला की तरह कपड़े पहनाए और उसे दोनों मुनियों के पास ले जाकर पूछने लगे कि वह पुत्र को जन्म देगी या पुत्री को! 

दोनों मुनियों को यह उपहास पसंद नहीं आया। उन्होंने गुस्से में आकर शाप दे दिया, “तुम लोहे के एक मूसल को जन्म दोगी, जो यदुवंश के नाश का कारण होगा।” तत्पश्चात अगले ही दिन साम्ब ने लोहे के एक मूसल को जन्म दिया। जब बलराम ने यह सुना, तो उन्होंने उस मूसल को पिसवाकर समुद्र में फिंकवा दिया। 

इधर गांधारी का शाप भी अपना रूप दिखाने लगा था। भगवान कृष्ण ने अपनी प्रजा को बचाने के लिए पूरे राज्य में मदिरा के सेवन पर कड़ी पाबंदी लगा दी। 

फिर युद्ध के छत्तीस वर्ष बाद यदुवंशी वन विहार को गए और वहां मदिरा का सेवन किया। कुछ देर बाद भगवान कृष्ण के पुत्रों तथा अन्य लोगों में वाद-विवाद होने लगा। शीघ्र ही सारे यादव दो दलों में विभाजित हो गए। उन्होंने समुद्र के किनारे उगे हुए सरकंडों को तोड़ा और अपने विरोधियों को मारने लगे। 

क्‍या आप जानते हैं, कैसे हुई थी श्रीकृष्ण की मृत्यु

इस तरह सभी यदुवंशी मौत के मुंह में चले गए। केवल भगवान कृष्ण, बलराम और उनके सारथी दारुक ही जीवित बचे थे। वे सरकंडे लोहे के उसी चूर्ण से उगे थे, जिन्हें समुद्र में फेंका गया था। बलराम ने योगबल से अपने प्राण त्याग दिए। वे सफेद रंग के एक विशाल सांप में बदल गए और समुद्र में चले गए। वे भगवान विष्णु के सेवक शेषनाग के अवतार थे।

बलराम आजीवन भगवान कृष्ण के बड़े भाई के रूप में धरती पर रहे, लेकिन वास्तव में वे अपने प्रभु की सेवा करने वाले शेषनाग थे। जब इस अवतार में उनका कार्य पूर्ण हो गया, तो वे पुनः शेषनाग का रूप धारण करके वैकुंठ धाम लौट गए, ताकि वहां अपने प्रभु भगवान कृष्ण के आगमन की प्रतीक्षा कर सकें। 

पूरी द्वारका नगरी तबाह हो चुकी थी। सभी लोग मारे जा चुके थे। अब वहां बच्चों और स्त्रियों के सिवा कोई पुरुष नहीं बचा था। भगवान कृष्ण बहुत उदास थे। वे ध्यान करने के लिए एक पेड़ के नीचे जा बैठे। जब एक शिकारी ने उन्हें वहां देखा, तो उनके पीले कपड़ों के कारण वह 

उन्हें हिरण समझ बैठा। उसने लोहे का एक तीर चलाया, जो प्रभु के पैर में जा लगा। अंततः भगवान कृष्ण भी स्वर्ग सिधार गए। कुछ समय बाद अर्जुन द्वारका नगरी आए, क्योंकि भगवान कृष्ण चाहते थे कि वे द्वारका की स्त्रियों और बच्चों की रक्षा करें। 

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अर्जुन सबको अपने साथ लेकर हस्तिनापुर की ओर चल पड़े। जब वे वहां से चले गए, तो द्वारका नगरी समुद्र में डूब गई। अभी वे लोग कुछ ही दूर गए थे कि अचानक जोर-जोर से आवाजें आने लगीं। अर्जुन ने सबसे कहा कि वे सावधान हो जाएं। वे ज्यों ही देखने के लिए आगे बढ़े, रास्ते में कुछ लुटेरों ने अर्जुन के दल पर हमला कर दिया। अर्जुन अकेले ही बड़ी वीरता से लड़ते रहे। लुटेरों ने चारों ओर आतंक मचा दिया। वे अपने साथ सारी संपदा और स्त्रियों को ले गए। अर्जुन की वीरता भी कोई काम नहीं आई। 

अर्जुन युधिष्ठिर के पास गए और उन्हें सब कुछ बताया। सारी बात सुनकर युधिष्ठिर को बड़ा दुख हुआ। वे मन ही मन में टूट गए। जब भगवान कृष्ण चल बसे, तो पांडव भी इस संसार से ऊब गए। उनका मन भगवान 

कृष्ण के बगैर नहीं लगता था। अतः उन्होंने अर्जुन के पोते यानी अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को राजकाज सौंपा और तीर्थयात्रा पर चल दिए। जब भगवान कृष्ण परलोक सिधारे, तो इस धरती पर कलियुग का आरंभ हुआ। 

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