Horror Story in Hindi-रात गहरी थी,रुह का राज़ 

Horror Story in Hindi-

Horror Story in Hindiरात गहरी थी 

बात 1988 की है, तब, जब रात-बेरात टैक्सी, ऑटो मिलना खालाजी का घर नहीं था। लोग बसों से सफ़र करते थे। सिनेमा के बस चार बांधे बँधाए शो होते थे, दोपहर बारह बजे से रात के बारह तक ही। ऐसे ही एक बार की बात है|

दिन सो चुका था, पर रात अभी जागी थी। रात की आखिरी बस से उतर कर राजबीर ने घर का रूख कर लिया था। आम सी रात थी पर फिर भी जाने क्यों राजबीर का मन किसी अनजाने डर से घबरा रहा था। रह-रह कर उसे ऐसा लग रहा था कि कोई न कोई उसका पीछा कर रहा है। हालाँकि किसी के क़दम सुनायी नहीं दे रहे थे पर उसे ऐसा लग रहा था कि कोई काला सा साया उसके पीछे पीछे चलता हुआ आ रहा है। न चोकीदार के सड़क पर डंडा ठोकने की आवाज़ और न ही किसी जानवर की पुकार। रात ज़रूरत से कहीं ज़्यादा सुन्न थी। सर्दी नहीं थी पर फिर भी रह-रह कर राजबीर के रोंगटे खड़े हो रहे थे। आज कुछ ज़्यादा ही देर हो गयी थी, दरसल, दोस्तों के साथ वो एक पिक्चर का रात का शो देख कर अकेला लौट रहा था। उसका घर बॉस स्टेण्ड से लगभग एक डेढ़ किलोमीटर दूर था। 

Horror Story in Hindi-

अमावस की रात थी तो चाँद की रोशनी भी नहीं थी, दूर दूर तक लगे खम्बों में लगे बिजली के बल्ब उसे ऐसे लग रहे थे जैसे लम्बे-लम्बे साये हाथ में हाथ डालकर सड़क के दोनों ओर खड़े हों और वो बल्ब नहीं उनके चेहरे पर चमकती एक आँख हो। इस तरह की कई आँखें बदस्तूर उसे घूरतीं जा रहीं थीं और उसका पीछा करता साया भी अपना रास्ता बदलने की नहीं सोच रहा था। उसने हिम्मत कर घड़ी देखी तो आधी रात के बारह बजकर पचास मिनट हुए थे। उसने अपने क़दम और तेज़ कर लिए। थोड़ी आगे जा कर वो अपने घर की ओर जाने वाली सड़क पर मुड़ने को ही था कि उसने एक अजीब सा दृश्य देखा। उसने देखा कि एक बहुत बूढ़ा आदमी सड़क के किनारे एक खम्बे के नीचे किताबें बेच रहा था। और उसने अभी अभी दुकान लगानी शुरू की थी, क्योंकि वो अपने साथ लाए झोलों में से अभी किताबें निकाल निकाल कर सज़ा रहा था। 

राजबीर को किताबों का बहुत शौक़ था, किताबें देखते ही वो बिलकुल भूल गया कि क्या वक़्त हुआ है। वो सीधा उस बूढ़े के पास गया और बोला, ये आप इस समय दुकान क्यों लगा रहे हैं। पहले तो बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया पर जब एक बार फिर रजबीर ने ज़ोर देकर पूछा तो बूढ़ा बोला “मेरे ग्राहक इसी वक़्त आते हैं” और वापिस अपना काम करने में लग गया। राजबीर ने ध्यान दिया तो सारी की सारी किताबें भूतों, प्रेतों और चुडैलों और डायनों से वास्ता रखती थीं। यहाँ वहाँ टटोल कर उसने एक किताब उठाई जिसका नाम था “सुसाइड नोट” “आप यहाँ रोज़ बैठते हो बाबा?” राजबीर ने बूढ़े से पूछा तो वो बोला “ज़िंदगी के ठिकाने हैं तो मौत के भी हैं, जहाँ मुझे मौत इशारा करती है वहीं दुकान लगा लेता हूँ” 

“मतलब कुछ समझ नहीं आया अंकल?” बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया। 

“अच्छा ये किताब कितने की है?” 

“जिंदगी देते हो तो मुफ़्त में भी मिल सकती है” बूढ़े ने अजीब सा जवाब दिया। 

राजबीर ने उसकी बात की ओर ध्यान न देते हुए किताब खोली तो उसमें क़ीमत लिखी थी दो पेसे 

“जाने कौनसे ज़माने की किताबें बेच रहा है ये बूढ़ा?” 

राजबीर ने जेब से बीस पैसे निकाले और “बोला इतने ठीक हैं? दो पैसे तो अब मिलने मुश्किल हैं” 

बूढ़ा बोला “ले जाओ, ले जाओ, अब तो तुम हमारे कस्टमर बन गए हो हमेशा के लिए” 

हँसते हुए रजबीर की नज़र एक बार फिर किताबों की ओर गयी तो वो हैरान रह गया। हर किताब पर अलग अलग अजीब सा भद्धा, डरावना चेहरा बना था पर हर किताब का टाइटल एक ही था “सुसाइड नोट” 

सकपकाया सा राजबीर घर की ओर चल पड़ा, जाने क्यों कुछ अजीब लगते हुए भी उसने वो किताब वापिस रखने की नहीं सोची। 

कुछ पंद्रह-बीस मिनट चलने के बाद वो अपने घर पंहुच गया था। राजबीर इस शहर में पढ़ाई कर रहा था पर अच्छे परिवार से होने के कारण उसके माता पिता ने उसे एक कोठी का एक अच्छा बड़ा फ़्लोर किराए पर लेकर दिया हुआ था। 

राजबीर ने घर पंहुचते ही चैन की साँस ली, फ़ैन ऑन किया, कपड़े बदले और हाथ मुँह धोकर सीधा अभी लायी किताब ले अपने बिस्तर पर कूद पड़ा। घर पहुँचकर उसे बहुत सुकून सा मिल रहा था, बहुत अच्छा लग रहा था। खिड़की पर लगे परदे पंखे की हवा से हल्का-हल्का लहरा रहे थे। घर आकर कुछ देर लेटने के बाद उसे हल्की हल्की ठण्डक सी महसूस हो रही थी। उसने पैरों के पास रखी चादर खोली, कढ़ाई वाले तकिए पर अपना सर रखा और चादर ओढ़ कर किताब को ध्यान से देखने लगा। अजीब सा कवर था किताब का। एक पल को तो उसे ऐसा लगा कि कवर पर बना चेहरा बिलकुल असली है, उसे ऐसा लगा जैसे उस चेहरे की आँखों की पुतलियाँ हिल रहीं हैं और लगातार उसे घूर रहीं हैं। उसने किताब के कवर को थोड़ा बहुत घुमाया तो उसे लगा कि कवर में बना चेहरा भी कवर के साथ साथ घूम गया है पर कैसे भी घूमे कवर पर बने उस आदमी की आँखें जैसे उसी पर गड़ीं हैं। उसके लिए उस किताब के कवर से नज़रें हटाना बड़ा मुश्किल हो रहा था। उसे लगा जैसे वो चेहरा उससे कुछ कहना चाहता है। चेहरे के ठीक ऊपर गहरे लाल रंग के अक्षरों में किताब पर बड़ा बड़ा लिखा था “सुसाइड नोट” 

कुछ देर कवर देखने के बाद रजबीर ने किताब खोल कर पढ़नी चाही पर जैसे ही थोड़ा ज़ोर लगाकर उसने कवर खोला तो वो हैरान रह गया। कुछ देर पहले जिसे उसने किताब समझकर ख़रीदा था वो अब किताब नहीं बल्कि एक छोटा सा बक्सा बन चुका था। बाहर से दिखने में तो किताब ही थी पर जब उसे खोला गया तो अंदर से वो एक बक्से की तरह खुल गयी। एक छोटा सा बक्सा जो अंदर से पूरा लाल था। पर ये बक्सा ख़ाली नहीं था, इसमें तह लगा एक काग़ज़ रखा था। 

राजबीर हैरान था, उसने वो काग़ज़ निकाला और पढ़ने के लिए खोला ही था कि तभी उसके दरवाज़े पर दस्तक हुई। राजबीर ने अपना बेड लिविंग रूम में ही रख रखा था। ज़्यादा कमरे साफ़ करने की रोज़ ज़रूरत ना पड़े इसलिए उसने अपना सारा इंतज़ाम बाहर के कमरे में ही किया हुआ था। 

जब उसके कमरे के दरवाज़े पर इतनी रात गए दस्तक हुई तो राजबीर का दिल धक्क से रह गया, इस समय आखिर कौन हो सकता है? उसने महसूस किया कि पूरा कमरा किसी भीनी सी खुशबू से भर गया है। पर साथ ही उसे किसी अनजाने से डर ने भी घेर लिया था। एक पल को 

तो उसे लगा कि कुछ बहुत बुरा होने वाला है। उसके माथे पर पसीने की बूंदें साफ़ साफ़ चमक रहीं थीं। वो इतना डर गया था कि बिस्तर से हिल भी नहीं पा रहा था, उसने सोचा कि दरवाज़ा खोलने की ज़रूरत ही नहीं है, जो भी होगा फिर आ जाएगा। बाहर कोई लगातार दरवाज़ा बजा रहा था। 

लगभग ५ मिनट तक ऐसे ही कोई दरवाज़ा खटखटाता रहा फिर अचानक कोई भी आवाज़ आनी बंद हो गयी। सर्दी नहीं थी पर राजबीर ने सर से पाँव तक ख़ुद को चादर से ढंक रखा था, डर के मारे वो पसीने से तर ब तर हो चुका था, उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी दरवाज़े की ओर मुड़ कर देखने की । तभी धड़ाम से दरवाज़ा अपने आप खुल गया और किसी गाड़ी के हॉर्न की तेज़-तेज़ आवाज़ आने लगी। दरवाज़ा खुलने के साथ ही वो कमरा गाड़ी की हेड लाइटों की रोशनी से नहा गया था। 

जब काफ़ी देर हॉर्न बजना बंद नहीं हुआ तो मजबूरन राजबीर ने चादर से अपना चेहरा निकालकर देखा तो वो हैरान रह गया, उसके घर के बाहर एक बहुत ही महँगी कार खड़ी थी जिसका पीछे का दरवाज़ा खुला था और पीछे एक बहुत खूबसूरत जवान लड़की जामुनी रंग की साड़ी पहने बैठी थी और उसे अपने पास आने का इशारा कर रही थी। इतनी सुंदर लड़की तो शायद उसने सपने में भी नहीं देखी थी, उसे समझ नहीं आ रहा था कि ये क्या हो रहा है। हॉर्न बजना बंद हो चुका था पर वो लड़की लगातार उसे अपने पास आने का इशारा कर रही थी। जाने क्या जादू था उस लड़की में, राजबीर अपने बिस्तर से उठा और उसकी ओर खिंचता चला गया। पूरा वातावरण एक अजीब सी ख़ुशबू से इतना भर गया था कि राजबीर पर हल्की हल्की बेहोशी छा रही थी। जैसे कि उसने कोई नशा ले लिया हो। 

वो सीधा जाकर गाड़ी के पिछली वाली सीट पर उस लड़की के साथ जाकर बैठ गया। उसके गाड़ी में बैठते ही उसके घर और इस गाड़ी दोनों का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया था। गाड़ी धीरे से स्टार्ट हुई और जाने कहाँ के लिए निकल पड़ी। पर राजबीर में ये सब सोचने की ताक़त नहीं थी। वो लगातार उस लड़की को घूरे जा रहा था। उस लड़की की जामुनी पोशाक रह-रह कर ऐसे चमकती थी जैसे उसमें सितारे जेड हों। वो लड़की धीरे से राजबीर के पास आयी और उसे अपने गले से लगा लिया और धीरे धीरे उसके माथे पर अपना हाथ फेरने लगी। राजबीर पूरी तरह उसमें खो चुका था। वो ख़ुद को इतना भूल गया था कि उसने अपना सर उसकी गोद में रखा और उसके चेहरे को निहारने लगा। उस लड़की ने धीरे से राजिर के माथे पर चूमा और अपनी चमकती नीली आँखों से उसे ऐसे देखने लगी कि जैसे बरसों बाद उसे देख रही हो। वो गाड़ी धीरे धीरे सड़क पर ऐसे चल रही थी जैसे किसी कश्ती की तरह पानी में तैर रही हो। राजबीर को जैसे उस लड़की से प्यार हो गया था। 

कुछ देर बाद उसे एहसास हुआ कि गाड़ी रुक चुकी है। उसने चेहरा उठा कर ड्राइवर की ओर देखने की कोशिश की तो वो बहुत घबरा गया। ड्राइवर उसको बुरी तरह घूर था, अंधेरे में भी उस ड्राइवर के चेहरे का गुस्सा साफ़ साफ़ झलक रहा था, उस ड्राइवर के हाथ में एक बड़ा सा चाकू था। ड्राइवर ने बिना कोई पल गँवाए सीधा राजबीर पर वार कर दिया। पर डरा हुआ होने के बावजूद राजबीर एक झटके से एक ओर हट गया और वो चाकू सीधा उस लड़की के पेट में जा लगा। वो लड़की दर्द से बुरी तरह क़राह रही थी। राजबीर के मन में गुस्से, डर और घृणा और आश्चर्य के मिले जुले भाव थे। वो सकते में था, तभी उसने देखा कि ड्राइवर की सीट पर कोई नहीं है। ड्राइवर वहाँ से ग़ायब हो चुका था। 

Horror Story in Hindi-

तभी गाड़ी के आगे के शीशे पर किसी ने दस्तक दी। उसने देखा तो बाहर एक पुलीस वाला खड़ा था और अपने डंडे से गाड़ी का शीशा खटखटा रहा था। राजबीर के होश उड़ गए थे। उसके साथ बैठी लड़की मर चुकी थी। उस लड़की की लाश की आँखें खुलीं थीं और राजबीर को बुरी तरह घूर रहीं थीं, इधर ये पुलीसवाला लगातार गाड़ी के शीशे पर दस्तक दे रहा था। एक दो मिनट खटखटाने के बाद जब दरवाज़ा नहीं खुला तो पुलीसवाले ने बाहर से गाड़ी का दरवाज़ा खोल दिया। सामने का नज़ारा देख वो भी हिल गया था। उसने अपने होल्स्टर से बंदोक निकाली और राजबीर पर तान दी। “चुपचाप हाथ ऊपर कर गाड़ी से बाहर निकल आओ”, राजबीर के पास कोई चारा नहीं था, उसने बिना कुछ कहे ही बाहर आना ठीक समझा, आख़िर सारे सबूत उसके ख़िलाफ़ जो थे। वो बाहर निकला तो हैरान रह गया। गाड़ी और कहीं नहीं बल्कि पुलीस स्टेशन के बरामदे में खड़ी थी। उसे याद आया कि उस गाड़ी के ड्राइवर का चेहरा जिसने उस खूबसूरत लड़की का क़त्ल किया था हू-ब-हू उस किताब बेचने वाले से मिलता था जिसने उसे “सुसाइड नोट” नाम की किताब आज रात बेची थी। 

पुलीस वाले के आवाज़ देते ही अंदर से और पुलीस वाले निकल आए और राजबीर को बुरी तरह जकड़ लिया। उसे अंदर सलाखों के पीछे फेंक दिया गया और एक पुलीसवाला उसके पास बैठ उससे पूछ पूछ कर सारा ब्योरा लिखने लगा। राजबीर समझ नहीं पा रहा था कि आख़िर उसे कैसे समझाए कि उसके साथ कोई बहुत बड़ा धोखा हुआ है। वो बार बार उस पुलीसवाले से कह रहा था कि उसने कोई खून नहीं किया है पर कोई उसकी बात मानने को तैय्यार नहीं था। उस लड़की की लाश गाड़ी से निकाल कर थाने में ले आयी गयी थी और गाड़ी की जाँच करने के लिए फ़ोरनसिक डिपार्टमेंट के लोगों को बुलवा लिया गया था। 

तभी बाहर से एक पुलीसवाला चिल्लाते हुए आया। बाहर कोई गाड़ी नहीं है भाइयों, गाड़ी बाहर दालान से ग़ायब हो गयी है। सारे पुलीसवाले बाहर भागे तभी राजबीर ने देखा कि वही लड़की जो कुछ देर पहले मर चुकी थी, स्ट्रेचर से उठी और थाने के बाहर की ओर चल दी। हालाँकि उसके पेट में लगा हुआ चाकू साफ़ साफ़ दिख रहा था पर वो बिना किसी दर्द के चलती हुई थाने के बाहर जा रही थी। थाने के दरवाज़े पर पंहुच कर उसने पलटकर राजबीर की ओर देखा और फिर ग़ायब हो गयी। राजबीर के रोंगटे खड़े हो गए थे। बाहर पुलीसवाले अभी ग़ायब हो चुकी गाड़ी के रहस्य को समझने में लगे थे कि ये सब नज़ारा देख राजबीर ने बुरी तरह चीख़ना शुरू कर दिया था। पुलीसवाले भागे भागे अंदर आए तो अंदर से उस लड़की की लाश गायब थी। राजबीर ने पहली बार इतने सारे वर्दी वालों को एक साथ काँपते देखा था। वो समझ गए कि ये कोई भयानक ऊपरी मामला है और अब उन्हें कुछ हद तक राजबीर की बात पर विश्वास हो चला था। 

सबूत और गवाह के न होने से अब वो राजबीर को हवालात में नहीं रख सकते थे, उसी पल उसे सलाखों की कैद से निकाल पुलीस की जीप में ही उसके घर वापिस छोड़ दिया गया। थका, हारा, रात के वाक़ये से बुरी तरह परेशान राजबीर घर में घुसा तो रात के ढाई बज चुके थे। उसने देखा कि किताब की शक्ल में वही मनहूस बक्सा अभी भी उसके बिस्तर पर पड़ा था और उसपर बना वो भयानक चेहरा अभी भी उसे घूर रहा था। उसने गुस्से में वो बक्सा उठाया और घर के बाहर फेंक दिया, इसके बाद वो सीधा जाकर अपने बिस्तर पर लेटा और नींद ने बेहोशी की शक्ल में उसे बुरी तरह जकड़ लिया। रात का सन्नाटा और गहरा हो चला था। 

बर्फ़ सी ठंडी किसी चीज़ के छूने से राजबीर की आँखें धीरे धीरे खुल रहीं थीं। पर बर्फ़ सी क्या, ये तो बर्फ ही थी, उसने महसूस किया तो मालूम हुआ कि वो अपने बिस्तर पर नहीं बल्कि एक मोटी सी बर्फ की सिल पर लेटा था। उसके कपड़े बदल चुके थे और उसके आस पास उसके सारे रिश्तेदार इकट्ठे हो बुरी तरह रो रहे थे। उसके माता पिता उसके पास बैठे आँसू भारी आँखों से लगातार उसकी ओर देख रहे थे। उसकी माँ रह रह कर उसके माथे पर हाथ फेर रही थी और बुरी तरह रोए जा रही थी, पर ऐसा कैसे हो सकता था? वो तो वापिस आकर अपने बिस्तर पर ही सोया था फिर फिर ये सब क्या था? राजबीर ने महसूस किया कि वो ज़िंदा था पर चाह कर भी हिल डुल नहीं पा रहा था। उसका शरीर किसी मुर्दे की तरह बेजान पड़ा था। वो सब कुछ महसूस कर रहा था पर न ही उसका दिल धड़ाक रहा था और न ही उसकी नब्ज़ चल रही थी। 

अपने रिश्तेदारों के साथ ही उसे पहले मर चुके उसके पुरखे और कई और भयानक आत्माएँ उसके आस पास चक्कर लगाती दिख रहीं थीं। कुछ हंस रहीं थीं, कुछ रो रहीं थीं और कुछ ऐसे ही शून्य में ताकती जा रहीं थीं। उसने मुँह से बोलने की पुरजोर कोशिश की, वो चीख चीख कर सबको ये बताना चाह रहा था कि वो ज़िंदा है, मारा नहीं पर उसके शरीर का कोई भी हिस्सा अब उसके क़ाबू में नहीं था। कुछ देर बाद वही हुआ जो किसीके मरने के बाद होता है, उसके मुर्दा पड़ चुके शरीर को नहलाया गया, उसकी अर्थी सजायी गयी, फूल और कफ़न चढ़ाया गया और उसकी अंतिम यात्रा म्शान के लिए निकल पड़ी। वो अपने आस पास सब कुछ महसूस कर रहा था, सुन रहा था पर जिंदा होते हुए भी इस तरह मुर्दो की तरह पड़े रहने के अलावा उसके पास कोई चारा भी तो नहीं था। 

कुछ देर बाद शशान पंहुच कर उसे चिता पर लेटा दिया गया था। वो बड़ा हैरान था कि कभी भी अंधेरा पड़ने के बाद अंतिम संस्कार नहीं किया जाता पर ये इस नामुराद रात में उसके साथ क्या हो रहा था। न तो अभी उजाला था और न ही वो कोई मुर्दा पर वो ये उन सबको बताता भी तो कैसे बताता? 

चिता सजायी गयी और उसकी जिंदा लाश को उसपर लेटा दिया गया और साथ ही अंतिम संस्कार के मंत्र बोलने शुरू कर दिए गए। इसके साथ ही चिता में आग लगा दी गयी और उसका बेजान शरीर जलती आग की सलाखों में कैद हो गया। उन लपटों के बीच से उसने देखा कि मंत्र पढ़ने वाला पंडित कोई और नहीं बल्कि वहीं आदमी था जिससे उसने वो शैतानी किताब खरीदी थी। उस बूढ़े की आँखें अंधेरे में चमक रहीं थीं और उसके हाथ में वही किताब थी जिसे राजबीर ने अपने घर के बाहर फेंक दिया था। 

किसी मोमबत्ती की तरह राजबीर का शरीर चिता की गरमी से मोम की तरह पिघल पिघल कर शशान की ज़मीन पर गिर रहा था। इतने दर्द का एहसास उसने अपनी पूरी जिंदगी में नहीं किया था और इतनी बेबसी उसने कभी भी महसूस नहीं की थी। 

तभी किसीने उस बूढ़े के हाथ से वो किताब ले सीधे आग की लपटों के हवाले कर दी। राजबीर ने ध्यान से देखा तो ये कोई और नहीं बल्कि खूबसूरत जामुनी ड्रेस पहने वही लड़की थी जिसने गाड़ी में उसे बड़े प्यार से गले लगाया था। उस लड़की के पेट में अभी वो चाकू वैसे ही घुसा हुआ था जैसे कि उसे अभी किसीने उसके पेट में उतारा हो, वो लड़की भी दर्द से कराह रही थी, पर फिर भी हिम्मत करते हुए उस लड़की ने बूढ़े के हाथ से वो किताब छीनकर सीधी राजबीर की जलती चिता में फेंक दी थी। यहाँ उस किताब ने आग की लपटों को छुआ और इसके एक पल बाद ही राजबीर ने ख़ुद को वापिस अपने बिस्तर पर लेटा पाया। 

लगभग सुबह होने को थी पर उसे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे कि वो बहुत ज़्यादा बीमार है। इतना बीमार कि उसमें सीधा खड़े रहने की भी हिम्मत नहीं थी, वो अपने बितर पर जा गिरा और सो गया। जब तक वो उठा दोपहर के बारह बज चुके थे, वो एक घंटा बिस्तर पर पड़ा करवटें बदलता रहा। रात को उसके साथ गुज़री बदकिस्मती के निशान अभी भी उसके ज़हन पर चोट कर रहे थे। उसे बहुत भूख लग रही थी। किसी तरह वो बिस्तर से उठा। कुछ देर बाद नहा धोकर उसने रसोई में जाकर अपने लिए खाना बनाने लगा। पर रसोई में वो अकेला नहीं था। उसके पीछे जामुनी ड्रेस में वही रात वाली लड़की किचन में उसके पीछे खड़ी उसे लगातार देख रही थी। राजबीर को प्यार भरी आँखों से देखती वो लड़की धीरे से उसके पास आयी और बोली वो बूढ़ा कोई आम किताब बेचने वाला नहीं बल्कि एक भटकता प्रेत है जो ज़िंदा शरीरों से आत्माएँ निकाल कर उन्हें तरह तरह से परेशान करता है, न तो वो ख़ुद खुश है और न ही उसके सामने आने वाला कोई और खुश रह पाता है। मुझे वो बरसों पहले मार चुका है और मेरा इस्तेमाल तुम्हारे जैसे आम लोगों को फँसाने में करता है। मैं मरने के बाद भी उससे इतना डरती हूँ कि उसकी बात को टाल नहीं पाती। उस बूढ़े प्रेत का हुक्म है इसलिए मेरे साथ आओ मुझे तुम्हें कुछ दिखाना है और इसके साथ ही वो पारी सी लड़की राजबीर का हाथ पकड़ कर उसे उसके बिस्तर के पास ले गयी। 

बिस्तर पर जो राजबीर ने देखा तो वो वहीं जम गया। बिस्तर पर राजबीर की लाश पड़ी थी। उसकी लाश के साथ ही वही मनहूस किताब रखी थी, जो अब कोई डिब्बा नहीं बल्कि किताब बन चुकी थी। वो लड़की जो खुद एक भटकती आत्मा थी, वो आगे बढ़ी, और वो किताब खोलकर राजबीर को दिखाने लगी। उसमें रात भर जो जो राजबीर के साथ गुज़रा था, बिलकुल वही सब लिखा था, और आखिरी पेज पर लिखा था। “मैं, राजबीर अपनी मर्जी से अपनी जिंदगी से और भयानक सपनों से तंग आकर तंग आकर आत्महत्या कर रहा हूँ” दस्तखत राजबीर राजबीर रात गए अपने सपने में ही मर चुका था। 

Horror Story- रुह का राज़ 

काजीरंगा के जंगलों में गहरी रात पड़ चुकी थी। सूरज की चाल रुकने के बाद आज शायद चाँद ने भी निकलने से मना कर दिया था। झींगुरों की आवाजें और चमकती बिजलियाँ इस वक़्त किसी के भी दिलों की धड़कनें बढ़ाने के लिए काफ़ी थीं। 

Horror Story- रुह का राज़ 

घने जंगल में दो पेड़ों के सहारे से लटके लकड़ी के बने एक ट्री हाउस में पुरानी घड़ी की सुइयाँ और झूलता पेंडलम अभी भी ज़िंदगी का अहसास कर रहे थे। माहौल में दहशत सी थी क्योंकि एक दूसरे के जानी दुश्मन फ्रैन्सिस और कुमार इसी मनहूस ट्री हाउस में एक दूसरे को रह रह कर बुरी तरह घूर रहे थे। उनके बीच की बातें मिलने के कुछ ही मिनटों में तना तनी पर उतर आयीं थीं। बीच बीच में उनके चलने से पुरानी लकड़ी के फ़र्श की चर्चराहट से माहौल और भयवना लग रहा था। 

मेज़ पर रखे अपने पेग में बर्फ़ डालते हुए गहरे सन्नाटे को भंग करने के लिए फ्रांसिस ने कुमार को बोस के लिए टोंट करते हुए एक बेकार सा सवाल पूछा 

“ये इन शानदार वादियों में छुपा पुराना लकड़ी का ट्री हाउस क्या वाक़ई में पोलीस की नज़र से इतना छुपा है कि कोई हमें यहाँ कोई भी क़ानूनी मुलाजिम ढूँढ नहीं पाएगा कुमार? मुझे तो कभी कभी लगता है कि बॉस का दिमाग़ 

अब सठिया गया है और तुम्हें और मुझे मिलकर धंधा सम्भाल लेना चाहिए” 

“छुपे काटिज का एक ही मतलब है मेरे लिए फ्रांसिस, जब बॉस ने कहा है कि ये छुपा है तो ये छुपा ही है न, समझदार कम लफ़्ज़ों में ही समझ जाते हैं प्रैन्सिस पर मैं समझ सकता हूँ तुम्हारी बात अलग ही है” कुमार ने तीखे शब्दों में वापिस टोंट किया। 

“बकवास बंद कर कुमार, मेरे पास तेरी फ़ालतू बातें सुनने का टाइम बिलकुल नहीं है, जल्दी बता मुझे यहाँ क्यूँ बुलाया है” और इसी के साथ फ़ैन्सिस ने अपनी अलग अलग जेबों से ५ रिवाल्वर एक-एक करके कुमार और अपने बीच रखी मेज़ पर निकाल कर रख दीं। 

“इस बेवकूफ़ाना हरकत का मतलब?” कुमार ने गुस्से से पूछा। इसके साथ ही कुमार का चेहरा काफ़ी सख़्त हो गया था। 

“कुछ नहीं कुमार, बस अपनी जेब का बोझ हल्का कर रहा हूँ और तेरे दिमाग़ का, तेरे हर क्यों का जवाब मेरे पास नहीं है, मुझे लगता है ये पाँचों रिवाल्वर मेरी पहरेदार रहेंगी और तेरी किसी भी ग़लत हरकत का जवाब यही देंगी” 

“ऐसा है तो फिर ये ले ये १ और ये २। ये दो गवाह मेरी तरफ़ से भी” और कुमार ने भी अपनी जेबों से दो रिवोलवेर निकाल कर फ़्रांसिस पर तान दी और बोला “जैसा मैंने पहले कहा कि तेरी बेवकूफ़ी पर मुझे अपनी अक़्ल से भी 

ज़्यादा भरोसा है फ़ैन्सिस। यहाँ हम सिर्फ बात करने आए थे पर इससे पहले कि बात शुरू हो तूने अपनी औक़ात पर आना ज़्यादा ज़रूरी समझा।” 

फ्रांसिस को हिलने की कोशिश करते देख कुमार अपने दाँत भींचता चिल्लाया “न-न हिलने की कोशिश भी मत करना। ये पाँच-पाँच रिवोल्वर अपने साथ रखने का क्या फ़ायदा फ़ैन्सिस, चलाने के लिए तो ऊपर वाले ने दो ही हाथ दिए हैं न, और शायद सबसे ज़्यादा ज़रूरी चीज़ है तेरा भेजा जो शायद ग़लती से तेरे अहंकार के सामने काफ़ी छोटा पड़ गया है। मुझे लगता है कि मैं पहले चेक ही कर लूँ कि तेरे पास भेजा है भी या नहीं?” 

और इससे पहले कि फ्रन्सिस के हाथ सामने रखे अपने पाँच पहरेदारों को कोई इशारा करते, कुमार ने ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाते हुए फ़ैन्सिस का जिस्म छलनी-छलनी कर दिया था। 

शायद पल के सौंवें हिस्से में ही ये सब हो गया था। 

कुमार ख़ुद हैरान था कि क्या इसके अलावा कोई और चारा भी हो सकता था? गोलियाँ चलाते हुए कुमार का दिल बिलकुल नहीं डरा था, और फिर बॉस ने इसी काम के लिए तो उसे यहाँ भेजा था। 

पर अब कुमार को सामने जो दिख रहा था उसे देख वो बुरी तरह से काँप गया था। उसके सामने अभी भी फैन्सिस ठीक-ठाक बैठा था और वही बेवकूफ़ाना हँसी, हँसते हुए 

उसे फिर से बुरी तरह घूर रहा था। तभी फ़ैन्सिस के इशारे पर पाँचों राइफ़लें हवा में उठीं और पलक झपकते ही कुमार का बदन छलनी छलनी हो ट्री हाउस की खिड़की से बाहर लटक रहा था, कुमार की आँखें दहशत से फटी पड़ीं थीं और उसका बदन जिसमें अभी शायद थोड़ी सी जान रही होगी, किसी सूखे पत्ते की तरह काँप रहा था। फ़ैन्सिस की रूह ठहाके लगाते हुए पाँचों रीवोलवरों के साथ वहाँ से ग़ायब हो चुकी थी। 

दोस्तों हमारे दिमाग़ और शरीर की क्षमताएँ यानी abilities हमारी समझ के तब तक परे हैं जब तक हम ख़ुद उन्हें जानने के लिए या जगाने के लिए अपने दिमाग़ को तैय्यार न करें। टेली काइनेसिस एक ऐसी क्षमता है जिससे कि एक जीता जागता व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति के द्वारा सामने रखी चीज़ों को दूर से ही नियंत्रित यानी कंट्रोल कर सकता है और आत्माओं के पास तो कई ऐसी शक्तियाँ खुद ब खुद ही आ जाती हैं क्योंकि मरने के बार शरीर के पाँच तत्वों का बोझ उनपर नहीं होता, होती है तो एक ऐसी ख़ालिस ताक़त जिसे वो चाहें तो किसी के भले के लिए इस्तेमाल करें या किसी के बुरे के लिए। 

जो आत्माएँ भौतिक वस्तुओं को उठा कर कंट्रोल कर सकती हैं या उठाकर फेंक सकती हैं उन्हें poltergiest कहा जाता है। इसके कई उदाहरण आपको इंटर्नेट और यू टूब पर मिल जाएँगे। बाक़ी किसी भी सवाल का जवाब ढूँढने से पहले ही उसे फ़ेक या झूठ कह देना आज का faishon है। यदि किसी को स्मार्ट दिखना है तो उसे बस इतना करना है कि हर बात पर डाउट करता रहे। पर यदि वास्तव में किसीको अपने दिमाग़ और आत्मा की ताक़त के बारे में जानना है तो उसे ध्यान यानी meditation करना चाहिए और इससे उसे अपने सब सवालों के जवाब ख़ुद ही मिलने शुरू हो जाएँगे। 

ङ्केखैर, कॅन्सिस की आत्मा कुमार का खून कर उस ट्री हाउस से ग़ायब हो चुकी थी। 

इधर रात को चमचमाती मुंबई के एक शानदार बंगले के बड़े से शानदार हॉल में हल्का हल्का संगीत चल रहा था। हाल में लगे बिस्तर पर लेटे डॉन के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आयीं थीं। डॉन की सबसे क़रीबी रूबीना ने एक जाम अपने लिए और दूसरा डॉन के लिए बनाया और पेग को अपने होठों से लगाकर बड़े ही दिलकश अन्दाज़ में एक हल्का सा घूट भरने के बाद बोली “जब काम के लिए आपने ख़ुद कुमार को भेजा है तो फिर आप क्यों परेशान हो रहे हैं डॉन? आपका चेला कुमार क्या आज तक कभी फ़ेल हुआ है? हो न हो अब तक उसने फैन्सिस का काम ख़त्म कर ही दिया होगा, पँन्सिस जैसा आस्तीन का साँप अगर जिंदा रहता तो किसी दिन हमें ही डस लेता” 

तभी जाने कैसे टेबल पर बॉस के लिए रखा जाम तबले के बीच से खुद ही सरकता हुआ ज़मीन पर गिर कर टुकड़े टुकड़े हो इटेलियन मार्बल के शानदार फ़र्श पर फैल चुका था। 

“अपने शब्द चुन कर बोलने चाहिएँ रूबीना, कहते हैं दिन में एक बार जुबान से कहा सब सच हो जाता है। ” कमरे के एक कोने में बैठे प्रैन्सिस की सर्द आवाज़ ने रूबीना को सर से पाँव तक काँपने पर मजबूर कर दिया था। उस हाल में कोने में रखे एक सोफे पर बैठे फॅन्सिस के अक्स के आर-पार दिख रहा था, जिस पँन्सिस को बॉस और रूबीना पहले से जानते थे ये उससे काफ़ी अलग लग रहा था। 

“तुम यहाँ क्या कर रहे हो पँन्सिस, यहाँ कैसे आए?” बॉस ने बिना पलक झपके या सकपकाए हुए गहरी रोबदार 

आवाज़ में फैन्सिस से पूछा। 

“मौत के घोड़े पर सवार रूहों को तुम्हारी संगमरमर की दीवारें नहीं रोक सकतीं बॉस। तुम्हारे चेले की लाश वहाँ काजीरंगा के जंगलों में पड़ी-पड़ी सोच रही होगी कि आख़िर वो मरा । तुम्हारे भेजे पिछले खूनी की लाश भी इसी हाल में कहीं समंदर के किनारे पड़ी होगी पर फ़र्क ये है कि वही था जिसने मुझे मेरे शरीर से आज़ाद किया था। एक ही पल में हम दोनों की बंदकों ने एक दूसरे के चीथड़े उड़ा दिए थे। उससे मिल कर लगा ही था कि कोई शेर है पर ये तुम्हारा कुमार तो गीदड़ निकला” है 

कई सौ लोगों की लाशों पर पैर रख रख कर कामयाबी की इस सीढ़ी पर पंहुचा डॉन फ्रन्सिस की ये बात सुन खिलखिलाकर हंस पड़ा और बोला “फ्रेंन्सिस तेरी ये गीदड़ वाली बात कुछ हद्द तक तो ठीक ही है शायद पर फ़र्क सिर्फ एक है।” 

इतना कहकर डॉन ने सामने रखी नक्काशीदार टेबल को हल्का सा घुमा दिया और और इतने में फ़ाइव स्टार होटेल के स्वीट के पिछले कमरे से एक खुंखार बड़ा सा भेड़िया हल्की गुर्राहत के साथ चलते हुए उस हालनुमा कमरे में दाखिल हुआ और बॉस के साथ आकर खड़ा हो गया। बॉस बिना पीछे मुड़े उस भेड़िए के सर के बालों में हाथ फेरता हुआ बोला “ये गीदड़ नहीं है फ़ैन्सिस ये तो एक भेड़िया है, एक मानव भेड़िया यानी वेयरवोल्फ” ये वो मानव भेड़िया है जिसे चाँद की रोशनी नहीं चाहिए खुद को इंसान से भेड़िए में बदलने के लिए। ये जब चाहे इस रूप में आ सकता है जैसे अभी ये वहाँ लाश बनकर पड़ा था और अब यहाँ खड़ा है क्योंकि तुम्हारी तरह ही ये भी अपनी आम आदम जिंदगी से आज़ाद हो चुका है। हाँ फ्रन्सिस कुमार पिछले पांच सालों से एक वेयरवोल्फ बन चुका है” 

इतने में बॉस का रूप भी काफ़ी भयानक हो गया, उसके भद्दे मुँह के दोनों किनारों के दाँत अचानक बड़े बड़े हो कर मुंह से बाहर आ गए, वो हवा में लहराता हुआ फ़ैन्सिस की आत्मा के पास आया और टेबल के पास की ज़मीन की ओर इशारा करते हुए बोला “ये देख हम कोई आम शराब नहीं बल्कि इंसान का ही खून ही पी रहे हैं, तू अगर ये सोचता है कि आज के दौर में इंसान होकर कोई आसमान की बुलंदियाँ छू सकता है तो तेरे से बड़ा पागल नहीं है फ्रन्सिस, आज कामयाबी पाने के लिए आदमी को आदमी का खून पीना ही पड़ता है और वो चाहे इंसान बनके हो या वैम्पायअर यानी पिशाच बन के और मैं तो ये काम पिछले १२८ सालों से करता आ रहा हूँ, देख वो ज़मीन पर कुमार ये नर-भेड़िये के रूप में जो चाट रहा है न वो इंसानी खून ही है” इसके साथ ही बॉस और रूबीना ठहाका लगाकर हंस पड़े। 

फ्रन्सिस ने कभी नहीं सोचा था कि अंडवर्ल्ड का किंगपिन ये बॉस कोई वैम्पायअर होगा, फ्रन्सिस, बॉस के नीचे काम करते हुए भी उससे हमेशा नफ़रत ही करता रहा था। इसका सबूत उसने अलग अलग मौक़ों पर बॉस के कई क़रीबी लोगों को उलटा सीधा बहकाने की कोशिश करते हुए दिया था बॉस को उसने अपने बचपन से ही अंडवर्ल्ड पर राज करता देखा था। बॉस का एक ही काम था हर किसी को किसी न किसी चीज़ की लत लगा कर अपना गुलाम बना लेना फिर उसे चिंता नहीं होगी कि उसके साथ काम करने वाला उसे छोड़ जाएगा या धोखा देगा। हर किसी के लिए बॉस के पास कोई न कोई नशा था पर फ़ैन्सिस बिल्कुल नहीं जानता था कि बॉस के साथ काम करने वाले ज़्यादातर मुलाजिम भी एक ख़तरनाक नशे का शिकार हैं और वो नशा है इंसानी खून। 

उनकी ये हँसी फैन्सिस के अहंकारी वजूद को बिलकुल भी बर्दाश्त नहीं हुई और उसकी रूह उसी पल वहाँ से ग़ायब हो गयी। भेड़िया बना कुमार ज़मीन से चाटकर सारा खून साफ़ कर चुका था और अब अपनी लम्बी लाल जीभ अपनी नाक के आस पास फिराते हुए बेसब्री से बॉस की तरफ़ देख रहा था। बॉस ने सामने रखी खून से भरी काँच की दूसरी बोतल उठायी और ज़मीन पर दे मारी। और वो नर भेड़िया बना कुमार एक बार फिर ज़मीन की लाली साफ़ करने में मशगूल हो गया। जंग शायद बिना कहे ही तय हो चुकी थी। एक अतृप्त भटकती आत्मा और एक शक्तिशाली वैम्पायअर के बीच में। 

बॉस ये जान चुका था कि जीते-जी उसे नुक़सान पंहुचाने का कोई मौक़ा न छोड़ने वाला फैन्सिस अब मरने के बाद तो उसे किसी न किसी तरह नुक़सान पंहुचाना चाहेगा ही। 

और अब तो उसे मौत का डर भी नहीं है। अब वो एक ङ्केआदमी से कहीं ज्यादा ताक़तवर हो चुका है और उसकी नफ़रत की आग इस बदले को और भी भयानक बना देगी। 

वैसे तो एक आत्मा एक पिशाच का ज़्यादा क्या बिगाड़ सकती थी पर जैसे हर चीज़ की शुरुआत होती है वैसे ही उसका अंत भी लिखा होता है, किसी का पहले तो किसी का बाद में। 

फैन्सिस की आत्मा ने यहाँ-वहाँ बसावट में, शहरों में, जंगलों जैसी वीरान जगहों, सन्नाटों में, जिन्न और रूहों को बाँधने वालों के आस-पास और शमशानों, क़ब्रस्तानों में भटकना शुरू कर दिया था। उसे बेसब्री से अपने पिशाच बॉस से इन्तक़ाम चाहिए था। हालाँकि इसमें उसके किसी न किसी के द्वारा कैद हो जाने का ख़तरा भी था पर उसके शरीर की रस्सी जल जाने के बाद भी उसके अहंकार के बल नहीं गए थे। और वो जानता था कि ये बदला लिए बिना उसकी रूह को कभी चैन नहीं मिलेगा। 

ऐसी ही एक शाम उसकी रुह भटकते-भटकते किसी गहरे सुनसान जंगल के किसी गुमनाम कोने पर पँहुची, वहाँ इतना सन्नाटा था कि लग रहा था सिर्फ एक बहता झरना ही है जो शायद इस सुनसानियत में कुछ बात कर रहा है। वो कुछ डेर वहीं रुक कर साफ़ बहते पानी को देख कर सोचने लगा कि जब वो ज़िंदा था तब यही पानी कैसे उसकी प्यास बुझाता था, आज अगर वो जिंदा होता तो इतना साफ़ सुंदर पानी उसके गले को कितनी ठंडक पंहुचाता। तभी उसने देखा कि झरने का पानी बीच बीच में लाल हो उठता था। कहीं से खून की एक छोटी सी धार आती और फिर बहते बहते ग़ायब हो जाती। उसने झरने के साथ साथ ऊपर जाने का फैसला किया। और काफ़ी ऊपर हवा में तैरते तैरते जब वो ऊपर पंहुचा तो उसने देखा कि उस झरने के ठीक ऊपर एक बड़ा सा घर था जिसकी नाली से रह-रह कर खून बहकर निकल रहा था। 

थोड़ा और ऊपर जाकर फ़ैन्सिस की आत्मा उस घर की पिछली दीवार के आर पार हो घर के अंदर दाख़िल हो गयी और वहाँ जो उस रूह को दिखाई दिया वो कुछ ही समय पहले जिंदगी से आज़ाद हुए फॅन्सिस के लिए भी काफ़ी अजीब और भयानक था। सामने एक लम्बा-चौड़ा सा काला आदमी शेर की खाल लपेटे हुए बड़ा सा पैना चाकू हवा में लहरा रहा था, उसने खोपड़ियों की बड़ी सी बेल्ट अपने पेट पर बाँध रखी थी, उसके चेहरे पर अलग अलग रंगों से अजीब अजीब से क़बीलाई निशान बने थे। वो इतना ताक़तवर लग रहा था कि पँन्सिस इस रूप में भी घबरा रहा था कि कहीं वो उसे देख न ले। वो ताक़तवर राक्षस जैसा आदमी बार बार कोई अजीब सा मंत्र बुदबुदा रहा था 

ओ हीर वान वू दू मनीफ़ेस्टीर इन माई (यानी ओ वू-डू के मालिक मुझमें प्रकट हो )और नीचे बैठी लगभग बेहोश सी एक लड़की की गर्दन पर उसी चाकू से घाव कर रहा था, वो घाव करता था और उस लड़की की गर्दन से खून रिसता था, उसके बाद वो जैसे ही मंत्र बोलता था वो घाव खुद ही भर जाता था, ऐसा लग रहा था जैसे कि उस लड़की में चीखने की हिम्मत भी नहीं बची थी। वो गर्दन से पैरों तक खून से नहा चुकी थी। उस लड़की ने खुद को ढंकने के लिए सिर्फ एक तौलिए जैसा ही कुछ पहना था। कमरे में चारों ओर खून ही खून फैला था। पर उस लड़की की बेबसी का उस भयानक आदमी पर बिलकुल किसी तरह का कोई असर होता नहीं दिख रहा था। वो लगभग साढ़े-छह फ़ीट का बलिष्ठ काला सा आदमी था। कुछ आधे घंटे तक ये सिलसिला ऐसे ही चलता रहा और उसके बाद उस आदमी ने चाकू को पास रखे एक लकड़ी के टुकड़े में घोंपा और अपने दोनों हाथ हवा में उठाकर ऊपर की ओर देखते देखते वहीं जम गया। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें एकदम सफ़ेद हो गयीं थीं। 

पॅन्सिस की आत्मा ने वहाँ से निकलने की हर बार सोची पर हर बार उस कमरे की दीवारों के पास पंहुचते ही कोई अनजानी ताक़त उसे वापिस कमरे में धकेल देती थी। चाहे पॅन्सिस की ज़िंदगी कैसी भी रही थी पर ये नज़ारा देखते ही उसका मन उस लड़की के लिए काफ़ी परेशान हो गया था। दोस्तों, मौत के बाद भी अगर किसीकी रूह भटकती है तो उसकी सोच, उसका मन भी उसी के साथ भटकता है और वही मुर्दा शरीर छोड़ देने के बाद भी आत्मा को यहाँ वहाँ भटकने पर मजबूर कर देता है। इस कमरे में आने के बाद पॅन्सिस की रूह भी अपनी सोच में काफ़ी बदलाव महसूस 

कर रही थी। 

“ब्लूद वान दूइया ससी यू राक” “ब्लूद वान दूइया ससी यू राक”*

“ब्लूद वान दूइया ससी यू राक”  यानी सिर्फ मुर्दा खून ही तेरा इंतक़ाम है। 

एक केन ग़ीस वान फ्रंकीस दात जयहीयर इस। यानी मैं जानता हूँ फ़ैन्सिस की रूह कि तू यहाँ है। 

मोआनी बेकोम्मेरद वीस नाई, वांत ऐक साल जोऊ हेल्प यानी चिंता मत कर, मैं तेरी मदद करूंगा। 

और इसी तरह उस काले आदमी ने बताया कि वो एक अफ़्रीकन वू-डू तांत्रिक है और उस लड़की पर किसी तरह का अत्याचार नहीं कर रहा, बल्कि ये तो एक अफ्रीकन वू डू तरीक़ा है किसी के बुरे कर्म और पुराने श्राप को हटाने के लिए। इसके बदन के ज़ख़्म इसके बुरे कर्मों को काट रहे हैं 

और इस वू-डू साधना से इसकी रूह के ज़ख़्म भरते जा रहे हैं। जो रह रह कर उस नाली में बह रहा है वो सिर्फ़ इसका लहू ही नहीं बल्कि इसके पापों का बोझ है जो क़तरा क़तरा हल्का हो रहा है। जल्दी ही ये अपने बुरे भूतकाल याने पास्ट से मुक्त हो जाएगी और अपनी आत्म को और ताक़तवर बनाने के लिए और बाक़ी लोगों की मदद के लिए आगे की साधनाओं में लग जाएगी। 

इस घावों से रिसते लहू के साथ साथ इसने ख़ुद को उन चाहतों से अलग कर लिया है जिसे जीते-जी कोई भी इंसान अपनी ज़रूरत समझता है। अच्छा स्वाद, अच्छा घर, शरीरों की कभी ना ख़त्म होने वाली प्यास, दौलत, शोहरत, जिनके लिए कोई किसी का भी खून तक कर सकता है उनसे अलग होने के लिए ये अपना लहू बहा रही है। ये कोई छोटी साधना नहीं है। इसने ख़ुद को इंसान की भलाई के लिए समर्पित कर दिया है और जल्द ही इसके साथ मिलकर मैं और कुछ लोगों को इसी तरह जिंदा और मुर्दा लोगों की भलाई के लिए तैय्यार करूँगा। 

फ्रन्सिस की रूह उस आदमी की बातें सुन मन ही मन बुरी तरह पछता रही थी कि आख़िर जीतेजी ही वो ये समझ ङ्केजाता तो आज इस हाल में न भटक रहा होता 

“वूर वान बूते माक यू सील राई वान आल्ले सोंदेस” यानी पश्चताप की आग तुम्हारी आत्मा को हर पाप से आज़ाद कर देगी 

“माक रेज,लूद वान दूइया ससी यू राक”  यानी, तैयार हो जा, मुर्दा खून ही तेरा इंतक़ाम है। 

इसके साथ ही उस आदमी ने उस लड़की की सर पर हाथ फेरा और बोला- 

 माक जीरीड गुले, जाई मोए आईट्स बाए मुंबई 

अफ़्ले वेर यानी, तैय्यार हो जाओ गुले, तुम्हें कुछ सामान मुंबई पहुँचाना है। 

और इसके साथ ही अपने सर पर उसके हाथ के स्पर्श से ही गुले नाम की वो लड़की उठकर ऐसे खड़ी हो गयी जैसे कुछ हुआ ही न हो। उस वू-डू पुजारी ने अपना हाथ हवा में लहराया और बोला ओ फ़्रांसिस की आत्मा तुझे यहाँ देखकर ऐसा लग रहा है कि मौत के बाद भी इंसान की क़िस्मत नहीं मरती। और इसके पल भर बाद ही फ्रांसिस की आत्मा भी वहाँ से गायब हो गयी। 

 

इधर, मुंबई में बॉस, रूबीना और कुमार के साथ बैठा कुछ गम्भीर बात कर रहा था। इस समय बॉस, रूबीना और कुमार तीनों आम इंसान के रूप में ही बैठे थे कि बॉस ने रूबीना को एक जाम तैयार करने का इशारा किया। अभी रूबीना जाम बनाने को उठी ही थी कि उनके कमरे के दरवाज़े पर एक दस्तक हुई। 

पलक झपकते ही रूबीना अपनी जगह से ग़ायब हुई और दरवाज़े के पास प्रकट होकर उसने दरवाज़ा खोल दिया। नीचे, दरवाज़े के पास एक बोतलों का क्रेट रखा था। काँच की बारह खूबसूरत बोतलों के साथ एक कार्ड रखा था जिसपर लिखा था **”फ्रोम द काऊंट ओफ़ त्रांसलवेनिया” ** यानी “त्रांसिलवेनिया के काउंट की ओर 

से” 

रूबीना उस कार्ड को देखते ही ख़ुशी से पागल हो उठी और बॉस से बोली “ड्रैक्युला महान आपको आज भी भूले नहीं 

हैं बॉस, आपके लिए खास तोहफ़ा है उनकी ओर से” और इसके साथ ही उसने खून से भारी उन बोतलों का क्रेट बॉस के सामने टेबल पर रख दिया। बॉस की आँखों में भी खुशी की चमक दौड़ गयी। 

वाह क्या सही वक़्त पर तोहफ़ा मिला है, लाओ रूबीना आज इन्हीं बोतलों में आए ताज़े खून से जाम बना दो और। इतनी खून की बोतलों को सामने देख कुमार भी खुद को रोक नहीं पा रहा था और धीरे धीरे आदम भेड़िए में तब्दील हो रहा था। 

रूबीना को अपने और बॉस के लिए जाम बनाने में ज़्यादा देर नहीं लगी। बॉस को जाम देते हुए रूबीना बोली “इस तोहफ़े को देख ऐसा लगता है कि आज तो मौत भी माँग लेते तो हमें मिल ही जाती, है न बॉस” 

जब तक जाम बॉस के हाथों में पंहुचा कुमार पूरा भेड़िया बन चुका था, एक खूखार भयानक नर भेड़िया। खून की प्यास ने उसके अंदर के जानवर को उसपर इतना हावी कर दिया था कि वो ख़ुद को रोक नहीं पाया और बोतलों से भरे क्रेट पर छलाँग लगा दी। बॉस और रूबीना ने अभी जाम का एक एक घुट ही लिया था कि वो दोनों दर्द से क़राह उठे। अपने गले उन्होंने इतनी तेज़ी से पकड़ लिए कि जैसे कोई उनके गले तेज़ी से दबा रहा है। बरसों से उनकी गंदी रगों में दौड़ता कई मासूमों का खून उन दोनों की आँखों में उतार आया था। बाँस बड़ी ज़ोर से चिल्लाया “धोखा, किसीने हमें मुर्दे का खून पिला दिया है”। 

“मैंने कहा था न रुबीना, अपने शब्द चुन कर बोलने चाहिएँ, कौन जाने कब जुबान से निकली बात सच हो जाए” कमरे के एक कोने में बैठे फॅन्सिस की सर्द आवाज़ ने रूबीना और बॉस की ये आख़िरी तड़प कई गुना बढ़ा दी 

थी। 

“जीतेजी इंसानों का ताज़ा खून रोज़ बोतलों में भरवाकर पीने वालों, आज आखिरी बार जो गहरा लाल लहू तुमने चखा है वो मुर्दो का लहू है और एक बहुत ही क़ाबिल वू डू तांत्रिक ने इसे अपनी साधना की ताक़त से तैयार किया है, आज के बाद तुम किसी का लहू नहीं पी पाओगे और उसके इतना कहते ही उन पिशाचों, बॉस और रूबीना के गंदे शरीरों को आग की लपटों ने बुरी तरह जकड़ लिया। 

बॉस और रूबीना अपने जलते पापी शरीरों के साथ उस आलीशान ज़मीन पर पड़े बिना पानी की मछली की तरह तड़प रहे थे पर उनकी भयानक चीख़ों का कुमार से भेड़िए बने उस आदमखोर जानवर पर कोई असर नहीं हो रहा था, इतना खून एक साथ पीने को उसे पहले कभी नहीं मिला था। खून और आग से भरे उस मार्बल के फ़र्श पर दो क़दम एक चाँदी का बड़ा सा चाकू लिए उस नर भेड़िए की ओर तेज़ी से बिना कोई आवाज़ किए पंहुचे और सीधा उसकी खोपड़ी में वो चाकू उतार दिया गया। ये क़दम गुले के ही थे जो कमरे के दरवाज़े के बाहर क्रेट रखने के बाद छुप गयी थी और कमरे का दरवाज़ा खुलते ही वो चाकू लिए कमरे में दाखिल हो गयी थी। जैसा जैसा उस वू-डू तांत्रिक ने बताया था, गुले ने वैसा ही किया और उसका नतीजा ये था कि उन पिशाचों के जलते शरीरों के साथ साथ उस भेड़िए का शरीर भी बुरी तरह गल-गल कर ख़त्म हो रहा था पर हैरान करने वाली बात ये थी कि मरते मरते भी उस भेड़िए की खून की प्यास ख़त्म नहीं हो रही थी। जब तक वो गल कर पूरी तरह ख़त्म नहीं हो गया उसकी जीभ वहाँ फैले खून को चाटती ही रही। हैवानी लालच का ये बड़ा घिनौना मंज़र था। 

तीनों शैतान ख़त्म हो चुके थे। गुले ने ऊपर की ओर देखकर अपने हाथ जोड़े और इसके बाद उस कमरे से चुपचाप चली गयी। इस पूरे वाक़ये ने फ्रांसिस को अपने पापों पर अफ़सोस करने को इस क़दर मजबूर कर दिया था कि उस पश्चताप की आग ने उसके दिल से हर तरह की नफ़रत को ख़त्म कर दिया था। फ्रांसिस ख़ुद को पहले से काफ़ी अलग और हल्का महसूस कर रहा था। ये सब देख फ्रांसिस ने भी मन ही मन ऊपर वाले को याद किया और उसकी इस याद में जाने क्या जादू रहा होगा की फ्रांसिस की रुह भी वहाँ से ग़ायब हो गयी। 

उम्मीद है, इस सबके बाद उसकी आत्मा को भी शांति मिल गयी होगी। 

 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

19 − fourteen =