Horror kahani hindi-15 प्लेनचिट पर आत्मा का आह्वान 

Horror kahani hindi

Horror kahani hindi– 15 प्लेनचिट पर आत्मा का आह्वान 

तंत्र एक विलक्षण विद्या है। प्राचीन समय से ही तंत्र के बारे में यह धारणा रही है कि इसके द्वारा अद्भुत और असंभव कार्य किए जा सकते हैं। इसी कारण तंत्र ने सदैव मनुष्य को आकर्षित किया है। समय-समय पर देश-विदेश के अनेक महापुरुषों ने तंत्र साधने की कोशिश की थी। उन्हें सफलता मिली या असफलता यह तो अलग बात है लेकिन तंत्र की ओर लेखकों के आकर्षित होने के प्रसंग बहुत रोचक हैं। 

एक अमेरिकी महिला एलिजाबेथ कूटन ने उपन्यास लिखने में बहुत नाम कमाया है। उपन्यासकार बनने से पहले एलिजाबेथ कूटन एक साधारण महिला थीं। एक दिन उन्हें तंत्र पर एक किताब पढ़ने को मिली। जिसमें प्लेनचिट पर प्रेतात्माओं के आह्वान का तरीका बताया गया था। एलिजाबेथ कूटन की रुचि जागी और उन्होंने प्लेनचिट का प्रयोग करके देखा। एलिजाबेथ को अपने पहले प्रयास में सफलता मिली, लेकिन प्लेनचिट पर जिस आत्मा का आह्वान किया गया वह नहीं आई बल्कि एक लेखक की आत्मा आ गई। लेखक की आत्मा ने एलिजाबेथ के माध्यम से एक उपन्यास पूरा करना चाहा। जब एलिजाबेथ ने अपनी असमर्थता व्यक्त की तो लेखक आत्मा ने उसे डराया-धमकाया। आखिर एलिजाबेथ को उपन्यास लिखने के लिए बाध्य होना पड़ा। लेखक की आत्मा रोज एकांत में कूटन को डिक्टेशन देती और कूटन उसे ज्यों-का-त्यों उतार लेती। 

उपन्यास पूरा होने पर लेखक की आत्मा ने उपन्यास को प्रकाशित कराने में एलिजाबेथ की मदद की। उपन्यास बड़ा लोकप्रिय हुआ और उपन्यासकार के रूप में एलिजाबेथ कूटन की ख्याति सर्वत्र फैल गई। फिर क्या था? आत्मा के निर्देश पर एलिजाबेथ कूटन ने एक के बाद एक कई उपन्यास लिखे और नाम के साथ साथ उसने पैसा भी कमाया।अपने जीवन के अंत में एलिजाबेथ कूटन ने रहस्योद्घाटन किया कि उपन्यास उसके द्वारा नहीं लिखे गए हैं बल्कि किसी गुमनाम लेखक की आत्मा द्वारा लिखवाए गए हैं। इस तरह तंत्र के छोटे से प्रयोग ने एलिजाबेथ कटन के जीवन की दिशा बदल दी। 

Horror story books in hindi- एंड्रयू वर्दी की रहस्यमय डायरी 

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यह घटना द्वितीय विश्व युद्ध के समय की है। युद्ध पूरे जोर पर था। 10 मई 1941 को जर्मन वायुसेना के बमवर्षक विमानों ने लंदन पर बमों की जोरदार वर्षा की। इस हमले में लंदन का अत्यधिक प्रसिद्ध होकल अलेक्जेंड्रा पूरी तरह नष्ट हो गया। इस होटल में ठहरे मेहमानों के साथ इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध प्रकाशक एंड्रयू वर्दी भी मारे गए। उस दिन की लंदन पर हुई यह सबसे भयानक बम वर्षा थी। 

एंड्रयू वर्दी की मृत्यु के बाद उनकी प्रकाशन संस्थान के संचालन की सारी जिम्मेदारी उनके पुत्र जेम्स वर्दी के कंधों पर आ पड़ी।

एक दिन कोई महत्त्वपूर्ण जानकारी पाने के लिए जेम्स अपने पिता की 1914 की डायरी को देख रहा था। तब यह देखकर वह घोर आश्चर्य में पड़ गया कि उस डायरी में 10 मई का पन्ना बिल्कुल खाली था, यहां तक कि उस पर 10 मई की तारीख भी नहीं छपी थी। 

चूंकि यह डायरी उन्हीं के प्रकाशन संस्थान ने अपने एजेंटों, पुस्तक-विक्रेताओं और ग्राहकों में वितरण के लिए छापी थी, इसलिए जेम्स को यह डर हुआ कि कहीं ऐसा न हुआ हो कि यह गलती सभी डायरियों में रह गई हो। जेम्स ने गोदाम में रखी बची हुई सारी डायरियों की जांच कराई। पता लगा कि किसी भी डायरी में 10 मई का पन्ना खाली नहीं था। 

जिन लोगों को डायरियां भेजी गई थीं उन सभी को पत्र भेजे गए, परंतु सभी ने स्वीकारा की सभी की डायरियां दुरुस्त थीं। किसी भी एजेंट या पुस्तक विक्रेता या ग्राहक ने इससे पहले भी डायरी के 10 मई के पन्ने के खाली होने की शिकायत नहीं की थी। 

सिर्फ एंड्रयू वर्दी की डायरी में ही 10 मई 1941 का पन्ना खाली था। 10 मई 1941 अर्थात् उसकी मौत का दिन। यह रहस्य आज भी अनसुलझा हुआ है कि आखिर एंड्रयू वर्दी की डायरी में ही 10 मई का पन्ना खाली क्यों है? 

प्रेतात्मा द्वारा मरीजों की देखभाल 

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ग्रेसी इस अस्पताल में कभी मेट्रन थी, लेकिन अब उसकी प्रेतात्मा मरीजों की देखभाल करती है और जैसा कि भूतों के बारे में प्रचलित है कि वे रात में ही सक्रिय होते हैं, ग्रेसी की प्रेतात्मा भी रात को ही अपनी ड्यूटी’ निभाती है। प्रिंस हेनरी अस्पताल सिडनी शहर से दूर समुद्र तट के पास लिटिल बे में स्थित है। इसकी स्थापना 1881 में की गई थी। पहले इसका नाम ‘द कोस्ट हास्पिटल’ था. लेकिन 1934 में ग्लाउसेस्टर के ड्यूक हेनरी के आगमन पर यह नाम दिया गया। 1960 के दशक में इसका पुनर्निर्माण और विस्तार हुआ और यह आज भी मौजूद है। साथ ही मौजूद हैं इसके अनेक प्रेत-प्रसंग भी।

ग्रेसी की प्रेतात्मा की इस नाइट-ड्यूटी के खास गवाह अस्पताल के ‘बी’ ब्लाक के मरीज हैं। इस वार्ड को आजकल ‘डेलानी वार्ड’ के नाम से जाना जाता है। यहां इलाज के लिए दाखिल मरीज बताते हैं कि आधी रात के बाद पुरानी शैली की सफेद नर्सिंग कैप सिर पर लगाए एक रहस्यमयी नर्स वार्ड में आती है और उनकी सेवा करती है। वह उनके खाली गिलासों में पानी भरती है, सर्द रातों में उन्हें ठीक से कंबल ओढ़ाती है, जरूरत पड़ने पर उनके नीचे बैड-पैन रखती है और इस्तेमाल होने के बाद उन्हें हटाती भी है। मजे की बात यह है कि मरीजों को यह आभास तक नहीं होता कि एक प्रेतात्मा वार्ड में है और वही उनकी देखभाल कर रही है। लेकिन वहां की नसें इस हकीकत से वाकिफ हैं और उससे भयभीत भी रहती हैं। हालांकि ग्रेसी को दुष्ट आत्मा के रूप में कभी नहीं समझा गया, लेकिन वह उस जमाने का प्रतिनिधित्व करती है, जब नर्स का दबदबा रहता था। इसलिए उसके डर से नर्से फटाफट उसके आदेशों का पालन भी कर डालती हैं। कई मौकों पर नौं ने ग्रेसी की प्रेतात्मा की उपस्थिति महसूस की है। उन्होंने महसूस किया है कि वह उनके कामकाज पर नजर रखती है। जब भी वे कॉफी ब्रेक लेती हैं, ग्रेसी उसे पसंद नहीं करती। एक बार तो दो नर्से दूध उबालने के लिए चूल्हे पर रख, वार्ड में झांकने चली गईं। करीब एक-डेढ़ मिनट बाद वे लौटकर आईं तो चूल्हा बंद था। बर्तन का दूध सिंक में फेंका जा चुका था और बर्तन ताजा ताजा धोकर रखा गया था। अब इतनी जल्दी तो ये सारा काम कोई प्रेतात्मा ही कर सकती थी। ग्रेसी की प्रेतात्मा के इन कामों से उसकी छवि एक सहृदय और सीधी सादी समर्पित नर्स की बनती है। पर वास्तविक जीवन में वह रूखे मिजाज और सनकी आदतों वाली नर्स थी। वह इतनी नकचढ़ी थी कि किसी से रास्ते में छू जाने या टकरा जाने पर फौरन नहाने चली जाती थी। इसी अस्तताल के ‘बी’ ब्लाक में लिफ्ट की बेकार पड़ी एक शाफ्ट में रहस्यपूर्ण परिस्थितियों में गिरकर उसकी मृत्यु हुई थी। दरअसल इस अस्पताल की स्थापना टायफाइड, कोढ़ तथा चेचक जैसे अन्य संक्रामक रोगों के मरीजों के इलाज के लिए की गई थी। हजारों मरीज यहां आए। कई ठीक हुए, तो काफी संख्या में मरे भी। ऐसे में ग्रेसी जैसी बिगडैल मत्य के बाद प्रेतात्मा बनकर जीवन-काल में किए अपने व्यवहार के लिए प्रायश्चित कर रही हो, तो आज आश्चर्य है! ग्रेसी की प्रेतात्मा के आने का भी एक निश्चित समय है। वह रात को ठीक दो बजे ही आती है और उस वक्त घड़ी की सुइयां रुक जाती हैं। ग्रेसी की प्रेतात्मा के बाद अगर किसी दूसरी आत्मा की चर्चा होती है तो वह है एक आदिवासी लड़के की आत्मा। यह आत्मा भी इस अस्पताल के ‘बी’ ब्लॉक में विचरती है। लेकिन वह ब्लॉक की पीढ़ियों पर ही आकर बैठती है और यहां आने-जाने वाली नौं व दूसरे लोगों के साथ बालसुलभ छेड़छाड़ करती है। 

कभी वह सीढ़ियों पर बैठा खिलखिलाता दिखता है। इन दो प्रेतात्माओं के अलावा और भी कई आत्माओं के किस्से इस अस्पताल से जुड़े हैं। आए दिन कुछ-न-कुछ ऐसा सुनने-देखने में आता रहता है, जिससे इस धारणा की पुष्टि होती है कि यहां एक-दो नहीं कई आत्माएं विचरती हैं। कभी किसी ने किसी उपकरण का स्विच ही ऑफ कर दिया। एक आत्मा किसी भारी-भरकम व्यक्ति की है। गलियारों की दीवारों पर उसके पचिह्न उसके भारी पांवों की कहानी कहते हैं। इस आत्मा की पहचान नहीं हो सकी है। अस्पताल में बंद पड़े खाली वार्डों से नों को बुलाने के लिए बजर सुनाई पड़ते हैं। इतना कुछ होने के बावजूद अस्पताल में काम करने वालों और इलाज करवा रहे मरीजों को कोई परेशानी नहीं होती। उनके लिए ये एक सामान्य और रोजमर्रा की बातें हो गई हैं। लेकिन सवाल उठता है कि एक ही जगह पर इतनी आत्माओं का डेरा क्यों? इसका जवाब भी शायद अस्पताल के पिछवाड़े बने उसके पुराने और खासे बड़े कब्रिस्तान में है, जहां कभी एक हजार से ज्यादा विभिन्न लोगों को दफनाया गया था। 

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