द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास |History of World War II

द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास

द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास (Second World War) (1939-1945) 

सन् 1939 से 1945 तक चलने वाला द्वितीय विश्व युद्ध, विश्व के युद्धों के इतिहास में सर्वाधिक संहारक युद्ध साबित हुआ। इस युद्ध में 70 देशों की जल, थल, वायु सेनाओं ने युद्ध लड़ा। 

इस युद्ध में भी दो पक्ष सामने आए-एक पक्ष मित्र राष्ट्र कहलाया, दूसरा पक्ष धुरी राष्ट्र। धुरी राष्ट्रों में मुख्य तीन देश थे-(1) जर्मनी, (2) इटली, (3) जापान। 

मित्र राष्ट्रों में-(1) ब्रिटेन, (2) फ्रांस, (3) अमेरिका, (4) सोवियत, रूस, तथा अन्य सभी देश थे। द्वितीय विश्व युद्ध में इटली, मित्र राष्ट्रों से अलग होकर धुरी राष्ट्रों में शामिल हो गया था। 

सैनिकों की संख्या और मानव क्षति 

इस युद्ध में विभिन्न राष्ट्रों के लगभग 10 करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया। 5 से 7 करोड़ सैनिक तथा नागरिकों की जाने गयीं। बम वर्षक विमानों ने खुलकर हिस्सा लिया, जिसके कारण असंख्य सैनिक नागरिकों की जानें गयीं। इस युद्ध में परमाणु हथियारों का भी इस्तेमाल हुआ जिसकी वजह से अन्त में मित्र राष्ट्रों की जीत हुई।

 द्वितीय विश्व युद्ध  की शुरूआत 

द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास

यद्यपि जापान और चीन में 1937 ई० से ही युद्ध की अवस्था बनी हुई थी। परन्तु सामान्यतः 1 सितम्बर, 1939 को इसकी शुरूआत मानी गयी, जबकि जर्मनी ने पौलेण्ड पर हमला कर दिया। जवाब में फ्रांस ने जर्मनी पर आक्रमण कर दिया। इंग्लैण्ड, तथा इसके गठबन्धन में शामिल देश (राष्ट्रमण्डल देश) ने फ्रांस का खुला समर्थन कर युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी। 

जर्मनी ने 1931 में यूरोप में अपनी शक्ति दर्शाने के उद्देश्य से अडोल्फ हिटलर के नेतृत्व में पौलेण्ड पर हमला बोल दिया। 1931 के अन्त से 1941 की शुरूआत तक, अभियान तथा संधि की एक श्रृंखला में जर्मनी ने महाद्वीपीय यूरोप का बड़ा भाग या तो अपने अधीन कर लिया था या उसे जीत लिया था। हिटलर सोवियत समझौते के तहत सोवियत रूस अपने छः पड़ोसी मुल्कों, जिसमें पौलेण्ड भी शामिल था, पर काबिज हो गया। फ्रांस की हार के बाद युनाइटेड किंगडम और अन्य राष्ट्रमण्डल देश ही धुरी राष्ट्रों से संघर्ष कर रहे थे, जिसमें उत्तरी अफ्रीका की लड़ाईयां तथा अटलांटिक की लड़ाई शामिल थी। जून, 1941 में यूरोपीय धुरी राष्ट्रों ने सोवियत संघ पर हमला बोल दिया और इसने मानव इतिहास में जमीनी युद्ध के सबसे बड़े रणक्षेत्र को जन्म दिया। 

दिसम्बर, 1941 को जापानी साम्राज्य भी, धुरी राष्ट्रों की तरफ से इस युद्ध में कूद पड़ा। दरअसल जापान का उद्देश्य पूर्वी एशिया तथा इंडोचायना में अपना प्रभुत्व स्थापित करने का था। उसने प्रशान्त महासागर में यूरोपीय देशों के आधिपत्य वाले क्षेत्रों तथा संयुक्त राज्य अमेरिका के ‘पर्ल हार्बर’ पर हमला बोल दिया और जल्द ही पश्चिमी प्रशान्त पर कब्जा बना लिया। 

सन् 1942 में आगे बढ़ती धुरी सेना पर लगाम तब लगी, जब पहले तो जापान सिलसिलेवार कई नौसैनिक झड़पें हारा, यूरोपीय धुरी ताकतें उत्तरी अफ्रीका में हारी और निर्णायक मोड़ तब आया जब उनको लेलिनग्राड में हार का मुंह देखना पड़ा। 

सन् 1943 में जर्मनी पूर्वी यूरोप में कई झड़पें हारा, इटली में मित्र राष्ट्रों ने आक्रमण बोल दिया तथा अमेरिका ने प्रशान्त महासागर में जीत दर्ज करनी शुरू कर दी, जिसके कारण धुरी राष्ट्रों को, सारे मोर्चों पर सामरिक दृष्टि से पीछे हटने की रणनीति अपनाने को मजबूर होना पड़ा। 

सन् 1944 में जहां एक ओर पश्चिमी मित्र देशों ने जर्मनी द्वारा कब्जा किए हुए फ्रांस पर आक्रमण किया वहीं दूसरी ओर से सोवियत संघ ने अपनी खोई हुयी जमीन वापस छीनने के बाद जर्मनी तथा उसके सहयोगी राष्ट्रों पर हमला बोल दिया। 

सन् 1945 के अप्रैल-मई में सोवियत और पोलैण्ड की सेनाओं ने बर्लिन पर कब्जा कर लिया और यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध का अन्त 8 मई, 1945 को तब हुआ जब जर्मनी ने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया। 

सन् 1944 और 1945 के दौरान अमेरिका ने कई जगहों पर जापानी नौसेना को शिकस्त दी और पश्चिमी प्रशान्त के कई द्वीपों में अपना कब्जा बना लिया। जब जापानी द्वीपसमूह पर हमला करने का वक्त करीब आया तो अमेरिका ने जापान में दो परमाणु बम गिरा गए। 15 अगस्त, 1945 को एशिया में भी द्वितीय विश्व युद्ध तब समाप्त हो गया जब जापानी साम्राज्य ने आत्मसमर्पण करना स्वीकार कर लिया।

 द्वितीय विश्व युद्ध आरम्भ होने के मुख्य कारण 

द्वितीय विश्व युद्ध का इतिहास

प्रथम विश्व युद्ध में हार के बाद जर्मनी को ‘वर्साय की संधि’ पर जबरन हस्ताक्षर करना पड़ा था। इस संधि के कारण उसे अपने कब्जे की बहत सारी जमीन छोड़नी पड़ी; किसी दूसरे देश पर आक्रमण नहीं करने की शर्त माननी पड़ी। अपनी सेना को सीमित करना पड़ा और उसको प्रथम प्रथम विश्व युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई के रूप में दूसरे देशों को धन का भुगतान करना पड़ा।

1917 में रूस में गृह युद्ध के बाद सोवियत संघ का निर्माण हुआ जोकि जोसफ स्टालिन के शासन में था, 1922 में उसी समय इटली में बेनेटो मुसोलिनी का एकाधिपत्य राज्य कायम हुआ।

1933 में जर्मनी का शासक अडोल्फ हिटलर बना और तुरन्त ही उसने जर्मनी को एक शक्तिशाली सैन्य ताकत के रूप में प्रदर्शित करना शुरू कर दिया। इस बात से फ्रांस और इंग्लैण्ड चिन्तित हो गए, जोकि पिछली लड़ाई में काफी नुकसान उठा चुके थे। इटली भी इस बात से परेशान था क्योंकि उसे भी लगता था कि जर्मनी उसके काम में दखल देगा। उसका सपना भी शक्तिशाली सैन्य ताकत बनने का था। 

इन सब बातों को देखकर और अपने आप को बचाने के लिए फ्रांस ने इटली के साथ हाथ मिलाया और उसके अफ्रीका में इथियोपिया जो उसके कब्जे में था, को इटली को देने का मन बना लिया। 1935 में बात और बिगड़ गईक जब हिटलर ने वर्साय की संधि को तोड़ दिया और अपनी सेना को बड़ी करने का काम शुरू कर दिया। 

जर्मनी को काबू में करने के लिए इंग्लैण्ड, फ्रांस और इटली ने स्ट्रेसा नामक शहर (जो इटली में है) में एक घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए जिसमें यह लिखा था कि ऑस्ट्रिया की आजादी को कायम रखा जाए और जर्मनी को वर्साय की संधि तोड़ने से रोका जाए। लेकिन स्ट्रेसा घोषणा-पत्र ज्यादा सफल नहीं हुआ क्योंकि तीनों राज्यों के बीच में आम सहमति ज्यादातर बातों पर नहीं बनी। उसी समय सोवियत संघ जो जर्मनी के पूर्वी यूरोप के बड़े हिस्से को कब्जा करने की मंशा से डरा हुआ था, फ्रांस से हाथ मिलाने को तैयार हो गया। 

1935 में इंग्लैण्ड ने वर्साय की संधि को दरकिनार करते हुए जर्मनी के साथ एक स्वतन्त्र करार करके कुछ पुरानी शर्तों को कम कर दिया। 1935 की अक्टूबर में इटली ने इथियोपिया पर आक्रमण कर दिया और सिर्फ जर्मनी ने इस आक्रमण को वैध माना जिसके कारण इटली ने जर्मनी को आस्ट्रिया पर कब्जा करने की मंशा को हरी झंडी दे दी। 1936 में जब हिटलर ने रयानलैण्ड को दोबारा अपनी सेना का गढ़ बनाने की कोशिश की तो उस पर ज्यादा आपत्तियां नहीं उठाई गईं। उसी साल स्पेन में गृह युद्ध चालू हुआ तो जर्मनी और इटली ने वहां की राष्ट्रवादी ताकत का समर्थन किया। जो सोवियत संघ की सहायता वाली स्पेनिश गणराज्य के खिलाफ थी। नए हथियारों के परीक्षण के बीच में राष्ट्रवादी ताकतों ने 1939 में युद्ध जीत लिया। 

जैसे-जैसे समय बीतता गया तनाव बढ़ता रहा और अपने आप को ताकतवर करने की कोशिशें बढ़ती गईं। तभी जर्मनी और इटली ने रोम-बर्लिन अक्ष-रेक्षा (Rome-Berlin Axis) बनाई और फिर जर्मनी ने जापान के साथ मिलकर साम्यवाद विरोधी करार (Anti Comintern Pact) किया जो चीन और सोवियत संघ के खिलाफ मिलकर काम करने का था। इटली भी इसमें 1940 में शामिल हो गया।

युद्ध पूर्व की स्थिति

1937 में चीन और जापान मार्को पोलो में आपस में लड़ रहे थे। उसी के बाद जापान ने चीन पर पूरी तरह से धावा बोल दिया। सोवियत संघ ने चीन को अपना पूरा समर्थन दिया। जापान सेना ने शंघाई से चीन की सेना को हराना शुरू किया तथा उनकी राजधानी बेजिंग पर कब्जा कर लिया। 

1938 में चीन ने अपनी पीली नदी को बाढ़ ग्रस्त कर दिया इससे उसको थोड़ा समय मिल गया, लेकिन फिर भी वो जापान को रोक नहीं पाया। इसी बीच सोवियत संघ और जापान के बीच में छोटा युद्ध हुआ पर वो लोग सीमा पर ज्यादा व्यस्त हो गए। 

यूरोप में जर्मनी और इटली और ताकतवर होते जा रहे थे। 1938 में जर्मनी ने आस्ट्रिया पर हमला बोल दिया तब दूसरे यूरोपियन देशों ने इसका ज्यादा विरोध नहीं किया। इस बात से उत्साहित होकर हिटलर ने सदतनलैण्ड जोकि चेकोस्लोवाकिया का पश्चिमी हिस्सा है, जहां जर्मन भाषा बोलने वालों की ज्यादा तादात थी, वहां पर हमला बोल दिया। फ्रांस और इंग्लैण्ड ने इस बात का हल्के से लिया जर्मनी से कहा की जर्मनी उनसे वादा करे की वो अब कहीं और हमला नहीं करेगा। लेकिन जर्मनी ने इस वादे को नहीं निभाया और उसने हंगरी के साथ मिलकर 1939 में पूरे चेकोस्लोवाकिया पर कब्जा कर लिया। 

देंजिंग शहर जो की प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी से अलग करके पोलैण्ड को दे दिया गया था। इसका संचालन देशों का संघ (League of Nations) (लीग ऑफ नेशन्स) नामक विश्वस्तरीय संस्था कर रही थी, जोकि प्रथम विश्व युद्ध के बाद स्थापित हुई थी, इस देजिंग शहर पर जब हिटलर ने कब्जा करने की सोची तो फ्रांस और जर्मनी ने पोलैण्ड को अपनी आजादी के लिए समर्थन देने को तैयार हो गए। 

जब इटली ने अल्बानिया पर हमला बोला तो यही समर्थन रोमानिया और ग्रीस को भी दिया गया। सोवियत संघ ने भी फ्रांस और इंग्लैण्ड के साथ हाथ मिलाने की कोशिश की लेकिन पश्चिमी देशों ने उसका साथ देने से इन्कार कर दिया। क्योंकि उनको सोवियत संघ की मंशा और उसकी क्षमता पर शक था। 

फ्रांस और इंग्लैण्ड की पोलैण्ड को सहायता के बाद इटली और जर्मनी ने भी समझौता पैक्ट ऑफ स्टील किया जिसमें निश्चय हुआ कि वे पूरी तरह एक-दूसरे के साथ हैं। 

सोवियत संघ यह समझ गया था कि फ्रांस और इंग्लैण्ड को उसका साथ पसन्द नहीं। ऐसे में यदि जर्मनी अगर उस पर हमला करेगा तो भी फ्रांस और इंग्लैण्ड उसके साथ नहीं होंगे। तब उसने जर्मनी के साथ मिलकर उस पर आक्रमण न करने का समझौता (नॉन अग्ग्रेसन पैक्ट) पर हस्ताक्षर किए और खुफिया तौर पर पोलैण्ड और बाकी पूर्वी यूरोप को आपस में बांटने का ही करार शामिल किया। 

सितम्बर, 1939 में सोवियत संघ ने जापान को अपनी सीमा से खदेड़ दिया। उसी समय जर्मनी ने पोलैण्ड पर हमला बोल दिया। फ्रांस, इंग्लैण्ड और राष्ट्रमण्डल देशों ने भी जर्मनी के खिलाफ हमला बोल दिया। परन्तु यह हमला बहुत बड़े पैमाने पर नहीं था, सिर्फ फ्रांस ने एक छोटा हमला सारलैण्ड पर किया जोकि जर्मनी का एक राज्य था। 

सोवियत संघ के जापान के साथ युद्ध विराम के घोषणा के बाद खुद ही पोलैण्ड पर हमला बोल दिया। अक्टूबर, 1939 तक पोलैण्ड जर्मनी और सोवियत संघ के बीच विभाजित हो चुका था। इसी दौरान जापान ने चीन के एक महत्वपूर्ण शहर चंघसा पर आक्रमण कर दिया पर चीन ने उन्हें बाहर खदेड़ दिया। पोलैण्ड पर हमले के बाद सोवियत संघ ने अपनी सेना को बाल्टिक देशों (लातविया, एस्टोनिया, लिथुनिया) की तरफ मोड़ दिया। 

नवम्बर, 1939 में फिनलैंड पर जब सोवियत संघ ने हमला बोला तो युद्ध जो विंटर वार के नाम से जाना जाता है वो चार महीने चला और फिनलैंड को अपनी थोड़ी-सी जमीन खोनी पड़ी। उसने सोवियत संघ के साथ मॉस्को शान्ति करार पर हस्ताक्षर किए जिसके तहत उसकी आजादी को नहीं छीना गया। पर उस सोवियत संघ के कब्जे वाली फिनलैंड की जमीन को छोड़ना पड़ा। जिसमें फिनलैंड की 12 प्रतिशत जनसंख्या रहती थी। उसका दूसरा बड़ा शहर स्योर्ग शामिल था। 

फ्रांस और इंग्लैण्ड ने सोवियत संघ के फिनलैंड पर हमले को द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल होने का बहाना बनाया और जर्मनी के साथ मिल गए। सोवियत संघ को देशों का संघ (League of Nations) (लीग ऑफ नेशन्स) से बाहर करने की कोशिश की गयी। चीन के पास इस कोशिश को रोकने का मौका न था। क्योंकि वो देशों का संघ (League of Nations) (लीग ऑफ नेशन्स) का सदस्य था। लेकिन वो इस प्रस्ताव में शामिल नहीं हुआ, क्योंकि वह न तो सोवियत संघ से और न ही पश्चिमी ताकतों से अपने आप को दूर रखना चाहता था। सोवियत संघ इस बात से नाराज हो गया और चीन को मिलने वाली सारी सैनिक मदद को रोक दिया। जून, 1940 में सोवियत संघ ने तीनों बाल्टिक देशों पर कब्जा कर लिया।

 द्वितीय विश्व युद्ध  युद्ध का परिणाम 

सन् 1939 से 1945 तक चले इस विश्व युद्ध में 7 करोड़ से ज्यादह इन्सानी जिन्दगियां युद्ध की भेंट चढ़ीं। युद्ध में जिस महत्वकांक्षा के साथ जर्मनी ने अपनी मुख्य और अग्रणी भूमिका निभाई थी, वह युद्ध के अन्तिम चरण पहुंचने से पूर्व ही पूरी तरह टूट गयी। रूस की फौजें जब बर्लिन तक घुस आयीं तो युद्ध नेता अडोल्फ डिटलर को आत्महत्या करनी पड़ी। 

जर्मनी ने अड़ोस-पड़ोस के राज्यों के जीतने के स्थान पर अपना बहुत सारा क्षेत्र खो दिया। 

इटली का पतन, जर्मनी के पतन से पहले हो चुकाथा। इटली के तानाशाह मुसोलिनी की इटली के ही राष्ट्रवादियों ने निर्दयता के साथ हत्या करके इस बात का दुनिया को संदेश दिया कि उन्हें युद्ध से नफरत है, वे युद्ध नहीं शान्ति चाहते हैं। 

जापान के दो प्रमुख नगरों हिरोशिमा और नागासाकी को परमाणु बम का दंश झेलना पड़ा। ये परमाणु बम अमेरिका ने अपने नौसैनिक अड्डे ‘पर्ल हार्बर’ को, जापान द्वारा बमबारी करके तबाह किए जाने के बदले में गिराए थे। दोनों नगर पलक झपकते ही पूरी तरह तबाह हो गए। इन नगर के लोगों का कोई कुसूर न था। एक लाख से ज्यादह लोग परमाणु बम से सामने आयी तबाही के शिकार हुए। 

इस विश्व युद्ध के बाद दुनिया का नक्शा तेजी के साथ बदला। अनेक नए देशों का अस्तित्व विश्व मानचित्र पर अंकित हुआ।

केवल जर्मनी, इटली और जापान को ही नहीं ब्रिटेन को भी काफी बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। ब्रिटेन, जिसके बारे में कहा जाता था कि उसका सूर्य नहीं डूबता अर्थात् जिसकी हुकूमत पूर्व से पश्चिम तक थी, वह पश्चिम में ही सिमट कर रह गया। उसके औपनिवेशिक राज्य एक-एक करके आजाद हो गए। 

एक बड़ी उपलब्धि यह सामने आयी कि संयुक्त राष्ट्र संध (U.N.O) का अस्तित्व सामने आया। जो विश्व को एकता के सूत्र में बांधने के प्रयास में रत है। देशों के बीच तनाव होने पर अपनी प्रभावी भूमिका निभाता है।

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