प्रथम विश्व युद्ध का इतिहास | History of World War First

प्रथम विश्व युद्ध का इतिहास

प्रथम विश्व युद्ध का इतिहास  (First World War) (1914-1919) 

विश्व युद्धों के इतिहास में 1914 से 1919 तक होने वाले विशाल पैमाने के युद्ध इस तरह फैल गए थे, जिससे दुनिया का हर देश किसी न किसी रूप में प्रभावित हुआ। चारों ओर फैल जाने वाले युद्धों के कारण ही इसे विश्व युद्ध कहा गया। बाद में 1939 से 1945 तक नए विश्व युद्ध ने जब अपना अस्तित्व बनाया तो इस विश्व युद्ध को प्रथम विश्य युद्ध नाम दिया गया। 

यह महायुद्ध यूरोप, एशिया व अफ्रीका तीन महाद्वीपों और जल, थल तथा आकाश में लड़ा गया। इसमें भाग लेने वाले देशों की संख्या, इसका क्षेत्र (जिसमें यह लड़ा गया) तथा इससे हुई क्षति के अभूतपूर्व आंकड़ों के कारण ही इसे विश्व युद्ध कहते हैं।

प्रथम विश्व युद्ध का कारण 

प्रथम विश्व युद्ध का कारण 

ऑस्ट्रिया के सिंहासन के उत्तराधिकारी आर्चड्युक फर्डिनेंड और उनकी पत्नी का वध इस युद्ध का तात्कालिक कारण था। यह घटना 28 जून, 1914 को सेराजेवो में हुई थी। एक मास पश्चात् ऑस्ट्रिया ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध घोषित किया। रूस, फ्रांस और ब्रिटेन ने सर्बिया की सहायता की और जर्मनी ने आस्ट्रिया की। 

अगस्त में जापान, ब्रिटेन आदि की ओर से, और कुछ समय बाद टर्की, जर्मनी की ओर से, युद्ध में शामिल हुए। यह महायुद्ध यूरोप, एशिया व अफ्रीका तीन महाद्वीपों और जल, थल तथा आकाश में लड़ा गया। प्रारम्भ में जर्मनी की जीत हुई। 1917 में जर्मनी ने अनेक व्यापारी जहाजों को डुबोया। इससे अमेरिका ब्रिटेन की ओर से महायुद्ध में कूद पड़ा किन्तु रूसी क्रान्ति के कारण रूस महायुद्ध से अलग हो गया। 1918 ई० में ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका ने जर्मनी आदि राष्ट्रों को पराजित किया। जर्मनी और आस्ट्रिया की प्रार्थना पर 11 नवम्बर, 1918 को युद्ध की समाप्ति हुई।

युद्धों का विवरण 

इस महायुद्ध के अन्तर्गत अनेक युद्ध हुए। इनमें से टेनेनबर्ग (26 से 31 अगस्त, 1914), माने (5 से 10 सितम्बर, 1914), सरी बईन (Sari Bair) तथा सूबला खाड़ी (6 से 10 अगस्त, 1915), वर्दू (21 फरवरी, 1916 से 20 अगस्त, 1917), आमिएँ (8 से 11 अगस्त, 1918), एवं वित्तोरिओ बेनेतो (23 से 29 अक्टूबर, 1918) इत्यादि की लड़ाइयों को अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व दिया गया 

जर्मनी द्वारा किए गए 1916 के आक्रमणों का प्रधान लक्ष्य बर्दू था। महाद्वीप स्थित मित्र राष्ट्रों की सेनाओं का विघटन करने के लिए फ्रांस पर आक्रमण करने की योजनानुसार जर्मनी की ओर से 21 फरवरी, 1916 ई० को बर्दू युद्धमाला का श्रीगणेश हुआ। 

नौ जर्मन डिवीजन ने एक साथ मॉजेल (Moselle) नदी के दाहिने किनारे पर आक्रमण किया तथा कई युद्ध मोर्चों पर अधिकार किया। फ्रेंच सेना का ओज जनरल पे” (Petain) की अध्यक्षता में इस चुनौती का सामना करने के लिए बढ़ा। जर्मन सेना 26 फरवरी को बर्दू की सीमा से केवल पांच मील दूर रह गई। कुछ दिनों तक घोर संग्राम हुआ। 

15 मार्च तक जर्मन का आक्रमण शिथिल पड़ने लगा तथा फ्रांस को अपनी व्यूह रचना तथा रसद आदि की सुचारु व्यवस्था का अवसर मिल गया। म्यूज के पश्चिमी किनारे पर भी भीषण युद्ध छिड़ा जो लगभग अप्रैल तक चलता रहा। मई के अन्त में जर्मनी ने नदी के दोनों ओर आक्रमण किया तथा भीषण युद्ध के उपरान्त 7 जून को वाक्स (Vaux) का किला लेने में सफलता प्राप्त की। जर्मनी अब अपनी सफलता के शिखर पर था। 

फ्रेंच सैनिक मार्ट होमे (Mert Homme) के दक्षिणी ढालू स्थलीय मोर्चों पर डटे हुए थे। संघर्ष चलता रहा। ब्रिटिश सेना ने सॉम (Somme) पर आक्रमण कर बर्दू को छुटकारा दिलाया। 

जर्मनी का अन्तिम आक्रमण 3 सितम्बर को हुआ। जनरल मैनगिन (Mangin) के नेतृत्व में फ्रांस ने युद्ध के अन्तिम युद्ध के उपरान्त जर्मनी के हाथ में केवल ब्यूमांट (Beaumout) रह गया। युद्धों ने फ्रेंच सेना को शिथिल कर दिया था, जबकि आहत जर्मनों की संख्या लगभग तीन लाख थी और उसका जोश फीका पड़ गया था। 

आमिएँ (Amiens) के युद्धक्षेत्र में मुख्यतः खाइयों की लड़ाइयां हुईं। 21 मार्च से लगभग 20 अप्रैल तक जर्मन अपने मोर्चे से बढ़कर अंग्रेजी सेना को लगभग 25 मील ढकेल आमिऐं के निकट ले आए। उनका उद्देश्य वहां से निकलने वाली उस रेलवे लाइन पर अधिकार करना था, जो कैले बन्दरगाह से पेरिस जाती है और जिससे अंग्रेजी सेना और सामान फ्रांस की सहायता के लिए पहुंचाया जाता था। 

लगभग 20 अप्रैल से 18 जुलाई तक जर्मन आमिऐं के निकट रुके रहे। दूसरी ओर मित्र देशों ने अपनी शक्ति बहुत बढ़ाकर संगठित कर ली तथा उनकी सेनाएं जो इससे पूर्व अपने-अपने राष्ट्रीय सेनापतियों के निर्देशन में लड़तीं थीं, एक प्रधान सेनापति, मार्शल फॉश के अधीन कर दी गई। 

जुलाई, 1918 के उपरान्त जनरल फॉश के निर्देशन में मित्र देशों की सेनाओं ने जर्मनों को कई स्थानों में परास्त किया। 

जर्मन प्रधान सेनापति लूडेनडार्फ ने उस स्थान पर अचानक आक्रमण किया जहां अंग्रेजी तथा फ्रांसीसी सेनाओं का संगम था। यह आक्रमण 21 मार्च को प्रातः 4 बजे, जब कोहरे के कारण सेना की गतिविधि का पता नहीं चल सकता था, 4000 तोपों की गोलाबारी से आरम्भ हुआ। 4 अप्रैल को जर्मन सेना कैले पेरिस रेलवे से केवल दो मील दूर थी। 11-12 अप्रैल को अंग्रेजी सेनापतियों ने सैनिकों से लड़ मरने का अनुरोध किया। 

तत्पश्चात् एक सप्ताह से अधिक समय तक जर्मनों ने आमिऐं के निकट लड़ाई जारी रखी, पर वे कैले-पेरिस रेल लाइन पर अधिकार न कर सके। अंग्रेजों को फ्रांसीसियों से पृथक् करने का प्रयास असफल रहा। 

20 अप्रैल से लगभग तीन महीने तक जर्मन मित्र देशों को अन्य क्षेत्रों में परास्त करने का प्रयत्न करते रहे, और सफल भी हुए। किन्तु इस सफलता से लाभ उठाने को अवसर उन्हें नहीं मिला। मित्र देशों ने इस भीषण स्थिति में अपनी शक्ति बढ़ाने के प्रबन्ध कर लिए थे। 

25 मार्च को जनरल फॉश इस क्षेत्र में मित्र देशों की सेनाओं के सेनापति नियुक्त हुए। ब्रिटेन की पार्लियामेन्ट ने अप्रैल में सैनिक सेवा की उम्र बढ़ाकर 50 वर्ष कर दी, और 3,55,000 सैनिक अप्रैल मास के भीतर ही फ्रांस भेज दिए। अमेरिका से भी सैनिक फ्रांस पहुंचने लगे थे, और धीरे-धीरे उनकी संख्या 6,00,000 पहुंच गई। नए अस्त्रों तथा अन्य आविष्कारों के कारण मित्र देशों की वायुसेना प्रबल हो गई। विशेषकर उनके टैंक प्रभावशाली सिद्ध हुए। 

15 जुलाई को जर्मनों ने अपना अन्तिम आक्रमण मार्न नदी पर पेरिस की ओर बढ़ने के प्रयास में किया। फ्रांसीसी सेना ने इसे रोककर तीन दिन बाद जर्मनों पर उसी क्षेत्र में शक्तिशाली आक्रमण कर 30,000 सैनिक बन्दी किए। फिर 8 अगस्त को आमिऐं के निकट जनरल हेग की अध्यक्षता में ब्रिटिश तथा फ्रांसीसी सेना ने प्रातः 4 बजे कोहरे की आड़ में जर्मनों पर अचानक आक्रमण किया। 

इस लड़ाई में चार मिनट तोपों से गोले चलाने के बाद, सैकड़ों टैंक सेना के आगे भेज दिए गए, जिनके कारण जर्मन सेना में हलचल मच गई। आमिएँ के पूर्व आब्र एवं सॉम नदियों के बीच 14 मील के मोर्चे पर आक्रमण हुआ, और उस लड़ाई में जर्मनों की इतनी क्षति हुई कि सूडेनडोर्फ ने इस दिन का नामकरण जर्मन सेना के लिए काला दिन किया। 

15 जुलाई, 1919 के बाद जर्मनी ने पूर्णतः आत्म समर्पण कर दिया। लीग ऑफ नेशन्स ने युद्ध रुकवाने और समझौता कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाकर ‘वर्साय संधि’ करायी। इस संधि में जर्मनी को भयानक अपमान सहना पड़ा। अपमान के साथ-साथ उसने देश का काफी भाग हाथ से निकल गया, जिसे मित्र देशों फ्रांस और ब्रिटेन ने बांट लिया। युद्ध हर्जाना भी लगाया गया, जिसे अदा करने के प्रयास में जर्मनी आर्थिक दिवालिये की स्थिति में पहुंच गया। 

प्रथम युद्ध में सहभागी गठबन्धन देश थे-ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, रूस, इटली। युद्ध में सहभागी केन्द्रीय शक्ति (CentralPower) वाले देश थे-आस्ट्रिया (हंगरी) जर्मनी, ओटोमन बल्गारिया। 

सहभागी गठबन्धन देशों के मारे गए सैनिकों की संख्या 55 लाख 25 हजार, घायल सैनिकों की संख्या 41 लाख 21 हजार थी। 

सहभागी केन्द्रीय शक्ति के देशों के मारे गए सैनिकों की संख्या 43 लाख 86 हजार, घायल सैनिकों की संख्या 83 लाख 88 हजार थी। 

इस विश्व युद्ध में मानवता का जो संहार हुआ वह युद्धों के सम्पूर्ण इतिहास से कहीं ज्यादह था।

भारत की भागीदारी

1914 से 1919 तक चलने वाले विश्व युद्ध में भारत की भागीदारी भी थी। उस समय भारत ब्रिटिश राज्य का एक औपनिवेशिक देश था अतः ब्रिटेन ने विश्व युद्ध में भारतीय सेना का इस्तेमाल किया। इस युद्ध में गड़वाल राइफल्स रेजीमेन्ट का इस्तेमाल किया गया, जिसमें अनेकों भारतीय जवान युद्ध मोर्चे पर शहीद हुए। गड़वाल राइफल्स सिपाहियों ने जो शौर्य और साहस दिखाया था उसकी स्मृति में दो सैनिकों को ब्रिटिश सरकार ने दो विक्टोरिया क्रास प्रदान किए थे।

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