मैसूर का तृतीय और चतुर्थ युद्ध का इतिहास |History of the third and fourth wars of Mysore

History of the third and fourth wars of Mysore

मैसूर का तृतीय और चतुर्थ युद्ध का इतिहास |History of the third and fourth wars of Mysore(1791-1792 व 1799 ई०) 

यह युद्ध तृतीय आंग्ल मैसूर युद्ध और चतुर्थ आंग्ल मैसूर युद्ध भी कहलाता है। इस युद्ध का नायक हैदर अली का पुत्र टीपू सुल्तान रहा, जिसने द्वितीय 

आंग्ल-मैसूर युद्ध के अन्तिम चरणों में पिता के घायल होने के बाद खुद युद्ध में भूमिका अदा की थी और बंगलौर सन्धि करके 1784 ई० में युद्ध का पटाक्षेप किया था। 

जो सन्धि 1784 में हुई थी वह ब्रिटिश सेनापति लार्ड मैकार्टनी और टीपू सुल्तान के बीच हुई थी। इस सन्धि को लेकर भारत का ब्रिटिश गवर्नर जराल असहमत था। उसका अपने सेनापति के बारे में उक्ति थी 

“यह लार्ड मैकार्टनी कैसा आदमी है? मैं अभी भी विश्वास करता हूं कि इस सन्धि के बाद कर्नाटक को खो बैठेगा।” 

असन्तुष्ट लार्ड कार्नवालिस ने तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध की कूटनीति खुद तय की। उसने तृतीय आंग्ल-मैसूर युद्ध के लिए मराठों और निजाम हैदराबाद के साथ सन्धि पर हस्ताक्षर कराकर उन्हें सैन्य सहयोग के लिए बाध्य किया। इस सन्धि को ‘त्रिगुट सन्धि’ भी कहा जाता है। 

कार्नवालिस ने पूरी तैयारी के साथ, मैसूर को राजधानी श्रीरंगपट्टम पर हमले का आदेश दे दिया। टीपू सुल्तान के नेतृत्व में मैसूर सेना ने श्रीरंगपट्टम की युद्ध भूमि में घमासान युद्ध करते हुए त्रिगुट सेना के बढ़ते कदमों को पीछे ढकेल दिया। 

युद्ध के अन्तिम चरण में लार्ड कार्नवालिस को जब प्रतीत हुआ कि त्रिगुट सेना हार जाएगी तो उसने सेना का खुद नेतृत्व सम्भाला, पर श्रीरंगपट्टम में टीपू के कुशल संचालन में अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा। त्रिगुट सेना सिर्फ पीछे हटी थी, हार-जीत का अभी फैसला न हुआ था-पर त्रिगुट सेना का सिर्फ पीछे हटने से ही कार्नवासिल की इंग्लैण्ड में खूब आलोचना हुई। टीपू सुल्तान उन राज्यों के लिए नायक साबित हुआ जहां-जहां अंग्रेजों ने अपना अधिपत्य जमाया था। 

कार्नवालिस को समुन्द्री मार्ग से नई ब्रिटिश सैनिक सहायता मिल गयी, तब सन् 1792 में वह फिर त्रिगुट सेना के साथ श्रीरंगपट्टम की ओर बढ़ा। 

इस बार त्रिगुट सेना टीपू सुल्तान पर भारी पड़ गयी थी। उसने श्रीरंगपट्टम के चारों ओर घेरा डाल दिया था। दोनों ओर से सन्धि के प्रस्ताव बढ़े-यह प्रस्ताव दोनों ही ओर से इसलिए बढ़े थे कि मराठों और निजाम की सेना एक साल से युद्ध भूमि में पड़ी-पड़ी थक चुकी थी, वह युद्ध भूमि से उकता चुकी थी। टीपू सुल्तान ने श्रीरंगपट्टम को चारों ओर से घिरा पाकर आंकलन कर लिया था कि वह हार सकता है-अतः सन्धि ही सही मार्ग था। 

इस सन्धि के अनुसार टीपू को अपना आधा राज्य त्याग देना पड़ा। जिसे अंग्रेजों, मराठों और निजाम ने आपस में बांट दिया। टीपू को युद्ध हर्जाना भी देना पड़ा। इस तरह मैसूर विजय का कार्नवालिस का सपना अधूरा रह गया, जिसे आगे चलकर लार्ड वेलेजली ने पूरा किया। 

आंग्ल-मैसूर चतुर्थ युद्ध 

मैसूर के राजा टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के कदम भारत की धरती से उखाड़ फेकने के उद्देश्य से लोहे से लोहे के काटने की नीति अपनाकर, फ्रांसीसियों से गठबन्धकर लिया। यद्यपि अंग्रेज भी विदेशी थे तथा फ्रांसीसी भी विदेशी थे, पर अंग्रेज बड़ी शक्ति बन गए थे, उसके मुकाबले फ्रांसीसी छोटी शक्ति थी, दुश्मन का दुश्मन दोस्त की कहावत को टीपू सुल्तान ने चरितार्थ की थी। फ्रांसीसियों की सहायता से वह अपनी शक्ति बढ़ाने लगा था। 

आंग्ल-मैसूर चतुर्थ युद्ध 

वह फ्रांस के नेपोलियन बोनापार्ट के भी उस समय सम्पर्क में था, जो अंग्रेजों पर आक्रमण करने की तैयारियों में लग चुका था। टीपू ने अफगानिस्तान के शासक जमाल शाह के पास भी अपना राजदूत भेज रखा था। 

भारत में कार्नवालिस के स्थान पर बेलेजली गवर्नर जनरल बनकर आ चुका था। वह कार्नवालिस से कहीं ज्यादह प्रशासनिक क्षमता वाला प्रशासक था। वह न केवल अपनी शक्ति बढ़ाने में ही अपना ध्यान रख रहा था बल्कि टीपू सुल्तान की गतिविधियों पर निगाह रखने वाले भेदिये भी मैसूर में पैदा कर दिए थे, जो टीपू की गतिविधियों पर नजर रखते हुए वेलेजली को गुप्त सूचनाएं पहुंचाते रहते थे। 

युद्ध की पहल करने के उद्देश्य से वेलेजली ने सन् 1799 में टीपू से सहायक सन्धि करने का प्रस्ताव भेजा। इस प्रस्ताव के पीछे मुख्य ध्येय था कि वह टीपू को सन्धि में बांध ले ताकि नेपोलियन की ओर से यदि भारत में अंग्रेजों पर आक्रमण हो तो न सिर्फ टीपू फ्रांसीसियों की सहातया लेने से रुक जाए, बल्कि नेपोलियन के आक्रमण के समय वह अंग्रेजों की सहायता भी करे। 

परन्तु टीपू, बेलेजली की कूटनीति से पहले से ही सावधान था। वह वेलेजली के जाल में न फंसा। उसके प्रस्ताव पर इनकार कर दिया। 

वेलेजली को युद्ध का बहाना मिल गया। इससे पहले कि टीपू को नेपोलियन या अफगानिस्तान के शाह की ओर से कोई सहातया मिल पाती, उसने टीपू पर आक्रमण कर दिया। टीपू ने इस समय फ्रांसीसियों से सहायता की उम्मीद की, परन्तु उन्होंने किसी प्रकार की सहायता न की, तटस्थता की नीति अपना ली। टीपू को अकेले ही, अपने दम पर युद्ध भूमि में उतरना पड़ा। अपनी सेना के साथ वह आंधी-तूफान की तरह युद्ध भूमि में उतर पड़ा। जान हथेली पर रखकर वह युद्ध करने लगा। उसकी सेना में हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही सैनिक थे। उसने सैनिकों में यह भावना भर दी थी कि वे हिन्दुस्तानी हैं और अंग्रेज फिरंगी (विदेशी)। फिरंगी, हिन्दुस्तानियों को गुलाम बनाना चाहते हैं। देश की अस्मिता के जोश में भरकर टीपू के सैनिक युद्ध करने लगे थे। 

हिन्दू सैनिकों के मुंह से ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष सुनाई दे रहा था तो मुसलमान सिपाही ‘अल्लाहो अकबर’ के नारे लगा रहे थे। 

वेलेजली, तलवारों के जोर पर लड़े जाने वाले युद्ध के मुकाबले में तोप और बन्दूकचियों को लेकर युद्ध में उतरा था। अंग्रेजों के साथ निजाम हैदराबाद की सेना भी मैदान में उतरकर टीपू के विरुद्ध युद्ध कर रही थी। निजाम की वेलेजली ने जीत के बाद टीपू के राज्य का हिस्सा देने का वायदा किया था, अतः निजाम ने पूरे जोश के साथ युद्ध भूमि में अपनी सेना को युद्ध आरम्भ होने के बाद उतारा था। 

इस मामले में भी वेलेजली की कूटनीति ने काम किया था। वह उस युद्ध को फिरंगियों और हिन्दुस्तानियों का युद्ध न होकर सत्ता का युद्ध साबित करना चाहता था। निजाम की सेना में भी हिन्दू और मुस्लिम दोनों ही सैनिक थे-निजाम की सेना जब मैदान में उतरी तो टीपू के सैनिकों के मन में इस बात की सोच उभरी कि वे अपने ही भाइयों को क्योंकर तलवार के घाट उतरें। वे उन्हें बचा-बचाकर अंग्रेजों की टुकड़ी की ओर काल बनकर झपटने लगे। उस अवसर पर वेलेजली ने तोपों के दहाने खोल देने का आदेश दिया। तोपों की मार से टीपू के योद्धा पूरी-पूरी टुकड़ी के रूप में युद्ध भूमि में काम आने लगे। 

निजाम की फौज को बचाकर चूंकि मैसूर सैनिकों ने युद्ध नीति अपनाई थी, यह नीति ही उन पर भारी पड़ गयी। निजाम के सैनिक खाली मोर्चा पाकर विशाल घेरा बनाकर आगे बढ़ जाने में सफल हो गए। आगे से आग उगलने वाले हथियारों के साथ अंग्रेज सेना, पीछे से घेरे हुए निजाम सेना-इस घेरे में टीपू फंस गया। उसकी आंखों में खून उतर आया। वह वीरता के साथ लड़ता हुआ फिरंगियों को तलवार के घाट उतारने लगा। वह फिरंगियों को गाजर-मूली की तरह सफाया करने लगा। 

टीपू के इस दुःसाहसिक हमले से अंग्रेज सेना में भगदड़ मच गयी। उसी समय वेलेजली घोड़ा दौड़ाता हुआ आगे आया। कदम पीछे सरकाती अंग्रेज सेना का साहस बढ़ाते हुए उसने बन्दूकधारी टुकड़ी को ललकार कर आदेश दिया-“फायर…!” 

आदेश के साथ ही कई बन्दूकें एक साथ फायर खोल बैठीं। सबका लक्ष्य, मौत बनकर वेलेजली की ओर झपटता टीपू था। कई गोलियां टीपू के आस-पास से गुजर गयीं पर एक अचूक निशाने पर बैठ ही गयी। वह बुरी तरह से घायल होकर घोड़े से गिरा। टीपू के सैनिकों ने अपने वीर नायक को अंग्रेजों के कब्जे में जाने से बचाया। जख्मी टीपू को उठाकर वे शिविर में ले आए। 

उस युद्ध में टीपू का भाई करीम भी जख्मी हुआ था। शिविर में दोनों जख्मी भाइयों ने एक-दूसरे की ओर देखा। वे जख्म की पीड़ा सहन करते हुए, एक-दूसरे की ओर सरक कर बढ़े, गले मिले और उनका प्राणान्त हो गया। 

टीपू सुल्तान न रहा था, परन्तु वह भारत के जन-जन का नायक बन गया। उसने जिस बहादुरी से अंग्रेजों को फिरंगी कहकर, देश की स्वतन्त्रता के नाम पर लड़ा था, इसके लिए वह अविस्मरणीय हो गया। उसे अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतन्त्रता संग्राम का प्रथम योद्धा और नायक माना गया।

टीपू के बलिदान के साथ ही मैसूर की स्वतन्त्रता का अंत हो गया। अंग्रेजों ने मैसूर के चप्पे-चप्पे पर अपना अधिकार कर लिया। मसूर पतन के बाद अंग्रेजों ने राजधानी श्रीरंगपट्टम के राजमहल को तथा पूरे नगर को निर्दयता के साथ लूटा। टीपू के आखिरी सदस्यों को बेल्लोर में कैद कर लिया। अंग्रेजों ने कन्नड़, कोयम्बटूर, वेनड़, घाटपुरम्, तथा मैसूर का समस्त समुन्द्री तट अपने प्रदेश में विलय कर दिया। कुछ भाग निजाम को भी देकर सन्तुष्ट किया। 

लार्ड वेलेजली ने वाडियार वंश के एक बालक को मैसूर का राजा घोषित कर मैसूर राज्य की जनता के सामने इस बात को साबित करने का प्रयास किया कि उन्होंने मैसूर पर हुकूमत करने के लिए युद्ध नहीं किया था। 

जाहिर था कि जिसे वेलेजली ने मैसूर का राजा घोषित किया था, वह आगे चलकर उसके लिए कठपुतली शासक ही सबित होने वाला था। उसे मैसूर के सिंहासन पर बैठाते समय दो मुख्य बातें उसके सामने रखी थीं-सर्वप्रथम वह अपने राज्य में किसी अंग्रेज को अपनी नौकरी पर न रखेगा। दूसरी यह कि वह किसी भी विदेशी से पत्र-व्यवहार न करेगा। वेलेजली ने वाडियार वंश के जिस बालक को मैसूर का राजा घोषित किया था, वह उसी हिन्दू राजवंश से था, जिस राजवंश से टीपू के पिता हैदर अली ने राज्य छीनकर खुद को राजा घोषित किया था।

More from my site

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

17 − 4 =