चीन-जापान युद्ध का इतिहास | History of the Sino-Japanese War

चीन-जापान युद्ध (Sino-Japanese War) 1894 ई० 

चीन-जापान युद्ध को, 1894 ई० का चीन-जापान युद्ध अथवा ‘सिनो-जापानीज वॉर ऑफ 1894’ नाम इसलिए दिया गया है ताकि समय काल 

और युद्ध की परिस्थितियों को अलग किया जा सके। अंग्रेजी में चीन को सिनो (Sino) इसलिए कहा गया है क्योंकि उस समय चीन में सिनो शासक का काल था। चीन-जापान युद्ध प्रत्यक्ष रूप से दोनों देशों के बीच किसी विवाद के लिए न होकर-कोरिया (Koria) देश के लिए हुआ। 

इस युद्ध की परिस्थिति इस रूप में अधिक स्पष्ट होगी, यदि कोरिया की स्थिति पर नजर डाल ली जाए। भौगोगिक दृष्टि से कोरिया जापान और चीन के मध्य स्थित है। कोरिया और जापान के बीच का समुन्द्र बहुत अधिक चौड़ा नहीं है। उस समय तक जापान में एक क्रान्ति हुई थी और वह व्यावसायिक उन्नति और सैन्य शक्ति में वृद्धि के कारण पाश्चात्य देशों के समकक्ष हो गया था। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में चीन काफी प्रगति कर गया था, बावजूद इसके यूरोप के विभिन्न देश चीन पर अपना प्रभुत्व और प्रभाव कायम करते जा रहे थे। उस समय की स्थिति के अनुसार कोरिया चीन के सम्राट की अधीनता स्वीकार करता था। यद्यपि कोरिया का अपना पृथक् राजा होता था, जो स्वतन्त्र राजा के समान अपने देश का शासन करता था, पर उसे चीन के शासक को अपना अधिपति स्वीकार करना पड़ता था। जब कोई राजा कोरिया के सिंहासन पर आरूढ़ होता था तो वह चीन सम्राट की अनुमति प्राप्त करता था। कोरिया की ओर से चीनी सम्राट की सेवा में प्रतिवर्ष भेंट और उपहार भेजे जाते थे और विशिष्ट अवसरों पर कोरिया का राजा या उसका कोई प्रतिनिधि चीन की राजधानी पेकिंग के दरबार में भी उपस्थित हुआ करता था। उस तरह, कोरिया का राज्य चीन का एक संरक्षित राज्य जैसा था। 

उधर, जापान की शक्ति उन्हीं दिनों बढ़ना आरम्भ हुई थी-जापान में सैनिकवाद का अम्युदय हो चुका था-उसके लिए आवश्यक हो गया था कि वह अपनी शक्ति का विस्तार दुनिया को दिखाए। उसने कोरिया पर अपना प्रभुत्व जमाना आवश्यक समझा। चीन उस समय, कई यूरोपीय देशों के दलदल के बीच फंसा अपने अस्तित्व की रक्षा में जूझ रहा था। इस अवसर का लाभ उठाते हुए जापान ने कोरिया को अपने प्रभाव में लेने की तैयारी आरम्भ कर दी थी। 

संयोग कुछ इस रूप में सामने आया कि जापान का एक जहाज कोरिया के समुन्द्र तट पर पहुंच गया। कोरिया सरकार ने इस जहाज पर गोलाबारी शुरू कर दी। इस कारण जापान में बेचैनी बढ़ी-उग्रवादी, जापानी नेता कोरिया के विरुद्ध युद्ध घोषित करने की मांग करने लगे। पर जापान ने उस समय थोड़ा संयम से काम लिया। बावजूद इसके उसे युद्ध का बहाना तो मिल ही गया था। जापान ने अपना एक प्रतिनिधि मंडल कोरिया में कुछ धमकियों के साथ भेजा। जापान की नीति यह थी कि प्रतिनिधि मंडल की धमकियों से डरकर यदि कोरिया आत्मसमर्पण कर दे तो युद्ध की आवश्यकता न रहे। 

जापानी प्रतिनिधि-मण्डल की धमकी से कोरिया डरा। उसने अपने कुछ बन्दरगाह जापान के व्यापार के लिए खोल दिए। जापान की देखा देखी, 1882 ई० में अमेरिकी सरकार ने भी कोरिया से कुछ इसी प्रकार की संधि करने में सफलता प्राप्त कर ली। उसके बाद ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और इटली के साथ भी कोरिया को पृथक्-पृथक् संधियां करनी पड़ी। 

अब जापान को लगा कि उसकी 1876 ई० की संधि का कोई लाभ नहीं रहा। अब उसके लिए कोरिया पर युद्ध लादने का भी अवसर न रहा था, क्योंकि कई एक यूरोपीय देश कोरिया के साथ संधि में बंध गए थे-कोरिया पर सीधा आक्रमण करने पर उन देशों को हित टकराता, जो कोरिया से संधि में बंध गए थे। युद्ध की स्थिति आने पर वे सारे या कोई एक-दो मजबूत देश, कोरिया के समर्थन में युद्ध करने उतर सकते थे। तब, जापान ने कोरिया में भीतरघात नीति चली। यह उसके लिए सहज थी क्योंकि कोरिया से वह सबसे नजदीक का मुल्क था। 

जापान को अपने इस प्रयास में सफलता मिली। इस जापान समर्थक वर्ग के विरुद्ध चीन समर्थक लोगों का जनरोष फूट पड़ा। परिणामतः सन् 1884 ई० में कोरिया में आन्तरिक विद्रोह या बलबा हो गया। कोरिया को उस स्थिति से निपटने के लिए चीन सम्राट से मदद लेनी चाहिए थी, चीन की एक सैन्य टुकड़ी भी कोरिया में मौजूद थी, विद्रोह दबाने के लिए वह उसे भी बुला सकता था। पर कोरिया का राजा, चीन के सम्राट से उस समय असन्तुष्ट था; यह असंतोष इसलिए था क्योंकि अन्य यूरोपीय देशों से व्यापारिक संधि करते समय कोरिया शासक ने चीन से कोई अनुमति न ली थी जिससे चीनी सम्राट बुरी तरह चिढ़ा हुआ था। 

इसी के साथ कोरिया शासक ने शक्ति सन्तुलन को परखा था-इसमें उसे जापान मजबूत नजर आया था। उसने अपने यहां आन्तरिक विद्रोह दबाने के लिए जापान सरकार से मदद की मांग कर ली। मांग करते ही जापान की सेना को कोरिया में घुसने का मौका मिल गया। जापानी सैनिकों ने कोरिया में दाखिल होकर विद्रोह को दबाया। अपने पक्ष वाले विद्रोहियों को मदद पहुंचायी। 

चीन-जापान युद्ध

इस पर चीन चुप बैठने वाला न था-उसकी कुछ सेना कोरिया में पहले से मौजूद थी-कुछ सेना और कोरिया में भेजकर चीन ने इस बात का सख्त विरोध किया कि उसके सैनिकों के रहते जापान को अपने सैनिकों को वहां भेजने की कोई आवश्यकता न थी। परिणामतः जापान और चीन सेना के बीच कुछ स्थानों पर झड़पें भी हुईं। दोनों ओर के सैनिक मारे गए। लेकिन झड़प युद्ध का बड़ा रूप न ले सका। कोरिया से मैत्री सम्बन्धों से जुड़े योरोपीय देशों ने हस्तक्षेप कर जापान और चीन में मैत्री संधि करा दी। इस मैत्री संधि में जापान की जीत इस रूप में हुई कि कोरिया से उसकी सेना तो वापस हुई ही, साथ ही चीन को भी कोरिया से अपनी समस्त सेना वापस लौटानी पड़ी। चीन की उस सेना ने भी कोरिया की भूमि खाली कर दी जो वहां हमेशा से रहती आयी थी। 

इस संधि में यह बात तय पायी गयी थी कि जापान और चीन, एक-दूसरे को सूचित किए बगैर कोरिया में अपनी सेना न भेजेंगे। यह संधि अधिक दिनों तक न चल सकी-1894 ई० में कोरिया में एक बार फिर आन्तरिक विद्रोह भड़का। संधि के अनुसार कोरिया के राजा ने चीन सम्राट के पास सूचना भेजी-चीन की सेना जब कोरिया में दाखिल होने वाली थी तब उसने जापान को भी इस बात की इत्तला दे दी कि चीन की सेना कोरिया में आ रही है। सूचना पाते ही जापान अपने जहाजी बेड़े के साथ कोरिया में पहुंच गया। उस समय तक चीन की सेना कोरिया में दाखिल हो चुकी थी। जापान ने कोरिया तट पर लगते ही सख्त एतराज जताया कि उसे सूचित किए बगैर चीन की सेना कोरिया में घुसी कैसे? 

और, इस आरोप के साथ ही उसने कोरिया में दाखिल हो चुकी चीनी सेना पर युद्ध थोप दिया। जापान जंगी बेड़े के साथ पहुंचा था-उसने चीनी सेना पर जबरदस्त गोलीबारी की। उसने चीन के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करने के साथ इस बात को यूरोपीय देशों को दिखा देना आवश्यक समझा था कि उसकी सैनिक शक्ति कितनी प्रबल है। चीन ने भी युद्ध में अपने पूरी शक्ति झोंक दी। नौ महीने तक दोनों देशों के बीच जमकर युद्ध चलता रहा। जापान की जल और स्थल सेना ने चीन को जगह-जगह शिकस्त दी। चीन को घुटने टेकने को मजबूर होकर शिमोनेस्की की संधि करनी पड़ी। 

इस संधि के अनुसार लिआसो नदी के पूर्व में स्थित मंचूरिया का प्रदेश, फारमोसा द्वीप समूह, पोसका डोर्स द्वीप समूह पर जापान का अधिकार स्वीकार कर लिया गया। चीन ने हर्जाने की भारी रकम जापान को दी-हर्जाने की रकम अदायगी तक वेहहाईवेई के बन्दरगाह पर जापान का कब्जा बनाए रखने की बात मानी गयी। कोरिया को स्वतन्त्र राज्य माना गया। संधि का सारा पक्ष जापान के पक्ष में रहा क्योंकि कोरिया की बहुसंख्य आबादी तथा वहां का राजा, जापान के प्रभाव में आ चुका था। चीन की शक्ति कोरिया से पूरी तरह बाहर हो गयी।

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