प्यूरिटन क्रांति का इतिहास |History of the Puritan Revolution

प्यूरिटन क्रांति का इतिहास

प्यूरिटन क्रांति का इतिहास या लूथेरियन क्रांति का इतिहास

विश्व इतिहास के मध्यकाल में इन क्रांतियों ने मानवीय चेतना को जितना – जाग्रत् किया, संभवतः अन्य किसी कारक ने इतना प्रभाव नहीं डाला। प्यूरेटिन क्रांति ने जहाँ परतंत्रता के विरुद्ध शस्त्र-अभियानों और राजनीतिक दाँव पेंचों को मुखर किया, वहीं लूथेरियन क्रांति ने वैचारिक क्रांति का बाजीरोपण किया। इतना तो निश्चित है कि मानव-जागरण का आरंभ यूरोप से हुआ, क्योंकि यहीं से आरंभ हुआ था साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का भी। 

यह तो क्रिया के विपरीत प्रतिक्रिया का शाश्वत नियम है कि जहाँ प्रचार होता है, वहीं प्रतिकार जन्म लेता है। शासकीय अत्याचार हो या मानवीय अधिकारों का हनन, प्रतिक्रिया होना तो स्वाभाविक है। यह वह समय था, जब साम्राज्यवाद का सबसे बड़ा समर्थक ब्रिटेन विश्व भर में अपनी आर्थिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए किसी भी नीति का आश्रय ले सकता था। ब्रिटिश सम्राट की शक्तियाँ दैवीय अधिकारों की भाँति स्थापित थीं। इन्हीं अधिकारों के मौलिक प्रश्नों को लेकर सत्ता और समाज का संघर्ष आरंभ हुआ। 

इंग्लैंड के गृहयुद्ध 

इंग्लैंड विश्व की पहली साम्राज्यवादी शक्ति था, जिसने अपने संसाधनों और बुद्धिमत्ता से विश्व भर में साम्राज्यवाद के बीज का रोपण कर दिया था। 17वीं शताब्दी के इंग्लैंड में रक्तहीन क्रांति से वहाँ संसद् की स्थापना हुई और इसके बाद संसद् व सम्राट के बीच अंतहीन विवादों की शुरुआत हो गई। सम्राट् चार्ल्स प्रथम और संसद् के बीच राज्य की प्रभुसत्ता को लेकर संघर्षों की जो स्थिति बनी, उसने समूचे यूरोप को प्रभावित किया। इसका निर्णय तत्काल तलवार के बल पर होना अनिवार्य हो गया। यद्यपि इन टकरावों की पृष्ठभूमि ट्यूटडर वंश और संसद् के बीच ही बन चुकी थी। आगे चलकर स्टुअर्ट वंश के सम्राटों के समय इसमें वृद्धि हई और चार्ल्स द्वितीय के समय तो यह संघर्ष शत्रुता में बदल गया। 

जेम्स प्रथम के बाद चार्ल्स प्रथम इंग्लैंड का सम्राट् बना और अपने राजनीतिक अनुभवहीनता के कारण स्वेच्छाचारी शासन स्थापित करने में असफल रहा। सन् 1625 से प्यूरेटिन संसद् ने चर्च-व्यवस्थाओं में परिवर्तन की माँग करते हुए राजनीतिक क्रांति का आरंभ कर दिया। प्यूरेटिन सदस्य विगत वर्षों में स्पेन और फ्रांस के साथ हुई पराजयों में ब्रिटेन की हार का कारण सम्राटों को बताने लगे थे। सम्राट के मंत्रियों की अयोग्यता पर जोर देने लगे थे। चार्ल्स प्रथम ने इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देना भी आवश्यक नहीं समझा। उलटे वह और भी स्वेच्छाचारी हो गया। उसने शाही आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऋण लेकर ब्रिटेन को ऋणग्रस्त कर दिया और प्रजा का भरपूर उत्पीड़न किया। इससे संसद् सदस्य आक्रोशित हो गए और सम्राट को नियंत्रित करने लगे। 

सन् 1628 में संसद् का तीसरा अधिवेशन हुआ तो संसद् ने ‘पिटीशन ऑफ राइट’ के आधार पर उसकी निरंकुशता पर लगाम कसी। प्यूरेटिन सदस्यों ने उसकी इच्छा को दरकिनार करके उसके द्वारा लगाए गए करों को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। चार्ल्स ने इस स्थिति का सामना अपने कथित अधिकारों के साथ करना चाहा और सन् 1640 तक अपना शासन बनाए रखा। इसमें उसने सैन्य शासन को प्रमुखता दी और इससे इंग्लैंड में गृहयुद्ध पनप गया। 

सन् 1640 में प्यूरेटिन सदस्यों ने सम्राट् के मंत्री ‘अर्ल ऑफ स्टेटफोर्ड’ पर राजद्रोह का मुकदमा चलाकर उसे मृत्युदंड की सजा दे दी। शिप मनी की वसूली और स्टार चेंबर जैसे शासक समर्थक न्यायालयों को बंद कर दिया। इसके साथ ही संसद् अधिवेशन को तीन साल में एक बार कराना अनिवार्य कर दिया। इन स्थितियों में सम्राट् की ओर बड़े उद्योगपति और विरोध में राउंडहेड्स, छोटे व्यापारी तथा आम नागरिक हो गए। सन् 1644 में प्यूरेटिन अनुयायियों ने अपनी एक सेना का गठन कर लिया, जिसके निरंतर दबाव में चार्ल्स ने सन् 1646 में हथियार डाल दिए। फिर सन् 1648 में पुनः युद्ध थोप दिया। इस युद्ध में प्यूरेटिन की ओर से ऑलिवर क्रॉमवेल नेतृत्व कर रहा था। सम्राट् की करारी हार हुई और उसे बंदी बनाकर उस पर मुकदमा चलाया गया। 30 जनवरी, 1649 को उसे फाँसी पर लटका दिया गया। इस प्रकार लॉर्ड सभा भंग हो गई। 

अब इंग्लैंड में गणतंत्र की स्थापना हुई और प्यूरेटिन क्रांति ने विश्व भर को एक नया संदेश दिया कि जब शासकीय नीतियाँ प्रजा का शोषण करने लगें तो उसक विरुद्ध क्रांति का आह्वान आवश्यक हो जाता है। ब्रिटेन के उपनिवेशो में इस क्रांति ने और भी प्रेरणादायी बीजारोपण कर दिए। कालांतर में यही साम्राज्यवाद के पतन का मुख्य कारण बना और मार्क्सवाद ने इसे ही विश्व के आधुनिकीकरण की प्रथम क्रांति की संज्ञा दी। हालाँकि राजतंत्र की निरंकुशता के पतन के बाद इंग्लैंड में संसद् की निरंकुशता का भी दौर आया और इसके विरुद्ध भी लगातार सामाजिक संघर्षों का दौर चला। 

अत: यह कहा जा सकता है कि इंग्लैंड के इन तेजी से बदलते राजनीतिक समीकरणों ने विश्व भर में जनजागरण का बीज रोप दिया था। उपनिवेशों में कभी भी शांति नहीं रही थी, लेकिन अब उपनिवेशी विद्रोह और भी मुखर हो गए थे। स्पष्टत: यह संदेश गया था कि जब ब्रिटेन का समाज अपने अधिकारों के लिए अपने परंपरागत शासक का विरोध कर सकता है तो अपनी धरती पर विदेशी शासन को कोई समाज कैसे बरदाश्त कर सकता है! इसी धारणा ने उपनिवेशों में साम्राज्यवाद के प्रति आक्रोश की भावना उत्पन्न कर दी।

आधुनिक विश्व के निर्माण में मानवीय चेतना का जो योगदान रहा है, वह सार्वकालिक और महानतम योगदानों में से एक रहा है। साम्राज्यों और उपनिवेशों के बीच मुक्ति संघर्षों की दास्तान हालाँकि अनेक कारणों से जन्मी है, लेकिन इनमें वैचारिक कृतियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अरब ग्रंथों में ऐसे अनेक विचारकों के विचार और जीवनियों का वर्णन था, जो कालांतर में यूरोप सहित सभी महाद्वीपों में वैचारिक क्रांति का कारण बना।

जब कार्ल मार्क्स ने अपने विचारों को दुनिया के सामने रखा तो एक हलचल सी मच गई। मार्क्स के विचार वर्ग-विभेद और श्रमिक पूँजीवाद के साथ आर्थिक व्यवस्थाओं पर कड़ा प्रहार करते थे, जिससे एक नए वर्ग ने जन्म लिया और पूँजीवाद को चुनौती मिलने लगी। इसी क्रम में लियो टॉलस्टॉय, रूसो और ऐसे ही अनेक महान् दर्शनिक हुए, जिन्होंने समाज में परिवर्तन किए। 

यह वह समय था, जब यूरोप में चर्च और पोप की सत्ता सम्राटों के समानांतर चल रही थी, बल्कि एक प्रकार से यह सम्राटों से भी ऊपर थी। सम्राट भी अपने निर्णयों में पोप और पादरियों का परामर्श लेते थे, जबकि पोप का आदेश सर्वमान्य होता था। राजतंत्र से अधिक पोपतंत्र की प्रभुता थी। 16वीं शताब्दी में इस पोपतंत्र को एक करारा आघात तब लगा, जब यरोप में नए विचारकों ने पोप की भूमिका पर प्रश्नचिह्न लगा दिए। 

इन विचारकों में इरास्मस एक ऐसा ही मुखर और महान् विचारक हुआ, जिसने पोप की सत्ता पर निर्भयता से अपने विचारों से प्रहार करके समूचे यूरोप में हलचल मचा दी। ‘प्रेज ऑफ फॉली’ नामक पुस्तक में उसने ईसाई धर्म को और भी उदार बनाने के साथ-साथ ईसा मसीह को ऐतिहासिक व्यक्ति स्वीकार करने का गंभीर साहस किया। उसने यह घोषणा की कि ईसाई धर्म और ईसा मसीह का सबसे बड़ा शत्रु तो पोप है । इरास्मस ने व्यंग्यपूर्वक कहा कि यदि पोप से कहा जाए कि वह ईसा मसीह के आदर्शों और आचरणों का पूर्ण पालन करके सात्त्विक जीवन बिताए तो उसे यह कठोर दंड के समान प्रतीत होगा।

धर्म-सुधार की इन वैचारिक प्रक्रियाओं में आगे चलकर जिस व्यक्ति ने महान् योगदान दिया, उसका नाम मार्टिन लूथर था। उसने मध्यकाल के पाखंड को प्रबल तर्कों से झकझोरकर रख दिया। लूथर ने अपनी धर्मशास्त्रीय दलीलों से कैथोलिक चर्च द्वारा बाइबिल की शिक्षा के विरूपित और भ्रष्ट कर देने पर कठोर प्रहार किए। लूथर ने धन के द्वारा मुक्ति के पोपीय प्रलोभन को नितांत मिथ्यावाद कहकर अपने वैचारिक तेवर स्पष्ट कर दिए। वह व्यक्ति के विश्वास को महत्त्वपूर्ण मानता था, न कि पादारियों की साधना को। 

लूथेरियन क्रांति ने जितनी शीघ्रता से यूरोपीयन समाज में स्वीकार्यता ग्रहण की, वह वास्तव में पोपतंत्र द्वारा आरोपित नियमों की परिणति थी। नगरों में अधिकांश धनिक वर्ग के आधिपत्य के बावजूद चर्च से लगातार शिकायतें रहती थीं। पादरी वर्ग शासन में अपने कथित दैवीय अधिकारों की बात करके शासकीय करों में छूट लेते रहते थे और सामंती करों से अपने विलास को पूरा करते थे। इन पादरियों की संतानें भी सुरक्षित और वैभवपूर्ण भविष्य की अधिकारी बन जाती थीं। इन पादरियों से छोटे वर्गों को धार्मिक संतुष्टि नहीं मिल पा रही थी। बस, लूथर को इसी असंतुष्ट वर्ग ने स्वीकार्यता दी। लूथर ने भी उन्हें निराश नहीं किया। अत: लूथर ने उनके असंतोष पर अपने साहस की मुहर लगाई। 

सन् 1521 में वर्स में चर्च-सम्मेलन हुआ तो लूथर ने उसकी अवहेलना करके जर्मनी और स्विट्जरलैंड में अपने लूथरियन आंदोलन से जुड़नेवाले लोगों की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि कर ली। चर्च से असंतुष्ट लोग लूथर के अनुयायी हो गए। इस प्रकार लूथेरियन क्रांति व्यापक हो उठी। जगह-जगह पर रोमन कैथोलिक चर्चों द्वारा व्याप्त अंधविश्वासों और धारणाओं पर प्रदर्शन होने लगे। एरफर्ट में तो पादरियों पर हमले तक किए गए। इन आंदोलनों ने लूथर को और भी शक्ति प्रदान कर दी, जिससे वे लोगों के बीच और अधिक लोकप्रिय हो गए। लूथर की बढ़ती लोकप्रियता ने पादरियों के बीच एक विचित्र-सा भय उत्पन्न कर दिया और अब उन्हें अपनी प्रभुता पर चोट लगती-सी प्रतीत होने लगी थी। 

पेपर ऑफ इंडेलजेंस 

रोमन कैथोलिक चर्चों ने बाइबिल और ईसा मसीह की शिक्षाओं को जो विरूपित किया था, उनमें सबसे घृणास्पद पापमुक्ति-पत्र सभी मूल्यों में उपलब्ध थे और सभी पापों के मोचन का दावा करते थे। उदाहरणस्वरूप झूठ बोलने के पाप से मुक्ति पाने के लिए कम मूल्य का और हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए अधिक मूल्य का मुक्तिपत्र पर्याप्त था। इससे समाज में अपराध और पापों के प्रति संवेदनशीलता कम हो गई और लोग इन पत्रों के आश्रय पापकर्म करने से अभय हो गए थे। चर्च क लिये यह पापमुक्ति पत्र कमाई का साधन बन गए थे। इसके अतिरिक्त चर्चों में पदों पर नियुक्ति के लिए घूसखोरी का प्रचलन भी बढ़ गया था। 

एक समय तो ऐसा भी आया, जब मार्टिन लूथर को पादरी रेटजेल ने पापमुक्ति -पत्र खरीदने की सलाह दी। उस समय लूथर ने इसकी स्पष्ट अवहेलना कर दी और यह चर्चा बहुत समय तक लूथर के विरोध का कारण बनी, लेकिन साथ ही इससे इसका व्यापक प्रचार भी हुआ। 

लूथर चर्च के इन पाखंडों से बहुत अधिक असंतुष्ट और व्यथित था, इसलिए वह अब खुलकर क्रांतिनायक के रूप में पूरी तरह सामने आ गया। उसने यह संदेश दिया कि व्यक्ति को तर्कों से नहीं, अपनी आस्था से मुक्ति मिलती है। 

पादरियों ने जो तरह-तरह के झूठे आडंबरों व पाखंडों का जाल बिछाया हुआ था, उस जाल को लूथर नामक तेजतर्रार कैंची ने काट फेंका और जो मासूम लोग उस जाल में फंसे हुए थे, उन्हें बाहर निकाल लिया। लूथर की बातें तार्किक थीं, जो जल्दी ही लोगों के मनोमस्तिष्क में गहराई तक पैठ गईं। बस, यही बातें पादरियों को नागवार लगीं, लेकिन वे अधिक कर भी क्या सकते थे, क्योंकि उनसे असंतुष्ट लोगों का एक बड़ा वर्ग लूथर के साथ था। 

लूथर ने अपने धार्मिक विचारों को सैद्धांतिक आधार देने के लिए तीन महत्त्वपूर्ण संदेश-पत्र प्रकाशित किए। ये संदेश-पत्र निम्नलिखित थे 

1.जस्टिफिकेशन बाई फेश (निजी आस्था से पापमुक्ति)

2. प्राइमेसी ऑफ स्क्रिप्चर (धर्मग्रंथ की प्रमुखता)

3. प्रीस्टहुड ऑफ ऑल बिलीवर्स (सभी आस्थावानों का पादरीवाद) 

लूथर के इन संदेशों ने न केवल लोकप्रियता पाई, बल्कि उसके अनेक अनुयायी भी बन गए। लोगों ने लूथर को मानववादी पुनर्जागरण का अंग मानकर उसे ईसाई धर्म में नई क्रांति का प्रणेता स्वीकार कर लिया। धीरे-धीरे लूथर ने जर्मनी में अपने विचारों से लूथेरियन क्रांति का बाजीरोपण कर दिया। यह क्रांति इतनी व्यापक और शक्तिशाली सिद्ध हुई कि ईसाई धर्म ही दो दलों में बँट गया। लूथर के समर्थकों को ‘प्रोटेस्टेंट’ कहा गया, जबकि उसके विरोधी कैथोलिक कहलाए। 

लूथर की लोकप्रियता और प्रोटेस्टेंट धर्म जर्मनी के उत्तरी राज्यों, डेनमार्क, नार्वे, स्वीडन और बाल्टिक राज्यों में बड़ी तीव्रता से फैल गए। अब लूथर के अनुयायियों में केवल व्यापारी या आमजन ही नहीं थे, बल्कि जर्मन किसान और राजकुमार भी उसके अनुयायी बन गए थे। बड़ी बात तो यह थी कि इन किसानों व सामंतों के मध्य आंतरिक वैचारिक मतभेद थे, लेकिन लूथर के धर्म ने प्रेरणाशक्ति से उन्हें एक ही मंच पर ला खड़ा किया था। इसी कारण लूथेरियन क्रांति जर्मनी का धर्म-सुधार आंदोलन न रहकर समस्त यूरोप में प्रेरणा का कारक बना। रोमन पोपतंत्र से संबंध विच्छेद होते रहे, जो आगे काल्विन, ज्वैगली आदि विचारधाराओं के समानांतर बहते हुए समूचे विश्व में पाखंड के विरुद्ध खड़े रहे। 

इस प्रकार कहा जा सकता है कि लूथेरियन क्रांति ने यूरोप में रोमन कैथोलिक चर्च की अवहेलना करके जिस धर्म-आंदोलन की शुरुआत की थी, वह कालांतर में विश्व के अन्य राष्ट्रों में धार्मिक क्रांति के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी। ईरान की इस्लामिक क्रांति या तुर्की का युवा तुर्क आंदोलन इसी धर्म-सुधार पृष्ठभूमि पर टिके थे, जिनकी जड़ों में लूथेरियन क्रांति की प्रेरणा समाई हुई थी। 

धर्म-सुधार क्रांति ने मानव की धार्मिक सोच को शुद्धता प्रदान करके इसमें व्याप्त अशुद्धियों को आत्मचिंतन के द्वारा ही नहीं, बल्कि संघर्ष करके भी दूर करने की प्रेरणा दी। लूथेरियन क्रांति को विश्व की प्रथम सैद्धांतिक और स्वीकार्य क्रांति कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।

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