अफीम युद्ध का इतिहास |History of the Opium War

अफीम युद्ध का इतिहास

अफीम युद्ध का इतिहास |History of the Opium War (सन् 1839-1841) 

उन्नीसवीं सदी के प्रारम्भ में चीन, संसार के पिछड़े हुए देशों में शुमार किया जाता था। पिछड़ा हुआ देश इसलिए था क्योंकि वह अपने आप में सीमित था। उसने विदेशों से व्यापार करने या अपने यहां किसी को भी व्यापार की अनुमति न दी थी। जिसकी वजह से चीन में जो भी उत्पादन था, सब चीन में ही सिमटा-सिकुड़ा रहता था। 

यूरोपीय देशों की काफी कोशिशों के बाद चीन के शासकों से इस बात की इजाजत मिल सकी थी कि वे चीन के कैण्टन शहर से बाहर रहकर चीन से छोटे पैमाने पर व्यापार कर सकते हैं। इस छोटी-सी छूट मिलने पर यूरोप के व्यापारी केवल चीन से ही माल खरीदने लगे थे। 

बेचने के लिए उनके पास कोई वस्तु न थी। चीनी, रेशम, चाय और चीनी मिट्टी के बर्तनों की मांग यूरोप में बहुत थी। यूरोप के व्यापारी चीन से इन्हीं चार चीजों की खरीददारी करके उन्हें यूरोप के बाजार में बेचते थे। उन चीजों का मूल्य वे चीन को सोने-चांदी में चुकाते थे। 

अफीम युद्ध का इतिहास

अट्ठारहवीं शताब्दी के द्वितीय चरण में, अंग्रेज (ईस्ट इण्डिया कम्पनी) भारत में पूरी तरह अपनी पकड़ मजबूत बना चुकी थी। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की पकड़ भारत में इतनी मजबूत हो चुकी थी कि वह भारत के अधिकांश हिस्सों को अपना गुलाम बना चुकी थी।

अब उसे अपने साम्राज्यवाद का क्षेत्र विकसित करना था। इसके लिए उसने चीन का द्वार खोलने की युक्ति अपनायी। उस दौर में चीन में किसी अन्य देश की घुसपैठ अन्दर तक न हो सकी थी, उनका क्षेत्र केवल कैण्टन शहर तक ही सिमटा हुआ था। 

अंग्रेजों ने बहुत बड़े पैमाने पर बहुत अच्छा सूती वस्त्र का उत्पादन कर लिया था। इन कपड़ों को ले जाकर उन्होंने कैण्टन बाजार में उतारा। उम्दा सूती वस्त्र को देखकर वे चीनी व्यापारी ललचाए जो चीनी, रेशम, चाय, चीनी मिट्टी के बर्तन लाते थे। 

उन्होंने बदले में सूती वस्त्र खरीदे। उन्हें अपने यहां के बाजार में ले जाकर दिखाया तो चीनी उपभोक्ताओं ने सूती वस्त्रों को हाथो-हाथ खरीद लिया। इससे चीनी व्यापारियों को जबरदस्त मुनाफा होने लगा। 

चीन उपभोक्ताओं में अंग्रेजों के उत्पादित सूती वस्त्रों की बेतहाशा मांग बढ़ गयी। चीनी व्यापारी उनकी खपत करके मुनाफे पर मुनाफा कमाने लगे। सूती वस्त्रों की मांग बढ़ते-बढ़ते इस हद तक पहुंच गयी कि अब अंग्रेजों को सोने-चांदी में चीनी माल की कीमत अदा करने की जरूरत ही न रह गयी। 

इस व्यापार से चीनी सरकार काफी समय तक बेखबर रही। उसकी निन्द्रा तब टूटी जबकि व्यापार से शाही कोष में आने वाले सोने-चांदी की आमदनी रुकी। 

उस समय तक, ब्रिटिश व्यापारियों ने एक और हथकड़ा अपना लिया था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी के व्यापारी, चीन को अफीम का बाजार बनाने के प्रयास में लग गए थे। 

अफीम की खेती ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत में प्रचुर मात्रा में कराने लगी थी। उस अफीम को चोरी-छुपे चीन में खपाकर वे भरपूर फायदा उठाना चाहते थे। सूती कपड़ों की तहों के बीच में अफीम के पैकेट्स रखकर चीन में खपाया जाने लगे। चीन के लोग अफीम के नशे के शिकार होने लगे । सम्भवतः शुरूआती दौर में नमूने के तौर पर फ्री में अफीम की खपत करायी गयी होगी-लोग आदी होकर उसकी मांग करने लगे तब व्यापारियों ने अफीम का चोरी-छुपे व्यापार शुरू कर दिया। 

सन् 1825 ई० तक चीन के लोग अफीम के इतने आदी हो गए थे कि अफीम का व्यापार चमक उठा। 

इस तिकड़म को 1800 ई० के आस-पास, ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपनाया था। 1825 ई० आते-आते चीन अफीमचियों का देश कहा जाने लगा। सरकार ने चिंतित होकर उस व्यापार पर सख्त प्रतिबन्ध लगाया-परन्तु भारी मुनाफे के चक्कर में चीनी व्यापारी उस अवैध व्यापार के नए-नए तरीके ईजाद कर चुके थे। 

अपने यहां के व्यापारियों पर अंकुश पाने में असफल चीनी सरकार ने कैण्टन बाजार में आकर पड़ाव डालने वाले ब्रिटिश व्यापारियों पर कड़ाई करनी आरम्भ कर दी। 

सन् 1839 तक ऐसी स्थिति आ गयी कि चीन और ब्रिटेन में युद्ध के बादल मंडरा उठे। चीनी अधिकारियों ने कैण्टन के बन्दरगाह के तट पर आकर लगने वाले समुन्द्री व्यापारिक जहाज पर छापा मारकर तलाशी ली। उस पर अफीम पाकर, चीनी सरकार के आदेश पर पूरे जहाज में आग लगा दी गयी। 

ब्रिटेन को भला यह कार्यवाही क्योंकर सहन होती-उसने युद्ध की घोषणा करते हुए ब्रिटिश नौ-सेना को आदेश दिया कि कैण्टन बन्दरगाह को घेर लिया जाए।

नौसेना ने कैण्टन बन्दरगाह को घेरा और जबरन चीन में घुसकर चीनी सेना पर युद्ध थोप दिया। 

अफीम युद्ध का इतिहास

चीन के पास सैनिक शक्ति बहुत कम थी-नौ-सेना की शक्ति तो न के बराबर थी। अंग्रेजों ने चीनी शासक को सबक सिखाने के लिए, चीन में अन्दर तक घुसकर जमकर नरसंहार किया, तथा प्रशान्त महासगार के तटवर्ती कई चीनी प्रदेश और टापू अपने कब्जे में ले लिए। चीन की सैनिक शक्ति पूरी तरह कुचल दी गयी। 

चीन को, ब्रिटेन शक्ति के सामने टिकना असम्भव हो गया। उसने घुटने टेक कर ब्रिटेन की शर्तों पर समझौता किया। यह समझौता ‘नानकिंग की संधि’ कहलायी। यह संधि 29 अगस्त, 1842 ई० की संधि कहलायी। ब्रिटेन ने चीन पर सन् 1839 में युद्ध थोपकर सन् 1842 तक तीन वर्ष की अवधि में एक प्रकार से चीन को अपना बंधक बनाए रखा और मनमाना व्यापार चीन में फैलाया।

नानकिंग संधि का प्रभाव 

नानकिंग-संधि ने चीन के कैण्टन, अमोम, फूचाऊ, निगपो और संघाई के बन्दरगाहों को ब्रिटेन के व्यापारियों के लिए पूरी तरह खोल दिया। 

हांगकांग का द्वीप ब्रिटेन ने हमेशा के लिए अपने कब्जे में ले लिया। 

कोहांग पर चीनी व्यापार के अधिपत्य को समाप्त कर केवल ब्रिटिश व्यापार के आधीन कर दिया गया। 

चीन की सरकार ने पांच प्रतिशत तटकर निर्धारित किया और आयात-निर्यात की वस्तुओं पर पारस्परिक समझौते द्वारा ही तटकर बढ़ाने की बात स्वीकार की गयी। 

ब्रिटेन को चीन सरकार से हर्जाने के रूप में दो करोड़ दस लाख डॉलर मिले। इसमें अफीम की वह कीमत भी शामिल थी जिसको चीन सरकार के विशेष अधिकारी ने नष्ट कर दिया था। 

चीन और ब्रिटिश युद्ध घटना के परिप्रेक्ष्य में कोई भी सामान्य बुद्धि से समझौते को देखे तो कह सकता है कि यह ब्रिटेन की खुल्लम खुल्ला दादागीरी और चीन की असहायता थी। यद्यपि उसे संधि का नाम दिया गया तथा इस समझौते पर दोनों के ही हस्ताक्षर हुए थे, पर वस्तुतः यह एकतरफा अधिकार था, जिसे शक्ति के बल पर ब्रिटेन ने प्राप्त किया था। 

घुटने टेकने वाली यह स्थिति इसलिए चीन के सामने आयी, क्योंकि चीन में उस समय परम्परागत रूस से मंचू वश का शासन चला आ रहा था। मंचू शासक पुरातनपंथी विचारधारा को अपनाए हुए थे। जिससे चीन आर्थिक रूप से बहुत पिछड़ गया था। चीन का बौद्धिक तथा व्यापारिक वर्ग इस बात को उस समय मानने लगा था कि दुनिया की प्रगति के साथ चीन को भी उसी तौर-तरीकों को अपनाना चाहिए, जैसी दुनिया अपना रही है-इसलिए ब्रिटेन की कार्रवाई यद्यपि गलत थी, बावजूद इसके चीन के बौद्धिक और व्यापारिक तबके ने उसकी हिमायत यह मानकर की थी कि इससे चीन के व्यापार जगत को बढ़ावा मिलेगा तथा प्रगति होगी। 

अपने ही देश के बौद्धिक और व्यापारिक तबके को अपने विरुद्ध जाते देख, मंचू शासक को अपना सिंहासन डोलता हुआ नजर आया। इसलिए उसने घबराकर, जो भी संधि का प्ररूप सामने आया था, उस पर हस्ताक्षर कर दिया था। 

कुछ मिलाकर ‘नानकिंग संधि’ ने ब्रिटेन को लाभ तो पहुंचाया ही था-चीन के लिए विकास के द्वार खोल दिये थे।

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