यूनानी स्वतन्त्रता युद्ध का इतिहास | History of the Greek War of Independence

यूनानी स्वतन्त्रता युद्ध का इतिहास

यूनानी स्वतन्त्रता युद्ध का इतिहास | History of the Greek War of Independence(1821-1829 ई०) 

यूनान एक बहुत प्राचीन देश था। यूरोप में सभ्यता का आरम्भ होने से पहले यूनान का ही झण्डा सब जगह फहराया जाता था। पर, 17वीं शताब्दी आते-आते यूनान इतना शक्तिहीन हो गया था कि टर्की के ओटोमन साम्राज्य का एक हिस्सा बनकर रह गया। 

उस समय ओटोमन साम्राज्य में क्षेत्रफल की दृष्टि से रूसी साम्राज्य के बाद उसका ही स्थान आता था। पूर्वी यूरोप के यूनान, सार्बिया, रूमानिया, बुल्गेरिया, बोल्विया आदि क्षेत्र इस विशाल साम्राज्य के अन्तर्गत आते थे। इन क्षेत्रों के निवासी भाषा, धर्म, रक्त आदि की दृष्टि से तुर्की से सर्वथा भिन्न थे। तुर्कों ने उनका केवल शोषण ही किया था। 

18वीं शताब्दी के आरम्भ में ओटोमन साम्राज्य में निर्बलता के लक्षण प्रकट होने लगे। ऐसी हालत में आस्ट्रिया और रूस, टर्की की पतनोन्मुख अवस्था से लाभ उठाने का प्रयत्न करने लगे। 

इंग्लैण्ड, रूस की इस प्रसारवादी नीति का विरोधी था, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि ओटोमन साम्राज्य का अस्तित्व खत्म हो जाए और उस पर रूस का आधिपत्य हो जाए। ऐसा न होने, पर उसे आशंका थी कि उसके भारतीय साम्राज्य की सुरक्षा पर खतरा उत्पन्न हो सकता है। 

फ्रांस की क्रान्ति हो चुकी थी। इस क्रान्ति ने दुनिया में इस बात की भावना फूंकी थी कि एक भिन्न जाति, दूसरी भिन्न जाति पर अधिपत्य नहीं जमाए रख सकती। सर्वप्रथम सर्बिया के लोगों ने 1804 ई० में तुर्की के विरुद्ध आन्दोलन कर स्थानीय स्वशासन के कुछ अधिकार प्राप्त कर राजनीतिक अधिकार की प्राप्ति का प्रयास किया। यूनान का स्वतन्त्रता युद्ध इसी परिप्रेक्ष्य में उठ खड़ी हुई एक बड़ी घटना थी। 

यूनान के लोग चर्च के अनुयायी थे। समान धार्मिक भावना के कारण उनमें जातीय एकता की अनुभूति भी थी। एडिमेटिटआस कोटेज नामक एक प्रसिद्ध यूनानी लेखक ने पुस्तकों के माध्यम से यूनानियों को उनकी प्राचीन सांस्कृतिक परम्परा के प्रति जागरूक रहने का संदेश दिया। कान्सटैण्टाइन रीगस नामक एक अन्य राष्ट्रवादी साहित्यकार ने देश भक्ति पूर्ण गीतों की रचना की। इस प्रकार, कोरेज और रीगस के राजनीतिक विचार एवं साहित्यिक प्रेरणा के कारण यूनानियों को अपनी परतंत्रता अखरने लगी। वे टर्की के अत्याचारपूर्ण शासन से मुक्त होकर प्राचीन यूनानी साम्राज्य को पुनः प्रतिष्ठित करने की योजनाएं बनाने लगे। 

वहां इटली और स्पेन की प्रेरणा से गुप्त क्रान्तिकारी संगठन बनने लगा। इन गुप्त समितियों में हिटोरिया फिल्के नामक एक सशक्त क्रान्तिकारी संगठन का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस संस्था में शीघ्र ही देश के अन्दर और बाहर के हजारों यूनानी सम्मिलित हो गए। चार-पांच वर्षों में उनके सदस्यों की संख्या दो लाख तक पहुंच गयी। उनका उद्देश्य यूरोप से तुर्कों को निकालकर पुनः यूनानी साम्राज्य स्थापित करना था। 

यूनानियों का विद्रोह 

यूनानियों का विद्रोह 

सन् 1821 ई० में यूनानियों ने विद्रोह का झण्डा बुलन्द कर दिया। उनका सबसे पहला विद्रोह हिप्सलांटी के नेतृत्व में मोण्डोविया नामक स्थान पर प्रारम्भ हुआ। मोल्डोविया के अन्तर्गत आने वाले मेरिया नामक स्थान पर निवास करने वाले हजारों तुर्कों का वध क्रान्तिकारी यूनानियों ने कर दिया। 

उस समय यूनानियों का विश्वास था कि ईसाई देश होने के कारण रूस उनके स्वतन्त्रता संग्राम को बल प्रदान करेगा। परन्तु उस समय रूस का जार अलेक्जेण्डर प्रगतिवादी विचारधारा का प्रबल विरोधी था। उसकी सोच थी कि यदि यूनानियों का आन्दोलन सफल हो गया तो उससे प्रेरणा लेकर यूनान के युवा भी प्रगतिशील विचारधारा अपनाकर उसके विरुद्ध आवाज उठाएंगे। उसने यूनान के आन्दोलन की कोई सहायता न की, जिसकी वजह से टर्की को इस बात का अच्छा अवसर मिला कि वह आन्दोलनकारी यूनानियों को पूरी तरह कुचल दे। टर्की के सुल्तान ने एक विशाल सेना भेजकर मेल्डेविया पर कब्जा जमाए विद्रोही यूनानियों को पूरी तरह कुचल दिया। एक-एक टर्की नागरिक के कत्ल का बदला दस-दस यूनानियों से चुकाकर उनका दमन कर दिया। 

लेकिन स्वतन्त्रता की यह आग मेल्डेविया में टर्की सैनिकों द्वारा कत्लेआम करने के बाद दबी नहीं बल्कि अधिक ही भड़क गयी। मेल्डेविया की दमनात्मक कार्यवाही का समाचार यूनान के अन्य भागों-मेटिया, ईजियन में स्थित द्वीपों में पहुंची और बड़े पैमाने पर विद्रोह शुरू हो गए। यूनानियों में राष्ट्रीयता का अपूर्व जोश आ चुका था। कई देशों के स्वयं सेवक यूनानी ईसाइयों की सहायता के लिए गुप्त रूप से यूनान पहुंचने लगे। इंग्लैण्ड का सुप्रसिद्ध कवि बायरस भी इस युद्ध में स्वयं सेवक के रूप में शामिल हुआ था। यूरोप भर में यूनानी करने के बाद तन्त्रता की यह नया से चुकाकर स्वतन्त्रता के लिए चन्दा एकत्र किया जाने लगा। देखते ही देखते यूनानियों के स्वतन्त्रता आन्दोलन ने ओटोमन टर्की (मुस्लिम) के मुकाबले ईसाइयों के युद्ध रूप में तूल पकड़ लिया। 

‘ईसाइयत और मुस्लिम’ युद्ध छिड़ते ही रूस के जार पर ईसाइयों का दबाव बढ़ने लगा। रूस का जार ग्रीक चर्च का प्रधान था और यूनानी लोग ग्रीक चर्च के अनुयायी थे। रूस की जनता के दबाव में आकर रूस को यूनानियों की मदद करना आवश्यक हो गया था। 

यूनानियों पर टर्की शासक द्वारा दमन देखकर, रूस ने टर्की से दौत्य सम्बन्ध तोड़ लिया और युद्ध की तैयारी करने लगा। 

रूस के हस्तक्षेप की सम्भावना ने परिस्थितियों को और भी गम्भीर बना दिया। टर्की ने दमनात्मक कार्यवाही तेज करते हुए रूस के भू-भाग क्रीट पर अधिकार जमा लिया तथा एथेन्स के यूनानियों पर भीषण अत्याचार करने आरम्भ कर दिए। 

सन् 1822 ई० में इंग्लैण्ड में कैसलोट के स्थान पर जार्ज कैनिगां इंग्लैण्ड का विदेश मंत्री नियुक्त हुआ। उसने यूनान में हस्तक्षेप की नीति अपनाई। 

इस बीच रूस में जार अलेक्जेण्डर का निधन होने पर निकोलस प्रथम रूस की गद्दी पर बैठा। 1826 ई० में इंग्लैण्ड और रूस ने टर्की के समक्ष यह प्रस्ताव रखा कि वह टर्की साम्राज्य के अन्तर्गत यूनान को एक राज्य स्वीकार करे। पर इस प्रस्ताव को न माना गया। 

उसके बाद फ्रांस और इंग्लैण्ड ने अपने जहाजी बेड़ों को भूमध्य सागर में सतर्क होने का आदेश दे दिया। नेवोरिनो के बन्दरगाह पर टर्की के जहाजी बेड़े भी थे। दोनों जहाजी बेड़ों में मुठभेड़ हो गयी। अब युद्ध के बादल पूरी तरह मंडरा चुके थे। इधर फ्रांस में यूनानी स्वतन्त्रता का आन्दोलन जोर पकड़ रहा था। उधर ब्रिटेन, फ्रांस ने समुन्द्री युद्ध छेड़ दिया था। रूस ने बाकायदा तौर पर टर्की के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर अपना नौसैनिक बेड़ा समुन्द्र में आगे बढ़ा दिया। 

टर्की, रूस से मुकाबला करने की स्थिति में बिल्कुल न था। विवश होकर 1829 ई० में टर्की के सुल्तान ने रूस के साथ एड्रियानोपुल की सन्धि पर हस्ताक्षर कर दिया। टर्की सुल्तान के सन्धि पर हस्ताक्षर करते ही यूनान एक स्वतन्त्र राज्य के रूप में उदित होकर दुनिया के नक्शे पर आया। 

‘एड्रिमानोपुल की संधि’ के पश्चात् बालकन क्षेत्र में रूस की प्रतिष्ठा एवं प्रभाव और भी बढ़ गया। इस प्रकार, यूनान के लोगों ने अपनी स्वतन्त्रता के लिए जो खून बहाया था वह व्यर्थ न गया। यूनान एक आजाद देश बना।

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