इंग्लैंड की महान क्रांति का इतिहास | History of the Great Revolution of England

इंग्लैंड की महान क्रांति का इतिहास

इंग्लैंड की महान क्रांति का इतिहास | History of the Great Revolution of England

विश्व-क्रांति के इतिहास में पहली राजनीतिक क्रांति इंग्लैंड में हुई। इस क्रांति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें हिंसा का सर्वथा अभाव रहा और इसी कारण इंग्लैंड की क्रांति को रक्तहीन या श्वेत क्रांति की संज्ञा दी गई। यह क्रांति राजशाही और संसद् के बीच सत्ता के संघर्ष का परिणाम रही, जिसने विश्व को संवैधानिक प्रजातंत्र का नूतन विचार देकर आधुनिक विश्व की रूपरेखा खींची। 

इंग्लैंड विश्व का पहला ऐसा देश था, जहाँ सबसे पहले 11वीं शताब्दी में ही संसद् की स्थापना हुई। उस समय वहाँ का सम्राट हेनरी प्रथम था, जिसने शासन के कार्यों में परामर्श लेने के लिए एक सलाहकार समिति की स्थापना करके उसको ‘क्यूरिया रेजिस’ का नाम दिया। यही समिति धीरे-धीरे अधिकारों में वृद्धि करती रही और इसी ने आगे चलकर संसद् का रूप ले लिया। 

History of the Great Revolution of England

13वीं शताब्दी के प्रारंभ में सन् 1215 में इंग्लैंड के राजा जॉन ने संसद् के अधिकारों में कटौती करनी चाही, जिससे संसद् के सदस्यों ने एकमत होकर राजा की नीतियों का विरोध करते हुए एक घोषणा-पत्र ‘मैग्नाकार्टा’ तैयार किया। इस घोषणा-पत्र में स्पष्ट किया गया था कि परिषद् की अनुमति के बिना राजा संसद् के अधिकारों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। यह घोषणा-पत्र विश्व की राजनीति में मानव-स्वतंत्रता का पहला घोषणा-पत्र माना गया। राजा को इसे मानने के लिए बाध्य भी होना पड़ा। 

अब संसद् की शक्तियाँ इंग्लैंड के शासन में पूर्ण रूप से लागू होने लगी थीं। इसी बीच इंग्लैंड में सन् 1485 से सन् 1603 तक निरंकुश और अत्याचारी ट्यूडर वंश का शासन रहा, जिसने सामंतवाद और चर्च का आश्रय लेकर जनता को बुरी तरह पीड़ित किया। इस वंश की अंतिम शासिका रानी एलिजबेथ रही, जिसने विवाह नहीं किया और इस कारण स्कॉटलैंड का स्टुअर्ट वंश शासन पर काबिज हो गया। 

जेम्स स्टुअर्ट प्रथम ने राजा को ईश्वरीय प्रतिनिधि घोषित किया और संसद् की शक्तियों को कम करने के सभी प्रयास किए। राजा और संसद् के इस संघर्ष में संसद् की ही जीत हुई। सन् 1642 में यही संघर्ष राजा चार्ल्स प्रथम और संसद् के बीच भी उठ खड़ा हुआ और इसने एक महान् परिवर्तन को जन्म दिया। सम्राट चार्ल्स को शक्तिशाली संसद् ने बंदी बना लिया और उस पर अभियोग सिद्ध करके उसे मृत्युदंड दे दिया। यह प्रजा के हितैषी प्रतिनिधियों द्वारा निरंकुश शासक को दंड दिए जाने की युग-परिवर्तनकारी घटना थी। 

सन् 1649 में चार्ल्स प्रथम को 30 जनवरी को फाँसी दे दी गई और इंग्लैंड में राजतंत्रात्मक शासन-व्यवस्था का अंत करके प्रजातंत्र की स्थापना हुई। इंग्लैंड की यह क्रांति ‘प्यूरेटिन’ क्रांति, के नाम से प्रसिद्ध हुई। इस क्रांति का नायक ऑलिवर क्रॉमवेल था, जिसने एक नए प्रकार के शासन की नींव रख तो दी थी, लेकिन स्वयं को सत्ता की शक्ति के हाथों निरंकुश होने से न बचा सका। यह स्वाभाविक लक्ष्य है कि सत्ता व्यक्ति को पथभ्रष्ट कर देती है। उस पर भी किसी को असीमित शक्तियाँ मिल जाएँ तो उसके पथभ्रष्ट हो जाने की संभावनाएँ अधिक हो जाती हैं। क्रॉमवेल के साथ भी ऐसा ही हुआ। वह जननायक से तानाशाह बनने की ओर अग्रसर होता गया और सन् 1656 में उसने संसद् को भंग कर दिया। 

जब क्रॉमवेल ने जनता के हित व अधिकारों के लिए निरंकुशता के विरुद्ध लड़ाई का मोर्चा खोला तो लोगों को उसमें अपना मसीहा दिखाई दिया, लेकिन जब शक्ति उसके हाथ में आ गई और वह अपनी मनमानी पर उतारू हो गया तो लोगों के दिलों से वह अपनी जगह खोने लगा। यह बड़े दुर्भाग्य की बात थी कि जिस क्रॉमवेल ने राजतंत्र के अंत में जनसाधारण और संसद् की अगुवाई की, वह सत्ता के हाथ में आते ही निरंकुश होता गया। आरंभ में उसने इंग्लैंड की जनता का विश्वास प्राप्त कर लिया था और यही कारण था कि उसने शासन सँभाला था। उसने प्रजातंत्र की मजबूती के लिए विश्व में पहली बार लिखित संविधान को लागू किया। फिर जब उसने संसद् को भंग किया तो जनता ने उसके नायकत्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिए। 

अब तक जनता लोकतंत्र में अपनी आस्था को दृढ़ कर चुकी थी। एक बार सामूहिक जागरण हो जाने के बाद प्राचीन व्यवस्था की पुनर्स्थापना कठिन ही नहीं, बल्कि असंभव-सी हो जाती है। क्रॉमवेल नहीं जान पाया कि उसने जब प्यूरेटिन क्रांति का नेतृत्व किया था तो वह जनता की आँखों का तारा था, मगर जब वह भी निरंकुश होकर जनता पर अपने अनुचित निर्णय को थोपने लगा तो जाग्रत् जनता कैसे उसे आँखों में बसाए रखती। 

सन् 1660 में ही क्रॉमवेल को जनप्रतिनिधियों ने अपदस्थ कर दिया और चार्ल्स द्वितीय को इंग्लैंड का शासक बना दिया। उसने राजप्रजातंत्रात्मक पद्धति में भी प्रजातंत्र की रक्षा का वचन दिया और इंग्लैंड के प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की घोषणा कर दी। दूसरी ओर चार्ल्स द्वितीय ने बडी कूटनीति से काम लिया और संसद् की शक्ति को अपनी ओर मिलाना शुरू कर दिया। उसने संसद् के सदस्यों में येन-केन-प्रकारेण राजभक्ति का बीज बोना शुरू कर दिया और अपने इस कार्य में वह सफल भी हुआ। 

जब इंग्लैंड में संसदीय चुनाव हुए तो अधिकतर जीते हुए उम्मीदवार राजा के परमभक्त थे और अब संसद् भी राजशाही का अंग बन गई। राजभक्तों ने अपने राजा को प्रसन्न करने और उसे निश्चिंत शासन करने देने के लिए टोरी दल की स्थापना कर दी, जिसमें अनेक राजभक्त आ जुड़े। संसद् के होने पर भी राजशाही ने अपनी अति निरंकुश सत्ता के दर्शन कराने आरंभ कर दिए। सामंतों और राजभक्तों ने राजा को समर्थन देते हुए जनता का शोषण आरंभ कर दिया। 

सन् 1685 में चार्ल्स द्वितीय की मृत्यु हो गई और इंग्लैंड के सिंहासन पर उसका भाई जेम्स द्वितीय बैठा, जो बहुत ही संकीर्ण विचारोंवाला था। उसने कैथोलिक धर्म को राज्य में लागू करने का आदेश दिया, जो जनता के लिए असहनीय था। उसने सेना को अपनी शक्ति बनाने के लिए कैथोलिक लोगों को उच्च पदों पर नियुक्त करना आरंभ कर दिया, जिसका कुछ प्रोटेस्टेंट लोगों ने विरोध किया तो उन्हें निर्ममता से फाँसी पर लटका दिया गया। वह अब कभी राजतंत्र में प्रजातंत्र को स्थान न देने के लिए प्रयासरत रहा।

जेम्स द्वितीय की निरंकुशता इतनी बढ़ गई थी कि खूनी न्यायालयों और कैथोलिक न्यायाधीशों से उसने अपने विरोधियों का दमन करना शुरू कर दिया था। जनता उसके अत्याचारों से त्रस्त हो उठी थी और प्रजातंत्र में जीने की आदी हो चुकी थी, इसलिए कहीं-कहीं राजसत्ता के प्रति विद्रोह भी मुखर होने लगा था। स्वेच्छाचारी जेम्स द्वितीय अब किसी भी मूल्य पर संसद् की शक्ति को राजमुकुट के विरोध में पनपने नहीं देना चाहता था। उसने अपनी पूरी क्षमता से लोकतंत्रवाद को कुचल देने का हर संभव प्रयास किया। 

इंग्लैंड की जनता के पास व्यापक क्रांति के पर्याप्त कारण थे। जेम्स द्वितीय ने अपने तीन वर्ष के शासनकाल में ही जनता को दरकिनार कर दिया था और अपनी सामंती शक्ति से प्रजातंत्र को छिन्न-भिन्न कर दिया था। इन तीन वर्षों में उसके जिन तानाशाही निर्णयों ने इस असंतोष को जन्म दिया, वे निम्नलिखित थे 

निरंकुशता से उपजा असंतोष 

निरंकुशता सदैव से ही इंग्लैंड में राजा और संसद् के बीच असंतोष का कारण रही। जेम्स द्वितीय से पहले के शासक भी अपनी इसी मानसिकता के कारण ही या तो पदच्युत हुए या जनाक्रोश ने फाँसी पर चढ़ा दिया। अपनी मनमानी करने, नए और अनपेक्षित कर लगाने, भेदभाव करने व क्रूरता से निर्णय लेनेवाले निरंकुश शासक के विरुद्ध ऐसा असंतोष स्वाभाविक ही था। 

कैथोलिकों से समर्थन 

जब इंग्लैंड की अधिकांश आबादी प्रोटेस्टेंट धर्म की अनुयायी थी और कैथोलिक हाशिये पर खड़े थे, ऐसे में जेम्स द्वितीय ने फरमान जारी किया कि जनता को कैथोलिक धर्म का पालन करना होगा, क्योंकि राजा का धर्म ही जनता का धर्म होता है। उसने कैथोलिक लोगों को सेना में ऊँचे पदों पर बैठाया और प्रोटेस्टेंट का दमन करने के लिए उन्हें शक्तियाँ प्रदान कर दीं। जब संसद् ने उसके इस निर्णय पर विरोध प्रकट किया तो उसने संसद् ही भंग कर दी। 

कोर्ट ऑफ हाई कमीशन की स्थापना 

संसद् भंग करने के बाद जेम्स द्वितीय ने कैथोलिक लोगों को समर्थन देते हुए उनकी नियुक्तियों को वैध करने के लिए कोर्ट ऑफ हाई कमीशन’ की स्थापना की। संसद् ऐसे किसी भी न्यायालय या संस्था की स्थापना के विरोध में थी, क्योंकि इनकी निरंकुश निर्णय शक्ति राजा में निहित हो जाती थी। 

कानूनों का रद्दीकरण 

जेम्स द्वितीय ने वर्षों पुराने उन कानूनों को सन् 1687 में रद्द कर दिया, जो कैथोलिक लोगों और उनके द्वारा किए जानेवाले दुष्प्रचारों पर नियंत्रण रखते थे। इन कानूनों में ‘क्लेरेंडन कोड’, ‘टेक्स्ट एक्ट’ और चर्च संबंधी कानून प्रमुख थे। इन कानूनों के रद्द होने से कैथोलिक चर्च फिर से आडंबर फैलाने के लिए स्वतंत्र हुए। 

बिशपों पर मुकदमे 

कैथोलिक धर्म का वर्चस्व स्थापित करने के लिए राजा ने चर्च के प्रोटेस्टेंट पादरियों को आदेश दिया कि वे सभी कैथोलिक धर्म के प्रचार संबंधी कार्य करें। इससे पादरी वर्ग में असंतोष फैला। कैंटरबरी के आर्क बिशप के नेतृत्व में छह और बिशपों ने राजा को प्रार्थना-पत्र देकर ऐसे आदेश को वापस लेने की विनती की। इस पर राजा ने उन सातों को बंदी बना लिया और उन पर राजद्रोह का अभियोग चलाया। इतना ही नहीं, उसने इन सात बिशपों के स्थान पर डिसेंडर्स की नियुक्ति की, जो उसके आदेश के अनुसार कार्य करनेवाले राजभक्त थे। यह निर्णय उसकी निरंकुशता का प्रतीक था, जिसने असंतोष को भड़काया। 

विलियम ऑफ ऑरेंज का लेख 

हॉलैंड का राजा विलियम तृतीय राजशाही के इस निरंकुश शासन को उचित नहीं मानता था। वह संसद् की अनिवार्यता के पक्ष में था और कैथोलिकों के आडंबरों का बड़ा कट्टर विरोधी था। उसने अपने ये विचार एक लेख में लिखकर जनता को संकेत कर दिया कि यदि जनमत चाहे तो वह इस निरंकुशता के विरुद्ध जन-नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह तैयार है। 

इन सभी कारणों से इंग्लैंड की जनता में पूरी तरह से असंतोष व्याप्त हो गया और उसने क्रांति का वातावरण तैयार कर दिया; क्योंकि ऐसी किसी भी क्रांति को नेतृत्व की आवश्यकता होती है तो हॉलैंड के राजा के विचारों ने उसकी पूर्ति कर दी थी। जनता एकमत से विलियम तृतीय को इंग्लैंड का राजा बनाने पर सहमत हो गई थी। 

जनप्रतिनिधियों ने जनता के समर्थन से 5 नवंबर, 1688 को हॉलैंड के राजा को इंग्लैंड के सिंहासन पर विराजने के लिए आमंत्रित कर दिया। विलियम ततीय इसके लिए सहर्ष तैयार हो गया। यहाँ यह भी बताना आवश्यक है कि विलियम तृतीय जेम्स द्वितीय का दामाद था और उसकी पत्नी जेम्स द्वितीय की पुत्री थी। जब जेम्स द्वितीय के गुप्तचरों ने यह सूचना उसे दी तो वह बौखला गया कि उसका अपना दामाद ही उसके विरुद्ध क्रांति का नायक बन रहा था। 

जेम्स द्वितीय ने अपनी पत्नी और छोटी पुत्री एन से यह शिकायत की तो एन ने भी अपने पिता की गलत नीतियों का विरोध करते हुए अपनी बहन और बहनोई को उचित ठहराया। जेम्स द्वितीय के होश उड़ गए और उसने दुखी मन से कहा 

“ईश्वर रक्षा करे, मेरे बच्चे ही मेरा साथ छोड़ गए हैं।” 

इस पर उसकी पत्नी और छोटी पुत्री ने उसे यह भी समझाया कि यदि वह आज भी जनता के सामने अपनी गलतियों पर प्रायश्चित्त करते हए भविष्य में जनमत के अनुसार शासन करने का वादा करे तो जनता उसे क्षमा कर सकती है तथा उसे एक और अवसर दे सकती है; पर जेम्स द्वितीय अपनी अकड़ और जिद के कारण जनता के सामने झुकना नहीं चाहता था। अब कोई मार्ग शेष नहीं रहा था। 

15 नवंबर, 1688 को विलियम तृतीय हॉलैंड से 15,000 सैनिकों के साथ इंग्लैंड की ओर चल पड़ा तो जेम्स द्वितीय ने 20,000 सैनिकों के साथ उसका मुकाबला करने की तैयारी कर ली। दोनों सेनाएँ सेलिबरी में आमने-सामने आ गई थीं और युद्ध छिड़नेवाला ही था।

युद्ध से पहले ही जेम्स द्वितीय को एक बड़ा झटका तब लगा, जब उसने अपनी सेना के बहुत से सरदार और सैनिकों को हॉलैंड के विरुद्ध हथियार धरती पर रखते हुए देखा। इससे जेम्स द्वितीय बौखला गया। यह उसके लिए आदर्श स्थिति नहीं थी। उसे तो तब और बड़ा झटका लगा, जब उसे पता चला कि सरदारों और सैनिकों को उस युद्ध से विमुख करने में उसकी छोटी पुत्री एन की भूमिका थी, जो अब यॉर्कशायर में क्रांति का नेतृत्व कर रही थी।

जेम्स द्वितीय को अब अपने प्राण संकट में नजर आने लगे थे। अत: उसने रणभूमि से भाग जाना ही उचित समझा और अवसर पाकर भाग भी गया, लेकिन क्रांतिकारियों ने उसे रोचेस्टर में बंदी बना लिया। युद्ध आरंभ होने से पहले ही प्रजातंत्र की जीत हो चुकी थी। विलियम तृतीय और उसकी पत्नी को जनता ने सहर्ष इंग्लैंड का ताज पहनाया। अब वहाँ प्रजातंत्र की स्थापना हो गई थी और एक गौरवपूर्ण क्रांति का आगमन हुआ था, जिसमें एक बूंद भी रक्त नहीं बहा था। यह प्रजातंत्र की अभूतपूर्व विजय थी। 

विलियम तृतीय ने राजतंत्र को तिलांजलि देते हुए संसद् में विश्वास रखकर प्रजातंत्र को सर्वोपरि शासक बनाने का वचन दिया और तत्काल संसद् की पुनर्स्थापना कर डाली। बंदी जेम्स द्वितीय पर अभियोग चलाने की तैयारी भी हो गई, लेकिन वह किसी प्रकार से बंदीगृह से भागकर फ्रांस जा पहुँचा और इस तरह अपने प्राणों की रक्षा की। नए राजा ने इस महान् रक्तहीन क्रांति में जनता के धैर्य और अनुशासन की भूमिका की सराहना की और संसद् को प्रजातंत्र के अनुसार नीतिनिर्धारण करने के लिए अधिकार प्रदान किए। 

सन् 1689 में संसद् ने राजा की शक्तियों का निर्धारण करते हुए एक अधिकार पत्र घोषित किया, जिसे ‘बिल ऑफ राइट्स’ कहा गया। राजा ने इसे सहर्ष स्वीकृति दे दी। इस अधिकार-पत्र के अनुसार जो नियम और धाराएँ थीं, वे निम्नलिखित थीं- 

1.संसद् की अनुमति के बिना राजा कोई नया कर जनता पर नहीं लगाएगा

2. संसद् को भंग करने के अधिकार राजा के पास नहीं होंगे और संसटकी अपनी सहमति ही उसे भंग करने का अधिकार रखेगी।

3. सेना का विस्तार और उसमें नियुक्तियाँ करने के लिए राजा को संसद की अनुमति लेना अनिवार्य होगा, अन्यथा ऐसी भर्ती अवैध होंगी।

4. किसी भी व्यक्ति को बिना उचित कारण के बंदी नहीं बनाया जा सकता।

5. वित्तीय मामलों और सैन्य-नियंत्रण के लिए संसद् का अधिवेशन प्रतिवर्ष होगा, जिसमें आर्थिक और रक्षा-नीतियों का निर्धारण होगा।

6. राजा का एंग्लिकन चर्च का अनुयायी होना अनिवार्य होगा और भविष्य में भी कोई कैथोलिक गतिविधि न करने के लिए बाध्य होगा।

7. जनता और उसके प्रतिनिधि अपना पक्ष राजा के सामने रखने को स्वतंत्र होंगे।

इस अधिकार-पत्र के स्वीकृत हो जाने पर इंग्लैंड में प्रजातंत्र स्थापित हो गया। अब नागरिकों के मूल अधिकारों का विकास होने लगा। राजा को नामधारी शासक माना गया और लोकसदन के अधिकारों में वृद्धि हुई। राजा और संसद् के बीच चल रहा विवाद सदैव के लिए समाप्त हो गया और वैधानिक राजतंत्र की स्थापना हो गई। 

अब राजा की शक्तियाँ संसद् की सहमति से ही प्रभावी हो सकती थीं। इंग्लैंड की संसद् ने संसार की संसदों की जननी होने का गौरव पाया। इस संसदीय शक्ति और प्रजातंत्र ने जब मिलकर कार्य किया तो इंग्लैंड ने दिनोदिन प्रगति के नए आयाम रच दिए। विज्ञान ने इंग्लैंड की धरती पर जन्म लिया और नए आविष्कारों से औद्योगिक क्रांति की आधारशिला रखी। इस औद्योगिक क्रांति ने इंग्लैंड को विश्व में सिरमौर बना दिया और आर्थिक शक्ति बनकर इंग्लैंड ने साम्राज्यवाद की नींव रखी। ज्ञान, विज्ञान, साहित्य और मानवीय कौशल से परिपूर्ण छोटे से देश इंग्लैंड ने अपने साम्राज्य का इतना विस्तार किया कि उसे ‘ग्रेट ब्रिटेन’ कहा जाने लगा।

धीरे-धीरे इंग्लैंड ने सभी महाद्वीपों में अपने उपनिवेश स्थापित किए और फिर उसे थोड़े ही समय में विश्व की महाशक्ति के रूप में गिना जाने लगा। अमेरिका और भारत जैसे शक्तिसंपन्न देश भी ग्रेट ब्रिटेन के अधीन रहे और पाँच शताब्दियों ने विश्व को ग्रेट ब्रिटेन की महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बनते देखा। 

सन् 1906 में औद्योगिक क्रांति के बाद श्रमिक वर्ग ने सामूहिक जागरण के साथ मजदूर दल की स्थापना कर दी, जिसने राजनीतिक स्तर पर श्रमिकों के हित \के लिए कार्य किए। मताधिकार ने इस श्रमिक दल को भी इंग्लैंड के शासन में महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाया। उदारवादी नीतियों वाले इस मजदूर दल को शासन में व्याप्त औपनिवेशिक नीति में कठोरता, पक्षपात आदि पर विरोध रहा। यह दल मानता था कि शासन मानववादी होना चाहिए और किसी भी देश को दूसरे देश की स्थिति, धारणाओं और वहाँ के प्रजातंत्र के अनुसार शासन करना चाहिए। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में इस दल के प्रतिनिधियों ने उदार भूमिका निभाई और प्रजातंत्रीय शासन का समर्थन किया।

इंग्लैंड विश्व की अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा स्थान रखता है और आज भी उसकी चमक-दमक से संसार प्रभावित है। इंग्लैंड ने शेष विश्व को आधुनिक युग तक लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह सब उसके प्रजातंत्र की शक्ति के कारण संभव हो सका है। 

इंग्लैंड की इस रक्तहीन क्रांति के विषय में रैम्जे ग्योर ने लिखा है- 

“सन् 1688 की रक्तहीन क्रांति इंग्लैंड के संसदीय इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई, क्योंकि इसी क्रांति ने देश में संसद् की सर्वोच्चता स्थापित की और शेष विश्व को इसका अनुसरण करने की प्रेरणा दी।”

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