फ्रांस की क्रांति का इतिहास | History of the Glorious Revolution of France

फ्रांस की क्रांति का इतिहास

फ्रांस की गौरवपूर्ण क्रांति का इतिहास | History of the Glorious Revolution of France

पुरातन राजतंत्र व्यवस्था में राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि स्थापित उकिया गया था और उसे दैवीय कृपा से परिपूर्ण दिव्य पुरुष माना जाता था। प्रजा उसकी पूजा करती थी और उसके हर आदेश का आँख मूंदकर पालन करती थी। किसी भी प्रकार के मानवीय नियंत्रण से बाहर इन स्वयंभू देवपुरुष राजाओं ने मध्यकाल में जनता का शोषण करने की व्यवस्था बना रखी थी, जिसमें उसके स्वजन, हितैषी और सामंत वर्ग के साथ धर्माधिकारियों का पूर्ण योगदान था। धर्म के ठेकेदार नित नए धार्मिक आडंबरों से जनता की आस्था राजा में प्रबल करते रहते थे और इसे जनता में सिद्ध करने में राजभक्त सामंतों और धर्माधिकारियों की भूमिका सक्रिय थी। 

आखिरकार उपरोक्त सिद्धांत का जोरदार खंडन फ्रांस की राज्य क्रांति ने कर दिया और जनता की शक्ति को सर्वोपरि बना दिया। मध्यकाल में फ्रांस में भी राजा ने स्वयं को ईश्वरतुल्य समझा और निरंकुशता की सभी हदों को पार करते हुए जनसाधारण को पीड़ा भोगने पर विवश कर दिया। शासन-व्यवस्था और जनता को त्रास देनेवाले कानून इतने कठोर थे कि जनता राजा के अनुचित कार्यों की आलोचना भी नहीं कर सकती थी। यदि किसी ने भलवश या साहस से ऐसा कर भी दिखाय तो उसे राजद्रोह का अभियोग लगाकर मृत्युदंड दे दिया जाता था। 

फ्रांस की क्रांति के समय लुई सोलहवाँ वहाँ का शासक था, जो अत्यंत विलासी, चाटुकारिताप्रिय और जनहितों से दरी बनाकर रखनेवाला था। उसक आसपास चाटकारों का ऐसा समह रहता था. जो उसकी व्यर्थ की प्रशसा का रहता था। 

यही फ्रांस विश्वपटल पर एक ऐसी शक्ति था, जिसने इंग्लैंड का साम्राज्य को हमेशा टक्कर दी। लई चौदहवें के समय फ्रांस यूरोप के सबसे शक्ति और आर्थिक संपन्न देशों में अग्रणी था। मजबूत अर्थव्यवस्था से फ्रांस ने उन्नति के जिस शिखर को छुआ, वह मध्यकाल में आसान काम नहीं था। बाद में यहाँ का शासक वर्ग अपनी विलासिता से इस उन्नत देश के माथे पर कलंक बनकर रह गया। 

लुई पंद्रहवाँ तो विरासत में मिली अकूत अर्थव्यवस्था को अपनी अगली सात पीढ़ियों के लिए पर्याप्त मानता था और दिन-रात रासरंग में डूबा रहता था। इसके बाद लुई सोलहवाँ आया, जो उससे भी चार कदम आगे सोचता था। उसका मानना था कि सार्वभौमिकता मेरे अंदर निवास करती है और कानून बनाने की सारी शक्ति मुझमें है। मैं ही राज्य हूँ और मेरी इच्छा ही कानून है।

इस अयोग्य और विलासी राजा ने जनहित के लिए कभी भी कोई काम नहीं किया। उसने ऐसा कोई काम ही नहीं किया, जिससे फ्रांस के राजकोष की गिरती सेहत में कोई सुधार हो पाता। आदेश को वह काम समझता था और जनता पर कर थोपने को अपना अधिकार समझता था। अपनी शक्ति को स्थायी और शासन को निष्कंटक रखने के लिए उसने ऐसा मंत्रिमंडल बनाया था, जो उसके हर आदेश का पालन करने को तैयार रहता था, क्योंकि इससे उन चाटुकारों की विलासी प्रवृत्ति की भी संतुष्टि होती थी। लुई सोलहवाँ उन्हें अपना गणाधीश समझता था। उसकी अयोग्यता, विलासिता और जनउपेक्षा के निम्न दो उदाहरणों से ही राज्य क्रांति के पर्याप्त कारणों को समझा जा सकता है

जब अमेरिका में वर्चस्व स्थापित करने के लिए फ्रांस को अपने चिर प्रतिद्वंद्वी इंग्लैंड से 7 वर्ष तक युद्ध करना पड़ा और पराजय भी सहनी पड़ी, तो उसकी आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर हो गई थी। राजकोष में फ्रांस की विख्यात अर्थक्षमता के अनुरूप भी धन नहीं था। ऐसे में लुई सोलहवें को सनक चढ़ी कि वह यूरोप का ही नहीं, बल्कि विश्व भर का सबसे भव्य महल बनाएगा। इसके लिए उसने जनता पर नए कर लगा दिए और अपनी विलासिता का प्रतीक वह भव्य महल बनाया, जो फ्रांस की राजधानी से 12 मील दूर वर्साय में बनाया गया। इसके निर्माण में 10 करोड़ रुपए खर्च हुए और इसमें 18,000 व्यक्तियों के रहने की शानदार व्यवस्था की गई। 

इस भव्य प्रासाद में राजा के परिजन, संबंधी, चाटुकार मित्र और राजभक्त अधिकारी ही रहते थे, जिन पर प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए खर्च होता था। यह राजमहल फ्रासासी राजाओं की ऐशगाह था. जिसने लई वंश की कब्रगाह बनाने का मागे प्रशस्त किया। अगले शासकों ने भी इस भव्य राजमहल की शान-शाकत बनाए न के लिए जनता का खून निचोड़ डाला। लुई सोलहवाँ तो इस महल को अमरावती जान और स्वयं को इंद्र मानकर फ्रेंच अप्सराओं का नृत्य देखा करता था और कभी-कभार ही इस महल से बाहर जाया करता था। 

दूसरे उदाहरण में लुई सोलहवें और उसकी रानी मेरी आंतोआंत की विलासी प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं और जनता से उनके संबंधों का पता चलता है। एक बार अपने राजमहल की भव्यता में डूबी रानी ने ऊबकर राजा से नगर-भ्रमण की प्रार्थना की। कुछ इतिहासकार इसे ‘आदेश दिया’ भी कहते हैं, तो लुई सोलहवाँ अपनी भव्य सवारी में बैठकर रानी के साथ नगर-भ्रमण के लिए चल दिया। उनका ऐसा दौरा वर्षों में कभी एक बार होता था। 

जब जनता ने अपने राजा-रानी को सड़कों पर देखा तो समझा कि उनके अन्नदाता उनकी समस्याएँ सुनने आए हैं। सवारी आगे बढ़ी जा रही थी और भूख से बिलखती जनता ‘रोटी-रोटी’ चिल्ला रही थी तो उसने एक सेवक से पूछा। सेवक ने बताया कि गरीबी के कारण उन्हें रोटी न मिलने से वे लोग रोटी माँग रहे हैं। इस पर रानी ने आश्चर्य जताया और सहज भाव से कहा कि यदि इन लोगों को रोटी नहीं मिलती तो केक क्यों नहीं खा लेते। 

ये दो उदाहरण वहाँ की जनता में असंतोष फैलाने के लिए पर्याप्त थे और राजा की हृदयहीनता का सबूत भी थे। ऐसी विद्रूपपूर्ण स्थितियों में क्रांति को चंद और कारण मिल जाएँ तो उसके विस्फोट में क्या देर लगती है और प्रजातंत्र के भाग्य से ऐसे कई कारण फ्रांस की शासन व्यवस्था में मौजूद थे। इनका वर्णन इस प्रकार है 

सामाजिक असमानता 

फ्रांस में समाज तीन वर्गों में बँटा हुआ था। इनमें पहला वर्ग पादरियों का था, दसरा वर्ग सामंतों का था और तीसरा वर्ग फ्रांस की 95 प्रतिशत गरीब जनता का था। पादरी वर्ग की शक्ति धार्मिक आडंबरों पर टिकी हुई थी, जो सीधे राजा को लाभ पहुँचाती थी। उसकी सत्ता को कायम रखने और लोगों में राजा को दैवीय पुरुष बनाए रखने में इन चर्चों की बड़ी भूमिका थी। राजा ने इन्हें शक्ति और अधिकारों से सुसज्जित कर रखा था। 

चर्च की अपनी निजी सरकार थी, जो धार्मिक मुकदमों में निर्णय करती थी। राजा ने राज्य की कुल भूमि का पाँचवाँ हिस्सा चर्च को दे रखा था, जिस पर चच द्वारा अतिरिक्त कर लगाए जाने के अधिकार पादरियों के पास थे। दूसरा वर्ग कुलीन सामंतों, उच्चाधिकारियों और राजपरिवार के लोगों का था, जो राजा के हितैषी थे और उसकी विलासिता में हिस्सेदार थे। उन्हें जनता से कोई भी कार्य बिना पारिश्रमिक के करा लेने और मनचाहा उपहार लेने की छूट थी। उनसे किसी भी प्रकार का कर राजकोष में नहीं जाता था। ये अपने-अपने पद और अधिकारों से भी बढ़कर जनता का शोषण करते थे। उनकी विलासिता पर होने वाला खर्च राजकोष की सेहत में निरंतर सुराख कर रहा था। 

तीसरा, जनसाधारण वर्ग हालाँकि इन दोनों विलासी वर्गों से संख्या में बहुत अधिक था, लेकिन उनकी जीवनशैली में श्रम और राजभक्ति से ज्यादा और कुछ सम्मिलित नहीं था। इस वर्ग में श्रमिक, कृषक, सामान्य शिक्षित लोग थे, जिन्हें शासन में जरा भी भागीदारी करने का अधिकार नहीं था। जानवरों की तरह जीवन जीते ये सामान्य नागरिक अपनी न कोई इच्छा जानते थे और न इन्हें किसी प्रकार के अधिकार दिए गए थे। उनका काम केवल श्रम करना था, जिससे शासकों और सामंतों का भोगविलास होता रहे। 

आर्थिक विषमता 

जनता को जैसे श्रम के लिए ही माना गया था और उस श्रम से अर्जित उत्पादन पर जनता का कोई अधिकार था तो केवल पेट भरने लायक अन्न भर को था। वह भी हमेशा नहीं दिया जाता था। कृषकों द्वारा उत्पादित अन्न का 92 प्रतिशत भाग राज्यकरों के रूप में ले लिया जाता था और शेष 8 प्रतिशत से उसे अगली फसल तक अपने परिवार को पालना पड़ता था। श्रमिकों का मजदूरी देना या न देना कुलीन वर्ग या सामंतों की इच्छा पर निर्भर करता था। अधिकांश तो बेगार को ही प्राथमिकता देते थे। 

जब अमेरिका को फ्रांस ने वित्तीय सहायता दी तो राजकोष इस स्थिति में नहीं था, लेकिन अदूरदर्शी राजा को अपनी शान बनाए रखनी थी। उसने जनसाधारण पर एक के बाद एक कर लगाए, जिससे पहले से ही दबी-कुचली जनता और भी कराह उठी, जबकि पादरी वर्ग और कुलीन वर्ग के पास इतनी संपत्ति थी कि जिससे फ्रांस की अर्थव्यवस्था को बिना हिलाए-डुलाए, केवल कर लेकर भी अमेरिका की सहायता की जा सकती थी। जनता को इस अत्याचार ने बुरी तरह से असंतोष से ग्रस्त कर दिया था। 

वैचारिक प्रभावों से जागरण 

फ्रांस में वर्षों से चली आ रही निरंकश व्यवस्था को जनता के सामने लाने का श्रेय वैचारिक क्रांति को दिया जाता है, जिसने जनता को अपनी सामूहिक शक्ति का आभास कराते हुए उसे अपने अधिकारों के लिए लड़ने को प्रेरित किया। फ्रांस की सोई हुई जनता को प्रजातंत्र की शक्ति से परिचित कराकर सामंतवाद को उखाड़ फेंकने की प्रेरणा इसी क्रांति ने दी। 

अपने विचारों और लेखों से जनता में जागृति पैदा करने के लिए रूसो, वाल्टेयर, मांटेस्क्यू जैसे विचारकों और दिदरों तथा क्वेसेन जैसे लेखकों ने बहुत योगदान दिया। इन विचारकों ने फ्रांसीसियों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बुराइयों का ज्ञान कराया तथा जनता के हृदय में आजादी का अलख जगा दिया। इस बौद्धिक क्रांति ने न्याय, समानता और स्वतंत्रता की धारणा को जनसाधारण में स्थापित किया। रूसो ने जहाँ राज्य की उत्पत्ति के संबंध में अपने विचार प्रस्तुत किए, वहीं मानवीय अधिकारों की मनोहारी और प्रेरणापरक व्याख्या की। मांटेस्क्यू ने राजनीति और कानून के बारीक वर्णन से लोगों को अपनी क्षमता से परिचित कराया। इन दार्शनिकों ने स्वतंत्रता के लिए जो आवश्यक कारक बताए, उन्हें फ्रांस की आम जनता ने आत्मसात् कर लिया।

अंततः सन् 1788 में जनसाधारण की झलक दिखाई देने लगी थी। राजा ने इसी समय कुछ नए कर जनता पर थोपने के लिए सामंतों की सभा बुलाई, जिसमें इन करों का विरोध किया गया। 5 मई, 1789 को ऐवजेनरो का अधिवेशन हुआ, जिसमें वित्तमंत्री नेकर ने राजा की इच्छानुसार वित्तीय समस्याओं और समाधानों की ही चर्चा की। इससे तीसरा सदन सहमत नहीं हुआ। वित्तमंत्री ने स्पष्ट कहा कि इस विषय में प्रत्येक सदन अलग-अलग बैठक करे। 

तीसरे सदन का नेतृत्व मीराबो कर रहा था, जो इस क्रांति का नायक था। तीसरे सदन की बैठक 20 जून को होनी थी, लेकिन जब मीराबो और अन्य सदस्य सदन पहुँचे तो उसका मुख्य द्वार उनके लिए बंद कर दिया गया था। इससे स्पष्ट था कि राजा और उसके चाटुकार इस तीसरे सदन की माँगों पर गंभीर नहीं थे। तब मीराबो ने सभी साथियों को टेनिस कोर्ट में ले जाकर सभा की और इसे राष्ट्रीय सभा का नाम देकर संविधान बनाने की घोषणा कर डाली। 

जब सम्राट ने इस सभा को अवैध घोषित कर तत्काल उन लोगों से टेनिस कोर्ट खाली करने का आदेश दिया तो सभा का अध्यक्ष मीराबो गरज उठा। उसने दृढ स्वर में कहा, “हम उस समय तक यहाँ से नहीं हटेंगे, जब तक हम देश का संविधान नहीं बना लेते, भले ही हमारे विरुद्ध संगीनों का प्रयोग क्यों न किया जाए।” 

मीराबो की यह शपथ टेनिस कोर्ट की शपथ’ के नाम से प्रसिद्ध हुई, जिसने सम्राट को झुकने पर विवश कर दिया और उसे राष्ट्रीय सभा को मान्यता देनी ही पड़ी। यह जनांदोलन की बहुत बड़ी जीत थी। अब जनता की आशाएँ बढ़ गई थीं 

और सम्राट के झुक जाने पर उदारवादी वित्तमंत्री नेकर ने जनता की जीत की सराहना कर डाली, जिससे तिलमिलाए सम्राट ने उसे पद से हटा दिया और अब वह राष्ट्रीय सभा के संभावित विद्रोह को कुचलने की तैयारी करने लगा। 

बास्तील का पतन 

जब महासभा ने यह जाना कि राजा महासभा के दमन के लिए जर्मन और स्विस सेनाओं से मदद ले रहा है तो लोगों का उसकी हठधर्मिता पर आक्रोश बढ़ गया, जिससे विद्रोह शुरू हो गया। यह क्रांति का आगाज था, जिसमें राज्य भर की जनता सम्मिलित थी। 

14 जुलाई, 1789 को बास्तील की जनता ने किले पर धावा बोलकर वहाँ बंद किए हुए सभी सैनिकों को रिहा कर दिया। इसके बाद शस्त्रागार लूट लिया गया। अब बास्तील जनता के कब्जे में था, जहाँ किले की प्राचीर से क्रांतिकारियों ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इससे सारे फ्रांस में क्रांति की ज्वाला भड़क उठी। किसानों ने हथियार उठा लिए और सामंतों व कर वसूलने वालों पर चढ़ दौड़े। उनके अत्याचारों को याद करके क्रांतिकारियों ने कई अधिकारियों की जलसमाधि बना दी। इस भीषण क्रांति ने सम्राट के दैवीय प्रतिनिधि होने की मान्यता का समूल खंडन कर दिया। 

4 अगस्त, 1789 को राष्ट्रीय महासभा का अधिवेशन हुआ, जिसमें स्वतंत्र फ्रांस की तसवीर पेश करते हुए निम्नलिखित जनहितकारी घोषणाएँ की गईं 

1.फ्रांस में किसी भी पादरी और कुलीन वर्ग के पास कोई विशेषाधिकार नहीं रहेगा और ये लोग किसी भी तरह का कर वसूलने के अधिकारी नहीं होंगे।

2. सभी नागरिकों के अधिकार समान होंगे, बेगार प्रथा समाप्त होगी।

3. फ्रांस में वर्ग या जाति भेद को मान्यता नहीं दी जाएगी। 

इन घोषणाओं से जहाँ जनसाधारण में खुशी की लहर दौड़ गई, वहीं सामंत और पादरी अपनी जान बचाने के रास्ते खोजने लगे। महासभा ने देश की रक्षा के लिए राष्ट्रीय रक्षक दल की स्थापना करके लफायत नाम के एक स्वतंत्रता-प्रेमी को इसकी कमान सौंप दी। 

सम्राट् लुई सोलहवाँ अपने भड़कीले राजमहल में बैठा चिंतित था और इस क्रांति को कुचलने के उपाय सोच रहा था। 5 अक्तूबर, 1789 को दस हजार स्त्रियों का दल वर्साय के शीशमहल पर ‘हमें रोटी दो’ का नारा लगाकर चढ़ दौड़ा और महल को अपने कब्जे में लेकर सम्राट् तथा उसके परिवार को पेरिस घसीट लाया। यहाँ उसे नजरबंद कर दिया गया और स्वतंत्र फ्रांस के नए शासन की रूपरेखा तैयार की जाने लगी। 

राष्ट्रीय महासभा ने 26 अगस्त, 1789 को मानवाधिकारों की घोषणा करके जनता को समानता, न्याय और स्वतंत्रता के अधिकार हस्तगत कर दिए। इसके साथ ही राष्ट्रीय सभा ने जनता के अधिकारों की रक्षा के सभी उपाय कर दिए। राजा के शासन का अंत करके प्रजातंत्र की स्थापना कर दी गई थी। अतः सन् 1791 में फ्रांस का पहला लिखित संविधान भी अस्तित्व में आ गया। इसमें राजा के अधिकार सीमित कर दिए गए। जनता की इच्छा, अनुमति और सहमति को सरकार की शक्तियों का केंद्र बनाया गया। कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका की शक्तियाँ निर्धारित कर दी गईं। इन सब संवैधानिक नियमों को लागू करने के बाद राष्ट्रीय सभा ने ‘जनता का शासन जनता के हाथ’ सौंपकर स्वयं को भंग कर दिया। यह त्याग, देशप्रेम और जनसेवा का उदाहरण था। 

इस बीच लुई सोलहवाँ शांत नहीं बैठा था। उसकी अक्ल ने काम करना बंद कर दिया था, अन्यथा वह जनता की सरकार का नामचारी राजा बनकर आनंदपूर्वक को सीमित कर दिया जाए और वह नाम का राजा रहे । उसने संसदीय सरकार को समाप्त करने का दिवास्वप्न देखना शुरू कर दिया। अब उसे अपने चाटुकारों और राजभक्तों को संगठित करने की सुध आने लगी थी। तभी तो वह ट्वेलरी जेल से भागने का प्रयास कर रहा था। 

20 जून, 1791 को लुई सोलहवाँ को सफलता मिल गई और वह अपने पुत्र व पत्नी के साथ भेष बदलकर पेरिस से भाग खड़ा हुआ। वह नहीं जानता था कि अब फ्रांस का चप्पा-चप्पा जनता की नजर में है और उसका सरलता से सीमा पार कर लेना कठिन था। बस यही हुआ भी! वह बेरव गाँव में एक किसान द्वारा पहचान लिया गया और बंदी बना लिया गया। अब उस पर जनता का रहा। विश्वास भी समाप्त हो गया था। उस पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया। 

21 जनवरी, 1793 को गिलोटिन द्वारा उसके सिर को धड़ से अलग दिया गया। उसकी मृत्यु के साथ ही फ्रांस से राजतंत्र की समाप्ति हुई और गणतंत्र की स्थापना हो गई। गणतंत्र की स्थापना में महान् देशभक्त, कानूनविद् और मजदूरों के हितैषी दांते का योगदान रहा, जिसने क्रांति का सफलता से नेतृत्व किया। उसके अतिरिक्त रोब्स पियर और डॉक्टर मारा का योगदान भी उल्लेखनीय रहा। 

गणतंत्र की स्थापना के बाद फ्रांस ने विकास के मार्ग पर कदम रख दिए और अपनी तेज रफ्तार से संसार के साथ कदम मिलाकर चलने लगा। इस क्रांति के फलस्वरूप सुखद परिवर्तन ने फ्रांस को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को भी प्रेरित किया। इस क्रांति के परिणामस्वरूप फ्रांस को जो मिला, वह किसी भी देश के विकास के लिए पर्याप्त हो सकता था। 

राष्ट्रीय भावना का विकास 

राष्ट्रप्रेम की भावना का विकास राज्य क्रांति के साथ ही हुआ। जो फ्रांसवासी राजा के समक्ष हाथ बाँधे खड़े उसे दैवीय अधिकार प्राप्त दिव्य पुरुष मानते थे, उन्हें इस क्रांति ने राष्ट्रभावना से परिचित कराकर राष्ट्ररक्षा में खड़ा कर दिया। राष्ट्र के विकास में सभी ने योगदान देने की ठान ली और फ्रांस के गौरवशाली भविष्य की पटकथा लिख दी। 

समाजवाद का आरंभ 

वर्ग संघर्ष से उपजी इस क्रांति ने समाजवाद की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। राजा, सामंत, पादरी और अधिकारी वर्ग ने जो शोषण-व्यवस्था बनाई थी, उसका अंत करके समानता की स्थापना इसी क्रांति से हुई। दासप्रथा, बेगार जैसी प्रथाएँ समाप्त हुईं और स्त्रियों को भी समाज में बराबरी का अधिकार प्रदान किया गया। फ्रांस में एक सफल समाजवाद की स्थापना का श्रेय भी इस क्रांति को जाता है। 

धर्मनिरपेक्षता का उदय 

फ्रांस में क्रांति से पहले धार्मिक व्यवस्था राजहित में थी और धर्म ने जनता को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले रखा था। राजा का धर्म ही जनता का धर्म होता था। क्रांति ने धर्म को राजनीति से पृथक कर दिया और धर्माधिकारियों के महत्त्व को भी कम कर दिया। जनता को धर्म के मामले में स्वतंत्रता दी गई और इस प्रकार फ्रांस में धर्म निरपेक्षता का पदार्पण हुआ। 

सामंतवाद का अंत 

फ्रांस में जिस सामंतवाद ने जनता का शोषण किया था, उसका अंत इसी क्रांति के माध्यम से हुआ। सामंतों ने अपने विलासी और अयोग्य राजा की शह पाकर जनता पर मनमाना अत्याचार किया और जनसाधारण ने साक्षात् नरक समान जीवन व्यतीत किया। क्रांति के चरम पर पहुँचते ही इन सामंतों और कर वसूलने वालों को मौत के घाट उतारा जाने लगा। इससे यह शोषक वर्ग फ्रांस छोड़कर भागने लगा था। इस प्रकार सामंती व्यवस्था का अंत हुआ।

फ्रांस में गणतंत्र की स्थापना के बाद स्वर्णिम काल ने दस्तक दी और राजतंत्र के बाद प्रजातंत्र ने यहाँ के विकास को गति दी। अर्थव्यवस्था में सुधार होता गया और फ्रांस में एक नई सनसनी ने कदम रखा, जिसने सारे विश्व को फ्रांस का लोहा मनवा दिया। यह युग नेपोलियन बोनापार्ट का था, जो क्रांति के समय 15 अगस्त, 1769 को पैदा हुआ और अपनी क्षमताओं से फ्रांस की राजनीति में डायरेक्टरी के समाप्त होने पर पहला काउंसिल बना तथा सन् 1802 से आजीवन काउंसिल बना रहा। सन् 1804 में उसने फ्रांस का सिंहासन अपने अधिकार में ले लिया। फिर तो उसने फ्रांस की कायापलट ही कर दी। 

आधनिक फ्रांस का निर्माता नेपोलियन ही था। उसने पूरे यूरोप में फ्रांस को सबसे समद्ध और उन्नत देश बना दिया। शिक्षा, समाज और आर्थिक स्तर पर नेपोलियन ने फ्रांस को आत्मनिर्भर कर दिया। उसने फ्रांस का सम्राट् बनते ही इंग्लैंड, ऑस्ट्रिया, प्रशा और रूस को अनेक युद्धों में परास्त करके पूरे विश्व को कँपकँपा दिया था। 

सन 1807 में टिलासित की संधि के समय फ्रांस की शक्ति पराकाष्ठा पर नगई थी। नेपोलियन का युग फ्रांस के इतिहास का स्वर्णिम युग रहा और फ्रांस को संसार के शक्तिशाली राष्ट्रों में अग्रणी माना गया। 

फांस की क्रांति ने मानव और नागरिकों के जन्मजात अधिकारों की घोषणा करके मानव जाति के लिए भावी क्रांतियों की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। 

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