चीनी गृहयुद्ध का इतिहास |History of the Chinese Civil War

चीनी गृहयुद्ध का इतिहास

चीनी गृहयुद्ध का इतिहास (Civil War in China) (1945 से 1949 ई०) 

 चीन में व्यवस्था परिवर्तन की ओर नागरिकों का रुझान 1911 से ही आरम्भ हो गया था। इस रुझान की वजह जापान की बढ़ती हुई शक्ति के साथ मंचू शासकों का संकीर्णतावाद था। दुनिया तेजी से तरक्की करती जा रही थी, मशीनीकरण ने विश्व के अन्य देशों को कहीं से कहीं पहुंचा दिया था, परन्तु चीन खेती प्रधान देश ही बना हुआ था। 

चीन में तेजी के साथ जनसंख्या प्रसार हो रहा था। सन् 1885 ई० में चीन की कुल संख्या 37,370,00,000 थी, जबकि 1911 आते-आते यह 43,00,00,000 तक पहुंच गयी थी। इसके परिणामस्वरूप पैदावार की कमी से चारों ओर भुखमरी फैल गयी और जनसाधारण के लिए जीवन निर्वाह कठिन हो गया। इस अवस्था में चीन के लोग दूसरे देशों में जाकर श्रम करने लगे। उन्होंने श्रम का महत्व समझा और विदेशों से कमाकर अपने देश जब आए तो उन देशों की तरक्की का राज उन्होंने अपने देश के लोगों में बांटा। 

चीन में प्रगतिशील सुन-यात-सेन (Sun-yat-Sen) पैदा हुआ। जिसने नयी विचारों के लोगों को संगठित कर उनमें क्रान्तिकारी विचारधारा भरी। डॉ० सुन-यात-सेन के नेतृत्व में टोकियो में चीनी छात्रों ने अपना एक संगठन भी बनाया। सन् 1505 तक चीन के सत्ररह प्रान्तों के छात्रों ने युग-मेग-हुई नामक दल का गठन किया। इस प्रकार चीन में विद्रोह आरम्भ हो गया। लेकिन क्रान्ति की शुरूआत हांको नामक स्थान पर हुई। 10 अक्टूबर, 1911 को हांको के एक रूसी परिवार के आवास पर, जोकि क्रान्तिकारियों का अड्डा था, विस्फोट हुआ। पुलिस के दमन चक्र के कारण विद्रोहियों ने वायसराय के कार्यालय को घेर लिया, उसमें आग लगा दी, जिसके कारण वायसराय को भागना पड़ा। चीनी सेनापति भी नगर छोड़कर भाग गया। क्रान्तिकारियों ने बूचांग पर अधिकार कर लिया। तत्पश्चात् हांको पर अधिपत्य स्थापित करके क्रान्तिकारियों ने ली-युआन हुंग की अध्यक्षता में एक अस्थायी सरकार की स्थापना की। 

शीघ्र ही क्रान्ति चीन के अन्य नगरों में भड़की। 16 नवम्बर, 1911 ई० को पूरे चीन में क्रान्ति सफल रही। चीन को चीनी गणतन्त्र घोषित किया गया। सन-यात-सेन अमेरिका से संघाई पहुंचे। उन्हें 29 दिसम्बर, 1911 को अपनी सरकार का अध्यक्ष घोषित किया गया। इस तरह पुरातनपंथी, प्राचीन परम्परा से चले आ रहे शासक वंश की समाप्ति हो चीन में गणतंत्र की स्थापना हुई।

साम्यवादी आन्दोलन से प्रभावित चीन 

चीन की व्यवस्था बदल गयी थी। बावजूद इसके चीन उस तेजी से प्रगति न कर पा रहा था। जैसा कि वह अपने आस-पास में स्वतन्त्र देशों को करता देख रहा था। सन् 1917 ई० में रूस में बोल्शेविक क्रान्ति हो गयी। क्रान्ति सफल रही। रूसी क्रान्ति ने पूरे विश्व को प्रभावित किया था। इस क्रान्ति से केवल सरकार ही न बदली थी, विश्व को एक नयी व्यवस्था मिली थी-यह व्यवस्था कम्युनिस्ट व्यवस्था थी। कम्युनिस्ट व्यवस्था ने गणतंत्र और लोकतंत्र से आगे जाकर कार्य किया। चीन ने मान लिया था कि कम्युनिस्ट विचारधारा को स्वीकार करने पर ही चीन का उद्धार सम्भव है। इसी के फलस्वरूप रूसी साम्यवाद को प्रति चीन के प्रबुद्ध लोगों का झुकाव बढ़ने लगा।

माओं का नेतृत्व 

साम्यवाद के उदय और विकास के लिए परिस्थितयां तैयार हो रहीं थीं, उसी समय चीनियों का माओ-त्से-तुंग जैसे क्रान्तिकारी नेता का मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ। माओ में मजदूर वर्ग तथा निम्नवर्ग को संगठित करने की असाध पारण क्षमता विद्यमान थी। उनके प्रयासों से चीन में एक संगठित आन्दोलन का आरम्भ हुआ। उस समय चीन की सत्ता पर च्यांग-काई-शेक विराजमान था, उसने चीन के साम्यवादियों को कुचलने का प्रयास किया। परन्तु उसका यह प्रयास क्रान्तिकारियों में नई ऊर्जा भरने का कार्य करता रहा। 

13 अक्टूबर, 1934 ई० को साम्यवादियों को कुचलने के लिए च्यांग-काई-शेक की सरकार ने ‘महाप्रस्थान अभियान’ (मृत्यु अभियान चलाया। उस समय तक माओ के नेतृत्व में कई लाख साम्यवादी सेना तैयार हो चुकी थी। अभी वह प्रत्यक्ष च्यागं सेना से लड़ने की शक्ति न रखती थी, अतः अपनी सेना को लेकर माओ यांगत्सी नदी पार कर गए। फिर कुछ प्रदेशों में माओवादियों की सरकारें बनती चली गयीं। प्रतीत होने लगा था कि जल्द ही चीन में क्रान्ति सफल होकर रहेगी। पर उसी समय द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ गया। च्यांग सरकार ने देश के नाम पर साम्यवादियों को जापान से घिरते आ रहे खतरे से निपटने से साथ देने का आह्वान किया। 

सन् 1945 ई० में द्वितीय युद्ध में जापान की पराजय हो गयी। अब जापान से खतरे का भय भी न रहा। चीन के साम्यवादियों ने अपनी क्रान्ति फिर तेज कर दी। च्यागं सरकार की सेना और माओ की सेना (साम्यवादियों) के बीच खूनी जंग छिड़ गयी। लाखों लोग इस युद्ध की भेंट चढ़ने लगे। माओवादियों ने येनाम, मुकदेन, किटिन, चागमून आदि क्षेत्रों में सफलता प्राप्त कर अपनी सरकार कायम कर ली। 

उन्होंने पीकिंग से च्यांग की सेना का सम्बन्ध खत्म करने के लिए उनके सम्मुख रसद की समस्या उत्पन्न कर दी। बीच का मार्ग काटकर अपने अधिकार में लेकर रसद और नयी सेना की आपूर्ति ठप्प कर दी। 1947-48 ई० की ठण्ड, च्यांग सैनिकों के लिए बेहद घातक सिद्ध हुई। च्यांग सेना का एक बड़ा भाग नष्ट हो गया। उनके अस्त्र-शस्त्र और धन-सम्पदा माओ सेना के कब्जे में आ गया। इस प्रकार च्यांग सेना को माओ सेना के सामने भारी पराजय का सामना करना पड़ा। चीन में माओवाद का जोर, दिनो-दिन नौजवानों में बढ़ता चला जा रहा था। ये नौजवान भाग-भागकर माओ की ओर जाकर उनकी सेना में भर्ती होकर, उनकी विजय को सुनिश्चित करना चाहते थे। 

अन्ततः च्यांग सरकार की स्थिति इतनी बिगड़ गयी कि 1949 ई० के आरम्भ में च्यांग सेना के सेनापतियों ने भी च्यांग सरकार का साथ देने से इनकार कर दिया। उन्होंने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया।

गृहयुद्ध का अन्त

उत्तरी चीन पर साम्यवादियों का पहले से ही प्रभुत्व था। चीनी अधिकारियों को अपना साथ देने के लिए तैयार कर साम्यवादियों ने सांगत्सी नदी को पार कर नानकिंग पर भी आधिपत्य जमाकर शंघाई, चेकिआंग, हूनान आदि पर भी कब्जा जमा, माओत्से-तुंग ने चीन में कम्युनिस्ट गणतंत्र की घोषणा कर दी। 

लाखों लोगों के बलिदानों के साथ 21 नवम्बर, 1949 ई० को चीन के विस्तृत भूभाग पर माओवादी सरकार स्थापित होने की घोषणा हुई। 

च्यांग-काई-शेन ने फारमोसा में जाकर शरण लेकर अपनी जान बचायी। माओ ने च्यांग काई शेक को न केवल जीवित छोड़ दिया बल्कि फारमोसा में उसे अपनी सत्ता चलाने की अनुमति भी दे दी। तत्पश्चात् च्यांग-काई-शेक का शासन फारमोसा (आधुनिक ताइवान) तक सीमित रह गया। 

चीन के इस गणतंत्र के अध्यक्ष माओ-त्से-तुंग, उपाध्यक्ष श्रीमती सन-यात-सेन, प्रधानमंत्री व विदेशी मंत्री चाऊ-एन-लाई चुने गए। इसके बाद, चीन के इतिहास में एक नए युग का आरम्भ हुआ। 

च्यांग-काई-शेक के पराजय के बाद भी उन्हें न केवल जीवित छोड़ा गया बल्कि फारमोसा प्रदेश पर शासन करने के लिए छोड़ दिया गया था। सम्भवतः इसका श्रेय श्रीमती सन-यात-सेन को है; जिन्हें च्यांग-काई-शेक की चीन के लिए दी गयी सेवाएं याद की और उन पर दया की गयी थी।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

1 × 5 =