वाटरलू युद्ध का इतिहास | History of the Battle of Waterloo

वाटरलू युद्ध का इतिहास

वाटरलू युद्ध (Battle of Waterloo) (18 जून, 1815 ई०) 

वाटरलू युद्ध, विश्व युद्धों के इतिहास में इसलिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसने 19वीं शताब्दी के आरम्भिक चरण में फ्रांस के नेपोलियन बोनापार्ट के भाग्य का निर्णय कर दिया था। यह युद्ध वाटरलू नामक स्थान पर फ्रांस के अधिपति नेपोलियन बोनापार्ट द्वारा अंग्रेजों और उसके सहयोगी देशों के बीच लड़ा गया। इस युद्ध में फ्रांस के हताहतों की संख्या 48,000 तथा अंग्रेजों के सैनिकों की युद्ध भूमि में प्राण गंवाने वालों की संख्या 17,000 थी। 

इस युद्ध में अंग्रेजों ने यूनाइटेड किंगडम नाम से संगठन बनाकर युद्ध में उतरने की नीति बनायी। उसके साथ देश इस प्रकार थे-(1) नीदर लैण्ड, (2) हैनोव्हर, (3) नसाऊ, (4) ब्रेसविक, (5) पूसिया। 

सन् 1815 से पहले नेपोलियन खुद को विश्व विजेता के रूप में मानता हुआ देश पर देश विजय करता चला जा रहा था। एक वक्त तो ऐसा आया था जबकि लगा था नेपोलियन बोनापार्ट भारत की धरती पर घुसकर अंग्रेजों को हटायेगा और उसके उपनिवेशवाद को तोड़कर उसे इंग्लैण्ड में ही समेट कर रख देगा।

वाटरलू युद्ध युद्ध का आरम्भ और परिणाम 

वाटरलू युद्ध युद्ध का आरम्भ और परिणाम 

नेपोलियन बोनापार्ट की अजेय सेनाओं से एक के बाद एक कई स्थानों पर परास्त होने के बाद इंग्लैण्ड को लग गया था कि नेपोलियन से अकेले पार पाना अब उसके वश की बात नहीं रही है। तब उसने उपरोक्त वर्णित पांच अन्य देशों से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित कर यूनाइटेड किंगडम नाम से अपनी शक्ति बनायी। अन्य पांचों देशों की सेनाओं के साथ अंग्रेजों ने नेपोलियन की सेना को तब बेल्जियम के पास वाटरलू नामक स्थान पर चारों ओर से घेर लिया जबकि नेपोलियन वेल्जियम फतह करने के उद्देश्य से अपनी सेनाए उतार चुका था। 

वाटरलू युद्ध में फ्रांसीसी सेना के मजबूत दस्ते शामिल थे। 69,000 प्रशिया की सेना 250 बन्दूकधारियों के साथ नेपोलियन के पास अतिरिक्त सेना थी। प्रशिया सेना के अलावा 48,000 पैदल सेना, 14,000 रिसाला (घुड़सवार) और 7000 तोपखाने शामिल थे। 

ब्रिटिश सेना के पास 25,000 उसके अपने सैनिक थे। 6,000 जर्मन राजा की सेना, 17,000 डच और बेल्जियम के सैनिक 11,000 हनोवर, 6000 ब्राउनश्विक और 3000 नसाड के सैनिक थे। अनेक सफल विजय अभियानों का नायक कहे जाने वाले नेपोलियन बोनापार्ट को ब्रिटिश सेनापति नेल्सन की युद्ध प्रणाली के सामने मात खानी पड़ी। इस निर्णायक पराजय ने नेपोलियन के विराट सपने को भंग कर दिया। 

ब्रिटिश सेनापति ने अपनी कुशल युद्धनीति का उपयोग करते हुए, उस स्थान पर अपने युद्धाओं को प्रवेश कराने में सफलता पा ली थी, जहां नेपोलियन घोड़े पर बैठा खुद युद्ध कर रहा था। 

ब्रिटिश गठबन्धन सेना के अन्य दस्तों ने नेपोलियन सेना को, नेपोलियन की पहुंच से दूर कर दिया-एक बड़ा घेरा नेपोलियन के चारों ओर डालकर नेल्सन ने नेपोलियन को इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वह आत्मसमर्पण कर दें। पूरी तरह घिर जाने, अपनी सेना से अलग हो जाने वाले नेपोलियन को अच्छी तरह आभास हो गया था कि अगर वह आत्मसमर्पण नहीं करता तो निश्चित रूप से मारा जाएगा। स्थिति का जायजा लेने के बाद उसने हथियार डाल दिए। 

नेपोलियन के हथियार डालते ही फ्रांस की सेना युद्ध भूमि से भाग खड़ी 

नेपोलियन के पराजय स्वीकार करते ही उसे गिरफ्तार कर ‘सेन्ट हेलेना द्वीप’ भेज दिया गया। वह फ्रांस से निर्वासित कर दिया गया था। सेन्ट हेलेना द्वीप में नेपोलियन के निर्वासन के दिन बेहद कष्टकारी सिद्ध हुए। उसके साथ उसका डाक्टर तथा एक-दो सेवक के अलावा कोई अन्य न था। 

अपने अन्तिम समय में पेट की बीमारी से इतना ग्रस्त हो गया था कि वह उल्टियां कर रहा था। उल्टियां बन्द न होने के कारण उसकी आंतें क्षति ग्रस्त हो गयीं थीं। 6 मई, 1821 ई० को सेन्ट हेलेना द्वीप में ही नेपोलियन बोनापार्ट की मृत्यु हो गयी।

इस तरह फ्रांस का भाग्य विधाता बनने वाला, सम्पूर्ण यूरोप का एकछत्र शासक बनने की लालसा रखने वाला, ब्रिटेन की नाकेबन्दी करने की कोशिश में लगा, भारत पर अंग्रेजों के विरुद्ध अभियान चलाने वाला, मिस्र और रूस तक धावा बोलकर जीतने वाला योद्धा, एक निर्जन द्वीप में लगभग गुमनामी की मौत मरने को मजबूर कर दिया गया था।

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