बाल्कन युद्ध का इतिहास | History of the Balkan War

बाल्कन युद्ध का इतिहास

बाल्कन युद्ध का इतिहास  (Balkan War) (1912-1913) 

बाल्कन युद्ध का नाम आने पर यह प्रश्न उठता है कि बाल्कन राज्य या बाल्कन देश कौन सा था? वास्तव में बाल्कन नाम का कोई देश वजूद में था ही नहीं। 

अलबत्ता तुर्की (Turkey) सहित एक महान् साम्राज्य ओटोमन साम्राज्य में कई एक छोटे-छोटे राज्य थे। इन राज्यों की एकजुटता ही ओटोमन साम्राज्य कहलाती थी। 

इन राज्यों ने धीरे-धीरे टूटकर अलग होना आरम्भ कर दिया था। इस तरह टूटने वाले देशों की बाद केवल टर्की ही बचा था; जो ओटोमन साम्राज्य न रह गया था, परन्तु ओटोमन साम्राज्य का चिन्ह कहलाता था। 

उसी विशाल ओटोमन साम्राज्य से अलग हुए चार राज्य थे-(1) यूनान, (2) बल्गेरिया, (3) मोटीनीग्रो, (4) सर्बिया। 

इन चारों ने मिलकर खुद को बाल्कन राज्य कहलाना पसन्द किया। 

सन् 1912 में रूस और फ्रांस में यह समझौता हुआ कि यदि बाल्कन राज्यों पर कब्जा करने के उद्देश्य से जर्मनी अथवा आस्ट्रिया रूस से युद्ध करेगा तो फ्रांस रूस का साथ देगा। 

बाल्कन युद्ध का इतिहास

रूस और फ्रांस की शक्ति अपने पक्ष में पाकर चारों बाल्कन राज्यों ने आपस में तय किया कि टर्की से युद्ध करके न केवल ओटोमन साम्राज्य के बचे हुए अस्तित्व को ही बल्कि यूरोप से ही उसका वजूद खत्म कर दिया जाए।

बाल्कन राज्यों ने यह बात ऐसे समय में तय पायी जबकि टर्की में अशान्ति फैली हुई थी। वह काफी कमजोर था और उसे जीतना आसान था। 

बाल्कन राज्यों ने यह भी तय किया कि टर्की के पतन के बाद उसके मैसीडोनिया प्रदेशों का किस प्रकार बंटवारा किया जाएगा। तय पाया गया कि मैसीडोनिया का प्रमुख भाग बल्गेरिया को दिया जाएगा। तथा उसका एक अन्य भाग अल्मानिया, सर्विया को दिया जाएगा। 

अब इन चारों राज्यों ने टर्की से युद्ध का बहाना तैयार किया। उन्होंने बहाना निकाला कि मैसीडोनिया जो ईसाई बाहुल्य राज्य टर्की के अधीन था, वहां ईसाइयों पर क्रूर अत्याचार मुस्लिम टर्की शासक द्वारा किया जा रहा था। 

ईसाइयों पर टर्की द्वारा अत्याचार का बहाना लेकर 17 अक्टूबर, 1912 को चारों राज्यों ने टर्की से मैसीडोनिया में सुधार करने को कहा। टर्की द्वारा यह कहने पर कि उनके राज्य की अन्दरूनी मामलों में किसी अन्य को दखल देने की आवश्यकता नहीं चारों राज्यों ने मिलकर टर्की पर आक्रमण कर दिया। 

उस समय टर्की इतने कमजोर हालत में था कि युद्ध आरम्भ होते ही टर्की सेना बुरी तरह हार गई और बाल्कन राज्यों को आशातीत सफलता मिली। मॉटीनीग्रो तथा सर्बिया की सेनाओं ने अल्बानिया पर अपना अधिकार कर लिया। यूनानी सेनाओं ने एड्रियानोपुल के प्रसिद्ध दुर्ग को तुर्कों से छीन लिया। बल्गेरियन सेना श्रेस पर आक्रमण करके प्रमुख तुर्क सेना पर विजय प्राप्त करती हुई कास्टैटिनोपल के बहुत निकट पहुंच गई। 

इस समय टर्की के सामने कोई रास्ता न था। उधर यूरोप के अन्य राज्य टर्की की दशा पर चिंतित हो रहे थे। उन्होंने हस्तक्षेप करके टर्की तथा बाल्कन राज्यों में एक अस्थायी संधि करवा दी। 

तत्पश्चात् दोनों पक्षों के प्रतिनिधि स्थायी संधि करने के लिए लंदन में एकत्रित हुए। बाल्कन राज्यों की संधि की शर्ते टर्की के लिए बड़ी मंहगी थीं। उनको स्वीकार करने पर टर्की का यूरोप से अस्तित्व ही मिट जाता। इस पर युवा तुर्क दल के नेतृत्व में तुर्कों ने पुनः युद्ध छेड़ दिया। इस बार तुर्कों की और बुरी तरह हार हुई और वे अपने तीन और बड़े दुर्गों से हाथ धो बैठे। हताश होकर टर्की के सुल्तान ने संधि का प्रस्ताव किया। 

एक बार पुनः दोनों पक्षों के प्रतिनिधि 1913 में संधि करने के लिए लंदन में एकत्रित हुए। 30 मई, सन् 1913 ई० को लंदन की संधि हो गई जिसके द्वारा प्रथम बाल्कन युद्ध समाप्त हो गया। 

र्कीकोक्रीट तथा अन्य यूरोपीय क्षेत्रों से वचित कर दिया गया और ओटोमन साम्राज्य केवजल कांस्टैटिनोपल तथा उसके आसपास के कुछ भाग तक ही सीमित रह गया। पर छीने गए प्रदेशों का आपस में बंटवारा करने के सम्बन्ध में बाल्कन राज्यों में परस्पर मतभेद हो गया।

द्वितीय बाल्कन युद्ध 

बाल्कन युद्ध से पूर्व चारों राज्यों में जो समझौता हुआ था उसके अनुसार सर्बिया को अल्बानिया मिल जाना चाहिए था पर ऑस्ट्रिया किसी मूल्य पर भी सर्बिया के अधीन अल्बानिया होने नहीं देना चाहता था। 

इसका कारण यह था कि बोस्निया तथा हर्जेगोविना की आबादी मुख्य यूगोस्लाव तथा सर्बो की थी। सर्बिया के साथ मिलकर ये प्रदेश एक शक्तिशाली यूगोस्लाव राज्य का निर्माण करना चाह रहे थे। यदि ऐसा हो जाता तो सर्बिया की शक्ति बढ़ जाती जो ऑस्ट्रिया के लिए अहितकर थी। फिर, अल्बानिया पर अधिकार प्राप्त करने से सर्बिया की पहुंच एड्रियाटिक तक हो जाती। वास्तव में ऑस्ट्रिया की दृष्टि स्वयं अल्बानिया पर लगी हुई थी। अतः उसे एक पृथक राज्य घोषित करवा दिया। 

अल्बानिया के पृथक् अस्तित्व के फलस्वरूप मैसीडोनिया का विभाजन और भी दुष्कर प्रतीत होने लगा। सर्बिया ने यह इच्छा प्रकट की कि अल्बानिया न मिलने पर उसे मैसीडोनिया में अधिक भाग मिलना चाहिए। 

पर इस सम्बन्ध में सर्बिया तथा बल्गेरिया परस्पर सहमत न हो सके। जब यह मामला शान्तिपूर्वक न सुलझ सका तब दोनों शक्तियों ने बल प्रयोग करने का निश्चय किया।

29 जून, 1913 के बलगेरिया ने सर्बिया के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। इस युद्ध को द्वितीय बाल्कन युद्ध की संज्ञा दी जाती है। इस युद्ध में यूनान, रूमानिया तथा मांटीनीग्रो ने बलगेरिया के विरुद्ध सर्बिया का साथ दिया। अपने खोए हुए प्रदेशों का कुछ भाग मिल जाने की आशा में टर्की ने भी बल्गेरिया के विरुद्ध बाल्कन राज्यों की सहायता की। विवश होकर बल्गेरिया ने संधि का प्रस्ताव रखा। ____ दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों ने रूमानिया की राजधानी बुखारेस्ट में 10 अगस्त, 1913 को एक संधि की। इस संधि के कारण बल्गेरिया की मानहानि हुई। संधि के द्वारा सार्बिया तथा मांटीनीग्रो ने बहुत से प्रदेश प्राप्त किए। यूनान ने भी सैलोनिका प्रदेश पर अधिकार प्राप्त कर लिया। इस विभाजन के बाद मैसीडोनिया का बचा हुआ भाग ही बल्गेरिया को मिल गया। इस प्रकार द्वितीय बाल्कन युद्ध समाप्त हुआ। 

बुखारेस्ट की संधि द्वारा बाल्कन राज्यों में कुछ समय के लिए शान्ति स्थापित हो गई। बाल्कन युद्धों के फलस्वरूप सर्बिया तथा यूनान सर्वाधिक लाभान्वित हुए। इन युद्धों का एक बड़ा परिणाम यह हुआ कि यूरोप में तुर्की साम्राज्य लगभग समाप्त हो गया, और बाल्कन प्रायद्वीप में ईसाई राज्यों का परिवर्धन प्रारम्भ हो गया। 

यह कहना अनुचित होगा कि उपर्युक्त युद्धों से बाल्कन समस्या शान्त हो गई। द्वितीय बाल्कन युद्ध के द्वारा बाल्कन राज्यों में प्रतिस्पर्द उत्पन्न हो गई जिसका विस्फोटक परिणाम प्रथम विश्व युद्ध के रूप में दुनिया के सामने आया।

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