आंग्ल-अफगान युद्ध का इतिहास | History of the Anglo-Afghan War

आंग्ल-अफगान युद्ध का इतिहास

आंग्ल-अफगान युद्ध (Battle of Anglo-Afghan) (1838-1842 ई०) 

आंग्ल अफगान युद्ध, अंग्रेजों और अफगानों के बीच हुआ, जिसमें अंग्रेजी सेना का भीषण संहार हुआ। 

इस युद्ध के आरम्भ होने से पहले कई उतार-चढ़ाव आए। ये उतार-चढ़ाव उस समय के विश्व के बदलते राजनैतिक परिप्रेक्ष्य के कारण आए। ब्रिटिश कम्पनी ने भारत में अपने साम्राज्य के विस्तार का कार्य पूर्व तथा दक्षिण से किया था, धीरे-धीरे वह पूर्व से पश्चिम और दक्षिण तक पहुंच गया। 

विश्व के राजनैतिक उथल-पुथल के उस दौर में नेपोलियन बोनापार्ट ने भारत पर आक्रमण करने की योजना बनायी थी, परन्तु यूरोप के युद्धों में परास्त हो जाने के कारण स्थल मार्ग से भारत पर आक्रमण की उसकी योजना धूल-धूसरित हो गयी। यदि नेपोलियन को भारत पर आक्रमण करने का अवसर मिल जाता तो स्पष्ट था कि वह अफगानिस्तान की ओर से होकर ही आता। इसी मार्ग को सिकन्दर से लेकर मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गजनबी, मुहम्मद गौरी और बाबर ने अपनया था। यूरोपीय व्यापारी बनकर भारत में आने वाले पुर्तगाली, फ्रांसीसी, डच और अंग्रेज जलमार्ग से आये थे। जलमार्ग अंग्रेजों के लिए पूरी तरह सुरक्षित था। भारत की हर समुन्द्री सीमा पर अंग्रेजों ने अपनी प्रबल मजबूती कर रखी थी, अलबत्ता अभी उनके लिए स्थल मार्ग पूरी तरह किलेबन्द न था। नेपोलियन के हमले की बात सुनकर अंग्रेज चिन्तित हो गए कि इस स्थलीय मार्ग को भी अपने प्रभुत्व में लें। 

उसी दौर में एक और खतरा दरवाजा खटखटाने लगा। यह खतरा रूस की ओर से था। रूस एशिया में अपने साम्राज्य विस्तार में लग गया था। सन् 1836 ई० में रूस और फारस में युद्ध आरम्भ हो गया। इस युद्ध में फारस की पराजय हुई। उसे रूस के साथ संधि करनी पड़ी। फलस्वरूप तेहरान में रूसियों का प्रभाव बढ़ने लगा। वे फारस को अफगानिस्तान की ओर बढ़ने को प्रोत्साहित करने लगे। 1837 ई० में फारस ने हिरात पर अपना घेरा डाल दिया। अफगानिस्तान पर रूस और फारस, गठबन्धन बनाने की योजना बनाने लगे। अगर वे अफगानिस्तान तक बढ़ आते तो हिन्दुस्तान में घुसना उनका स्वाभाविक और उनसे युद्ध होना लाजिमी हो जाता-ऐसा विचार कर अंग्रेजों ने सोचा कि 

क्यों न अफगानिस्तान तक कब्जा करके वहीं रूस और फारस की नाकेबन्दी की जाए। 

उस समय अफगानिस्तान में सत्ता की काफी उथल-पुथल मची हुई थी। इस उथल-पुथल में कोई भी सहजता से अफगानिस्तान को कब्जे में ले सकता था। 

इस समय अफगानिस्तान का शासक शाहशुजा था। शाहशुजा को एक अन्य अफगानी सरदार दोस्त मुहम्मद ने अफगानिस्तान से मार भगाया था और खुद काबुल की गद्दी पर बैठ गया था। 

शाहशुजा भागकर भारत आया। उसने महाराजा रंजीत सिंह तथा अंग्रेजों से सहायता की याचना की। 

अंग्रेज तो इसकी प्रतीक्षा में ही थे कि अफगानिस्तान में कोई उथल-पुथल हो और वे उसका लाभ उठाएं। उन्होंने युक्ति लगाकर शाहशुजा को महाराजा रंजीत सिंह की भी सहायता दिलवा दी। 

सन् 1834 ई० में शाहशुजा ने अंग्रेजों और रणजीत सिंह की ओर से सहायता प्राप्त करके काबुल का सिंहासन प्राप्त करना चाहा-पर ‘जंग हथियारों के बल पर नहीं हौसले के बल पर जीती जाती है।’ यह कहावत उस पर चरितार्थ हुई। उसे सैनिक और अस्त्र-शस्त्रों की सहातया मिली थी, शेष सहायता उसे खुद अपनी ओर से करनी थी; जिसमें वह असफल रहा। उसे उल्टे पैरों वापस लौटना पड़ा। वह लुधियाना में रणजीति सिंह के संरक्षण में आया। 

रणजीत सिंह ने सेना भेजकर अफगान फौजों से युद्धकर पेशावर पर अधिकार कर लिया था, जिसे दोस्त मुहम्मद पुना अपने अधिकार में करना चाहता था। 

सन् 1837 ई० में आकलैण्ड ने अलेक्जेण्डर बर्स नामक एक कुशल कूटनीतिज्ञ को दोस्त मुहम्मद से बातचीत करने के लिए काबुल भेजा। इस उस रूस और फारस के संयुक्त हमले की तैयारी थी, हार की सम्भावना देख दोस्त मुहम्मद अंग्रेजों से दोस्ती के लिए आतुर था-उसने प्रस्ताव रखा कि यदि वह रणजीत सिंह से पेशावर वापस दिलवा दें तो वह अंग्रेजों से उनकी शर्त के अनुसार मैत्री सम्बन्ध बना सकता है। 

भारत में अंग्रेज अधिकारी इस बात को जानते थे कि रणजीत सिंह से पेशावर के अधिकार को दोस्त मुहम्मद को दिलाना लोहे के चने चबाना जैसी बात होगी। 

उन्होंने दोस्त मुहम्मद की दोस्ती को रणजीत सिंह से पूर्व से बनी आ रही मैत्री के मुकाबले पूरी तरह कमजोर माना। 

उन्होंने दोस्त मुहम्मद को साफ मना कर दिया कि उसकी संधि वार्ता आगे नहीं बढ़ सकती। टका सा जवाब मिलने के बाद दोस्त मुहम्मद ने रूसियों का दामन थामा। वह इस बात को जानता था कि अंग्रेज और रणजीत सिंह की शरण में शाहशुजा पड़ा हुआ है-अंग्रेज और रणजीत सिंह उसकी मदद करने बढ़ते हैं तो उस सूरत में तीनों का स्वार्थ जुड़ा हुआ होगा-तब तीन छोटे-दुश्मनों के मुकाबले में एक अधिक ताकतवर दुश्मन से संधि कर लेना कहीं ज्यादह लाभप्रद होगा। रूसियों ने उसकी दोस्ती प्रस्ताव को तुरन्त स्वीकार कर लिया। सन् 1837 ई० में दोस्त मुहम्मद ने रूसी दूत का काबुल में पूरी गर्म जोशी से स्वागत किया। 

अंग्रेजों को जब यह बात पता लगी तो उन्होंने शाहशुजा, रणजीत सिंह से गहरी दोस्ती की-त्रिकोणीय संधि में शाहशुजा को काबुल के सिंहासन पर बैठाने की योजना तय पायी गयी। 

शाहशुजा ने दोनों को वचन दिया कि वह काबुल का सिंहासन पुनः पाने के बाद उन दोनों की मर्जी के बगैर किसी अन्य तृतीय पक्ष की ओर दोस्ती का हाथ न बढ़ायेगा। 

अंग्रेज यही चाहते थे कि रूसियों का प्रवेश काबुल में न होने पाये। उन्होंने सारी स्थितियां को जानकर, पूरी तैयारी और जोश के साथ अफगानों पर आक्रमण की घोषणा कर दी। इस आक्रमण के लिए बहाना बनाया कि अफगानिस्तान रूस से दोस्ती करके रूसी सेना की काबुल मार्ग से भारत में प्रवेश के मार्ग प्रशस्त कर रहा है। 

आक्रमण की योजना 

आंग्ल-अफगान युद्ध

लार्ड ऑफ आकलैण्ड ने दोस्त मुहम्मद की ओर से संधि करने की शर्त को अपना व्यक्तिगत अपमान समझा था और दोस्त मुहम्मद को सबक सिखाने पर कमर कस ली। उसने पूरी ब्रिटिश सेना की कमान अपने हाथ में ली-रणजीत सिंह से दोस्ती और गहरी करके उन्हें पंजाब मार्ग से अपनी सेना भेजने का परामर्श देकर ब्रिटिश सेना को सिन्ध मार्ग से भेजने की योजना दी। 

फलतः मार्च, 1839 को अंग्रेजी सेना ने सिंध के मार्ग से अफगानिस्तान के लिए प्रस्थान किया। बिना किसी विरोध के अंग्रेजी सेना ने कंधार पर अपना अधिकार कर शाहशुजा को अफगानिस्तान का अमीर घोषित कर दिया। 

परन्तु, यहीं पर लार्ड ऑफ आकलैण्ड से भूल हो गयी-उसने कंधार फतह को ही इस बात की उपलब्धि मान ली थी कि अफगानिस्तान फतह हो गया है। उसने रणजीत सिंह की सिक्ख सेना का भी अफगानिस्तान की सीमा में प्रवेश करने की प्रतीक्षा न की थी। तब जबकि सिक्ख सेना खैबर दर्रे के मार्ग से आगे बढ़ रही थी, आकलैण्ड उसके आ मिलने की प्रतीक्षा किए बगैर बढ़कर गजनी पर अधिकार कर काबुल की ओर बढ़ने लगा। 

उधर, अंग्रेजों के द्वारा शाहशुजा को अफगानिस्तान का अमीर घोषित किया जाना, अफगानिस्तान के अमीरों (सरदार योद्धाओं) को न सिर्फ बुरा लगा बल्कि इस बात के लिए आत्मसम्मान और अफगानिस्तान की अस्थिता के लिए अपमानजनक माना। इस समय तक शाहशुजा और दोस्त मुहम्मद के मामले को उन्होंने दोनों के बीच सत्ता का निजी मामला मानते हुए हस्तक्षेप की आवश्यकता न समझी थी, पर अब यह मामला विदेशियों का मामला था। उन्हें अंग्रेजों की कूटनीति मालूम थी-इस बात को वे जानते थे कि भारत में उन्होंने क्या किया। ‘दो बन्दरों के बीच रोटी का टुकड़ा डालकर, बिल्ली को पंच बनाने’ की कहावत चरितार्थ करते हुए उन्होंने राज्य खुद हड़प लिया था। 

अफगान के अमीर और योद्धा अपने देश पर किसी विदेशी की हुकूमत बरदाश्त नहीं कर सकते थे। वे अपना आपसी वैमनस्य भुलाकर, तेजी से एक हो गए। 

अफगान योद्धा खुलकर सामने आए-पर उस समय तक काफी देर हो चुकी थी। अंग्रेज सेना ने गजनी की ओर से और सिक्ख सेना ने खैबर की ओर से घेरा डाला तो युद्ध के लिए बढ़कर आए दोस्त मुहम्मद को तोपों और गोलियों के साथ सिक्खों की तलवारों का भी सामना करना पड़ा। सैनिकों को युद्ध भूमि में एक के बाद एक गिरते देखकर दोस्त मुहम्मद का आत्म विश्वास लड़खड़ा गया। वह मैदान से भागा। उसे मैदान से भागते देखकर स्वतन्त्रता प्रेमी और स्वाभिमानी अफगानों को बड़ी ठेस लगी। फिर भी वे प्राण-प्रण से युद्ध करते रहे। 

पर नेतृत्वविहीन अफगान कब तक लड़ते, अन्ततः अंग्रेज सेना काबुल में घुसने में कामयाब हो गयी, शाहशुजा को गद्दी पर बैठा दिया। 

इस बात को साबित करने के लिए वे वहां राज्य करने नहीं आए हैं, अंग्रेज सेना में शाहशुजा की सुरक्षा में सेना का एक अंग वहीं छोड़ा, शेष सेना भारत लौटने के लिए मुड़ी। अंग्रेज कमाण्डरों ने सैनिक टुकड़ी को काबुल, कन्धार, जलालाबाद के रास्ते से वापस जाने के लिए बांट दिया। 

कुछ समय बाद ही काबुल में अफगानों में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। विद्रोहियों ने शाहशुजा की रक्षा के लिए छोड़ी गई सेना के कमाण्डर अलेक्जेण्डर बर्स की हत्या कर दी। दोस्त मुहम्मद के पुत्र अकबर खां को अपना नेतृत्वकर्ता घोषित किया। चूकि दोस्त मुहम्मद भगोड़ा साबित हुआ था अतः उस पर विश्वास न करके उसके पुत्र अकबर खां को अपना नेता माना। 

6 जनवरी, 1842 को जब अंग्रेज सेना काबुल दर्रे के पास एकत्र हुई थी तब अफगानों ने छापामार युद्ध अपनाकर, दर्रे में पहुंची पूरी सेना को चारों ओर से घेर कर उस पर गोली बारी करनी आरम्भ कर दी। 

कुछ ही घण्टों में पूरी ब्रिटिश सेना का सफाया हो गया था। दसियों हजार अंग्रेज सैनिक असहाय अवस्था में मौत के घाट उतार दिए गए थे। 

इतिहासकारों ने लिखा है कि इस दुःखद घटना का समाचार सुनाने के लिए 13 जनवरी को एकमात्र डॉ० ब्राइडन जलालाबाद पहुंच पाया था। 

कम्पनी को उस समय से पूर्व किसी भी युद्ध में ऐसी भीषण क्षति नहीं उठानी पड़ी थी। इस क्षति से लार्ड ऑफ आकलैण्ड भी बेहद बदनामी हुई। उसे इंग्लैण्ड वापस बुला लिया गया। उसके स्थान पर लार्ड एडेनबरा, भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया। 

लार्ड एडेनबरा को ब्रिटिश सरकार ने भारी सैनिक सहायता देकर भेजा था। उसने कुछ दिन में रणनीति तय करने में लगाया। फिर उसने जनरल पोलक की अध्यक्षता में एक सेना खैबर दर्रे से तथा दूसरी सेना जनरल नाट की अध्यक्षता में खोजक दर्रे से भेजी। एडेनबरा में योजना दी थी कि खोजक दर्रे से बढ़ती सेना खैबर दर्रे के सैनिकों को कबर करके रखेगी, तथा अफगानों की ओर से प्रतिरोध होता है तो दोनों सेनाएं संयुक्त होकर भीषण युद्ध कर नरसंहार करेगी। दोनों ही सेनाओं का लक्ष्य काबुल पहुंचना था। 

अपनी इस बढ़त में अंग्रेज सेना प्रतिशोध की भावना से बुरी तरह ओत-प्रोत थी। उसे एक-एक अंग्रेज सैनिक की मौत का बदला चुकाना था। अत्याधिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस बढ़ती हुई अंग्रेजों की सेना ने काबुल की ओर बढ़ते हुए अमानुषिक हत्या और बर्बरता का व्यवहार किया। उन्होंने उसी प्रकार का अफगानों के साथ बर्ताव किया जैसे अफगानों ने उनके साथ किया था। 

जब जनरल नाट की सेना गजनी पहुंची तो उसने उस नगर को जलाकर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। वहां से वह काबुल पहुंचा, जहां पोलक की सेना उससे आ मिली। दोनों सेनाओं के मिलते ही काबुल का बाजार जला दिया गया। काबुल विजय का कार्य पूरा करते हुए दोस्त मुहम्मद को काबुल की गद्दी पर बैठाया गया, क्योंकि उसे लेकर अफगान अमीरों में विरोध कम था। 

पर यह तो अंग्रेजों का आंकलन था-हकीकत यह थी कि अफगानों में यह धारणा बैठ गयी थी कि सारे विनाश की जड़ दोस्त मुहम्मद ही है। अमीरों ने उसका विरोध करना आरम्भ कर दिया। अमीरों के विरोध से यह बात तय हो गयी कि वह स्थायी सत्ता नहीं कायम कर पाएगा। जब दोस्त मुहम्मद की सत्ता स्थायी न रहने वाली थी, तब उसे गद्दी पर बैठाना तथा उससे मैत्री संधि बनाना भी व्यर्थ हो गया था। 

इस तरह इतिहास ने माना कि अफगान युद्ध में असंख्य इन्सानों के प्राण गए थे। अंग्रेजों को कुछ हासिल भी न हुआ था। उनकी कूटनीति को गहरा धक्का लगा।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

six − two =