अमेरिकी क्रांति का इतिहास | History of the American Revolution

अमेरिकी क्रांति का इतिहास

अमेरिकी क्रांति का इतिहास | History of the American Revolution

आज यह विश्वास करना कठिन होगा कि महाशक्ति अमेरिका, जो आज विश्व की राजनीति में सिरमौर और आर्थिक व्यवस्था की धुरी है, कभी गुलामी और शोषण के बहुत लंबे दौर से पीड़ित रहा है। आज अमेरिका विश्व के किसी भी देश की राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। यह कभी ऐसे उपनिवेशों में कैद था, जिसमें स्पेन, हॉलैंड, फ्रांस और इंग्लैंड का शासन था। उस समय प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर यह उत्तरी अमेरिकी महाद्वीप कितना पिछड़ा देश था, इसकी बस कल्पना ही की जा सकती है। इस देश में विभिन्न देशों का पृथक्-पृथक् भागों में शासन था। घोर अज्ञानता और अशिक्षा सहित इस देश ने गुलामी की पीड़ा तीन शताब्दियों तक सही। 300 वर्षों की यह अवधि किसी भी समाज को गुलामी का अभ्यस्त बना देने के लिए पर्याप्त है, लेकिन अमेरिका की जनता ने अपने उत्साह, पुरुषार्थ और देशप्रेम से न केवल दासता की बेड़ियाँ काटीं, बल्कि अगले दो दशकों में अमेरिका को विश्व की महाशक्ति बना दिया। 

सन् 1492 तक अमेरिका संसार के लिए अज्ञात देश था। इसकी खोज एक ऐसी आकस्मिक घटना रही, जिसने विश्व को कर्मठ, जिज्ञासु और प्रगति-पथ पर बढनेवाली सभ्यता से परिचित कराया। इसी ने भविष्य में अमेरिका को विश्व के मानचित्र पर किसी भी अविकसित देश के लिए प्रेरणा का स्रोत बना दिया। 

स्पेन का खोजी यात्री क्रिस्टोफर कोलंबस एशिया का जलमार्ग खोजने के लिए जलयात्रा पर निकला तो संयोग से वह अमेरिका के बहामा द्वीप समूह पर जा पहुंचा और एक नए देश को देखकर खुशी से उछल पड़ा। उसने एक नए देश की खोज कर ली थी। फिर उसके 9 वर्ष बाद इटैलियन समुद्री यात्री अमेरिगो वेस्पुची 1501 में अमेरिका में ब्राजील तक यात्रा पर गया और इस नए देश का यात्रा-विवरण प्रस्तुत किया, तभी उसके नाम पर इस नए द्वीप का नाम अमेरिका पड़ गया। 

चूँकि स्पेन के जलयात्री ने इसकी खोज पहले की थी तो स्पेन ने ही इस देश पर अपना राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास सबसे पहले किया। अमेरिका में मुख्यत: दो सभ्य जातियाँ थीं, एजटिक और इंका। एजटिक लोग मैक्सिको में और इंका लोग पीरू में रहते थे। स्पेन ने 1521 में मैक्सिको और 1533 में पीरू में अपना शासन स्थापित कर लिया। 

स्पेन के इस कदम ने इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल और हॉलैंड जैसे देशों को भी इस नए देश में अपना शासन स्थापित करने के लिए प्रेरित किया। इंग्लैंड ने अपने एक खोजी यात्री जॉन कैवट को उत्तरी अमेरिका की ओर परिस्थितियों का आकलन करने भेजा। जॉन कैवट ने लेब्राडोर और न्यू फाउडलैंड की खोज करके इंग्लैंड को वहाँ शासन स्थापित करने का आधार दे दिया। 

इधर फ्रांसीसी भी अमेरिका में उत्तरी तट कैरोलाइना मांद्रियली तक के रास्ते पर जा पहुँचे थे। अमेरिका में स्पेन का वर्चस्व बढ़ता गया और स्पेन की आर्थिक दशा सुदृढ़ होती चली गई। स्पेन की बढ़ती आर्थिक स्थिति ने इंग्लैंड को चिंतित कर दिया, जो सदैव से ही साम्राज्यवादी नीति का समर्थक था। 

 इंग्लैंड की तत्कालीन महारानी एलिजाबेथ ने स्पेन के जहाजों को लूटने के लिए अंग्रेज समुद्री डाकुओं को समर्थन दे दिया और इसका परिणाम दोनों देशों के बीच भयंकर जलयुद्ध के रूप में सामने आया। इंग्लैंड की जलसेना बहुत सुदृढ़ और शक्तिशाली थी, इसलिए विजय भी उसे ही मिली। इस विजय के बाद इंग्लैंड ने अमेरिका में अपने पैर पसार दिए और अगले डेढ़ सौ वर्षों में वहाँ अपने तेरह उपनिवेश स्थापित कर दिए। 

अंग्रेजों की बस्तियाँ बस गईं और यहीं से अमेरिका के शोषण का अध्याय शुरू हो गया। अधिक-से-अधिक आर्थिक लाभ कमाने के लिए अंग्रेजों ने अपने कानून थोपे और अपनी शक्ति का अवैध प्रदर्शन करते हुए अन्य यूरोपीय देशों को सशर्त अमेरिका में व्यापार की अनुमति दे दी। आयात और निर्यात अंग्रेजों के अधीन था और सभी औद्योगिक नियम भी उन्हीं के हित में थे। धीरे-धीरे दासता की बेड़ियों में खिसकती अमेरिकी जनता में असंतोष की भावना जन्म लेने लगी थी। बस, एक बुलबुला उठने की देर थी। जनक्रांति का सहसा विस्फोट होने के पर्याप्त कारण बन गए थे। 

विरल आबादी वाला देश अमेरिका अव्यवस्थित ढंग से निवास करता था और यही कारण था कि यहाँ क्षेत्रों के अनुसार भाषा व संस्कृति का विकास हुआ था। कई धर्म यहाँ व्याप्त थे, जिनमें परस्पर मतभेद होते रहते थे। कबीलाई पद्धति से जीवन जीनेवाले इन लोगों का अधिकांश समय परस्पर युद्धों में व्यतीत होता था। यह स्थिति साम्राज्यवादी शक्तियों के लिए अनुकूल थी। इससे विद्रोह की संभावनाएँ नगण्य हो जाती थीं, लेकिन कालचक्र किसी को भी इतना अज्ञानी नहीं रहने देता कि वह दासता को अपनी नियति मान बैठे। 

कुछ पीढ़ियाँ ऐसी होती हैं, जो स्वतंत्रता का अर्थ और जीवन-मूल्यों की समझ अपने शोषकों से ही सीख जाती हैं। संगत का प्रभाव भी होकर रहता है। ऊपर से असंतोष के कारण पर्याप्त थे। अब केवल इस असंतोष को नाद में बदलने के लिए नेतृत्व की आवश्यकता थी, जो अमेरिकी लोगों को जॉर्ज वाशिंगटन से मिला। जिन कारणों से अमेरिका में असंतोष उपजा और क्रांति का सूत्रपात हुआ, वे निम्नलिखित रहे –

दोषपूर्ण शासन प्रणाली 

इंग्लैंड एक साम्राज्यवादी देश तो था ही, साथ ही वह अपने उपनिवेशों को अधिक-से-अधिक लाभ कमाने का माध्यम समझता था। शोषण और जनहित की उपेक्षा से इंग्लैंड अपने उपनिवेशों से जहाज भर-भरकर धन अपने देश में पहुँचाता था, जिससे इंग्लैंड की भव्य विलासिता और भी बढ़ती जाती थी।

अमेरिकी क्रांति का इतिहास

अमेरिका में भी इंग्लैंड ने ऐसी ही शासन-व्यवस्था की, जो तीन भागों में थी। पहला गवर्नर, दूसरी उसकी कार्यकारिणी समिति और तीसरा उसका विधायक सदन। विधायक सदन जनप्रतिनिधियों द्वारा निर्वाचित होता था, जबकि गवर्नर और उसकी समिति ब्रिटिश सरकार के हित में थी। इससे संघर्ष की स्थिति बनी रहती थी। विधायक सदन की शक्ति के अधिकारी थे, लेकिन उन्हें जनहित में कार्य करने की अनुमति नहीं थी। इससे दोषपूर्ण शासन में जनता के हितों की उपेक्षा होती जा रही थी। 

आर्थिक शोषण-नीति 

इंग्लैंड को अपने हित सर्वोपरि दिखाई देते थे और उनके लिए वह किसी भी हद तक जा सकता था। अपने उपनिवेश के नागरिकों की इंग्लैंड को जरा भी चिंता नहीं थी। इंग्लैंड ने जितने भी व्यापारिक नियम और कानून लागू कर रखे थे, सभी उसके अपने हितों की पूर्ति करते थे। उसके उपनिवेशों में मुख्य उत्पादन कपास, तंबाकू और चीनी का निर्यात केवल इंग्लैंड को ही किया जाता था। गवर्नरों ने उपनिवेशों में मूल आवश्यकताओं की वस्तुओं के उत्पादन पर प्रतिबंध लगा दिया था और उनका आयात केवल इंग्लैंड से ही होता था। 

स्टांप एक्ट लगाना 

इंग्लैंड ने अपने उपनिवेश में व्यापारिक सौदों में भारी कर लगा रखे थे, जो वहाँ के मूल व्यापारियों को प्रभावित करते थे। सरकार अपने उपनिवेशों में निष्कंटक अपना शासन चलाने के लिए अपनी स्थायी सेना रखती थी, जिसका सारा खर्च उपनिवेश के आय-स्रोतों से ही चलाया जाता था। इसके लिए सरकार ने सन् 1765 में स्टांप एक्ट पारित कर दिया और उपनिवेशों पर अतिरिक्त कर थोप दिए, जिससे जनता कराह उठी। 

बोस्टन टी पार्टी 

सन् 1770 में बोस्टन नगर में अमेरिकी नागरिकों और अंग्रेजी सेना के मध्य संघर्ष हो गया, जिसमें अंग्रेज सैनिकों ने निर्ममता से बंदूकें चलाईं और सैकड़ों अमेरिकी नागरिक मारे गए। इससे अमेरिकी लोगों में असंतोष और बढ़ गया। 

सन् 1773 में जब अंग्रेजी जहाज चाय लादकर बोस्टन बंदरगाह पर पहुंचा तो अमेरिकी लोगों ने इसे वहाँ उतारने का विरोध कर दिया। तब गवर्नर ने कुछ रेड इंडियन मजदूरों की व्यवस्था करके जहाज को खाली करना चाहा। अमेरिकी लोग भी उसी वेशभूषा में मजदूरों में सम्मिलित हो गए और जहाज में चढ़कर चाय की सारी पेटियाँ समुद्र में फेंक दी। यह घटना बोस्टन टी पार्टी के नाम से प्रसिद्ध हुई और समूचे अमेरिका में क्रांति की ज्वाला भड़काने में सफल रही। 

धार्मिक मतभेद

यह मुद्दा अमेरिका में बसे उन अंग्रेजों और अंग्रेज सरकार के बीच भड़का, जो प्रोटेस्टेंट धर्म के अनुयायी थे। उन दिनों इंग्लैंड में कैथोलिक धर्म का वर्चस्व था। प्रोटस्टेंट अपने धर्म की रक्षा करने और सरकार से कोई आशा न रहने के कारण अमेरिका में आ बसे थे और धीरे-धीरे यहाँ के मूल निवासियों से घुल-मिल गए थे। 

जब इंग्लैंड ने अपने उपनिवेशों में कैथोलिक मान्यताओं का प्रचार किया तो इन प्रवासी अंग्रेजों ने मूल अमेरिकी लोगों के साथ मिलकर इसका विरोध किया। यह धार्मिक मतभेद भी क्रांति का कारण बन गया। 

स्वातंत्र्य भावना का प्रचार 

सदैव से ही मानव जगत् पर दार्शनिकों और चिंतकों का प्रभाव रहा है। इन्होंने दासता के समय जनता को अपने विचारों से जाग्रत् करने का महत्त्वपर्ण कार्य किया। अमेरिका में भी राजनीतिक चेतना और स्वातंत्र्य भावना का जागरण लॉक, टॉमस पेन, मिल्टन और जेफरसन जैसे महान् दार्शनिकों ने किया। इनके विचारों व लेखों से दासता के बंधन कसमसा उठे थे, जो आगे चलकर क्रांति का माध्यम बने यानी क्रांति का विकास हुआ। 

सप्तवर्षीय युद्ध से उपजी हताशा 

यह अमेरिका में अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए इंग्लैंड और फ्रांस के बीच चला युद्ध था, जो 7 वर्ष तक चला। इंग्लैंड की जीत हुई, लेकिन इसने जो जन-धन की हानि की, वह अमेरिका की हुई। इंग्लैंड ने सारे अमेरिका पर अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। 

उत्तरी अमेरिका के विजित क्षेत्र में फ्रांसीसी बस्तियाँ और रेड इंडियनों की भरमार थी, जो इंग्लैंड से घृणा की हद तक चिढ़े हुए थे। इससे अंग्रेजों को इस क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। सरकार को 7 वर्ष तक भयानक युद्ध करने के बाद भी विजित क्षेत्र से इच्छित लाभ न मिल पाना उसकी हताशा का कारण बन रहा था। तब दमनचक्र चलाया गया और इसने जनाक्रोश को और भी भड़का दिया। 

अन्य देशों की नाराजगी 

सर्वप्रथम स्पेन ने अमेरिका में अपना वर्चस्व स्थापित किया था। उसके बाद फ्रांस तथा हॉलैंड ने भी वहाँ आर्थिक लाभ के लिए अपने उपनिवेश बसाए, लेकिन इंग्लैंड ने अपनी अकूत शक्ति से इन देशों को अमेरिका से भगा दिया या सशर्त व्यापार की अनुमति दी। इससे इन सभी देशों ने जब अमेरिकी जनता को क्रांति के लिए करवट बदलते देखा तो उसे सरकार के विरुद्ध लड़ने में हर प्रकार की सहायता करने का वचन दिया। 

मेसाचुसेट्स और फिलाडेल्फिया सम्मेलन 

ये दो राजनीतिक सम्मेलन देश में राजनैतिक चेतना जगाने का कारण बने, जिनसे क्रांति की आधारशिला रखी गई थी। ब्रिटेन सरकार के प्रति बढ़ते असंतोष से मेसाचुसेट्स उपनिवेश में क्रांति उमड़ पड़ी थी, जिसे सभी उपनिवेशों का समर्थन प्राप्त था। 

3 सितंबर, 1774 को सभी उपनिवेशों के प्रतिनिधि फिलाडेल्फिया में एकत्र हए और एकमत होकर अंग्रेज सरकार के विरुद्ध प्रस्ताव पास हुआ। सरकार द्वारा थोपे जा रहे करों को अवैधानिक घोषित करके एक चेतावनी-पत्र इंग्लैंड भेजा गया, तो इस पर इंग्लैंड ने मेसाचुसेट्स में सैन्य काररवाई कर दी और आठ देशभक्तों को मार दिया। इससे विद्रोह की आग और भी फैल गई तथा सशस्त्र संघर्ष आरंभ हो गया। 

10 मई को उपनिवेशों ने फिर बैठक की और इसमें स्वतंत्रता संग्राम की रूपरेखा तैयार कर ली गई। सेना का गठन कर लिया गया और इस क्रांतिकारी सेना का प्रधान सेनापति जॉर्ज वाशिंगटन को नियुक्त किया गया, जो एक कुशल राजनीतिज्ञ और सेनानायक थे। ब्रिटिश सरकार उपनिवेशों के इस कदम पर बौखला गई और 23 अगस्त, 1775 को सभी उपनिवेश विद्रोही घोषित कर दिए गए, जिससे युद्ध अवश्यंभावी हो गया था। 

इन सभी कारणों ने अमेरिकी क्रांति को सुलगाने की पृष्ठभूमि तैयार कर दी थी। दूसरी ओर सरकार अपनी सैन्य शक्ति से अमेरिका को अपना गुलाम बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही थी। क्रांतिकारियों ने भी अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। 4 जुलाई, 1776 को यह घोषणा हुई, जिसमें दो बातें मुख्य रूप से कही गईं 

1.अब सभी उपनिवेश स्वतंत्र हैं।

2. सरकार का गठन जनता की सहमति से होगा। 

फिलाडेल्फिया के दूसरे सम्मेलन में क्रांतिकारी सेना को वचनबद्धता के साथ प्रेरित करते हुए जो कहा गया था, वह इस स्वतंत्रता संग्राम का मूल मंत्र रहा-

“हम एक न्यायसंगत उद्देश्य के लिए एकत्र हुए हैं। हमारी एकता ही हमारी संपूर्ण शक्ति है। हमारे पास आंतरिक साधनों का कोई अभाव नहीं है। यदि आवश्यकता पड़ती है तो हम विदेशी सहायता लेने में भी नहीं हिचकिचाएँगे। हमें दासता का जीवन जीते रहने की अपेक्षा स्वतंत्र होकर मरना स्वीकार होगा और यही हम सबका एकमत संकल्प है।” 

4 जुलाई को स्वतंत्रता की घोषणा के साथ ही स्वतंत्रता संग्राम छिड़ गया था। अमेरिकी जनता ने उत्साह से स्वातंत्र्य देवी के चरणों में प्राणार्पण करने का संकल्प कर लिया था। जनता और क्रांतिकारी मिलकर सरकार के विरुद्ध युद्ध के मैदान में खुलकर उतर आए थे। चाहे जय तो या पराजय, कोई भी स्थिति उनके स्वातंत्र्य-प्रेम में आड़े न आ रही थी। ब्रिटिश सेना पूरी शक्ति से विद्रोह का दमन करने में जुटी थी। 

जॉर्ज वाशिंगटन ने कठिन मोर्चों पर लड़ने का फैसला कर लिया अपनी अद्भुत राजनीतियों से ब्रिटिश सेना के पसीने छुड़ा दिए। ब्रिटिश सेनाना बर्गोइन ने साराटोगा में जॉर्ज वाशिंगटन को रोकना चाहा, लेकिन इस स्वातंत्र्य सेनानायक ने बर्गोइन को आत्मसमर्पण करने पर विवश कर दिया। यह एक अदभाव प्रेरणादायी विजय थी। युद्ध के अभ्यस्त साल भर रणभूमि में संगीने सँभालकर कठिन प्रशिक्षण प्राप्त किए अंग्रेज सैनिकों को अनुभवहीन क्रांतिकारियों ने घटने टेकने पर विवश कर दिया था।

इस विजय ने अमेरिकी क्रांति का मनोबल सातवें आसमान पर पहुँचा दिया था और साथ ही इंग्लैंड के शत्रु देशों को भी अवसर दे दिया था। फ्रांस, स्पेन और हॉलैंड ने अमेरिकी क्रांति को सैन्य व आर्थिक सहायता देनी आरंभ कर दी। अब तो अमेरिका के पक्ष में रूस, डेनमार्क, प्रशा और स्वीडन भी उतर आए थे। 

बुलबुले से बना विस्फोट अंतरराष्ट्रीय युद्ध में बदल गया था। अमेरिका ने जितना समर्थन पाया था, वह वाकई आश्चर्यजनक था। क्रांति का ऐसा सुंदर आगाज और क्रियान्वयन संभवतः ही किसी अन्य देश में देखा गया हो। इंग्लैंड की स्वार्थनीतियों ने विश्व-जनमत तैयार कर दिया था, जो आज उसके समक्ष चट्टान बनकर खड़ा था। 

History of the American Revolution

इस क्रांति का समापन युद्ध वर्जीनिया के यार्कटाउन में लड़ा गया। यहाँ अंग्रेज कमांडर कार्नवालिस अपने आठ हजार सैनिकों के साथ क्रांति का दमन कर रहा था और क्रांतिकारियों को बहुत क्षति पहुँचा रहा था। जॉर्ज वाशिंगटन ने फ्रांसीसी बेड़े के साथ कार्नवालिस को घेर लिया और सिर पर कफन बाँधे क्रांतिकारियों ने अंग्रेज सेना का जो हाल किया, वह निर्णायक सिद्ध हुआ। 

19 अक्तूबर, 1781 को कार्नवालिस ने अपने घुटने टेक दिए और अमेरिका विजयी घोषित हो गया। जब ब्रिटेन में यह समाचार पहुँचा तो सरकार स्तब्ध रह गई। युद्ध समाप्त करने के अलावा इंग्लैंड के सामने दूसरा कोई उपाय नहीं था। सन् 1783 में 3 सितंबर को इंग्लैंड ने पेरिस में अमेरिका से संधि कर ली थी, जो ‘पेरिस की संधि’ के नाम से प्रसिद्ध हुई। 

वास्तव में पेरिस की संधि भी बड़ी कठिनाइयों से हो सकी थी। यार्कटाउन में अंग्रेजों की करारी पराजय के बाद अमेरिका और इंग्लैंड, दोनों ही शांतिवार्ता के लिए तैयार थे, लेकिन स्पेन और फ्रांस इसके लिए तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि पश्चिमी अमेरिका स्पेन को दे दिया जाए। अमेरिकी अब किसी भी दासता का स्वीकार नहीं कर रहे थे। अंततः अमेरिका की स्वातंत्र्य-भावना को देखते हुए इन 

दोनों देशों ने भी इस शांतिवार्ता को सहमति दे दी। पेरिस में हुई संधि में जो शर्ते सम्मिलित की गईं, वे निम्नलिखित थीं- 

1.इंग्लैंड के सभी उपनिवेशों की स्वतंत्रता को मान्यता दी जाए।

2. न्यू फाउंडलैंड पर अमेरिका का कोई अधिकार नहीं होगा।

3. लेब्राडोर और नोवास्कोटिया में अमेरिका मछली उद्योग नहीं चलाएगा।

4. अमेरिका की निश्चित सीमाओं पर अतिक्रमण नहीं किया जाएगा।

5. स्वतंत्रता संग्राम में जिन लोगों ने इंग्लैंड से राजभक्ति दिखाई थी, उन लोगों की जब्त संपत्ति अमेरिकी सरकार वापस करेगी।

6. फ्रांस को सेनेगल और टंबिगों के साथ न्यू फाउंडलैंड भी दिया जाएगा।

7. स्पेन को जिब्राल्टर से अपना दावा छोड़कर मिनोरिका और फ्लोरिडा तक ही सीमित रहना होगा।

पेरिस संधि की सभी शर्ते चारों देशों ने मान ली और विशाल भू-भाग पर यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका का राष्ट्रपति बनाया गया। अब अमेरिका विश्व के प्रमुख प्रजातांत्रिक देशों में शुमार हो गया। 

स्वतंत्रता प्राप्त करने के पश्चात् अमेरिका ने जिस त्वरित गति से विकास किया, वह अद्भुत और अकल्पनीय रहा। 21वीं शताब्दी के आते-आते अमेरिका ने अपनी शक्ति को इतना विस्तार दिया कि शेष विश्व की संयुक्त शक्ति भी उसके सामने गौण प्रतीत होने लगी। गुलामी से स्वतंत्रता और फिर विकास की यह गाथा वास्तव में अमेरिकी पुरुषार्थ की द्योतक है। 

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