वैज्ञानिक क्रांति का इतिहास | History of scientific revolution

वैज्ञानिक क्रांति का इतिहास

वैज्ञानिक क्रांति का इतिहास | History of scientific revolution

वैश्विक जागरण में क्रांतिवाद को जन्म अकस्मात् या दैवीय वरदान से नहीं मिला, बल्कि इसके पीछे निरंतर संघर्षों और मानवीय जिज्ञासा की गौरवगाथा है, जिसने धीरे-धीरे विभिन्न रूपों में रिसकर महासमुद्र का रूप लिया। इसमें से पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक फैली मानव जाति ने अपनी-अपनी इच्छा के मोती चुन लिए और मानव-स्वतंत्रता के युद्ध यत्र-तत्र शुरू हो गए। 

औद्योगिक क्रांति ने यदि साधन और रोजगार उपलब्ध कराकर क्रांतियों को सहायता दी तो इसके इतर वैज्ञानिक कांति ने प्राचीन मिथकों और धारणाओं को ध्वस्त करते हुए कुछ नए सिद्धांत प्रतिपादित करके पोंगा-पंडितों और पोप की सत्ता पर आक्रमण किया। नई ब्रह्मांड खोजों और रहस्यों ने लोक-परलोकवाद पर करारा प्रहार किया। इससे मानवीय भय कम हुए। ऐसे मानवीय भय, जो आस्था के द्वारा मानव जीवन पर नियंत्रण रखते थे। ब्रह्मांड की इन कपोल-कल्पित अवधारणाओं से भयभीत मानव को खगोलविदों ने सत्य से परिचित कराया और मान्यताओं की बेड़ियाँ शिथिल हुईं। 

खागोल क्रांति का आरंभ 

सन् 1453 में कुस्तुनतूनिया के पतन के बाद पश्चिम जगत् को अरब देशों से प्राप्त ऐसे अनेक ग्रंथों का ज्ञान हुआ, जिसने ब्रह्मांड के रहस्यों का पर्दाफाश किया। इन अरब ग्रंथों का यूनानी भाषा में भी अनुवाद हुआ, जो कालांतर में कॉपरनिक्स द्वारा प्रतिपादित सिद्धांतों में सहायक सिद्ध रहे। विज्ञान का वास्तविक आरंभ टॉलमी की पुस्तक ‘अलमाजेस्ट’ से होता है, जिसने एक ऐसी भू-केंद्रीय विश्व-व्यवस्था का सिद्धांत निरूपित किया। इसके अनुसार सभी खगोलीय पिंड को पृथ्वी के चारों ओर एक समान वृत्ताकार कक्षाओं में घूम रहे थे। 

इससे पूर्व खगोल रहस्य पौराणिक कथावाद पर ही आधारित थे। टॉलमी के स सिद्धांत के गहन खगोलीय अध्ययन के बाद निकोलस कॉपरनिक्स ने सूर्य को विश्व व्यवस्था का केंद्र माना और स्पष्ट किया कि पृथ्वी सहित सभी खगोलीय पिंड वत्ताकार कक्षाओं में घूम रहे हैं। ‘ऑन द रेव्यूलेशन ऑफ द सेलेस्टियल म्फीयर्स’ में इस सिद्धांत को प्रतिपादित करते हुए कॉपरनिक्स ने बताया कि पृथ्वी सर्य की वार्षिक परिक्रमा करने के साथ-साथ अपनी ही धुरी पर चौबीस घंटे में एक बार पूरी तरह घूम जाती है। इस तरह के नए खगोल सिद्धांतों ने परंपरावादियों को विचलित कर दिया था। कॉपरनिक्स ने अपने सिद्धांत का प्रतिपादन अरस्तू के प्राचीन दर्शन का गहन अध्ययन करके किया था और उसी के आधार पर गणितीय आकलन करके अपनी बात रखी थी। 

प्रतिक्रियावादी अभियान

चँकि कॉपरनिक्स ने गणितीय आकलन से यह नया सिद्धांत दिया था तो परंपरावादी वर्ग ने तत्काल विरोधी प्रतिक्रिया देनी आरंभ कर दी। इस विरोधी वर्ग का कहना था कि उन सिद्धांतों ने अरस्तू, टॉलमी के साथ-साथ बाइबिल के स्थापित मूल्यों का अपमान किया है। यूरोप में पोप की सत्ता पूरी तरह से काबिज थी। शासन और धर्म पर इसका अधिकार था। मानव जीवन का कोई क्षेत्र शेष नहीं था, जिसमें पोप और पादरियों का नियंत्रण न था। 

कॉपरनिक्स का विरोध तेज हुआ और उसके विरोधियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ने लगी। कैथोलिक चर्च से बड़े व्यापक रूप से मानव जीवन में खगोल विज्ञान को जगह न बनाने देने के प्रयास किए। इन धर्माधिकारियों को भय था कि यदि धर्मग्रंथों की नई व्याख्या से मान्य सिद्धांत प्रतिपादित हो गए तो चर्च की सत्ता खतरे में पड़ जाएगी। अत: यह आवश्यक था कि पृथ्वी के सुस्थिर पिंड होने की प्राचीन धारणा बनी रहे। यह कैथोलिक वर्ग किसी भी मूल्य पर ऐसे मूल्यों को स्वीकार नहीं कर सकता था। इन विरोधियों ने अपने तर्कों में अरस्तू के स्थापित तर्क भी सम्मिलित कर लिए थे, जिनमें स्पष्ट था कि पृथ्वी जैसे भारी पिंड का तीव्र गति से भ्रमण या घूर्णन संभव ही नहीं था। उनका यह भी तर्क था कि यदि पृथ्वी गति करती है तो ऊपर से नीचे की ओर गिरनेवाली वस्तुओं का अवरोहण बिंदु ठीक उसके नीचे कैसे रह सकता है। 

इन तर्कों ने कॉपरनिक्स की धारणा को मान्य नहीं करने दिया और उन्हें खारिज कर दिया गया। फिर कुछ समय पश्चात् दूरबीन या खगोलदर्शी के आविष्कार ने वैज्ञानिक क्रांति को नई दिशा प्रदान कर दी। इससे जोहानस कैप्लर ने कॉपरनिक्स के सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या की और यह बौद्धिक स्तर पर सर्वमान्य हुई। कैप्लर ने जो संशोधन किया, वह यह था कि ग्रहों का पथ वृत्ताकार न होकर दीर्घ वृत्ताकार है, साथ ही उसने यह भी संभावना जाहिर की कि इन सभी खगोलीय पिंडों के बीच परस्पर आकर्षण हो सकता है। इसी आकर्षण की संभावना से पिंडों में गति होने की बात कही गई। 

गैलीलियो का युग 

कैप्लर के तर्क का गहन अध्ययन महान् वैज्ञानिक न्यूटन ने किया और इस सिद्धांत को पूर्ण रूप से निर्विवाद सत्य कहा। इसके बाद खगोल रहस्यों की परतों को उधेड़ने के लिए अद्भुत खगोलशास्त्रियों और भौतिक विज्ञानी गैलीलियो का पदार्पण हुआ। यह एक नए युग का आरंभ था, जो खगोल विज्ञान की स्थापना करनेवाला रहा। 

गैलीलियो का युग 

गैलीलियो ने अपने प्रयोगों और गहन अध्ययन से यह निष्कर्ष निकाला कि चंद्रमा की सतह समतल न होकर पृथ्वी की भाँति ही ऊबड़-खाबड़ है। इस निष्कर्ष ने अरस्तू के स्थापित विश्वास का खंडन किया कि सभी ग्रह शुद्ध, आदर्श और अपरिवर्तनीय हैं । गैलीलियो ने सिद्ध किया कि चंद्रमा पूर्ण रूप से गोल नहीं है और न ही विश्व-व्यवस्था भू-केंद्रीय है। उसने संभावना जताई कि सभी पिंड सूर्य या अन्य किसी पिंड की परिक्रमा कर रहे हो सकते हैं। 

‘डायलॉग्स ऑन टु न्यू साइंस’ के द्वारा उसने अरस्तू के दावों को निरस्त कर दिया। उसने स्पष्ट किया कि प्रकृति वह क्रमबद्ध व्यवस्था नहीं है, जिसमें सभी भौतिक वस्तुओं का स्थान उनके गुणों की उपस्थिति या अभाव द्वारा निर्धारित होता हो। गैलीलियो ने ब्रह्मांड के रहस्यों को गणित के माध्यम से जान लेने का दावा किया। उसने गति के सिद्धांत का प्रतिपादन किया और यह भी सिद्ध किया कि वायु के अभाव में स्वतंत्र रूप से गिरता हुआ कोई पिंड पैराबोलिक पथ अपनाता 

गैलीलियों द्वारा अरस्तू के दावों का खंडन करने से उसका भी घोर विरोध हुआ। धर्माधिकारी उसे भी ईसा-विरोधी, परंपरा-विरोधी और अरस्तू की महानता पर प्रश्नचिह्न लगानेवाला कहने लगे। गैलीलियों ने अपने सभी विरोधों का जवाब दिया और कहा कि धर्म का उद्देश्य मानव-जाति को स्वर्ग-प्राप्ति के माध्यम को समझाना है, न कि ब्रह्मांड की परिचालन प्रणाली को। इससे स्पष्ट था कि वह धर्माधिकारियों की खगोल संबंधी स्थापित मान्यताओं को कपोल कल्पित, तर्कहीन और अस्पष्ट कह रहा था। बस, इसी बात से कैथोलिक चर्च भडक गया। 

सन् 1616 में चर्च ने कॉपरनिक्स के सूर्यकेंद्रीय सिद्धांत को धर्म-विरोधी कहकर खारिज कर दिया और उसकी पुस्तक ‘ऑन द रेव्यूलेशन ऑफ द सेलेस्टियल स्फीयर्स’ को प्रतिबंधित कर दिया। चर्च के सेंसर ने कॉपरनिक्स के अध्यापन की भर्त्सना की और उसका परित्याग करने की घोषणा कर दी। गैलीलियो फिर भी अपने सिद्धांतों पर दृढ़ रहा और इसका परिणाम यह रहा कि चर्च और विरोधियों ने सन् 1633 में गैलीलियो पर वर्जित ग्रंथ के प्रचार का आरोप लगाकर मुकदमा चला दिया और उसे आजीवन कारावास का दंड दे दिया। इसका परिणाम कैथोलिक देशों में वैज्ञानिक गति पर विराम जैसी स्थिति में हुआ, जबकि प्रोटेस्टेंट देशों में इस विषय में प्रगति होने लगी। 

 गैलीलियो को भले ही प्रतिबंधित कर दिया गया था, लेकिन अब तक वह खगोल विज्ञान को इतने मार्ग दिखा चुका था कि उन पर चलकर वैज्ञानिक प्रगति निरंतर आगे बढ़ती रह सकती थी। यह कार्य प्रोटेस्टेंट यूरोप में जारी रहा। 

प्रोटेस्टेंट यूरोप में विज्ञान-क्रांति 

इस ज्ञान-विरोधी निर्णय ने कैथोलिक देशों में अवश्य ही विज्ञान की गति को बाधित किया, लेकिन ब्रिटेन और फ्रांस में इस दिशा में तेजी आई। ब्रिटेन में वैज्ञानिक बेकन और फ्रांस में डेकार्ट ने अपने ज्ञान से विज्ञान के रहस्यों पर से परदा उठा दिया। बेकन सहित सभी ब्रिटिश वैज्ञानिक गणित व दर्शनशास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित निष्कर्षों को मान्यता दे रहे थे। 

इस सदी में ब्रिटेन में विलियम हार्वे, रॉबर्ट हुक जैसे बड़े वैज्ञानिक हुए तो फ्रांस में डेकार्ट और पास्कल ने अपनी खोजों से विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया। हार्वे ने शरीर में रक्त-संचरण का अध्ययन करके यह स्थापित किया कि मानव शरीर में रक्त वाहिनियों की भूमिका मुख्य है, जिससे शरीर में रक्त परिसंचरण होता है। रॉबर्ट हुक ने दूरबीन के जरिये कोशिकाओं का पता लगाया तो बॉयल ने वायुपंप के आधार पर गैस के नियम की स्थापना करके रसायन विज्ञान में क्रांति ला दी। उन्होंने सिद्ध किया कि एक समान तापमान की स्थिति में किसी भी गैस का आयतन उस पर लगाए गए दाब के समानुपात में घटता जाता है। बॉयल ने ही सबसे पहले यौगिक और मिश्रण पदार्थों के बीच के वैज्ञानिक अंतर को स्पष्ट किया। 

इसके बाद वैज्ञानिक स्पिनोला ने कई पुरानी मान्यताओं का दृढता से खंडन किया और स्पष्ट किया कि समूचे ब्रह्मांड का निर्माण एक ही तत्त्व से हआ है और यह तत्त्व एक ही समय में ईश्वर और प्रकृति में प्रकट है। फिर सन् 1662 के बाद ‘रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन फॉर प्रमोटिंग नेचुरल नॉलेज’ की स्थापना के साथ ही वैज्ञानिक ज्ञान का आदान-प्रदान सरल हो गया। 

न्यूटन का युग 

विज्ञान जगत् को जो योगदान न्यूटन ने दिया, उसे विज्ञान का स्वर्णिम युग कहा जाता है। सर आइजक न्यूटन ने अपने नियमों और सिद्धांतों से बेकन व डेकार्ट के बीच विभाजन की रेखा खींच दी। न्यूटन ने लैटिन भाषा में ‘प्रिंसिपिया मैथमैटिका’ या ‘मैथमैटिकल प्रिंसिपल्स ऑफ नेचुरल फिलॉसफी’ नामक पुस्तक लिखी, जिसमें कॉपरनिक्स के खगोल विज्ञान और गैलीलियो के भौतिक विज्ञान का समावेश था। न्यूटन ने अपनी पुस्तक में दो मुख्य प्रश्न उठाए थे- 

1.इतनी भारी पृथ्वी की निरंतर गतिशीता के पीछे क्या-क्या कारण हैं?

2. ऐसा क्यों है कि पिंड पृथ्वी के केंद्र की दिशा की ओर गिरने पर विवश से प्रतीत होते हैं, लेकिन ग्रहपथीय गति दीर्घ वृत्ताकार कक्षों में बनी 

रहती है?

हालाँकि इन सभी संभावनाओं को कैप्लर द्वारा भी व्यक्त किया जा चुका था, जिन्हें आगे चलकर न्यूटन ने आगे बढ़ाया और चर्च आदि के विरोध की कोई परवाह न करके कार्टिसियन शंकाओं की अवज्ञा की, लेकिन कार्टिसियन गणित विद्या का ही प्रयोग करके बेकन-शास्त्र की नई, पर सशक्त व्याख्या की। इसी व्याख्या के अंतर्गत न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के नियम का प्रतिपादन किया, जो सर्वसार्विक था। इस नियम के अनुसार विश्व का प्रत्येक पदार्थ और उसका प्रत्येक कण परस्पर उतनी शक्ति से एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं, जो कि दोनों कणों के द्रव्यमान के गुणनफल के साथ समानुपाती है और दोनों के बीच की दूरी के वर्गफल के साथ व्युत्क्रमानुपाती है। 

न्यूटन का युग 

न्यूटन ने अपने अनुभव और प्रयोगों से सामुद्रिक रहस्यों को खोलते हुए ज्वार-भाटे के उतार-चढ़ाव की पूर्व सूचना देनेवाले सिद्धांत का प्रतिपादन करके धर्माचार्यों को स्तब्ध कर दिया। इससे आगे न्यूटन ने गति-विषयक तीन नियमों का प्रतिपादन करके गति विज्ञान को नई दिशा दी। नयूटन ने जड़त्व के नियम से सिद्ध किया कि कोई भी पिंड तभी गतिमान होता है, जब उस पर किसी बल का प्रयोग होता है। सीधी रेखा में गति करता कोई पिंड अपनी दिशा और वेग में तभी परिवर्तन करता है, जब उस पर कोई बाह्य बल लगाया जाए। फिर क्रिया-प्रतिक्रिया के नियम से उसने बल के साथ प्रतिबल उत्पन्न होने की बात को सिद्ध किया। न्यूटन के भौतिक विज्ञान ने संपूर्ण ब्रह्मांड की एकभूत व्याख्या की और गुरुत्वाकर्षण व गति-विषयक नियमों को इसके केंद्र में रखा। इस प्रकार न्यूटन ने यह सिद्ध किया कि विश्व का संचालन चर्च के द्वारा स्थापित मान्यताओं से नहीं, बल्कि एक सरल और प्राकृतिक नियम के अनुसार होता है। 

इन विज्ञानी सिद्धांतों ने मानव जगत् में निश्चय ही हलचल मचा दी। अब तक पौराणिक सिद्धांत के आधार और धर्माचार्यों द्वारा निर्देशित संदेशों से ही संसार की रचना और नियमितता स्थापित थी, लेकिन वैज्ञानिक क्रांति ने नए सिद्धांतों से मानव को विश्व के बारे में बताया और यहीं से मानवीय विचारों ने एक करवट ली, जो कालांतर में भयहीन होकर क्रांतियों के निमित्त बनते रहे।

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