रूस-जापान युद्ध का इतिहास | History of Russo-Japanese War

रूस-जापान युद्ध का इतिहास

रूस-जापान युद्ध (Russo-Japanese War) (1904-05 ई०) 

1904-05 का रूस-जापान युद्ध वास्तव में 1894 में चीन-जापान के बीच के युद्ध का अगला परिणाम था। चीन-जापान युद्ध में रूस का झुकाव चीन की ओर था, जापान की उस समय बढ़ी हुई नौसैनिक शक्ति के कारण रूस चाहकर भी अधिक हस्तक्षेप न कर सका था। पर जब चीन के हारने के बाद लिआसो नदी के पूर्व में स्थित मंचूरिया का प्रदेश जापान को दे दिया गया, तब यह भी निश्चित हो गया था कि जापान, पूर्व स्थित मंचूरिया तब ही खुद को सीमित न रखते हुए पूरे मंचूरिया को हड़प जाएगा। 

इससे बचाव के लिए रूस और चीन में एक संधि हुई-इस संधि के अनुसार रूस को मंचूरिया में ब्लाडीवोस्टक तक एक हजार-मील लम्बी रेल लाइन बनाने का अधिकार प्राप्त हुआ। पोर्टआर्थर और उसके समीप का प्रदेश 25 वर्ष के लिए रूस को पट्टे पर मिला और यहां रूसी सरकार ने अपने जंगी जहाजों को सुरक्षित रखने के लिए किलेबन्दी शुरू कर दी। 

रूस-जापान युद्ध का इतिहास

इस प्रकार पोर्ट अर्थर प्रशान्त महासागर में रूस का सबसे बड़ा सैनिक अड्डा बन चुका था। मंचूरिया में रेलवे लाइन निर्माण करने के लिए दो कम्पनियों का संगठन किया गया; जिन पर रूस का नियंत्रण था। इन कम्पनियों के लिए धन का इन्तजाम करने के लिए एक बैंक की स्थापना की गयी थी। बैंक पर भी रूस का ही नियंत्रण था। रेल लाइनों के निर्माण के लिए बहुत से रूसी लोग मंचूरिया आ रहे थे और उन लाइनों की रक्षा के लिए रूस की एक शक्तिशाली सेना भी इस प्रदेश में रहने लगी थी। 

उन्हीं दिनों चीन में बाक्सर विद्रोह (1889 ई०) हुआ। जिसे चीन ने यद्यपि शीघ्र दबा दिया, पर यह बहाना लेकर कि विद्रोही मंचूरिया में निर्माणाधीन रेल लाइनों को नुकसान पहुंचा सकते हैं, रूस की सेनाएं मंचूरिया पहुंचने लगीं। उस पर जापान ने एतराज जताया। जवाब में रूस ने कहा कि ज्योंही चीन में शान्ति-व्यवस्था बहाल हो जाएगी, वह अपनी सेना को वापस बुला लेगा, लेकिन समय गुजरता गया-चीन में शान्ति व्यवस्था भी बन गयी पर रूस ने मंचूरिया में तैनात सेना वापस नहीं बुलायी और उस सेना की मदद खुले रूस से चीन को प्राप्त होने लगी। बाक्सर विद्रोह से पूर्व मंचूरिया में रूस का केवल आर्थिक प्रभाव था-अब वहां उसका राजनीतिक और सैनिक प्रभाव भी कायम हो गया। 

स्वाभाविक था जापान इससे खासा चिन्तित हुआ-उसके अधिकार में मंचूरिया का जो क्षेत्र था, इसके लिए खतरा पैदा हो गया था। रूस की सेना बढ़ती ही जा रही थी-इस स्थिति को देखते हुए जापान ने अपना विरोध जताना शुरू किया। जैसे-जैसे जापान का विरोध बढ़ा, वैसे-वैसे रूस ने कोरिया में अपनी दखलअंदाजी बढ़ा दी। रूस और चीन को मजबूत संधि में बंधा पाकर कोरिया का झुकाव जापान से हटकर उन दोनों की ओर हो गया। कोरिया का राजा इस बात को जानता था कि चीनी शासक बेशक जापान के मुकाबले बहुत कमजोर हैं, पर रूस एक योरोपीय शक्तिशाली देश है। उसका संरक्षण उसे जापान से बचाए रख सकता है। 

उधर, जापान की शक्ति भी बढ़ती जा रही थी, उसने देखा कि कोरिया, चीन और रूस के गुट में शामिल हो गया है तो जापान ने ब्रिटेन को इस बात का पाठ पढ़ाया कि यदि इस समय रूस की बढ़ती शक्ति को रोका न गया तो वह एशियाई देशों में ब्रिटेन के पांव उखाड़ देगा। ब्रिटेन को यह बात जम गयी और वह जापान से संधि कर बैठा। 

ब्रिटेन का साथ पाकर जापान ने कोरिया में अपनी सेनाएं घुसेड़ दी तथा उन्हें इस बात का लक्ष्य दे दिया कि वे कोरिया के राजा की हत्या करके ही अपनी बढ़त रोके-पर संयोग से कोरिया के राजा को इस बात की खबर समय रहते मिल गयी कि जापानी सेनाएं उसकी हत्या करने के इरादे से कोरिया में दाखिल हुई हैं-वह वहां से भाग निकला, सीधे जाकर रूस में शरण ली। रूस ने न उसे भरपूर सुरक्षा दी बल्कि अपनी सेनाएं कोरिया में तैनात कर दीं-यह घटना 1909 ई० की है। तब दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने लगी थीं-भयंकर युद्ध छिड़ने के आसार थे। पर कुछ योरोपीय देशों ने हस्तक्षेप कर दोनों में संधि करायी। 

इस संधि में दोनों को लाभ नजर आया। रूस को कोरिया में अपना प्रभाव बढ़ाने की हरी झण्डी मिली तथा मंचूरिया के अधिक क्षेत्र में जापान को अपना प्रभाव बढ़ाने का अधिकार मिला। लेकिन यह संधि बस कुछ दिनों की थी-रूस ने मंचूरिया में जो धन खर्च कर दिया था, उसका ज्यादह से ज्यादह लाभ चाहता था, जबकि जापान, कोरिया से अपना प्रभाव हटाना न चाहता था। 

रूस और जापान दोनों के हित ही कोरिया में टकरा रहे थे। दोनों की ही सेनाएं कोरिया के आस-पास तेजी से जमा हो रही थीं। जापान ने मान लिया था कि कोरिया का मसला बगैर युद्ध के वह नहीं निपटा सकता। उसे ब्रिटेन की अधिकाधिक सहायता मिल गयी थी। 

फरवरी, 1904 में दोनों के बीच बातचीत के जरिए मसले का हल होने की प्रत्येक सम्भावना समाप्त हो गयी। 5 फरवरी, 1904 में रूस-जापान युद्ध आरम्भ हो गया। युद्ध के मैदान में जापान पहली बार एक शक्तिशाली यूरोपीय देश से लोहा ले रहा है। पहले ऐसा प्रतीत हुआ कि यह युद्ध दो अपमान प्रतिद्विन्द्वियों के बीच है। जापानी ‘बौना’ और रूसी ‘दानव’ से समानता भी नहीं हो सकती थी। लेकिन जापान युद्ध के लिए पहले से तैयार था, जहां-जहां रूस और जापान सेना के बीच भयंकर युद्ध छिड़ा, जापानी सेनाओं को रूसी सेनाओं पर विजय मिलती गयी। खास बात यह थी कि उसे ब्रिटेन से सहातया की आवश्यकता भी न पड़ी थी। विस्मयजनक बात यह थी कि उस समय से पच्चीस-तीस वर्ष पूर्व जापान अत्यन्त पिछड़ा हुआ मध्यकालीन देश था जो तीर और धनुष से लड़ाई करता था, उसके पास उस समय संहारक आयुध मौजूद थे। 

रूस-जापान युद्ध का इतिहास

कुछ समय के युद्ध में ही जापान ने दिखा दिया कि जापान में सैनिक शासन स्थापित होते ही उसने अपनी सैनिक शक्ति से, किसी भी योरोपीय देश को पीछे करने की शक्ति अर्जित कर ली है। 

जापान की सैनिक शक्ति का आंकलन करके अमेरिका को आगे आना पड़ा। उसे इस बात का खतरा पैदा हो गया था कि रूस को बुरी तरह पराजित करने के बाद कहीं जापान युद्ध उन्माद में इस कदर न भर जाए कि वह उसके मित्र देशों ब्रिटेन और फ्रांस को भी आंखें दिखाने लगे।

अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट मध्यस्थता के लिए आए। रूस इस बुरी तरह से हार का नुकसान उठा चुका था कि उसे आगे युद्ध जारी रखना असम्भव हो गया था। अतः वह संधि के लिए बाध्य हुआ। यह संधि पोर्टस् साउथ की संधि कहलाई। इस संधि की शर्तों के अनुसार 

(1) पोर्ट आर्मर और लिआ अवेतुंग प्रायद्वीप जापान को प्राप्त हुए।

(2) कोरिया पर जापान का प्रभुत्व स्वीकार हो गया। 

3.मंचूरिया को दो प्रभाव क्षेत्रों में बांट दिया गया। उत्तरी मंचूरिया पर रूस और दक्षिणी मंचूरिया पर जापान का प्रभाव स्वीकृत हुआ। 4.साइबेरिया के समुन्द्री तट पर मछली पकड़ने का अधिकार भी जापान को प्राप्त हुआ।

5) यह तय हुआ कि रूस और जापान मंचूरिया में अपनी-अपनी रेलवे लाइनों का उपयोग केवल व्यावसायिक और व्यापारिक प्रयोजन के लिए करेंगे; सैनिक प्रयोजनों के लिए नहीं।

इस प्रकार रूस और जापान के बीच भड़का हुआ युद्ध खत्म हुआ। इस युद्ध में रूस ने पाया; जापान ने कुछ ज्यादह ही पाया-सारा नुकसान कोरिया का हुआ-कोरिया पर, एक प्रकार से हिस्सा बांट पर मुहर लग गयी थी।

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