इराक कुवैत युद्ध का इतिहास | History of iraq kuwait war

इराक-कुवैत युद्ध

इराक-कुवैत युद्ध (Iraq-Kuwait War) (अगस्त, 1990) 

कुवैत पर इराक का युद्ध, वास्तव में इराक की, ईरान के साथ युद्ध करने की बदहाली के नतीजे में लादा गया मूर्खता भरा कदम था। इस मूर्खता भरे कदम में सद्दाम के दुर्भाग्य की दास्तान लिख दी थी। 

ईरान पर युद्ध थोपकर 1980-88 ई०, आठ वर्षों तक युद्ध करते रहने और हथियार की आपूर्ति अमेरिका से लेते रहने के कारण इराक पर 75 बिलियन डालर का कर्ज हो गया था। युद्ध बन्दी के बाद, दो वर्ष तक अथक प्रयास करने के बाद भी अपने देश के आर्थिक संसाधनों द्वारा कर्ज की अदायगी किसी तरह भी न कर पाने के कारण सद्दाम हुसैन बौखला उठे थे। 

अमेरिका की ओर से कर्ज का तकादा जोरों पर था। 

इन बौखलाहट के दिनों में सद्दाम को जब कोई रास्ता नजर न आया तो उनकी निगाह पड़ोसी मुल्क कुवैत की ओर गयी। 

कुवैत दुनिया के घनाड्य देशों में से एक माना जाता है। कुवैत में धन का भण्डार भरा पड़ा था। कुवैत छोटा देश है; पर तेल के कुंओं की प्राकृतिक सम्पदा के बल पर उसकी आय बेशुमार है। सद्दाम ने सोचा कि जब साहूकार पड़ोस में ही है तो वह किसी और से आर्थिक सहायता की मांग के लिए क्यों जाया जाए। सद्दाम ने कुवैत जाकर, कुवैत के शासक से बातचीत करते हुए उनके सामने अपनी बात रखी __“इराक को 30 बिलियन डालर रकम की उम्मीद आपकी ओर से है। इराक के बुरे दिन हैं; अमेरिका कर्ज अदायगी के लिए दबाव डाल रहा है। आप दीर्घकालीन कर्ज के रूप में इतनी रकम इराक को दे दीजिए ताकि अमेरिकी कर्ज से इराक को मुक्ति मिल सके।” 

कुवैत का शाह, सद्दाम का प्रस्ताव सुनकर सन्नाटे में आ गया था। 

यहां पर कुवैत के बारे में संक्षेम में जान लेना सुविधाजनक है। कुवैत दुनिया के नक्शे में, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उभरा हुआ देश है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इरान से कुछ हिस्सा काटकर ब्रिटेन और फ्रांस ने कुवैत देश बना दिया था तथा अरब परिवार के एक सदस्य को बुलाकर वहां की सत्ता दे दी गयी थी। 

ऐसा करने के पीछे ब्रिटेन और फ्रांस की दूरदर्शिता थी कि यदि भविष्य में ईरान-इराक उन्हें तेल देने में हीला हवाला करें तो कुवैत से उसकी पूर्ति वे करते रहें। कुवैत में तेल के प्राकृतिक संसाधन बहुत अधिक थे-उक्त देशों का हित साधन चलता रहने वाला था। 

नया-नया बना देश कुवैत खुशहाली और सम्पन्नता से जी रहा था। यूरोपीय देशों का वह कृपा-पात्र था, अतः उसने अपने लिए किसी सेना की भी व्यवस्था न कर रखी थी। 

सद्दाम का कर्ज का प्रस्ताव सुन, शाह कुवैत ने सोचा कि आर्थिक दिवालिये में घिरा इराक भविष्य में भी उसका कर्ज उतारने की स्थिति में रहेगा। जिसके पास कर्ज उतारने का साधन ही न हो, उसे मोटा कर्ज देने का अर्थ है या तो देकर भूल जाया जाए या फिर बाद के दिनों के लिए दुश्मनी का बीज बोया जाए। 

शाह कुवैत ने दो टूक शब्दों में कर्ज देने से इनकार कर दिया। 

खिसियाए हुए सद्दास हुसैन इराक वापस आ गए और अपना बयान जारी कर दिया 

“कुवैत कल भी इराक का हिस्सा था, आज भी है।” । 

उनके इस बयान से ही दुनिया ने जान लिया कि अब कुवैत के साथ कुछ अनहोनी होने वाली है। 

कुछ दिनों बाद ही सद्दाम ने आरोप मढ़ा

“अपने यहां तेल के कुंओं को गहराई से खुदवा कर कुवैत, इराक के तेल के कुंओं से तेल की चोरी कर रहा है।” । 

सद्दाम का कुवैत के बारे में बयान आने के बाद अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज एच० बुश ने सद्दाम हुसैन को व्यक्तिगत रूप से फोन करके उन्हें कुवैत पर फौज का इस्तेमाल करने से परहेज करने की सलाह दी। 

अमेरिका की ऐसी सलाह पाकर सद्दाम ने सोवियत यूनियन के राष्ट्रपति मिसाइल गोर्बाचोव की ओर हाथ बढ़ाया। रूस से सैनिक संधि कर ली। सोवियत यूनियन ने उनसे वादा किया कि रूस उन्हें सैन्य सलाहकार, हथियार और आर्थिक सहायता देगा। रूस की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाते ही अमेरिका सजग हो गया। 

वाशिंगटन हाउस प्रवक्ता ने संवाददाताओं को सम्बोधित करते हुए इराक-कुवैत के तनाव पूर्ण सम्बन्धों के जवाब में कहा 

 “इराक यदि तानाशाही रवैया अपनाकर कुवैत पर सैन्य शक्ति का इस्तेमाल करता है तो अमेरिका और मित्र देश तमाशाई न बने रहेंगे। कुवैत पर यदि फौजी कार्रवाई इराक की ओर से होती है तो यह अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा। इस मसले को अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् देखेगी और अपनी ओर से उचित कार्रवाई करेगी।” 

पश्चिम एशिया में वातावरण तनावपूर्ण हो गया था। अरब लीग के लोगों ने भी सद्दाम हुसैन को समझाने की चेष्टा की कि वे कुवैत पर सैनिक कार्रवाई करने की भूल न करें। 

पर, सद्दाम हुसैन ने इसे अपने सम्मान का विषय बना लिया था कि कुवैत शाह ने उन्हें 30 बिलियन डालर की रकम कर्ज के रूप में देने से क्यों मना।

2 अगस्त, 1990 को कुवैत पर इराकी हमला 

इराक-कुवैत युद्ध

सद्दाम हुसैन के कुवैत पर दोषरोपण से ही इस बात का अन्दाजा दुनिया को हो गया था कि आने वाले समय में क्या होने वाला है। कुछ दानिशवर राजनीतिज्ञों को मेमनों और भेड़िये की कहानी याद आ रही थी-भेड़िये ने मेमने का शिकार करने के लिए बहाना बनाया था कि तू जिस जगह पानी पी रहा है, उसका बहाव मेरी तरफ है, तेरे पानी पीने से झूठा पानी मेरी ओर आ रहा है। मेमने ने सफाई में कहा था-हुजूर, मैं जहां पानी पी रहा हूं वहां से पानी की धारा दूसरी ओर जा रही है ना कि आपकी ओर। 

तब भेड़िये का बहाना था-तेरे बाप ने एक दिन उस जगह पानी पिया था जिसकी धारा मेरी ओर आ रही थी-अतः बाप की गलती की सजा तुझे भुगतनी होगी। कहकर भेड़िये ने झपटा मार मेमने पर हमला कर, उसका शिकार कर डाला था। 

इराकी तानाशाह सद्दाम हुसैन ने ठीक भेड़िये और मेमने की सी कहानी का बहाना बनाकर कुवैत पर हमला कर दिया था। 2 अगस्त, 1990 को धड़धड़ाती हुई इराकी सेना तथा बख्तर बन्द टैंक कुवैत में घुस पड़े थे। बगैर किसी प्रतिरोध के इराकी सेना का कुवैत के चप्पे-चप्पे पर कब्जा हो गया था। 

शाह कुवैत ने हमले की खबर सुनते ही, हवाई जहाज पर बैठ अरब का रास्ता लिया था। शाह कुवैत को उस समय अपनी जान बचाने की सबसे ज्यादह जरूरत थी। उन्हें मालूम था कि आगे का सारा मामला विश्व बिरादरी निपट लेगी। 

कुवैत के चप्पे-चप्पे पर इराक का कब्जा हो गया था; पर यह कोई साधारण घटना न थी। सेना के बल पर एक सैन्य विहीन देश को उसके पड़ोसी देश ने हड़प लिया था-दुनिया के लिए एक बड़ा धमाका था। 

अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस ने अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद् में पुरजोर आवाज उठायी। इस सबमें अगस्त से 16 जनवरी, 1991 तक का समय गुजर गया था। 

पांच माह से ज्यादह समय तक इराकी सेना को कुवैत में मनमानी करके आर्थिक सम्पदा का दोहन करने का अवसर मिल गया था। सद्दाम हुसैन ने साढ़े पांच माह तक कुवैत से भरपूर दौलत समेटी। इतनी दौलत कि वह अमेरिका कर्ज की काफी हद तक भरपाई कर सकते। 

21वीं शताब्दी की यह सबसे बड़ी किसी देश पर युद्ध का डकैती की घटना थी। एक तानाशाह देश, एक छोटे से पड़ोसी देश में घुसकर कर्ज का धन चुकाने के लिए धन समेट रहा था, उसके विरुद्ध तुरन्त कोई कार्रवाई न हो रही थी-विश्व घटना में हैरत की बात थी। 

पर राजनीतिक जानकारों को हैरत इसलिए न थी। क्योंकि अमेरिका का बहुत बड़ा कर्ज इराक पर था-मित्र देश, अमेरिका के प्रगाढ़ मित्र थे-उनकी ओर से गुपचुप या अप्रत्यक्ष रूप से इराक को कुवैत पर डाका डालकर रकम जुटाने की छूट की सावधिक छूट प्राप्त थी। 

जब अमेरिका और मित्र देशों ने इस बात की अनुमानित तसल्ली कर ली कि इराक ने साढ़े पांच माह में इतनी दौलत समेट ली है कि वह अमेरिका का कर्ज किसी हद तक उतार सके तब 17 जनवरी, को यूनाइटेड नेशन्स से (संयुक्त राष्ट्र द्वारा) इराक को अल्टीमेटन दिलवाया गया कि कुवैत को यदि इराक ने जल्द से जल्द खाली न किया तो उससे संयुक्त राष्ट्र की सेनाएं इराक खाली करवाएंगी। 

इराक को शायद अभी और धन समेटना बाकी था। कुछ दिन की और उसने लूट की। संयुक्त राष्ट्र के ओदश पर ब्रिटेन, फ्रांस और अमेरिका की सेना ने कुवैत में प्रवेश किया। 

27 फरवरी, 1991 को इराक की सेना जिस रफ्तार से कुवैत में घुसी थी, उससे कहीं अधिक तेजी के साथ इराक में वापस आ गयीं। 

इराकी सेना द्वारा कुवैत को खाली करने के बाद, शाह कुवैत को वापस बुलाकर पुनः कुवैत के सिंहासन पर सत्तासीन कर मित्र राष्ट्र की सेनाएं कुवैत से वापस हुईं। 

इस प्रकार, विश्व युद्ध के इतिहास में अपने आप में अकेला, डकैती का कारनामा अंजाम दिया गया। इस कारनामे को दुनिया के तटस्थ देशों ने देखा और अचरज किया। अन्त में यही कहा जा सकता है कि 21वीं शताब्दी में सुपर पावर अमेरिका की ही मनमर्जी सब जगह चलती है। वह अपने आर्थिक लाभ के लिए युद्ध भी करता है और फिर शान्ति भी वही स्थापित कराता है।

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