औद्योगिक क्रांति का इतिहास |History of Industrial Revolution

औद्योगिक क्रांति का इतिहास

औद्योगिक क्रांति का इतिहास : क्रांतियों का आधार |History of Industrial Revolution

विश्व भर में हुई क्रांतियों को आधार देने के लिए औद्योगिक क्रांति ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह क्रांति उन महान् परिवर्तनों का कारण बनी, जिन पर आज आधुनिक विश्व टिका हुआ है। इस क्रांति के बिना मानव-जागरण की कल्पना नहीं की जा सकती थी। 

औद्योगिक कांति का अर्थ उद्योगों की प्राचीन, परंपरागत और धीमी गति को छोड़कर नए, वैज्ञानिक तथा त्वरित उत्पादक यंत्रों का प्रयोग किया जाना है। सरल शब्दों में कहा जाए तो उत्पादन के साधनों में आमूल-चूल परिवर्तन ही औद्योगिक कांति है। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इस क्रांति ने मानव जगत् को ऐसी दिशा प्रदान कर दी, जिससे विश्व भर में स्वतंत्रता के मूल्यों का प्रतिपादन हुआ। 

एक प्रकार के श्रम और अर्जन के बीच सामंजस्य का दौर आरंभ हुआ। मानव दासता का एक प्रमुख कारण श्रम-मूल्यों की विषमता थी, जो औद्योगिक क्रांति के कारण सजग और व्यवस्थित होती गईं। यद्यपि औद्योगिक क्रांति का श्रेय विश्व के सबसे बड़े साम्राज्यवादी शासक ब्रिटेन को दिया जाता है, जिसने अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए इस क्रांति को प्रश्रय दिया, लेकिन वह इस पर एकाधिकार रखने में सफल नहीं हो सका। उपनिवेशवाद ने इस औद्योगिक क्रांति को अन्य शक्तिशाली राज्यों में भी अनिवार्य कर दिया और इसकी आवश्यकता ने फ्रांस, रूस, स्पेन, जर्मनी आदि को भी आकर्षित किया। 

औद्योगिक क्रांति के कारण 

यूरोपीय देशों में औद्योगिक क्रांति के बहुत से कारण थे। इनमें से मुख्य कारण यह थे-

1. स्पेन, पुर्तगाल, ब्रिटेन ने भौगोलिक खोजों में रुचि दिखाई थी, जिसके कारण विश्व को अनेक ऐसे स्थानों का ज्ञान हुआ, जो आर्थिक दृष्टि से संपन्न और राजनीतिक दृष्टि से शून्य थे। इनकी खोज से खोजी देशों में उपनिवेशी सिद्धांत को बढ़ावा मिला और फ्रांस, ब्रिटेन, स्पेन, हॉलैंड आदि देशों ने संसार के कोने-कोने में अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए। इसके जरिये साम्राज्यवादियों को आवागमन को सुलभ और सहज बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम उठाने थे। कच्चे माल को पक्के माल में बदलने के लिए साधनों की आवश्यकता हुई। इस प्रकार औद्योगिक क्रांति को बल मिला।

2.यूरोपीय देशों में परस्पर व्यापार बहुत तीव्र गति से बढ़ा था। लाभ भी बहुत अधिक था। उपनिवेशों में निर्यात से मनमाना मूल्य वसूला जा सकता था। इस स्थिति में उत्पादन कम पड़ रहा था, जबकि माँग बढ़ रही थी और लाभार्थी देशों को उत्पादन के लिए कुटीर उद्योगों पर निर्भर रहना पड़ रहा था। इससे उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर संयंत्रों की आवश्यकता महसूस हुई, जिसने औद्योगिक क्रांति को बढ़ावा दिया।

3.यूरोपीय देशों, विशेषकर इंग्लैंड में कृषि प्रणाली में बहुत परिवर्तन हो गया था। जमींदारी-प्रथा, बेगार-प्रथा, श्रम-मूल्यों में असमानता से परेशान अनेक किसानों और मजदूरों ने नगरों की ओर पलायन किया। विवशता ऐसी थी कि ये लोग कम वेतन पर भी काम करने को तैयार थे। सस्ते मजदूरों की इस उपलब्धता से अधिक उद्योग धंधों की स्थापना को प्रेरणा मिली।

4.इंग्लैंड ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त की थीं। साथ ही साथ भारी मशीनों के आविष्कारों से उत्पादन क्षमता में गति आई थी। इंग्लैंड में वैसे भी लौह-संपदा का प्राकृतिक भंडार था। लौह-उत्पाद औद्योगिक विकास की धुरी थे, इसलिए अब इनको आकार प्रदान करने के लिए जिस ऊर्जा की आवश्यकता थी, वह कोयले में देखी गई। इंग्लैंड में कोयले का प्रचुर भंडार था और उसके उपनिवेश भी कोयले से परिपूर्ण थे। इससे उत्साहित होकर इंग्लैंड में पूँजीपतियों ने कारखानों में धन व्यय किया।

5. बौद्धिक विकास ने औद्योगिक क्रांति को अविस्मरणीय रूप से वृद्धि दी। यूरोप में पुनर्जागरण और धर्म-सुधार आंदोलन के साथ ही बौद्धिक विकास का युग प्रारंभ हो गया था। बौद्धिक धर्म ने नए-नए आविष्कारों की दिशा में कदम बढ़ाए तो उनके देशों ने उनकी आर्थिक आवश्यकताओं पर पानी की तरह पैसा बहाया। इससे उत्साहित वैज्ञानिकों ने नई मशीनों, परिवहन के साधनों और कृषि उपकरणों के अतिरिक्त रोजमर्रा की वस्तुओं का आविष्कार करके औद्योगिक क्रांति की पृष्ठभूमि को सशक्त कर दिया।

6. इंग्लैंड में ही नहीं, अन्य यूरोपीय देशों में भी औद्योगिक क्रांति ने पैर पसार लिए थे। फ्रांस और बेल्जियम ने इस क्रांति में सर्वप्रथम रुचि दिखाई। 1948 में ऑस्ट्रिया और जर्मनी में सामंतवाद और दास-प्रथा का अंत हो जाने से व्यापार एवं उद्योग विकसित होने लगा। 19वीं सदी आते-आते सूमचे यूरोप में इस क्रांति ने अपना वर्चस्व बना लिया।

7. कच्चे माल की उपलब्धता ने यूरोप में वैश्विक बाजार के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर दिया था। कपड़ा उद्योग के साथ आवश्यक खनिजों की आवश्यकता ने आपसी व्यापार को समृद्ध कर दिया था। उपनिवेश दोहन का केंद्र बन गए थे। पश्चिम ने पूर्व से कच्चे माल की सहज प्राप्ति के लिए जलमार्गों का विस्तार किया तो इससे एक महान् ‘शिप क्रांति’ ने जन्म लिया, जो आगे चलकर विश्व की सबसे बड़ी और अनिवार्य व्यापार आवश्यकता बन गई। 

औद्योगिक क्रांति के आविष्कार

बौद्धिक विकास, आवश्यकताओं और पूँजी निवेश ने संसार को इस युग में जिन महत्त्वपूर्ण आविष्कारों को सौंपा, वे आज भी लाभ और व्यापार के केंद्रबिंदु बने हुए हैं। मुख्य आविष्कारों का वर्णन निम्न प्रकार है- 

1.फ्लाइंग शटल : सन् 1733 में अंग्रेज आविष्कारक ‘जॉन के’ ने फ्लाइंग शटल नाम की एक मशीन का आविष्कार करके कपड़ा उद्योग में अभूतपूर्व क्रांति लाने का कार्य किया। पहले जुलाहों पर निर्भरता ज्यादा थी और धीमी गति से कपड़े का उत्पादन होता था, लेकिन इस मशीन ने उत्पादन बढ़ा दिया और एक व्यक्ति कम समय में अधिक कपड़ा बुन सकने में समर्थ हुआ। 

2.स्पिनिंग जैनी : सन् 1765 में जेम्स हारग्रीव्ज ने सूत कातने के लिए एक नई मशीन का आविष्कार किया। पहले चरखों द्वारा धीमी गति से धागे का निर्माण होता था, पर स्पिनिंग जैनी अपने आठ तकुओं से इस गति को बढ़ाने और बुने सूत की मजबूती बढ़ाने में सहायक सिद्ध हुई। अब एक मशीन आठ आदमियों के बराबर सूत कातने में सक्षम थी और कपड़ा उद्योग निरंतर प्रगति कर रहा था। 

3.वाटरफ्रेम : वस्त्र उद्योग में सबसे बड़ी समस्या तैयार वस्त्रों की आयु कम होने की थी। इसका कारण सूत का कच्चा होना था। चरखे और स्पिनिंग जैनी भी इस समस्या को दूर नहीं कर सके थे। ऐसे में सन् 1769 में रिचर्ड आर्कराइट ने पक्का और मजबूत सूत कातने के लिए वाटरफ्रेम मशीन बनाई, जिसमें पद्धति से कच्चे सूत को पक्के सूत में बदलकर उत्पादन की आयु में वृद्धि करने में सफलता प्राप्त हुई। 

4.म्यूल : यह वारफ्रेम से और भी अधिक संशोधित मशीन थी, जो बारीक और बेहद मजबूत धागा बुन सकती थी। इसे सन् 1776 में क्रांपटन ने बनाया और इससे वस्त्र उद्योग में क्रांति आ गई। 

5.रेल-इंजन : सन् 1814 में जॉर्ज स्टीफेंसन ने रेल-इंजन का निर्माण करके औद्योगिक जगत् में अभूतपूर्व क्रांति लाने का कार्य किया। इस आविष्कार ने एक साथ अनेक उद्योगों को लाभ पहुँचाया। आयात-निर्यात में इस आविष्कार ने तेजी ला दी। एक साथ हजारों-लाखों टन कच्चा या तैयार माल पहुँचाने में सुविधा होने से उत्पादन में भारी उछाल आया। 

History of Industrial Revolution

अन्य आविष्कार 

कपास को साफ करके कातने योग्य बनाना एक कठिन और समय लेनेवाला काम था, जो वस्त्र-उद्योग की गति को बाधित करता था। ऐसे में सन् 1792 में एली व्हिटन नाम के वैज्ञानिक ने ‘जिन’ नाम की मशीन बनाकर वस्त्र-उद्योग को गति प्रदान कर दी। यह मशीन प्रतिदिन 1,000 पौंड कपास को साफ कर सकती थी। इसी के साथ सन् 1846 में एलियास ने सिलाई मशीन का आविष्कार करके वस्त्र-उद्योग में एक और नई क्रांति ला दी। पक्की सड़कों का निर्माण करने की विधि मैकडम नामक विद्वान् ने खोजी। 

सन् 1761 में विट्रले नामक इंजीनियर ने मैनचेस्टर से बर्सले तक नहर बनाकर जल-ऊर्जा को नई दिशा दी। परिवहन को इच्छानुसार जलमार्ग देने की दिशा में यह महत्त्वपूर्ण कदम था। सन् 1808 में नावों पर निर्भरता कम हुई, क्योंकि समुद्री जहाज अस्तित्व में आ गया। इन सबके अतिरिक्त जो महत्त्वपूर्ण आविष्कार हुए उनमें संचार साधनों को मुख्य कहा जा सकता है। 

सन् 1835 में वैज्ञानिक मार्स ने तार भेजने की तकनीक विकसित की और सन् 1840 में डाकसेवा का प्रचलन आधिकारिक हुआ। सन् 1876 में ग्राहम बेल ने टेलीफोन का आविष्कार करके विश्व को एक नई शक्ति व दिशा प्रदान की। 

औद्योगिक क्रांति के प्रभाव 

इस क्रांति के मानव समाज के सभी क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव डाला। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं कृषि क्षेत्र में अनेक क्रांतिकारी परिवर्तन हुए, जिन्हें निम्नलिखित विश्लेषण से स्पष्ट समझा जा सकता है 

1.सामाजिक प्रभाव : औद्योगिक क्रांति ने उद्योग और व्यापार की वृद्धि कर नगरीकरण को बढ़ावा दिया। ग्रामीण क्षेत्रों से रोजगार की खोज में पलायन बढ़ गया और जनसंपर्क की परस्परता बढ़ गई। इससे एक नए वर्ग का उदय हुआ, जिसे शिक्षित मजदूर वर्ग कहा गया। यह वर्ग केवल श्रम में समय नहीं बिताता था, अपितु विचारों के आदान-प्रदान को भी महत्त्व देता था। इससे बौद्धिक वर्ग का निर्माण हुआ। दूसरी ओर इस औद्योगिक क्रांति ने कुछ दुष्प्रभाव भी डाले थे। नैतिक मूल्यों का पतन, पारिवारिक विघटन, स्त्री-शोषण, श्रम-शोषण आदि कई ऐसे दुष्प्रभाव रहे, जिनसे सामाजिक संतुलन अव्यवस्थित हुआ। मिल मलिकों के रूप में जमींदारों और सामंतों का यह पुनर्जन्म था, जबकि जनसाधारण की दशा में आंशिक सुधार ही हुए थे। 

2.आर्थिक प्रभाव : आर्थिक दृष्टिकोण से औद्योगिक क्रांति ने विश्व भर को संतुष्ट किया था। मशीनों के आविष्कार ने उत्पादन क्षमता में वृद्धि कर दी थी। उत्पादन की अधिकता ने व्यापार और लाभ को भी गति दी, जिससे नए प्रकार के पूँजीवाद का जन्म हुआ। उद्योगपति अब और भी धनी होने लगे थे, जिससे समाज में विलास और वैभव बढ़ गया। आयवृद्धि से श्रमिक वर्ग भी अपनी स्थिति में सुधार को महसूस करने लगा

संपूर्ण विश्व में समाजवाद का उदय हो चला। शासन व प्रशासन में पूँजीपतियों का दबदबा बढ़ने लगा, जो धन के बल पर वोट खरीदकर संसद में पहुंचने लगे। इस आर्थिक क्रांति ने भी अपने कुछ दुष्प्रभाव छोड़े, जिनमें वर्ग-भेद मुख्य रहे। श्रमिक व पूँजीपति नाम के दो वर्ग परस्पर संघर्ष की स्थिति में आ गए थे। जहाँ श्रमिक को अपने श्रम का उचित मूल्य नहीं मिल रहा था, वहीं पूँजीपति अधिक लाभ कमा रहे थे। इसी लाभ-प्रवृत्ति को निष्कंटक रखने के लिए पूँजीपतियों ने एक नए दास-वर्ग का निर्माण किया। इस नए वर्ग में वैसे आपराधिक लोग थे, जो पूँजीपतियों के लिए ढाल व तलवार का कार्य करते थे। श्रमिकों के विरोध को दबाने में यह वैतनिक दास बहुत कारगर सिद्ध होते थे। 

3.राजनीतिक प्रभाव : औद्योगिक क्रांति ने राजनीति को बहुत अधिक प्रभावित किया। अभी तक जनसाधारण को शासन या राजनीति से कोई विशेष लगाव नहीं था, लेकिन परस्पर विचारधाराओं के आदान-प्रदान से मजदूर वर्ग में राजनीतिक चर्चा आम हो चली थी। नगरीय सभ्यता में यह राजनीतिक प्रभाव और भी अधिक देखने को मिला। नगर-प्रशासन में राजनीतिक पदों का सृजन हुआ और इन्हीं स्थानों से मजदूर वर्ग से राजनेता निकले। पूँजीपति भी अब धन के म राजनीति में पहुँच बनाने लगे थे। इसका कुप्रभाव यह रहा कि पूँजीपतियों ने शासकीय विधानों का आश्रय लेकर श्रमिक वर्ग को शोषित करना आरंभ कर दिया। उन्होंने अपने हितों की रक्षा करने के लिए राजनीतिक प्रभावों का दुरुपयोग करने में भी हिचकिचाहट न दिखाई। 

4.कृषिक प्रभाव : कृषि के क्षेत्र में कई क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। अधिक अन्न के उत्पादन की दिशा में व्यापक प्रयास किए गए। खेती करने की पारंपरिक और कठिन शैली में नए कृषि यंत्रों ने नवीनता और सुगमता भर दी। फसल बोने और काटने के साधनों के साथ-साथ सिंचाई के साधनों में भी नवीनता आई। इसके पश्चात् भूमि सुधार कानूनों ने हदबंदी और चकबंदी से कृषि को व्यवस्थित किया। टुकड़ों में भूमि होने से कृषि-कार्यों में कठिनाई होती थी, जो चकबंदी के द्वारा भूमि को एक स्थान पर व्यवस्थित कर देने से दूर हो गई। 

कृषि के उत्पादन में इससे पहले जल पर निर्भरता नए उर्वरकों के प्रयोग से कम होती गई। इससे उत्पादन में वृद्धि हुई। फसल को कीटों के प्रभाव से बचाने के लिए कीटनाशकों का प्रयोग हुआ और तकनीकी कृषि का विकास हुआ। फसलों में अनुकूल मौसम के अनुसार विविधता लाई गई। चक्र के अनुसार फसलें बोई जाने लगीं, जिससे भूमि का दोहन अधिक होने से उत्पादन में वृद्धि हुई। इस क्षेत्र में भी कुप्रभाव देखने को मिले। चकबंदी ने भूस्वामियों को अधिक आश्वस्त कर दिया था, जबकि भूमिहीनों की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई थी। 

इनके अतिरिक्त औद्योगिक क्रांति ने धार्मिक क्षेत्र में भी प्रभाव दिखाया। समाज में धार्मिक मूल्यों, विश्वासों और धार्मिक मान्यताओं में कई परिवर्तन हुए। उत्पादन सुगम और लाभ अधिक होने से मानवीय इच्छाएँ भी पंखों पर सवार हो गईं। आवश्यकताओं ने पैर पसारे और उसी अनुपात में आविष्कारों में भी वृद्धि हुई। भौतिकवाद को बढ़ावा मिला और धन के आधार पर व्यक्ति का मूल्यांकन आरंभ हुआ। आत्मा-परमात्मा में अनास्था का वातावरण पैदा होने लगा और धर्म को व्यापार बनाया जाने लगा। 

उपर्युक्त प्रभाव और कुप्रभावों के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो इस औद्योगिक क्रांति ने विश्व में सजगता और अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता का भाव जाग्रत् करके शोषित वर्गों में एकता के महत्त्व और प्रयोग की बात सिखाई। भविष्य में जितनी भी क्रांतियाँ हुईं, उनमें से अधिकतर क्रांतियों के पीछे श्रमिक-संघर्ष रहा। 

यह संघर्ष स्पष्ट करता है कि उद्योग-धंधों में असमानता और शोषण सदैव से उपजता रहा है। औद्योगिक क्रांति के आविष्कारों ने शस्त्र-प्रणाली का विकास किया, जो कालांतर में क्रांतियों में प्रयोग हुए। 

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि यदि आधुनिक विश्व क्रांतियों की देन है तो वे क्रांतियाँ औद्योगिक क्रांति की आधारशिला पर खड़ी हुई हैं। औद्योगिक आविष्कारों ने मानव-जगत् को लाभ-हानि, अधिकार व कर्तव्यों का जो पाठ पढ़ाया, उनसे ही विश्व का भविष्य निर्मित होने लगा था।

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

nineteen + eleven =