गोरखा युद्ध का इतिहास | History of Gurkha War

गोरखा युद्ध का इतिहास

गोरखा युद्ध (Battle of Gurkha) (1814-16 ई०) 

गोरखों ने 1768 में नेपाल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था, जो हिमालय की गोद में स्थित है। गोरखे बड़े ही वीर, साहसी और रणकुशल होते हैं। इन लोगों ने बड़ी तेजी के साथ अपने राज्य का विस्तार करना आरम्भ कर दिया। 

सन् 1801 ई० में जब अंग्रेजों ने गोरखपुर का जिला अवध के नवाब से जीता तब कम्पनी राज्य की सीमा नेपाल राज्य की सीमा को स्पर्श करने लगी। यहीं से उसे गोरखों से युद्ध करने का बहाना मिलना शुरू हो गया। 

गोरखा युद्ध

लार्ड मिंटों के शासन काल में गोरखों ने शिवराज और बुटवल नामक स्थानों पर बढ़कर अपना अधिकार कर लिया। लार्ड मिन्टों के जाने के बाद लार्ड वारेन हेस्टिंग्स भारत का गवर्नर जनरल बनकर आया तो उसने एक सेना भेजकर शिवराज और बुटवल को पुनः अंग्रेजों के अधिकार में ले लिया। 

हेस्टिंग्स के ऐसा करते ही गोरखों के क्रोध की सीमा न रही। उन्होंने कम्पनी के राज्य पर आक्रमण कर दिया। 

लार्ड हेस्टिंग्स ने 1814 में गोरखों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करते हुए चार सैनिक कम्पनियां, चार योग्यतम् सेना अध्यक्षों के साथ नेपाल में उतार दीं। 

गोरखे छापामार रणनीति का अनुसरण कर पूरी वीरता से युद्ध भूमि में उतरे। उन्होंने अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। 

परन्तु अंग्रेज सेनापति आक्टर लोनी के निर्देश में अंग्रेज सेना बड़ी तेजी से नेपाल में प्रवेश करती चली गयी। 1815 ई० में गोरखों के सेनापति अमरसिंह ने उस बढ़ती सेना के साथ पराक्रम के साथ युद्ध करते हुए उसे न केवल नेपाल की सीमा से बाहर खदेड़ दिया बल्कि मलाव के प्रसिद्ध दुर्ग पर अपना अधिकार कर लिया जो उस समय अंग्रेजों के अधिकार में था। पर पीछे से आयी अंग्रेजों की शेष तीन ओर से आयी सेनाओं ने घेराव कर अपना दुर्ग छीन लिया। साथ ही युद्ध में नेपाली सेनापति अमरसिंह को बुरी तरह पराजित किया। इस पराजय से गोरखों का उत्साह भंग हो गया। 

अंग्रेजों की निगाहों में गोरखों की युद्ध करने की शौर्य शक्ति जंच गयी थी। उन्होंने गोरखों से सन्धि कर उनसे लाभ उठाने की योजना बनी ली। 

हारी हुई गोरखा सेना तीन ओर से फंस गयी थी। उनके सामने सन्धि का प्रस्ताव अंग्रेजों ने रखा तो उन्होंने सहजता से स्वीकार कर लिया। 

अंग्रेजों और गोरखों की यह संधि ‘सिगौली संधि’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह सन्धि मार्च, 1816 ई० को सिंगौली नामक स्थान पर हुई। इस संधि द्वारा गोरखों ने तराई का सारा प्रदेश और कुमायूं तथा गढ़वाल के जिले अंग्रेजों को दे दिए। गोरखों को अनुमति दी गयी कि वे काठमांडू को नेपाल की राजधानी के रूप में अपने पास रखें; परन्तु वहां एक अंग्रेजी रेजीमेन्ट भी साथ में रखी जाए। इस रेजीमेन्ट के मामले में अंग्रेजों ने वचनबद्धता दी कि यह रेजीमेन्ट गोरखों के आन्तरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप न करेगी; अलबत्ता यदि अन्य कोई विदेशी नेपाल पर आक्रमण करता है तो यह रेजीमेन्ट उससे उनकी रक्षा करेगी। 

गोरखों से यह वचन बद्धता ली गयी कि वे उनकी अनुमति के बगैर किसी यूरोपवासी को अपने यहां नौकर न रखेंगे।

सिंगौली सन्धि का महत्त्व 

सिंगौली की संधि का अंग्रेजों के साम्राज्य विस्तार तथा उनके आगे के युद्ध इतिहास में अत्यन्त महत्त्व है। इससे कम्पनी के राज्य की सीमा हिमालय पर्वत तक पहुंच गयी। प्राकृतिक सीमा हो जाने के कारण आगे सीमा सम्बन्धी विवाद की सम्भावना नहीं रही। दूसरा लाभ यह हुआ कि शिमला, नैनीताल, अल्मोड़ा, रानीखेत आदि पर्वतीय स्टेशन अंग्रेजों के लिए बेहद कारगर सिद्ध हुए। 

कम्पनी को तीसरा लाभ यह हुआ कि नेपाल सरकार से मैत्री सम्बन्ध स्थापित हो जाने के कारण गोरखा सैनिकों की सेवाएं अंग्रेजों को मिलने लगीं। अंग्रेजों ने गोरखों का विश्वास और महत्व बढ़ाने के लिए अलग से गोरखा रेजीमेन्ट खड़ी की। जिसमें सिर्फ गोरखा सैनिक ही भर्ती किए जाते थे। ये गोरखा रेजीमेन्ट आने वाले समय में, जगह-जगह ब्रिटिशों के कब्जे के समय अंग्रेजों की ओर से युद्ध में उतरकर अंग्रेजों के लिए लाभकारी सिद्ध होती रही।

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