क्रीमिया युद्ध का इतिहास | History of Crimean War

क्रीमिया युद्ध का इतिहास

क्रीमिया युद्ध का इतिहास | History of Crimean War (1853-1856 ई०) 

क्रीमिया का युद्ध एक प्रकार से फ्रांस द्वारा रूस को नीचा दिखाने के लिए उत्पन्न किया गया युद्ध था। फ्रांस 1814-15 ई० में रूस द्वारा पूरी तरह पराजित हो चुका था। 

सन् 1851 ई० में फ्रांस का सम्राट नेपोलियन तृतीय बना तो उसने अपनी सत्ता बनाए रखने, फ्रांस की जनता में लोकप्रिय बने रहने के लिए तथा रूस को नीचा दिखाने के लिए क्रीमिया युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की। उसने रोमनपादरियों का पक्ष लेते हुए जेरूसलम में उनके अतिक्रमणित अधिकारों को लौटाने की मांग की। 

यहां ध्यान देने योग्य विशेष बात यह है कि जेरूसलम विश्व की एक ऐसी धरती है जिसे तीन धर्मों के लोग पवित्र मानते हैं। ये धर्म हैं-ईसाई, यहूदी और मुसलमान। 

जेरूसलम पर कब्जे को लेकर समय-समय पर इन तीनों धर्मों के बीच बड़े-बड़े युद्ध जन्म लेते रहे हैं। जेरूसलम पर कभी किसी का अधिकार रहा, तो कभी किसी का। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जेरूसलम ब्रिटिश राज्य के आधीन था, ब्रिटिशों ने समझौते के तहत जेरूसलम को यहूदी धर्मावलम्बियों को पूरी तरह से दे दिया। इस तरह वहां यहूदी राज्य बना। संसार भर में फैले बेवतन यहूदी जेरूसलम पहुंचकर उसे अपने राज्य के रूप में इस्तेमाल करने लगे। वर्तमान में जेरूसलम यहूदियों का विश्व में एकमात्र देश है। 

जेरूसलम के बारे में इस स्थिति की जानकारी के बाद आइए, जेरूसलम को लेकर हुए क्रीमिया युद्ध विषय पर आते हैं। नेपोलियन तृतीय ने रोमन पादरियों का पक्ष लेते हुए टर्की के सुल्तान पर दबाव डाला कि वह जेरूसलम पर रोमन पादरियों का अधिकार दिलाने की उचित कार्यवाही करे-टर्की के सुल्तान पर ऐसा दवाब डालने की वजह यह थी कि उस समय जेरूसलम टर्की साम्राज्य के अन्तर्गत ही पड़ता था।

जब टर्की के सुल्तान ने रोमन पादरियों को उनके अधिकारों को दिलाने की पहल की तो जैसा कि नेपोलियन तृतीय की पूर्व से धारणा थी; तो रूस ने इस मामले में हस्तक्षेप किया। रूस की मांग थी कि ग्रीक पादरियों के अधिकारों में कोई कटौती न की जाए तथा सुल्तान अपनी सारी ईसाई प्रजा का संरक्षक रूसी जार को मान ले। 

इस मामले में इंग्लैण्ड भी कूद पड़ा। कान्सटैण्टिमोपुल नामक स्थान पर ब्रिटेन के राजदूत ने टर्की के सुल्तान को सलाह दी कि वह रूसी मांगों को अस्वीकार कर दे। 

क्रीमिया युद्ध

ब्रिटेन का प्रोत्साहन पाकर टर्की ने रूसी मांगों को अस्वीकृत कर दिया। इस पर रूस ने टर्की पर आक्रमण कर दिया। टर्की का पक्ष लेते हुए ब्रिटेन और फ्रांस जो एक ही पक्ष रखते थे, और उनके कारण ही टर्की के सुल्तान ने रूस की मांग अस्वीकार की थी-वे रूस के विरुद्ध युद्ध में कूद पड़े। 

विश्व प्रसिद्ध क्रीमिया का युद्ध 1853 ई० में क्रीमिया की धरती पर लड़ा गया। 

युद्ध शुरू होते ही एक छोटा-सा इटालवी राज्य सार्डेनिया भी फ्रांस का पक्ष लेते हुए युद्ध में कूद पड़ा। सानिया का प्रधानमंत्री काबूर नेपोलियन तृतीय की मदद करके उसकी निगाह में रहना चाहता था ताकि बाद में नेपोलियन तृतीय से इटली के एकीकरण में उसे मदद मिल सके। 

एक अन्य राज्य आस्ट्रिया, जो कि रूस के गुट में था, उसने रूस को धमकी दी कि यदि उसकी मांगें नहीं मानी गयीं तो वह भी रूस के विरुद्ध युद्ध में शामिल हो जाएगा। रूस ने आस्ट्रिया की मांगें तुरन्त मान लीं-जबकि वह रूस के एकदम पड़ोस में एक कमजोर देश था। उस पर से रूस की छत्रछाया हटते ही जर्मनी सबसे पहले उस पर अधिकार करने को तैयार बैठा था। 

सन् 1853 से शुरू होकर 1856 ई०, तीन वर्षों तक रूस के विरुद्ध फ्रांस, ब्रिटेन, उनके गुट के सदस्यों तथा टर्की की सेनाओं के सहयोग से रूस के विरुद्ध जबरदस्त युद्ध चलता रहा। इस युद्ध में रूस को एक के बाद एक मोर्चे पर जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा। उसने टर्की के अधिकारों के मामले में जबरदस्ती फ्रांस और ब्रिटेन के विरुद्ध अकारण अपनी दखलअंदाजी की थी; जिसका फल उसे भारी जान-माल हानि से चुकाना पड़ा।

युद्ध का परिणाम 

इस युद्ध का अन्त ‘पेरिस संधि’ से हुआ। 

इस संधि के द्वारा सभी योरोपीय शक्तियों में ओटोमन साम्राज्य (टर्की और उसके आस-पास के राज्यों) की अखण्डता बनाए रखने का वादा किया। यह भी तय किया गया कि किसी भी देश को सुल्तान और उसकी ईसाई प्रजा के बीच हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होगा। 

सुल्तान ने अपनी प्रजा के लिए एक बेहतर शासन प्रबन्ध का जिम्मा लिया। उपरोक्त विषय योरोपीय राज्यों पर पाबन्दी के रूप में थे। रूस के हमला करने के विरोध में जो परिणाम गए वे थे 

रूस का कुछ क्षेत्र माल्डेविया को प्राप्त हुआ। बाद में माल्डेविया और बैलेविया को मिलाकर रूमानिया का राज्य निर्मित हुआ। 

सर्बिया को स्वशासन का अधिकार मिला-यह राज्य भी रूस के हाथ से निकल गया। 

काला सागर, जिसके दो जलडमरूमध्यों पर रूस दशकों से निगाहें गड़ाए हुए था, उन क्षेत्रों को तटस्थ घोषित कर दिया गया। काला सागर में रूसी युद्धपोत रखने पर पाबन्दी लगा दी गयी। इन सभी देशों की व्यापारिक जहाजों के लिए उन्मुक्त घोषित कर दिया गया। 

इस युद्ध से रूस की विस्तारवादी नीति पर अंकुश लग गया। इस युद्ध में पराजय मिलने से रूस को अपमानित होना पड़ा-नेपोलियन ततीय की योजना पूरी तरह कारगर रही। उसने रूस से 1814-15 में फ्रांस की मिली अपमानजनक हार का जैसा बदला चाहा था, ठीक उसी रूप में लेकर, खुद को फ्रांस के नागरिकों में सम्मानित बना लिया। उसकी शोहरत यूरोप भर में फैल गयी। 

इस युद्ध से ब्रिटेन को कोई भी लाभ नहीं हो सका। इस युद्ध में इंग्लैण्ड के 60,000 सैनिक मारे गए। उस पर राष्ट्रीय कर्ज का भारी बोझ बढ़ गया। 

नेपोलियन तृतीय ने स्वयं को कैथोलिक चर्च का एक महान संरक्षक प्रमाणित कर दिया था। जिसके परिणामस्वरूप फ्रांस में उसकी स्थिति काफी मजबूत हो गयी थी। 

इटालवी राज्य सार्डेनिया को युद्ध से ठोस फायदे हुए। काबूर को वह अवसर मिला, जिसकी उसने उम्मीद की थी। उसे पेरिस सम्मेलन में महाशक्तियों के साथ बैठक करने और अपना निर्णय देने के लिए आमंत्रित किया गया था-जो उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। उसे नेपोलियन तृतीय की सदिच्छा प्राप्त हो गयी थी जिसके कारण आगे चलकर उसके द्वारा इटली के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

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