बाक्सर विद्रोह का इतिहास |History of Boxer Rebellion

बाक्सर विद्रोह का इतिहास

बाक्सर विद्रोह का इतिहास |History of Boxer Rebellion (1889 ई० )

बाक्सर युद्ध चीन की धरती पर 1889 ई० में चीन के शान्टंग नगर से प्रारम्भ हुआ। इस युद्ध में पाश्चात्य देशों की एक संयुक्त सेना संगठित हुई थी-जिसमें रूसी, ब्रिटिश, जापानी, और अमेरिकी सैनिक शामिल हुए थे। इस सेना ने चीन के समुन्द्री तट पर गोले बरसाकर अनेक स्थानों पर अधिकार कर लिया। इस संघर्ष में कई हजार चीनी सैनिक मारे गए। 

अन्नतः तीन्तसिन पर विजय प्राप्त करके विदेशी सेना ने चीन की राजधानी पीकिंग की ओर अपना रुख किया। चीन की इस राजधानी की सुरक्षा के लिए की गयी किलेबन्दी को भंग कर विदेशी सेना ने दूतावासों को ही आजाद नहीं करा लिया अपितु पीकिंग में लूटमार भी की। चीन की सामाज्ञी, राजमाता त्जू-शी ने जेहोल नामक स्थान पर जाकर शरण ली। 

इस तरह विदेशी शक्तियों द्वारा चीन पर किए गए इस युद्ध ने चीन को विघटन की कगार पर ला खड़ा किया। चीन पर संयुक्त आक्रमण करने वाले उपरोक्त देशों में चीन का टुकड़े-टुकड़े करके आपस में बांट लिया होता, परन्तु उनके साथ रूसी और जापानी भी शामिल थे-रूस और जापान में सर्वप्रथम बस्ती तौर पर समझौता करके दो अन्य शक्तिशाली देशों-ब्रिटेन और अमेरिका को इस बात से रोका कि चीन के टुकड़े न होने पाए। 

इस विषय में रूस और जापान के अपने स्वार्थ थे-उन दोनों की ही निगाहें चीन और कोरिया पर जमी हुईं थीं। दोनों ही चाहते थे कि जैसी भी हो चीन और कोरिया की छीना-झपटी कर वह खुद कर सकें-इसमें ब्रिटेन और अमेरिका की बन्दर बांट करके वे आगे के लिए उनका प्रभुत्व अपने समुन्द्री क्षेत्र में नहीं बढ़ाने देना चाहते थे। रूस और जापान के न चाहने के फलस्वरूप ब्रिटेन और अमेरिका को वहां से वापस जाना पड़ा। इस तरह चीन बंटने से बच गया।

बाक्सर युद्ध विश्व के युद्ध इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना है। यह युद्ध चीन में विद्रोह के रूप में भड़का था, जिसने युद्ध का रूप लेकर पूरे चीन के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया था। इस विद्रोह के कुछ प्रभत्व जिस ढग बना रही थी। विदशिया 

बाक्सर विद्रोह का कारण और विद्रोह का आरम्भ 

बाक्सर विद्रोह का कारण

चीन के इतिहास में बॉक्सर विद्रोह का एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसे ‘मुक्केबाजों का विद्रोह’ (Boxing Uprising) भी कहा जाता है। इस विद्रोह का आरम्भ चीन में विदेशियों के बढ़ते हुए प्रभुत्व, मंचू शासकों की अयोग्यता, ईसाई धर्म प्रचारकों का अपमानजनक व्यवहार एवं चीनियों का स्वाभिमान आदि ऐसे कारण थे, जिन्होंने इस विद्रोह को जन्म दिया। वस्तुतः बाक्सर विद्रोह चीन की जागृति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी। 

इस विद्रोह के कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार थे-

(i) चीन में विदेशियों का प्रभुत्व जिस ढंग से बढ़ रहा था उसके कारण विविध देश भक्तों में सुधार की इच्छा बलवती होती जा रही थी। विदेशियों के लिए चीनियों के हृदय में घृणा और प्रतिकार की भावना दिनों-दिन बढ़ती जा रही थी।

(ii) पाश्चात्य देशों के प्रति चीन का विश्वास समाप्त हो जाने के कारण चीनी शासिकों ने जापान से एक नवीन संधि करनी चाही थी-उसे लेकर भी युवाओं में असंतोष था। वे जापान के बजाय रूस से संधि के पक्ष में थे।

(iii) अफीम युद्ध के बाद ब्रिटेन को क्षतिपूर्ति की रकम देते-देते चीन की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर हो गयी थी। देश में बेरोजगारी बढ़ गयी थी तथा चीनी नवजवानों में इस बात के लिए जबरदस्त रोष था कि चीन को कमजोर पाकर आर्थिक क्षति लादी गयी है-जबकि होना यह चाहिए था कि ब्रिटेन चीन से माफी मांगता।

(iv) अफीम युद्ध के बाद ब्रिटिश ने अपने पैर चीन में पूरी तरह फैला लिए थे। चीनी कब्जे वाले तथा स्वतन्त्र स्थानों पर ब्रिटिश धर्म प्रचारक आ-आकर खुलेआम ईसाइ मत का धर्म प्रचार कर, लोगों को ईसाई बनाने लगे थे। अमेरिका पादरी भी वहां आकर खुलेआम ईसाई मत का प्रचार करने लगे थे। चीन बौद्ध धर्म अनुयायी था-चीनी युवाओं को गले ईसाई धर्म की शिक्षाएं न उतर रही थीं।

 बाक्सर विद्रोह का आरम्भ 

बाक्सर विद्रोह का आरम्भ 

चीन के अनेक देश भक्त इस विद्वेषपूर्ण भावना के कारण अपने देश से ईसाइयों को निकाल बाहर करने के लिए कटिबद्ध थे। इसके लिए उन्होंने कई ऐसी संस्थाओं की स्थापना कर ली थी जो विदेशियों की कट्टर विरोधी थीं। 

इसमें लाओ हुयी (भाइयों और वृद्धों का समाज) लाओ हुई (बड़ी तलवार वालों का समाज) आदि प्रमुख संस्थाएं थीं। ई-हो-हुआन (पवित्र और संगठित मुक्केबाज समाज) ने अपनी शक्ति का विकास और प्रदर्शन करके लोगों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। धीरे-धीरे इस दल का प्रभाव बढ़ता गया और अंत में ‘बाक्सर विद्रोह के रूप में इसका प्रस्फुटन हुआ। चीन की भूमि पर उभरे बाक्सर विद्रोह संगठन ने 1889 ई० के दिन दिवस को ‘शान्टुंग नगर’ में विशाल रैली आयोजित करके नारा दिया-‘विदेशियों का नाश करो।’ ‘मंचू शासकों को हटाओ।’ 

इस विशाल रैली में चीन का युवा वर्ग पूरे उत्साह से शामिल हुआ था। उपरोक्त दोनों नारों के साथ, रैली में सम्मिलित युवा ईसाई पादरियों पर टूट पड़े। उनके सामने जो-जो पादरी आता गया, उसकी हत्या करते चले गए। 

शान्टुना नगर में ही नहीं, बल्कि पूरे चीन में देखते ही देखते यह आग भड़कती चली गयी। गिरजाघरों को जलाया जाने लगा। यातायात के साधनों को नुकसान पहुंचाया जाने लगा। 

बाक्सर संगठन के युवकों के क्रोध का फायदा उठाते हुए चीन की सामाज्ञी ने युवाओं को अपना समर्थन और प्रोत्साहन दे दिया। 

सामज्ञी का प्रोत्साहन पाते ही बाक्सर विद्रोहियों की गतिविधियों में और भी तेजी आ गयी। उसके बाद पादरियों के साथ-साथ ईसाइयों की सामूहिक हत्याएं की जाने लगीं। दूतावासों पर आक्रमण करके, वहां मार-काट मचायी जाने लगी और दूतावासों में आग लगाए जाने की वारदातें होने लगीं। 

दूतावासों द्वारा अपने-अपने देशों को सूचनाएं भेजी गयीं। विषय अत्यन्त गम्भीर था-ईसाई धर्म पर संकट आ गया था, अतः अमेरिका, रूस, ब्रिटेन के जहाजी बेड़े एक साथ दौड़ पड़े। जापान भी चीन में सिमट आया।। 

चीन के बन्दरगाहों को चारों ओर से घेरकर इस बात की चेतावनी दी गयी कि 24 घण्टे के अन्दर विद्रोही चीन की धरती से बाहर चले जाएं वरना सैनिक कार्यवाही का सामना करने को तैयार हो जाएं। 

उस समय जो स्थिति विद्रोहियों ने पैदा कर रखी थी, उसमें मंचू सरकार यह विश्वास करती थी कि देश के युवा अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल रहेंगे-इसलिए उसने भी खुलकर उनका साथ दिया। 

विद्रोहियों ने बेशक चीन की धरती से ईसाइयत को उखाड़ फेंका था, परन्तु इसका खामियाजा पचासों हजार युवाओं को अपने प्राणों की आहुति देकर चुकाना पड़ा। 

चार-चार देशों की सैनिक कार्यवाही ने अन्तिम विद्रोही तक को मौत के घाट उतार, चीन में शान्ति की बहाली की।

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