आंग्ल-सिक्ख युद्ध का इतिहास | History of Anglo-Sikh War

आंग्ल-सिक्ख युद्ध का इतिहास

आंग्ल-सिक्ख युद्ध का इतिहास | History of Anglo-Sikh War(1845-1846 ई०) 

अंग्रेजों और सिक्खों के युद्ध के परिप्रेक्ष्य में सिक्खों के साम्राज्य और शासन के बारे में जानकारी लेनी आवश्यक है।

राजा रणजीत सिंह का सिक्ख राज्य विस्तार 

अफगानिस्तान के शासक अहमद शाह दुर्रानी के शासन काल से ही पंजाब, अफगानों के अधीन था। अहमद शाह दुर्रानी के बाद उनके उत्तराधिकारी कमजोर साबित हुए तो पंजाब के इलाके में सिक्ख मिस्लों (जातीय संगठन) ने अपनी शक्ति धीरे-धीरे बढ़ा ली। सन् 1791 ई० में महाराजा रणजीत सिंह उन्हीं मिस्लों में सुकर चकिया मिसल का प्रधान बने। सन् 1797 ई० में अफगानिस्तान के शासक शाह जमान शाह ने महाराजा रणजीत सिंह के महत्व को स्वीकार करते हुए, उन्हें लाहौर का गवर्नर बना दिया। इससे रणजीत सिंह को अपनी प्रभुता बढ़ाने का अवसर मिल गया। 

रणजीत सिंह ने सतलज नदी के पूर्व की ओर अपने राज्य का विस्तार करना आरम्भ किया, तब अंग्रेजों ने उनके प्रभाव को माना। 

1809 में लार्ड मिन्टों में रणजीत सिंह से मैत्रीपूर्ण संधि की। इस संधि में यह तय किया गया कि रणजीत सिंह सतलज से पूर्व में अपने राज्य का विस्तार न करेंगे तथा अंग्रेज सिक्ख राज्यों पर आक्रमण न करेंगे। 

अंग्रेजों से मैत्री के बाद रणजीत सिंह ने नेपाल की ओर ध्यान दिया। 1811 ई० में कांगड़ा विजय की। अफगानों से युद्ध किया। 1818 ई० में मुल्तान पर अधिकार कर लिया, पेशावर को अपने राज्य में मिला लिया। 

सन् 1831 ई० में सतलज नदी के किनारे रूपड़ नामक स्थान पर एक दरबार में अंग्रेजों ने रणजीत सिंह का स्वागत किया। मैत्रीपूर्ण संधि को आगे बढ़ाया। इस संधि से अंग्रेजों को सिन्ध नदी के मार्ग का अधिकार प्राप्त हो गया और रणजीत सिंह ने सन्धि के अमीरों पर अपना दावा मान लिया। 

महाराज रणजीत सिंह ने राखी और चिनाव के प्रदेशों का प्रशासन सम्भाला। अमृतसर और जम्मू पर अधिकार कर लिया। पंजाब की राजधानी लाहौर और धार्मिक राजधानी अमृतसर बनायी। मुल्तान और कश्मीर पर अधिकार किया। 

7 जून, 1839 ई० में महाराजा रणजीत का निधन हुआ फ्रांसीसी पर्यटक मिस्टर जामाण्ट ने रणजीत सिंह की तुलना नेपोलियन बोनापार्ट से की है। 

रणजीत सिंह के निधन के बाद उनका पुत्र खड़गसिंह 1839 ई० में सिंहासनासीन हुआ। पर, रणजीत सिंह के निधन के बाद परिस्थिति बिल्कुल बदल गयी। अब राज्य की सारी शक्ति खालसा या सिक्ख सेना के हाथ में चली गयी और वह अपनी पंचायतों द्वारा नाम-मात्र के शासकों को सिंहासन पर बैठाकर स्वयं शासन करने लगे। 1845 ई० में सेना ने पांच साल के बालक दिलीप सिंह को सिंहासन पर बिठा दिया। रानी झिन्दन को उसकी संरक्षिका बना दिया। 

लालसिंह, जो की रानी का कृपा-पात्र था, मंत्री का काम करने लगा। 

रानी महत्वाकांक्षी थीं। वे कठपुतली शासन से मुक्त होना चाहती थी। ऐसे समय में अंग्रेजों की ओर से युद्ध का खतरा मंडरा आया। दिसम्बर, 1845 ई० में सिक्ख सेना ने सतलज नदी पार की और कपम्नी के राज्य पर आक्रमण कर दिया। 

ह्यूडाफ ब्रिटिश सेना का सेनापति था। अंग्रेजों और सिक्खों का प्रथम संघर्ष फीरोजपुर के निकट मुटकी नामक स्थान पर हुआ। इस युद्ध के प्रारम्भ में सिक्ख सेना ने बड़ी सफलता से युद्ध किया। पर कुछ लोगों के विश्वासघात के कारण अंग्रेज विजयी हुए। दूसरा संघर्ष 31 दिसम्बर, 1845 ई० को फीरोज शाह नामक स्थान पर हुआ। इस युद्ध में सिक्खों ने बड़ी वीरता के साथ अंग्रेज सैनिकों का भीषण संहार किया। पर आलीवाल के युद्ध में सिक्ख सेना फिर परास्त हुई। 

अंग्रेज और सिक्ख सेनाओं का अंतिम संघर्ष सुबराँव नामक स्थान पर हुआ। लेकिन आपसी फूट के कारण अंग्रेजों ने सिख सेना पर विजय प्राप्त कर ली। 

आंग्ल-सिक्ख युद्ध

सन् 1846 ई० में लार्ड हार्डिंग्ज ने अपनी विजयी सेना के साथ लाहौर में प्रवेश किया और लाहौर के दरबार में संधि कर ली। इस संधि के अनुसार सतलज नदी के पूर्व का वह सारा प्रदेश कम्पनी के राज्य में मिला लिया गया, जिस पर इस समय तक सिक्खों का अधिकार रहा था। कश्मीर भी छीन लिया गया, लाहौर दरबार को डेढ़ करोड़ रुपए हर्जाने के रूप में दिया गया।

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