अमेरिकी स्‍वतंत्रता संग्राम का इतिहास | History of American War of Independence

अमेरिकी स्‍वतंत्रता संग्राम का इतिहास

अमेरिकी स्‍वतंत्रता संग्राम का इतिहास | History of American War of Independence in hindi (1775-173 ई०) 

अमेरिका का स्वतन्त्रता संग्राम वास्तव में अमेरिका मूल के लोगों द्वारा अमेरिका की धरती पर आकर ब्रिटिशों द्वारा कालोनी (उपनिवेश) स्थापित कर लेने तथा अमेरिकी मूल के लोगों पर मनमाने ब्रिटिश कानून लागू करने के विरोध में हुआ। 

अमेरिका का ‘नई दुनिया’ के रूप में पता लगाना (कोलम्बस द्वारा 1493 ई० में) योरोपीय जगत के लिए सबसे बड़ी घटना थी। कोलम्बस स्पेनी समुन्द्री यात्री था। उसके द्वारा अमेरिका रूपी नई दुनिया की खोज करते ही जहां वहां स्पेनी, डच, फ्रांसीसी, स्वीडिश लोग पहुंचे वहीं-वहीं ब्रिटिश सबसे बड़ी संख्या में पहुंच गए। 

उन्होंने सन् 1607 ई० में वर्जीनिया तम्बाकू कम्पनी की सुनिश्चित खेती जेम्स टाउन में करने के साथ ही, 1630 तक अपनी कई एक कम्पनियां अमेरिका की धरती पर स्थापित कर, अपनी कई एक कालोनियां स्थापित कर ली थी। 

ब्रिटिशों ने जिस तरह अमेरिका की धरती पर अपना प्रसार किया था, उसमें डच, फ्रेंच, स्पेन और स्वीडन बुरी तरह पिछड़ गए। 

सन् 1776 आते-आते 170 साल में ही अमेरिका की जनसंख्या 2,500,000 (दो करोड़ पांच लाख) से ऊपर हो चुकी थी। इसमें अमेरिकी धनी सौदागर, बागान मालिक, अभिजात वर्ग के लोग, स्वतन्त्र किसान, दूकानदार, कारीगर और व्यवसायी वर्ग के लोग भी सामने आ चुके थे। 

इस अभिजात अमेरिकी समाज के अलावा अमेरिकी दैनिक मजदूर, रैयती किसान, बंधुआ नौकर भी थे, जिनका समाज में नीचा स्थान था। इसके अलावा हशी नौकर भी थे, जिनका समाज में किसी प्रकार का कोई स्थान न था। पर इनकी संख्या काफी बढ़ी थी-उनका झुकाव किसी भी वर्ग की ओर होना, उसके लिए निर्णायक साबित हो सकता था। 

उसी दौर 1776 ई० में अमेरिका में ब्रिटिश उपनिवेश के पंजें इस हद तक जम चुके थे कि हर उपनिवेश का एक गवर्नर होता था जो ब्रिटिश राजमुकुट की सत्ता का प्रतिनिधित्व करता था और जो सामान्यतः राजमुकुट द्वारा चुना जाता था। सिद्धान्तः गवर्नर को औपनिवेशिक मामलों में निदेशन और राजनीति स्वतन्त्रता के दमन का व्यापक अधिकार था। पेनसिलवानिया को छोड़कर हर उपनिवेश को दो सदनों की विधायिका थी। निचला सदन शक्तिशाली लोगों द्वारा चुना जाता था, जबकि ऊपरी सदस्यों का मनोनयन ब्रिटिश नरेश या गवर्नर द्वारा होता था। 

धीरे-धीरे अमेरिकी और ब्रिटिश समाज के बीच काफी मतभेद पैदा होते गए थे, लेकिन इस मतभेद के कारण क्रान्ति नहीं हुई थी-अधिकांश अमेरिकी अब भी योरोपीय व्यवस्था से जुड़े हुए थे। उनका आर्थिक विचार, उनकी राजनीतिक व्यवस्था, उनका धर्म और उनकी सामाजिक विचारधारा मूलतः योरोपीय थी। वे नए वातावरण में घुल-मिल चुके थे, लेकिन उनका रूपान्तर नए रूप में नहीं हुआ था। 

History of American War of Independence

ज्यों-ज्यों अमेरिका पर औपनिवेशिक राज्य के रूप में, ब्रिटिश ने अपना अधिकार बढ़ाना आरम्भ किया, त्यों-त्यों ब्रिटिशों द्वारा अमेरिकनों पर ज्यादतियां बढ़ती गयीं। उसने अमेरिकनों के प्राकृतिक अधिकारों का उल्लंघन करना आरम्भ कर दिया। 

कई जगह विद्रोह और मुठभेड़ें हुईं-पर उन्हें दबा दिया गया। 1775 ई० में जार्ज वाशिंगटन जैसा नेता अमेरिकनों के बीच उभर कर आया। जार्ज वाशिंगटन ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ तेरह कालोनियों के लोगों को गुलामी की जंजीरें तोड़ फेंकने का आह्वान किया। उसने सभाएं और प्रचार कर उन्हें एकता के सूत्र में बांधने का कार्य किया। 

इन तेरह उपनिवेश के लोग पहले से ही समय-समय पर विद्रोही तेवर अपनाते रहे थे, उन्हें कुशल नेतृत्व मिला तो जान हथेली पर रखकर मरने-मारने पर तैयार हो गए। 

इस समय तब ब्रिटिश सरकार और अमेरिकी जनता के बीच स्वामी और दास की भावना जड़ जमा चुकी थी। कालोनी (उपनिवेश) के गवर्नर का आदेश किसी राजा या ईश्वर के आदेश के समान होता था। ग्रेटब्रिटेन में बैठी अंग्रेज सरकार, पूरी दुनिया में राज्य करते हुए पूरी तरह निरंकुश हो चुकी थी। वह इस बात को मानकर चलने लगी थी कि ईश्वर ने उन्हें पूरी दुनिया पर राज करने के लिए इस धरती पर भेजा है-वे राजा हैं, शेष धरती के मानव उनकी प्रजा है। 

राजा के आदेश को मानना प्रजा का धर्म है। 

ब्रिटिश शासन के आधीन तेरह कालोनी की जनता अपनी स्वतन्त्रता की मांग को लेकर आन्दोलित हुए, परन्तु ग्रेट ब्रिटेन उन उपनिवेश वासियों को कोई छूट देने को तैयार न था। वह विद्रोहियों को सबक सिखाने पर आमादा थे। 

सन् 1775 ई० में जब अमेरिका में क्रान्ति और स्वतन्त्रता का नारा गूंजा तब, फ्रेंच, स्पेन, डच, ने तटस्थता की नीति अपना ली। 

यद्यपि इन देशों ने भी वहां अपनी-अपनी कालोनियां बनायी थीं, परन्तु ब्रिटिश कम्पनियों ने अपने व्यापारिक साधनों से अजगर बनकर उनके कारोबार को निगल लिया था। 

अमेरिका की धरती पर आजादी के दीवानों ने जगह-जगह ब्रिटिशों के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष छेड़ते हुए समुन्द्र में उनके माल से लड़े जहाजों को जलाना आरम्भ कर दिया। 

तेरह कालोनियों में जगह-जगह अनेकों मोर्चे खुले, ब्रिटिश सेना ने हथियारों के बल पर अमेरिकनों की आजादी की मांग को दबाना चाहा, मगर वह आजादी की जंग थी, देश जाग चुका था, उनकी आजादी की मांग को जितना ही दबाने का प्रयास किया जा रहा था, आग उतनी ही भड़कती जा रही थी। 

इस अवसर पर, अमेरिका की धरती पर ब्रिटेन के बाद दूसरी बड़ी शक्ति फ्रांस की थी। फ्रांस ने इस अवसर को अनुकूल पाया तो अमेरिका सेना का आधुनिक हथियारों से मदद करने के लिए मैदान में कूद पड़ी। 

अक्टूबर, 1777 ई० सरागोटा में अमेरिकनों और ब्रिटिशों में जबरदस्त जंग छिड़ी। दोनों ओर लाशों पर लाशें बिछीं। अन्ततः ब्रिटिश सेना ने अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण कर देने में भी ही अपनी भलाई समझी। 

फ्रेंच नेता, बैजामिन फ्रैंकलिन, जो खुलकर अमेरिकन लड़ाकों की मदद कर रहे थे, उन्हें ब्रिटिशों के पिटने पर जबरदस्त खुशी हुई। उन्होंने जार्ज वाशिंगटन को बधाई संदेश देते हुए मिलने की इच्छा व्यक्त की। जार्ज वाशिंगटन ने लिखा-

“आपके बधाई संदेश से मेरा और अमेरिकी सेना व जनता का मनोबल बढ़ा है। इसके लिए मैं व्यक्तिगत तौर पर आपका आभारी हूं। मुलाकात के लिए आपका हर समय स्वागत है।” । 

ब्रिटिश सेना के जनरल जान बरणोटान ने कनाडा में ब्रिटिश सैनिकों को नेतृत्व प्रदान किया। उसने कनाडा को उत्तर-दक्षिण में बांटना चाहा, मगर अमेरिकी सेना के लगातार आक्रमण के कारण उसे कोई ठोस सफलता न मिल सकी। 

एक अन्य ब्रिटिश जनरल होवे, फिलाडेल्फिया में फंसा हुआ था। परिणामतः सरगोटा में ब्रिटिश सेना को आत्मसमर्पण करना पड़ा था। 

सन् 1780-81 में केरोलिया और वर्जीनिया के अधिग्रहण के प्रयास में ब्रिटिश सैनिकों ने दक्षिण में आक्रमण कार्यवाही की। इस कार्यवाही का परिणाम, अक्टूबर, 1781 में यार्कटाउन, वर्जीनिया में भयानक तबाही भरी हार के रूप में सामने आया। 

इन हारों के बाद ब्रिटेन की हार निश्चित हो गयी थी। वह सभी तेरह कालोनियों से अपना व्यापारिक बोरिया-बिस्तर समेटने लगे। खाली होने वाली एक-एक कालोनियों में अमेरिका सेना का कब्जा होना आरम्भ हो गया। 

सन् 1783 ई० तक छुट-पुट युद्ध अमेरिका के बचे हुए हिस्सों में चलता रहा, पर हर जगह ब्रिटिश सेना को मुंह की खानी पड़ रही थी। सन् 1781 में समुन्द्री मार्ग से आ रही एक बड़ी ब्रिटिश सेना मार्क टाइ वर्जीनिया फ्रेंच के जलपोतों की सहायता से अमेरिका सेना ने मार्ग में ही घेर लिया। जनरल चार्ल्स कार्निवल को पकड़ लिया गया। 

सन् 1783 ई० में पेरिस में शान्ति वार्ता आयोजित हुई। इस वार्ता में ब्रिटेन ने अमेरिका की स्वतन्त्रता को मान्यता दे दी। अमेरिका ने ब्रिटेन के जनरलों, सैनिक अधिकारियों को, जो समुन्द्री मार्ग पर तथा कालोनियों में पकड़े गए थे, उनको आजाद कर दिया।

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