हिन्दी का नवगीत-साहित्य निबंध (Hindi’s Neo-Lyrical Literature) 

हिन्दी का नवगीत-साहित्य निबंध

हिन्दी का नवगीत-साहित्य (Hindi’s Neo-Lyrical Literature) 

हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल आयाम-विस्तार तथा विद्यागत विस्तार के दृष्टिकोण से अत्यन्त समृद्ध काल माना जाता है. इस काल में जहाँ गद्य को नवीन ऊँचाइयाँ प्राप्त हुईं, वहीं पद्य में भी नवीनता का समावेश हुआ. ‘निराला’ की देन ‘मुक्त छंद’ ने हिन्दी काव्य जगत् को एक नवीन लोक के आलोक में ला खड़ा किया. पश्चिम में चलने वाले विभिन्न काव्य आन्दोलनों का भी हिन्दी कविता पर समुचित प्रभाव पड़ा. यहाँ से हिन्दी कविता ने एक नयी करवट ली और इसमें जन्म हुआ ‘नवगीत’ का. ‘नवगीत’ का तात्पर्य यह नहीं है कि नया गीत; क्योंकि नया तो प्रत्येक गीत होता ही है. यहाँ ‘नवगीत’ से तात्पर्य अत्यन्त विस्मृत फलक पर नवीन स्वरूप में आकार ग्रहण करने वाले गीत से है. 

नवगीत ‘नयी कविता’ काल की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है. इसने हिन्दी की नयी कविता को एक नया और साथ ही एक नया आयाम प्रदान किया है. नवगीत के एक समीक्षक के शब्दों में “आधुनिक के नव-भावबोध के रूप में नवगीत का उदय हुआ है.” नवगीतों के स्वर ने जीवन की विषमताओं को ललकारते हुए उन्हें दूर करने का प्रयास किया है, यथा 

मन जब होगा उन्मन, 

तब होता कोई गीत सृजन ।

अनुभूति में बौद्धिक तत्त्व का समावेश हो जाने के फलस्वरूप नवगीत में उस संगीतात्मकता का अभाव स्पष्ट है जो प्राचीन खेबे के कबीर, सूर, तुलसी आदि के पदों में तथा छायावाद के कवियों—जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा आदि के गीतों में पाया जाता है. अतएव नवगीत एक ओर जहाँ भावात्मक, अनुभूतिजन्य एवं युग के मनोभावों का दर्पण होता है, वहीं दूसरी ओर अपनी अभिव्यक्ति में गद्यात्मकता के निकट भी पहुँच जाता है. एक उदाहरण द्रष्टव्य है 

युग का अभिनंदन, गीतों का व्यंजन, 

जब खिल उठता मन ॥

चारों दिशाओं में छाया सावन,

प्रिय से मिलने को आतुर मन, 

कहीं खिलखिलाता बचपन, 

कहीं गोला-बारूद की गमक ।

परम्परा और विकास 

‘नवगीत’ को दो प्रकार से जाना जाता है—’नयी कविता’ के समान्तर प्रवाहित गीत काव्य की धारा के रूप में तथा नयी कविता के एक विकसित उपभेद के रूप में. विभिन्न समीक्षकों ने नवगीत के ‘विकास’ पर एक से अधिक दृष्टियों द्वारा प्रकाश डाला है. हमारे विचार से सर्वाधिक संतुलित विचारधारा यह है 

“छायावाद के बाद नवीन यथार्थ-बोध को प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रयोगों द्वारा कविता के क्षेत्र में जो उपलब्धि हुई, वह नयी कविता कही गई और गीत के क्षेत्र में जो उपलब्धि सामने आयी वह ‘नवगीत’ नाम से जानी गई. आज हम नवगीत कहकर उस गीत परम्परा का बोध कराते हैं जो अपने पारस्परिक रूप से भिन्न, नये भावबोध, नवीन साहित्यिक चेतना एवं नवीन शिल्प-विधि की कलात्मक परिणति है. उसकी पहचान उसके शिल्प की ताजगी से होती है.” 

(डॉ. नटवर लाल) उन्नीसवीं शताब्दी के छठवें दशक के आरम्भ में पश्चिम में New Poetry, New Verse आदि की परम्परा चली थी. उसको लक्ष्य करके हिन्दी में ‘नया आदमी’ उपन्यास के माध्यम से हिन्दी-जगत् में ‘नये’ शब्द का समावेश हुआ और ‘नयी कविता’ नामक काव्य आन्दोलन का प्रवर्तन हुआ. उसी के कुछ पीछे गीत-परम्परा में ‘नवगीत’ का उद्भव हुआ. इस प्रकार प्राचीन गीतों की कड़ी में नवगीत एक महत्त्वपूर्ण कड़ी ठहरती है. छायावाद युग के 

अन्तिम चरण में हमें कुछ ऐसे गीत मिल जाते हैं जिनमें नवगीत के बीज उपलब्ध होते हैं. कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला के गीतिका एवं आखिया कविता संग्रह इस दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं. परन्तु हमारे इस कथन से यह नहीं समझ लेना चाहिए कि निराला की अंतिम कविताएँ नवगीत का प्रवर्तन करती हैं. उनमें तो केवल नये भावबोध के दर्शन होते हैं, जो पुराने भावबोध से अलग दिखाई देता है. परम्परा से हटकर जो गीत लिखे जाएँ, वे वस्तुतः नवगीत कहे जा सकते है. इस प्रकार ‘नवगीत’ की रचना प्रत्येक युग में की जा सकती है. इस प्रकार आधुनिक, नये आदि शब्द काल-सापेक्ष न होकर भाव-बोध-सापेक्ष कहे जाने चाहिए. ‘नवगीत’ शब्द की प्रतिष्ठा किसके द्वारा की गई, इस सम्बन्ध में पर्याप्त विवाद है. शिव प्रसाद सिंह ‘नवगीत’ का प्रतिष्ठापक स्वयं को बताते हैं. जीवन प्रकाश जोशी नवगीत के शुभारम्भ का श्रेय केदारनाथ अग्रवाल और ठाकुर प्रसाद सिंह को देते हैं. कुछ समीक्षक उमाकान्त मालवीय को यह श्रेय देना चाहते हैं. परन्तु वास्तविकता यह है कि ‘गीतांगिनी’ पत्रिका के 5 फरवरी, 1958 के अंक में प्रकाशित सम्पादकीय में राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने ‘नवगीत’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किया. उस संदर्भ में सम्पादक ने ‘नवगीत’ की सविस्तार चर्चा भी की है. कुछ लोग राजेन्द्र प्रसाद सिंह के नाम पर प्रश्न चिह्न लगाते हैं, परन्तु डॉ. वेदप्रकाश शर्मा, डॉ. कुन्दन लाल उप्रेति और उमाकान्त मालवीय सदृश गीतकारों के अनुसार डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सिंह ‘नवगीत’ ने ही सन् 1958 में नवगीत का नामकरण किया. 

निराला द्वारा किये गये प्रयोगों से प्रभावित होकर हरिवंशराय बच्चन, नरेन्द्र शर्मा, भगवती बाबू आदि ने ‘नवगीत’ की परम्परा का शुभारम्भ किया. उसे हम नवगीत का आरम्भ काल, अथवा उसकी पहली पीढ़ी कह सकते हैं. दूसरी पीढ़ी के गीतकारों में अज्ञेय, त्रिलोचन केदारनाथ सिंह अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह आदि हैं. इन्होंने नवगीत-परम्परा को पुष्ट करके एक नई पहचान दी. यह वस्तुतः नवगीत का विकास काल था. वास्तविक बात तो यह है कि इसी काल में नवगीत की ओर लोगों का ध्यान गया और नवगीत को पहचान मिली. तीसरी पीढ़ी में डॉ. शम्भूनाथ सिंह, डॉ. रामदरश मिश्र, केदारनाथ सिंह, धर्मवीर भारती, वीरेन्द्र मिश्र, रवीन्द्र भ्रमर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं. इसको हम ‘नवगीत’ के प्रचार का काल कह सकते हैं. इसी काल में नवगीत ने अपना स्वतन्त्र अस्तित्व स्थापित किया, चौथी पीढ़ी में छविनाथ मिश्र, मणिम मुकट, तारादत्त ‘निर्विरोध’, उमाकान्त मालवीय, विद्यानंद, सोम ठाकुर, परमेश रंजक, कुँवर बेचैन आदि के नाम उल्लेखनीय हैं. इन गीतकारों ने नवगीत को समृद्ध बनाया. यह वह काल है जब नवगीत के बिना हिन्दी की नयी कविता अथवा सामयिक कविता की चर्चा अधूरी मानी जाती है. इस समय नवगीत की पाँचवीं पीढ़ी हमारे सामने है, यथा—लक्ष्मीकांत सरस, नचिकेता, अनूप, अशेष, मुनीश, अशोक शर्मा, डॉ. त्रिलोकीनाथ अग्रवाल, डॉ. वेदप्रकाश, अमिताभ, डॉ. नटवर नागर, रवि खण्डेलवाल, मदनमोहन, उपेन्द्र, शैलेन्द्र कुलश्रेष्ठ आदि के नाम आते हैं. उक्त तीसरी और चौथी पीढ़ियों के अनेक अन्य कवि भी अपनी रचनाओं द्वारा नवगीत साहित्य को पुष्ट एवं समृद्ध कर रहे हैं.

भाव-बोध एवं जीवन-मूल्य 

स्वतंत्रतापूर्व भारत की वन्दनाओं में भाव और प्रकृति के संश्लिष्ट विधान के कारण अपेक्षतया सूक्ष्म चित्र हैं, और स्थूल रूप में भारतीयता की पहचान के स्थूल भौगोलिक ही विद्यमान हैं. मैथिलीशरण गुप्त कृत भारत-भरिता, प्रसाद के गीत, बंकिमचन्द्र के ‘वन्देमातरम्’ आदि में की गई अभिव्यक्तियाँ इस कथन को पुष्ट करती हैं. नवगीत में भारतीय स्वरूप की अभिव्यक्ति, जातीय चेतना व जन-संवेदना के प्रकटन में हुई है. नवगीत में राष्ट्रीय जन के आचार-विचार, परम्परा, इतिहास, धर्म एवं संस्कृति के स्वरूप का बोध, संवर्धन और तदनुरूप दिशा निरूपण के दर्शन होते हैं. नवगीत की इस भावाभिव्यक्ति के पीछे वेद के इस ‘राष्ट्राणि वैविशः’ अर्थात् राष्ट्रीय जन ही राष्ट्र है’ की प्रेरणा रही है—ऐसा प्रतीत होता है. नवगीत के भाव-बोध का अध्ययन निम्नलिखित बिन्दुओं के आधार पर किया जा सकता है

राष्ट्रीय चेतना 

नवगीत में राष्ट्र का एक मूर्त स्वरूप सामने आता है और उसके साथ राष्ट्रीयता का अन्तर्राष्ट्रीयता का प्रथम सोपान माना गया है. ‘नवगीत’ में गंगा और हिमालय के महत्व संदर्भ को उद्घाटित करते हुए अनेक रचनाएँ प्राप्त होती हैं. उदाहरण देखिए 

गंगोत्री में पलना

झूले प्रागे चले बिकइयाँ

भागीरथी घुटुरुवन डोले शैल शिखर की छैयाँ 

ठमकत-ठमकत डोले घाटी-घाटी दही-दही कर महके सोन चिरैया

पावों पर पहुँडाकर परवत गाये खन्ना खइयाँ     (रमेशचन्द्र शुक्ल, पूर्वग्रह 73-74) 

तथा 

एक मीनार उठती रही,

एक मीनार ढहती रही ।

तरुकी अकधकी सामने, यह नदी किन्तु बहती रही 

कान में हर सदी के नदी अनकही बात कहती रही ।    (उमाकान्त मालवीय ‘यह चावल ने हरीघा’) 

इक़बाल की गज़ल का यह शेर भारतीय अस्मिता का गीत है और यही नवगीत रचना की मुख्य प्रेरणा भूमि है. 

कुछ बात है कि हस्ती, मिटती नहीं हमारी । 

सदियों रहा है दुश्मन, दौरे-जमां हमारा ॥

नवगीत पंचशील, अहिंसा, सह-अस्तित्व और परस्पर सहयोग की भावभूमि पर उपजा है. नवगीत की चेतना राष्ट्रीय चेतना, जैसे अन्ध राष्ट्रवाद की विरोधी है और साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय जगत में सैन्यवाद की भी. नवगीत में भारतीय भूमि में पल्लवित गौरवशाली सोच है—सोम ठाकुर का नवगीत दशक इसका ज्वलन्त प्रमाण है— 

तन हुए शहर के पर

मन जंगल के हुये

शीश कटी देह लिए

हम इस कोलाहल में

घूमते रहे लेकर 

विष घर छलके हुए

नवगीत के कवियों ने प्रकृति-शोषण के विरुद्ध जितना और जैसा रचनात्मक क्रोध व्यक्त किया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है. जंगलों का विनाश, पहाड़ों को नंगा करना और नदियों को बाँधकर उसको बहुआयामी प्रयोजनशीलता से काट कर मात्र ऊर्जा का स्रोत बना देना न तो युक्तिसंगत है और न विकास का सच्चा पक्षधर सोम ठाकुर, अनूप अशेष आदि के गीत इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं. राष्ट्र के विकास में बाधक तत्त्वों के प्रति नवगीत में गहरी चिन्ता व्यक्त की गई है- 

ठंडा खून गरम है,

नारे बेच रहे ईमान लिए कटोरा घूम रहा है सारा हिन्दुस्तान

सिर्फ आँकड़े अखबारों में छपे तबाही के ।

सत्य यहाँ पीछे चलता है सदा गवाही के ।  (जगदीश श्रीवास्तव नवगीत अर्द्धशती)

इस संदर्भ में डाक्टर सत्येन्द्र शर्मा का यह कथन महत्वपूर्ण है— 

“राष्ट्रीय चेतना की सीधी अभिव्यक्ति होने के कारण कुछ रचनाएँ स्थूल अनुभूतिपरक चाहे लगें, यह उनकी काव्यगत स्वाभाविक दायित्व निर्वाह की इच्छा शक्ति एवं सजगता सार्थक ही कही जाएगी.”

पौराणिक, ऐतिहासिक व पुरातात्विक दृष्टि 

नवगीत भारतीयता के बोध की काव्य धारा है. यह भारत की जमीन से जुड़ी हुई काव्य धारा है और इसके पीछे इस काव्य धारा का पौराणिक, ऐतिहासिक व पुरातात्विक बोध है. 

पुराण गाथाओं के सहारे की गई सहज अभिव्यक्ति की सहज प्रेषणीयता द्रष्टव्य है 

रघुवर सिय मिलन तीर्थ कुसुमित फुलवारी सी ।   (उमाकान्त मालवीय ‘मेंहदी और महावर’) 

तथा

लक्ष्मण रेखाओं में वैदेही ज्वालाएँ भोग रहीं, निर्मम वनवास 

छलिया कंचन मृग का मेघ खण्ड आकाश टेर रहा प्यास-प्यास-प्यास ।

पुरातत्व सम्पदा के प्रति कवि शम्भुनाथ सिंह की यह अभिव्यक्ति बड़ी सटीक है 

नमक हवायें टकराती हैं,

अब भी कोणार्क से गुम सुम सातों घोड़े ताक रहे सूरज आँख से, 

पत्थर के बने हुए अर्क देव हार गये सर्वशक्तिमान महाकाल

इस काव्य-धारा में अजंता-एलोरा के गुहा मंदिर, साँची के स्तूप, खजुराहो और कोणार्क के मंदिर आधुनिक मन को अतीत की स्मृति से जोड़ते हैं. 

नवगीत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह युग के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाला काव्य है. इसके मुख्य लक्षण हैं—संवेदनधर्मिता, स्मरणीयता, सम्प्रेषणीयता, बिम्बधर्मिता, लोकसंस्कृति, खुलापन, भारतीयता की चेतना, जातीय बोध, विसंगतियों के द्वन्द्व तथा सामाजिक पीड़ा की अभिव्यक्ति

नवगीत हमारी गीत परम्परा की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कड़ी है. वह गीत काव्य के भविष्य के प्रति हमें आश्वस्त करता है. 

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