हिन्दी : राष्ट्रभाषा बनाम विश्वभाषा | Hindi : National Language Vs World Language

Hindi : National Language Vs World Language

हिन्दी : राष्ट्रभाषा बनाम विश्वभाषा 

“दुनिया से कह दो-गांधी अंग्रेजी नहीं जानता…….सारे संसार में भारत ही एक अभागा देश है जहां सारा कारोबार एक विदेशी भाषा में होता है! …….तो आइए संकल्प लें, कि हम सब हिन्दी में अपना अधिकतम कार्य करेंगे! …… स्वदेश, स्वराज्य और स्वभाषा का सम्मान रखेंगे!” (महात्मा गांधी) 

“…..इस (सांस्कृतिक) विकास के लिए सबसे पहले सांस्कृतिक और राजनीतिक कार्यों में भारतीय भाषाओं का व्यवहार होना चाहिए। भारत में अनेक शिक्षा आयोग गठित किये गये। उन सबने कहा कि शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाएं होनी चाहिए, परन्तु विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा का माध्यम अभी तक अंग्रेजी बनी हुई है। विद्वान अपने अखिल भारतीय सम्मेलन करते हैं तो वहां भाषण अंग्रेजी में करते हैं। उनके शोधपत्र अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। यदि उनके निबंध विदेशी पत्रिकाओं में प्रकाशित हों तो वे और भी सम्मानित समझे जाते हैं। लोग लाखों रुपये खर्च करके विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित करते हैं, वहां हिन्दी को विश्व भाषा बनाने का बीड़ा उठाते हैं। यदि वे केवल दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी को शिक्षा का माध्यम बना दें तो हिन्दी भारत की वास्तविक’ राष्ट्रभाषा और विश्वभाषा भी बन जायेगी।” (राम विलास शर्मा) 

विश्व भाषा बनने से पहले हिन्दी को अपने देश में ही सही मुकाम तक पहुंचना होगा। ये दो उद्धरण दो ऐसे विचारकों के लेखन से यूँ ही उठा लिये गये हैं, जिनकी हिन्दी को लेकर चिन्ताएं जग जाहिर हैं। उन्होंने बहुत लिखा है, बहुत कहा है, बहुत व्यवस्थित तरीके से विवेचन किया है और हिन्दी के पक्ष में मुहिम चलाने की हद तक प्रतिबद्धता दिखायी है। दोनों में समानता यह है कि वे प्रथमतः साम्राज्यवादी प्रभुत्व और विस्तार के खिलाफ हिन्दी भाषा को एक राष्ट्रवादी हथियार के रूप में देखते हैं। विश्व राजनीति की समझ और उसमें अपने-अपने प्रायः परस्पर विरोधी नजरिये से उनकी दखलंदाजी इस एक मुद्दे पर लगभग समान है। गंभीर विचारधारात्मक मतभेदों के बावजूद गांधी की महानता के प्रायः सभी कायल थे। कायल सिर्फ वे नहीं रहे जो कुछ अधिक और अतिरिक्त राष्ट्रवादी थे और अब भी हैं। 

नवजागरण और साम्राज्य-विरोधी लहर में भाषाई राष्ट्रवाद पिछली डेढ़-दो शताब्दियों की एक विश्व परिघटना है। छोटे-बड़े तमाम राष्ट्रों ने अपनी-अपनी भाषाई अस्मिताओं की लड़ाई को प्राथमिकता दी और उसे ही साम्राज्य-विरोध के जबर्दस्त राजनीतिक आंदोलन में तब्दील कर दिया। पहली बार इतनी छोटी-बड़ी भाषाएं विश्व-पटल पर इतने बड़े पैमाने पर अवतरित हुईं। इन भाषाई अस्मिताओं की अवहेलना इन नव-स्वतंत्र राष्ट्रों की राजनीतिक अवमानना के बगैर संभव नहीं। अपनी-अपनी जमीनों पर वे सिर उठाये खड़ी हैं और परस्पर सम्मान और समादर की दृष्टि से देखे जाने की अपेक्षा रखती हैं। लेकिन समांगी भाषाई अस्मिताओं वाले राष्ट्रों में जहां यह लड़ाई अधिक बेबाकी से फलीभूत हुई वहीं बहुभाषा-भाषी बहुसांस्कृतिक देशों में इसने कुछ जटिल रूप धारण कर लिया। तत्कालीन सोवियत संघ जैसे बहुत थोड़े देशों ने इन जटिल भाषाई उपराष्ट्रीयताओं की बखूबी हिफाजत की और उनके बीच सहकार बना कर राष्ट्रीय मुक्ति का अनुपम उदाहरण पेश किया। शायद इस मजबूत भित्ति पर ही वहां समाजवाद का नया मॉडल खड़ा किया जा सका। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य ने अपनी विभाजनकारी चालों से इस भाषाई सहकार और सह-अस्तित्व को छिन्न-भिन्न कर दिया। धार्मिक कट्टरपंथ का ऐसा वितण्डा खड़ा हुआ कि नवजागरण के प्रारंभिक दौर से ही भाषाई राष्ट्रवाद अंधी गली में फंस कर रह गया। गांधी जैसा सुलझा हुआ राजनेता भी भाषाई राष्ट्रवाद के इस मोर्चे पर मात खा गया। 

दिल्ली और मेरठ के आसपास की खड़ी बोली हमारे जातीय विकास के क्रम में न सिर्फ एक वृहत्तर पट्टी की एक सुचारु-सुगठित भाषा बन सकी बल्कि उस विकसित हिन्दी ने अखिल भारतीय स्तर पर अकेली संपर्क-भाषा का दर्जा भी हासिल कर लिया। बंगला और उधर मराठी, मलयालम, तमिल, तेलुगू आदि दक्षिणी प्रांतों की अपेक्षाकृत समृद्ध भाषाएं अपने-अपने इलाकों में समांगी परिपक्वता प्राप्त अस्मिताएं थीं, किंतु उन भाषा-भाषियों के बीच और खास कर के उत्तरी प्रांतों से उनके संवाद के लिए भी इस खड़ी बोली हिन्दी ने ही संपर्क भाषा की भूमिका निभायी। औपनिवेशिक शासन की भाषा अंग्रेजी न तब उनके काम आयी, न आज आती है। मुट्ठी भर अंग्रेजीदाँ भद्रलोक की बात अलग है। गांधी ने हिन्दी की इस ताकत को पहचान लिया था। इसीलिए खुद गुजराती भाषी होते हुए भी उन्होंने हिन्दी सीखी और पूरे देश को हिन्दी सिखाने का बीड़ा उठाया। दक्षिण में हिन्दी प्रचार सभा ने साम्राज्य-विरोधी राष्ट्रीय एकता व एकजुटता की एक लहर-सी पैदा कर दी। गांधी, साम्राज्य की भाषा अंग्रेजी के मुकाबले सभी भारतीय भाषाओं की राष्ट्रीय जमात खड़ी करना चाहते थे। उन सबके बीच एकता के संपर्क-सूत्र के रूप में उन्होंने राष्ट्रभाषा हिन्दी की परिकल्पना की और इसी नाते वह हिन्दी की झंडाबरदारी करते थे। अन्यथा वह हिन्दी या किसी भी भारतीय भाषा के अंधराष्ट्रवादी वर्चस्व के सख्त खिलाफ थे। भाषाई अस्मिताओं के महत्त्व के बारे में उनकी समझ बिल्कुल दो-टूक और वैज्ञानिक थी। यही कारण है कि हिन्दी साहित्य सम्मेलन से लंबे अरसे तक जुड़े रहने के बावजूद जब वहां संस्कृतनिष्ठ ‘हिन्दू’ हिन्दी की कट्टरता हावी होने लगी तो उन्होंने सम्मेलन से नाता तोड़ लिया। यह वह दौर था जब हिन्दी-उर्दू की दो शैलियों की अवधारणा खारिज की जा चुकी थी और देश के राजनीतिक-सामाजिक पटल पर सांप्रदायिक विभाजन के गहरा होते जाने के समय हिन्दी-उर्दू के बीच भी खाई चौड़ी होने लगी थी। हिन्दी की ऐतिहासिक तौर से चली आ रही समेकित छवि के खंडित होने के बाद उन्होंने मिली-जुली हिन्दुस्तानी जबान की तजबीज पेश की और उसी दमखम के साथ अब हिन्दुस्तानी के प्रचार-प्रसार में जुट गये। डॉ. राम विलास शर्मा ने सही चिह्नित किया है कि “हिन्दी भाषा को लेकर 1945-46 के दौरान गांधीजी के विचारों में परिवर्तन आया। जब उन्होंने देखा कि अंग्रेजों को खदेड़ने के लिए मुस्लिम लीग से समझौते करने पड़ेंगे तब उन्होंने राजनीति में इस्तेमाल की जाने वाली समझौते की नीति को भाषा के क्षेत्र में लागू किया।” समझौते की नीति और समझौते के प्रयास की विडंबना अपनी जगह है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि संविधान सभा की निर्णायक बैठक में सिर्फ एक मत से (और वह भी अध्यक्ष के) हिन्दी उस हिन्दुस्तानी के मुकाबले जीत पायी। हमारे भाषाई आंदोलन के ये कुछ ऐसे नाजक स्थल हैं जिन पर हमें न चाहते हुए भी बार-बार लौटना होगा और इन अंतर्विरोधों को खंगाल करके ही भविष्य के लिए सही राह तलाशी जा सकेगी। आजादी के पैंसठ साल बाद भी हिन्दी जिस अवांछित स्थिति में फंसी हुई है, उसका एक बहुत बड़ा कारण यह भी है कि हिन्दी पट्टी के किसी भी स्थापित विद्वान-विचारक ने चाहे वह राम विलास शर्मा ही क्यों न हों, अन्य भारतीय भाषाओं की तुलना में ‘राष्ट्रभाषा हिन्दी’ के प्रति अपना अंध-मोह नहीं छोड़ा। कुछेक तो अपनी शद्धतावादी रवैये पर अब भी अड़े हुए हैं और शुद्धता का सीधा मतलब है संस्कृतनिष्ठता। फलतः साधारणजन की अखिल भारतीय संपर्क भाषा हिन्दी का सपना बिखरता चला गया। हिन्दी के वर्चस्व की दलील से बच-बचा कर चलने की चाहे जितनी तरकीबें निकाल ली जाएं, अंग्रेजी के साम्राज्यवादी वर्चस्व और प्रभुत्व से निपटने का और क्या रास्ता हो सकता है? 

हिन्दी पट्टी के भद्रलोक के सबसे बड़े नुमाइंदे पं. जवाहर लाल नेहरू की अपनी राजनीतिक विवशताएं थीं। राजनीतिक मामलों में सबसे समर्थ आधुनिक होने के बावजूद साधारण जन को लेकर वह उतने बड़े स्वप्नदर्शी कभी नहीं बन पाये। इस लिहाज से वह गांधी से कोसों पीछे थे। हिन्दी-हिन्दुस्तानी के पचड़े में वह कभी नहीं पड़े और मौका आया तो हिन्दी को राजभाषा के दर्जे तक महदूद कर दिया वह भी वैकल्पिक राजभाषा! माना गया कि हिन्दी अविकसित भाषा है और उसके विकसित होने के लिए 15 वर्ष की अवधि मुकरर्र की गयी। 1950 के बाद से 1965, 1980, 1995 कई पंद्रहसाला लीजें खत्म हुईं, लेकिन आज भी असली राजभाषा अंग्रेजी ही बनी हुई है। शासक वर्ग के चरित्र में आज भी कोई बुनियादी बदलाव नहीं हुआ है, किंतु सामाजिक स्तर पर पिछड़ों-दलितों-स्त्रियों, आदिवासी आदि तबकों में जो जन-उभार आया है उससे शासन स्तर पर भी अंग्रेजी के प्रति मोह कुछ कम हुआ है, और हिन्दी की स्वीकार्यता बढ़ी है। हिन्दी पट्टी के कई प्रदेशों में तो तस्वीर काफी बदल चुकी है। सत्ता की भाषा-संस्कृति अपना वर्चस्व जरूर स्थापित करती है—जैसा 

कि फारसी और अंग्रेजी ने किया, लेकिन जन-भाषा की क्रमशः बढ़ती स्वीकार्यता एक दिन इस सत्ता का चरित्र भी जरूर बदल दगा। ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। हाँ, इस प्रक्रिया में शासकीय भाषा के उस बनावटी स्वरूप को भी सायास तोड़ना होगा, जो निहायत अदूरदर्शी तरीके से देश पर थोप दिया गया है और जिसे हिन्दी के वर्चस्वकारी नेतृत्व वर्ग का भी नैतिक समर्थन हासिल है। 

विश्वभाषा होने न होने का एक नया चुनौतीपूर्ण परिप्रेक्ष्य मौजूदा वैश्वीकरण भी है। इस नवसाम्राज्यवादी दौर में दुनिया एकध्रुवीयता का आर बढ़ रही है या कम से कम ऐसी दुर्धर्ष महत्वाकांक्षा पाली जा रही है। यानी पूरी दुनिया को एक डण्डे से हाँकने की कोशिश हो रही है। नवउदारवादी विचारधारा में राष्ट्र-राज्य का वैसे भी अवमूल्यन हो तो जाता है। एक बाजार, उसके एक जैसे मानक और सारी राष्ट्रीय सरकारें उसकी पहरेदार। राष्ट्रीय मुक्ति और राष्ट्रीय विकास के सारे अरमान और जज्बे अब ठंडे बस्ते में डाल दिये गये हैं और इस स्थिति को ‘अपरिहार्य’ माना जा रहा है। पूरा परिदृश्य बहुराष्ट्रीय संगठनों, राष्ट-राज्य और अपनी उपस्थिति जताती नयी-नयी अल्पसंख्यक अस्मिताओं के बीच द्वंद्व और संघर्ष का है। विश्व बाजार को मानकीकरण भी चाहिए और ग्राहकीकरण भी। इसमें किसी तरह का अवरोध उसे मंजूर नहीं। भाषा-संस्कृति के क्षेत्र में इसका निहितार्थ यह हुआ कि पूरी दुनिया के लोग एक मानक भाषा बोलने और एक-सी संस्कृति अपनाने को बाध्य होंगे। अमरीकी सूचना सेवा की पत्रिका । ‘स्पेन’ के एक महत्त्वपर्ण आलेख में विश्व भर की तकरीबन 6000 भाषाओं के विलुप्त होने की आशंका जतायी गयी है। टाफ्लर जैसे विचारक ने अपनी पुस्तक ‘पावर शिफ्ट’ में साउथ टैरोल, ब्रिटानी, आल्जास, लान्द्र और केटोलानिया के भाषा-आंदोलनों का जिक्र करते हए स्पष्ट कहा है कि या तो एकीकृत यूरोप को इन लोगों को क्षेत्रीय स्वायत्तता देनी पड़ेगी या फिर सख्ती से कुचलना पड़ेगा। 

हिन्दी के अपने राष्ट्रीय संदर्भ में भी यह प्रवृत्ति भारतीय राष्ट्र राज्य के अपने चरित्र के मुताबिक पहले से परिलक्षित होती रही है और अब तो नयी विश्व बाजार व्यवस्था से कदम-ताल करके चलने का भी जुनून है। बाजार के तकाजे राष्ट्र-राज्य को तो अवमूल्यित करते हैं, पर कोने-अतरों से निकाल-निकाल कर क्षेत्रीय संस्कृतियों को बढ़ावा भी देते हैं। संसाधनों के दोहन और वाणिज्यिक विस्तार की गरज से इन नये क्षेत्रों की भाषाई अस्मिताएं ‘राष्ट्रभाषा’ और ‘विश्वभाषा’ दोनों के लिए गंभीर चुनौती भी पेश करती हैं। ब्रज, अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी आदि बोलियों को आठवीं सूची में शामिल करने की मांगे बढ़ती जा रही हैं। अब यह हमारे विवेक पर निर्भर है कि हम इन्हें स्वतंत्र भाषाओं का दर्जा देकर उन्हें विकास करने का मौका देते हैं या फिर वही दमन का रवैया अपनाते हैं जो वैश्वीकरण कर रहा है। राष्ट-राज्य की संप्रभता बनी रहेगी तभी इनके साथ भी न्याय होगा. संपर्क-भाषा के गणों की बदौलत हिन्दी का राजभाषा और राष्ट्रभाषा का स्वरूप भी निखर पायेगा और विश्व-स्तर पर हिन्दी की अपनी पहचान भी अक्षुण्ण रह पायेगी। अन्यथा बाजार-आधारित मीडिया तो इन क्षेत्रीय भाषा-संस्कतियों और हिन्दी का भी विकृतीकरण कर ही रहा है। हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बने या न बने, अपने साहित्य और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अपने अध्यवसाय के बल पर विश्व भाषा होने का गौरव जरूर हासिल करेगी जो कि जर्मन, फ्रेंच, रूसी आदि भाषाओं को प्राप्त है। 

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