Hindi motivational story-शरीर का सुख 

Hindi motivational story

शरीर का सुख 

Hindi motivational story-एक दिन एक सेठ ने सोचा, सब कबीरदास जी   बड़ी चर्चा करते हैं  मैं भी कल उनके प्रवचन सुनने जाऊंगा, देखें तो सही ऐसी क्या विशेष बात है अगले दिन सेठ सुबह के सत्र के प्रवचन सुनने गए। 

प्रवचन सुनत समय सेठ जी का ध्यान कबीरदास के अनमोल वचन पर गए और वे उन्हें सुनकर घर आनन्दित हुए। उन्हें भी लगने लगा कि कछ तो विशेष बात हैं इनमें।

परन्तु तभी उनका ध्यान कबीरदास के पहने हुए उनके खद्दर  कुर्ते  पर  गया उन्हें लगा इतने ऊंचे स्तर के संत और ऐसे हल्के स्तर का वस्त्र! उन्होंने सोचा कल इनके लिए मखमल का  कुर्ते  लेकर आऊंगा।

अगले दिन सेठजी एक अत्यधिक सुन्दर मखमल का कुर्ता लेकर आ गए आर कबीरदास जी के समक्ष रखकर उसे पहनने का अनुरोध करने लगे। कबीरदास ने मूल्यवान कुर्ते को उलट-पुलट कर देखा और कहा, ‘कल पहनेंगे।’ सेठजी बड़े प्रसन्न हो गए। 

अगले दिन जब प्रवचन के समय उन्होंने  कबीरदास  को कुर्ता पहने देखा तो हतप्रभ रह गए उन्होंने उसे उल्टा पहन रखा था। उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि कबीर जी ने ऐसा क्यों किया। यह प्रश्न प्रवचन के समय उनके मन में कोंधता रहा। सारे भक्तगण भी मन ही मन सोच रहे थे कि आज गुरुजी ने यह क्या लीला रची, कुर्ता उल्टा क्यों डाला। 

प्रवचन समाप्त हुआ, कबीरदास जी की दृष्टि सेठजी पर पड़ी। उसके आंखों में जो प्रश्न चिह्न था उसे देखकर कबीरदास जी बोले, ‘अरे हो, सुनो, मैं तो बताना ही भूल गया यह मूल्यवान कुर्ता मुझे इन्हीं सेठजी ने दिया था कल, इसलिए आज इसे पहन कर प्रवचन कर रहा था। और सबसे पूछ बैठे, ‘कैसा है?’ सेठ जी तपाक से बोल पड़े, ‘आपने तो कुर्ते को उल्टा पहन रखा है।’ 

कबीरदास जी मुस्कराए और घोले, ‘अरे मैं साधारण-सा बुनकर इतना महंगा कुर्ता शायद ही कभी खरीद पाऊंगा, इसलिए सोचा कि इसके मखमली भाग का सुख इस शरीर के चमड़ी को ले लेने दें (मखमल का ऊपरी भाग मुलायम होता है)। मैंने सोचा लोग देखकर क्या करेंगे, कम से शरीर को कुछ क्षणों के लिए सुख मिल जायेगा। 

यह सुन सेठजी ने कबीरदास के चरण पकड़ लिए और बोले, मैं सोचता था आप में ऐसी क्या बात है जो सभी आपकी प्रशंसा करते हैं। आप तो सचमुच लोकलाज, अहम, विकार सबसे परे हैं। हम आपके दर्शन कर धन्य हो गए।’ 

कबीरदास जी मुस्कुराकर बोले, ‘सेठजी कपड़े का काम है, धूप, सर्दी, गर्मी और लोक । लाज से बचाना और वैसे कपड़े तो मैं स्वयं घुन ही लेता हूं।’ कबीरदास की इस सादगी भरी बात सब को प्रभावित कर गयी।

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