Hindi kahaniyan-लक्ष्मी आ गई

Hindi kahaniyan-लक्ष्मी आ गई

लक्ष्मी आ गई

किसी नगर में अमरनाथ नाम का एक सेठ रहता था। वह बहुत घमंडी था । हमेशा सोचता रहता था कि वह अपनी दौलत से कुछ भी कर या खरीद सकता है। 

एक दिन कुछ लोग उससे लक्ष्मी जी का मंदिर बनवाने के लिए चंदा मांगने आए। सेठ ने उन्हें दुत्कार दिया, “तुम क्या मंदिर बनवाओगे? यह काम तो वही कर सकता है, जिस पर लक्ष्मी की कृपा हो।” वे बेचारे फटकारखाकर चले गए। 

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उसी रात अमरनाथ ने सपना देखा, लक्ष्मीजी उसके पास खड़ी हैं। कह रही हैं, “घमंड राजा रावण का भी नहीं रहा। फिर भला तुम्हारा कैसे रहेगा? मैं तुम्हारे घर से जा रही हूं।” 

“मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगा।” सेठ ने कहा। 

लक्ष्मी हंस पड़ीं, “मैं चंचला हूं। मुझे कोई रोक नहीं सकता।” 

तभी सेठ का सपना टूट गया। सोचता रहा, लक्ष्मी को कैसे रोकू।’ सवेरे उसने मुनीम से सलाह करके अपनी करोड़ों की संपत्ति छतों में लगे शहतीरों में भरवा दी।शहतीर दोबारा छतों पर लगवा दिए। फिर मन ही मन कहा, ‘अब देखता हूं, लक्ष्मी मेरे घर से कैसे जाती हैं।’ 

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उसी रात सेठ को फिर सपने में लक्ष्मीजी ने दर्शन दिए। उन्होंने मुसकराकर कहा, “मुझे तुम क्या, संसार 

में कोई भी नहीं बांध सकता।” 

सेठ ने पूछा,”मगर तुम मेरे घर से चलकर जाओगी कहाँ ?” 

“काशी में एक हलवाई के घर।” 

सेठ का सपना टूट गया। वह उठकर शहतीरों के पास आया। वे ज्यों के त्यों थे। सेठ मन ही मन मुसकाया। वह रोज सवेरे उठकर शहतीरों को देखता। उन्हें सुरक्षित पाकर मन ही मन कहता, ‘देखू, लक्ष्मी मेरा घर छोड़कर काशी के हलवाई के घर किस तरह जाती हैं ? 

बारिश के दिन थे। एक दिन पास की नदी में भयंकर बाढ़ आई। पानी ने सारे किनारे तोड़ डाले। नगर को अपनी चपेट में लेकर सेठ के महल की ओर पानी बढ़ने लगा। 

सेठ चिल्लाने लगा, “मेरे महल को बचाओ। 

मेरे शहतीरों को बचाओ।हाय, उन शहतीरों में ही मेरा सब कुछ है।” 

उस संकट की घड़ी में उसकी कौन सुनता! सभी को अपनी अपनी पड़ी थी। कुछ ही क्षणों में सेठ का महल ढहकर पानी के साथ नदी में बह गया। छतों पर लगे शहतीर पानी में तैरने लगे। सेठ ने किसी तरह एक लकड़ी पर चढ़कर अपनी जान बचाई। वह फूट फूटकर रोने लगा। तभी उसे लक्ष्मीजी का वचन याद आया कि वह काशी के हलवाई के पास जाएंगी। सेठ ने सोचा, मैं अपनी शहतीरों का पीछा करके देखता हूं, ये किसके यहां जाते हैं ?’ 

सेठ शहतीरों को देखते हुए नदी के साथ चलता रहा। शहतीर बहते-बहते काशी तक पहुंचे थे कि किसी लकड़हारे ने उन्हें नदी से निकालकर बाजार में बेच दिया। 

उन्हें खरीदा लकड़ी के व्यापारी जीतमल ने। सेठ अमरनाथ जीतमल की दुकान के सामने बैठ गया। सोचने लगा, यदि कुछ धन होता, तो इन्हें खरीद लेता।’ | 

तभी भागमल नामक एक व्यक्ति वहां आया। वह जीतमल से बोला, “मैं घर बनवा रहा हूं। ये शहतीर मजबूत लगते हैं। बोलो, कितने में बेचते हो?” 

सेठ अमरनाथ के देखते-देखते सारे शहतीर भागमल ने खरीद लिए।बैलगाड़ी पर लदवाकर चलने लगा, तो सेठ अमरनाथ उसके पास पहुंचा। बोला, “क्या आप हलवाई हैं?” “हां, क्यों ?” भागमल ने पूछा। 

अमरनाथ ने कहा, “मैं आपको एक रहस्य की बात बताना चाहता हूं।इन शहतीरों में करोड़ों की संपत्ति भरी है।” 

हलवाई को पहले तो विश्वास नहीं हआ | परसेठ के बार-बार कहने पर वह मान गया। वह अमरनाथ को साथ लेकर घर आया । शहतीरों को काटा, तो सचमुच उसमें से बेशुमार धन निकला। 

“सच बताइए, आप कौन हैं ?” भागमल ने अमरनाथ से पूछा। अमरनाथ ने उसे अपने सपने से लेकर भागमल द्वारा शहतीर खरीदने तक की सारी कहानी सुना दी। फिर लंबी सांसलेकर बोला, “मैंने कभी सोचा तक नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है।” 

भागमल ने सेठ अमरनाथ को आदर के साथ अपने घर ठहराया। उसे भोजन कराया। अच्छे वस्त्र दिए। कई दिन बाद जब अमरनाथ जाने लगा, तो भागमल ने उसे कुछ धन देना चाहा। अमरनाथ बोला, “नहीं, जो धन मेरे घर पर लाख रोकने पर नहीं रुका, उसे अब मैं नहीं लूंगा। मेहनत करके दोबारा कमाऊंगा।” 

उसे रुकने को कहकर भागमल अंदर गया। बेसन के चार लड्डू खुद बनाए ।बनाते समय उनमें चार बहुमूल्य रत्न छिपाए। फिर चारों लड्डू अमरनाथ को देते हुए कहा, “ये मैंने आपके लिए कुछ लड्डू बनाए हैं। इन्हें रख लें। जब भूख लगे, तो खा लीजिएगा।” 

अमरनाथ ने लड्डुओं को अपने झोले में रख लिया। अब वह काशी में नहीं रहना चाहता था। गंगा पार जाने के लिए वह घाट पर गया। पार उतारने के लिए मल्लाह काफी पैसे मांग रहे थे। उसके पास पैसे तो थे नहीं। उसने मल्लाह से कहा, “मेरे पास पैसे तो नहीं हैं। तुम चाहो,तो पैसों के बदले प्रसिद्ध हलवाई भागमल के हाथ के बने लड्डू ले लेना। 

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लड्डू देखकर मल्लाह मान गया। उसने अमरनाथ को पार पहुंचा दिया। फिर पैसों के बदले चार लड्डू ले लिए। 

मल्लाह ने सोचा, इतने बढ़िया लड्डूदेखकर बच्चे कल फिर लड्डू की मांग करेंगे? क्यों न इन्हें बेचकर खाने का सामान खरीद लूं?’ बस, उसने जाकर भागमल हलवाई के हाथों लड्डू बेच दिए। 

यह सब देखकर भागमल का मन तड़प उठा। वह ईमानदार था। भगवान सेडरता था। उसने सोचा, जिसकेधन के बल पर मैं करोड़पति बना, वह गली-गली ठोकरें खाए, यह ठीक नहीं। मुझे सेठ अमरनाथ को ढूंढ़ना ही होगा।’ 

बस, उसी क्षण वह घाट पर पहुंचा। गंगा पार मछुआरों का एक गांव था। वहां पहुंचकर वह मछुआरों से अमरनाथ के बारे में पूछने लगा। कुछ ही देर में उसे गांव में अमरनाथ मिल गया । वह काम की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था। उसे देखते ही भागमल ने कहा, “ठहरिए सेठजी। लक्ष्मी चंचला होती हैं। वह मनुष्य का साथ छोड़ सकती हैं। मगर मनुष्यता तो चंचल नहींहोती। वह मनुष्य का साथ कैसे छोड़ देगी? आप मेरे साथ चलिए।” 

“मगर…?”सेठ अमरनाथ ने आंखों में आंसूभरकर कुछ कहना चाहा। भागमल ने बीच में ही कहा, “आज से आप मेरे मुनीम हुए। आपका धन बेशक मेरा हो गया है। किंतु उसका हिसाब किताब आप ही रखेंगे।” सुनते ही सेठ अमरनाथ फूट-फूटकर रोने लगा।

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