हम गंध कैसे लेते हैं?-Ham Gand kaise Lete Hain

हम गंध कैसे लेते हैं

हम गंध कैसे लेते हैं?-how do you smell 

यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि हम बहुत सी वस्तुओं की गंध लेकर उनके बारे में ढेर सारी जानकारी दे सकते हैं। वस्तुतः किसी वस्तु को सूंघने भर से उसके विषय में बहुत-सी बातें हम इसलिए बता देते हैं, क्योंकि हमारी नाक में घ्राण-शक्ति मौजूद है। उसी के माध्यम से हम क्षणभर में किसी वस्तु की अच्छी और बुरी गंध को पहचानते हैं। नाक के संबंध में यह बात सभी जानते हैं कि यह 

हमारे सांस लेने की जगह है। हमारे शरीर में हवा तथा गंध इसी के जरिए प्रवेश करती है। नाक के भीतरी भाग या भीतरी द्वार के पास मटर के दाने के आकार का एक मांसल टुकड़ा है। इसी में हमारी सूंघने की शक्ति केंद्रित है, इसे ‘घ्राण केंद्र’ कहते हैं। 

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मानव शरीर के घ्राण केंद्र में लगभग छह लाख विशेष प्रकार की कोशिकाएं हैं, किसी भी वस्तु की गंध हवा में मिलकर हमारी नाक के दोनों दरवाजों के जरिए इन कोशिकाओं तक पहुंचती है। श्लेष्मा में घुल-मिलकर वह पतली परत के रूप में फैलती है तथा अणु रूप में हमारी संवेदनशील कोशिकाओं को 

प्रभावित करती है। ये कोशिकाएं स्नायु मार्ग से मस्तिष्क तक यह संदेश पहुंचा देती हैं। इस प्रकार अच्छी या बुरी-सभी प्रकार की गंध हम महसूस कर लेते हैं। 

सात प्रकार की मुख्य गंध 

इस संसार में लाखों-करोड़ों प्रकार के पदार्थ हैं और इन सबकी गंध भी भिन्न-भिन्न हैं, फिर हमारी स्नायु कोशिकाएं विभिन्न प्रकार की गंधों को आखिर किस तरह से पहचान लेती हैं-आइए, इस पर विचार करें। 

विभिन्न गंधों को सूंघने और गंध के आधार पर किसी वस्तु को पहचानने के सिद्धांत पर आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व ‘लुकीयस’ नामक वैज्ञानिक ने विभिन्न अनुमानों को लेकर कार्य करना प्रारंभ किया। आगे चलकर अमेरिका के एक कृषि वैज्ञानिक ‘जान ई. अमूरी’ ने परीक्षणों के आधार पर कोई छ: सौ जैविक मिश्रण तैयार करके अनेक वस्तुओं की विभिन्न गंधों की पहचान की और विज्ञान जगत से उनका परिचय कराया। धीरे-धीरे यह सिद्धांत प्रतिपादित हो गया कि मनुष्य अग्रांकित सात प्रकार की गंध मुख्य रूप से लेता है-1. तीखी, 2. कपूरी, 3. पुष्पकी, 4. पिपरमिंट जैसी, 5. कस्तूरी, 6. सड़ांध युक्त और 7. स्पिरिट वाली। 

उक्त प्रत्येक प्रकार की गंध के अणु होते हैं, जो आकार में एक-दूसरे से भिन्न होते हैं, जबकि एक सी गंध वाली सैकड़ों गंधों के अणुओं का आकार एक जैसा होता है। ये अणु हमारी नाक के मुख्य द्वार से संवेदी कोशिकाओं तक पहुंचते हैं तो उनमें अपना घर खोज लेते हैं और स्नायु लहर के जरिए हमारे मस्तिष्क को गंध विषयक समाचार मिल जाता है। 

मनुष्य की तीव्र घ्राण शक्ति

 सूंघने की शक्ति हमारे स्वाद लेने की शक्ति से कोई दस हजार गुना ज्यादा है, इसलिए वह गंध तीव्रता के साथ काम करती है। अनेक लोग पास खड़े व्यक्ति द्वारा लगाए गए सेंट’ को पहचानकर आंखें बंद किए ही उसका नाम बता देते हैं। 

लोग प्राय: यह कहते हुए पाए जाते हैं कि कुत्ते, गाय आदि जानवरों की घ्राण शक्ति मनुष्य से कहीं ज्यादा होती है, किंतु उनका यह विचार ठीक नहीं है। असलियत तो यह है कि मनुष्य की घ्राण शक्ति दुनिया के किसी भी अन्य प्राणी से कम नहीं होती। यह भी तथ्य है कि आदमी की गंध लेने की क्षमता दिन के चौबीस घंटों में एक समान नहीं रहती। वह घटती-बढ़ती रहती है। हमारी गंध संवेदना उस समय काफी तीव्र होती है, जब हमें भूख लग रही होती है। सुबह-सुबह बैठते हैं, तो हमें चाय बहुत ताजी और खुशबूदार लगती है, किंतु जैसे-जैसे दिन चढ़ता है और हमारे सामने चाय की प्याली आती है, तो चाय उतनी सुगंधित व ताजा नहीं लगती। 

घ्राण शक्ति में विस्तार नहीं होता 

वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में किए गए प्रयोगों के आधार पर अब अनेक वस्तुओं के ‘सेंट’ और कंसन्ट्रेट बन चुके हैं। बड़ी चीजों और जगहों की बात छोड़िए, अब तो बाल पेन से निकलने वाली स्याही और कागज पर घिसे जाने वाले रबड़ तक को भी सुगंधित बनाया जा चुका है। किंतु गंध के संबंध में यह एक आश्चर्यजनक बात है कि वैज्ञानिक अभी तक ऐसे किसी यंत्र का आविष्कार नहीं कर पाए हैं, जिसके जरिए नाक की संवेदन शक्ति यानी घ्राण शक्ति को बढ़ाया जा सके, जैसे कि वह देखने की शक्ति या दृष्टि में विस्तार कर सकता है। कान में माइक्रोफोन लगाकर आप कान की श्रवण शक्ति को बढ़ाकर आवाज को और तेज सुन सकते हैं। प्रकाश और ध्वनि का भी वैज्ञानिक माध्यमों से विस्तार किया जा सकता है, किंतु गंध विस्तार के संबंध में, अभी विज्ञान पिछड़ा हुआ है। लेकिन वैज्ञानिक हारे नहीं हैं, वे लगातार इस खोज में लगे हैं। देखते हैं, आशाजनक परिणाम कब तक सामने आते हैं।

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