ज्ञानवर्धक प्रेरक कहानियां-विश्वास का मूल्य 

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बुद्धिवर्धक कहानियां-समझ को तराशने वाला अनूठा कहानी

बहुत समय पहले की बात है-कंचनपुर पर राजा रणविजय का शासन था। एक दिन उनके दरबार में एक किसान आया, वह देखने में गरीब मालूम पड़ता था। उसने राजा को सिर झुकाकर अभिवादन किया और फिर अपनी पगडी में से एक चमकीली मणि निकाली, राजा को मणि देते हुए वह बोला, “महाराज, मैं गरीब किसान हूं। मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता हूँ।

आज सुबह जब मैं खेतों पर काम करने जा रहा था तो यह मणि मुझे रास्ते में पड़ी हुई मिली। यह बहुत कीमती मणि है। मैं यह सोचकर आपके पास आया हूं कि मुझ गरीब किसान के यह किस काम की? इसको आपके खजाने में होना चाहिए।” इतना कहने के साथ ही उस गरीब किसान ने वह मणि राजा को दे दी।

राजा ने किसान को वहीं बैठने को कहा और स्वयं तल्लीनता से मणि को उलट-पलट कर देखने लगा। मणि को गौर से देखकर वह सहसा मुस्कराया, राजा के मुस्कराने का रहस्य किसान की समझ में न आया। तत्पश्चात मणि को दरबारियों ने भी बारी बारी देखा। देखकर सभी कानाफूसी करने लगे, दरअसल किसान जिसको कीमती मणि कह रहा था, वह मणि न होकर चमकीला पत्थर था। 

“निस्संदेह, यह मणि बहुत कीमती है। इसकी कीमत तो हम भी नहीं आंक सकते।” राजा ने किसान की ओर देखते हुए कहा। राजा की बात पर किसान धीरे से मुस्कराया। 

राजा की बात सुनकर सभी दरबारी असमंजस में पड़ गए। उन्हें आश्चर्य भी बहुत हुआ, लेकिन किसी को भी कुछ कहने का साहस न हुआ। 

राजा ने कोषाध्यक्ष को आदेश दिया, “किसान को एक हजार स्वर्ण-मद्राएं देकर विदा किया जाए और इस बहुमूल्य मणि को खजाने में रखवा दें।” 

अब तो दरबारियों के धैर्य का बांध ही टूट गया। एक मंत्री राजा के पास आया और धीरे से कहा कि महाराज आप किसान को एक हजार स्वर्ण-मुद्राएं न दें, क्योंकि यह मणि न होकर एक पत्थर है और इसकी कीमत चंद स्वर्ण-मुद्राओं से अधिक नहीं है। लेकिन राजा ने मंत्री को डांटते हुए कहा, “आप अपने आसन  पर ही बैठिए, आपसे बातें बाद में करेंगे।” मंत्री सकुचाकर अपने आसन पर जा बैठा। अन्य दरबारी भी सकपका गए। राजा को सही बात बताने की हिम्मत किसी में न हई। 

किसान को एक हजार स्वर्ण-मुद्राएं देकर विदा कर दिया गया। किसान के जाते ही सेनापति ने राजा से कहा, “महाराज, मैं कुछ कहना चाहता हूं।” 

“हां, हां, कहिए!” राजा ने निश्चिंत भाव से कहा। 

“महाराज! अभी आपने मणि के बदले में किसान को एक हजार स्वर्ण मुद्राएं दी हैं, लेकिन महाराज, वह मणि नहीं है, वह एक चमकीला पत्थर है और उसकी कीमत दो-चार स्वर्ण-मुद्राओं से अधिक नहीं है। आपको किसान ने ठग लिया है और आप भी आसानी से उसकी बातों में आ गए। किसान बड़ा धूर्त और चतुर व्यक्ति जान पड़ता है।” 

राजा ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा, “हां सेनापति जी! वह मणि नहीं है, यह मैं जानता हूं। लेकिन किसान धूर्त व्यक्ति नहीं है और न ही उसने मुझे ठगा 

“तो फिर आपने उसे एक हजार स्वर्ण-मुद्राएं क्यों दी?” सेनापति ने आश्चर्य से पूछा। 

“मुद्राएं मैंने उसे मणि के बदले नहीं दीं। मणि की असलियत तो मैं उसे देखते ही समझ गया था। मुद्राएं तो मैंने उसके विश्वास को बनाए रखने के लिए दी हैं।” राजा ने कहा। 

सेनापति ने विस्मय से पूछा, “विश्वास को बनाए रखने के लिए?” 

“हां, वह किसान सचमुच में भोला और सच्चा है। उसे अपने राजा पर अगाध विश्वास एवं श्रद्धा है। वह उस चमकीले पत्थर को मणि समझकर ही लाया था। और वह चाहता था कि वह मणि राजा के पास रहे। अगर सचमुच वह चमकीला पत्थर न होकर मणि ही होती, तो उसकी कीमत करोड़ों स्वर्ण-मुद्राएं होतीं, वह किसान भी उसकी कीमत जानता था, फिर भी उसे लोभ न छू सका।

उसका राजा के प्रति जो विश्वास था, वह सचमुच अनुकरणीय है। स्वर्ण मुद्राएं तो मैंने उसके विश्वास को जीवित रखने के लिए दी हैं। हमने विश्वास का सौदा किया है और यह सौदा घाटे का हरगिज नहीं है।” राजा ने आत्मविश्वास से कहा। 

सेनापति राजा द्वारा किसान को स्वर्ण-मुद्राएं देने के रहस्य को समझ गया। दरबारी भी राजा की जय-जयकार करने लगे।

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