ज्ञानवर्धक प्रेरक कहानियां-एकता की ताकत

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बुद्धिवर्धक कहानियां-समझ को तराशने वाला अनूठा कहानी

एकता की ताकत काफी समय पहले की बात है। किसी गांव में एक बहुत ही ईमानदार और परोपकारी जमींदार रहता था। उसके तीन बेटे थे। जमींदार जितना ईमानदार और परोपकारी था उसके तीनों बेटे उतने ही बेईमान और आलसी थे। वे दिन भर पड़े रहते और जब कोई काम करने की बात होती तो आपस में लड़ने लगते। तीनों भाई गांव वालों को सताने से भी बाज नहीं आते। 

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उसी गांव में एक गरीब रामधन के भी तीन बेटे थे। जमींदार के खेतों पर दिन भर कड़ी मेहनत से काम करते लेकिन बदले में उन्हें इतना कम पैसा मिलता कि उनके परिवार को पेट भर भोजन भी नसीब नहीं होता। फिर भी वे खाली बैठने की अपेक्षा जमींदार के खेतों पर ही काम करते रहे। 

एक दिन अचानक जमींदार की मृत्यु हो गई। उसके मरते ही तीनों बेटे और निकश हो गए। अब वे आपस में दिन भर लड़ते और गांव वालों को भी शिक सताते। एक दिन रामधन के बेटों को जरा-सी बात पर उन्होंने मारा-पीटा और नौकरी से निकाल दिया। 

वृद्ध रामधन बड़ा दुखी था। एक माह से उसके जवान लड़के बेरोजगार थे। लोटे पोते-पोतियों का दुख उससे देखा न जाता। उसके पास जो कुछ भी था, वह सब समाप्त हो चुका था। 

एक दिन उसने अपने तीनों बेटों को बुलाया और बोला, “बच्चो, एक माह से तम लोग बेकार हो, मेरे पास जो कुछ था मैंने खर्च कर दिया। अब कुछ भी नहीं बचा। तुम्हारे छोटे-छोटे बच्चों का दुख मुझसे देखा नहीं जाता। तुम लोग जवान हो, मेहनती हो, कुछ काम क्यों नहीं करते?” 

“मगर बापू हम क्या कर सकते हैं ? खेती के सिवा हमें कोई काम नहीं आता और जमीन हमारे पास है नहीं। अब तुम्हीं बताओ हम क्या करें?” बड़ा भाई बोला। शेष दोनों भाई आज्ञाकारी सेवकों के समान उसके पीछे चुपचाप खड़े थे। 

“ठीक है, एक काम करो। जब तुम्हें इस गांव में कोई काम-धंधा नहीं मिलता तो परदेश जाकर कमाओ। बिना कमाए किसी का गुजारा नहीं होता।” रामधन ने हृदय पर पत्थर रखकर अपने जवान बेटों को परदेश जाने की आज्ञा दी। 

“ठीक है बापू, जैसा आप कहते हैं हम वैसा ही करेंगे,” कहते हुए बडे भाई ने अपने दोनों छोटे भाइयों की ओर देखा। वे सिर झुकाए खड़े थे। जैसे कह रहे हों कि बापू की आज्ञा हमें भी स्वीकार है। 

अगले दिन तीनों भाई तैयार होकर वृद्ध पिता के पास गए। रामधन चारपाई पर बैठा खांस रहा था। तीनों भाइयों ने पिता के पैर छुए और कमाने के लिए घर से परदेश जाने के लिए निकल गए। वृद्ध रामधन ने उन्हें बड़े दुखी मन से विदा किया। उसकी आंखों में आंसू थे। चलते समय उसने पड़ोसी के यहां से आया एक तरबूज उनको दे दिया। 

वे शीघ्र ही नदी के निकट पहुंच गए। पानी पीने के बाद तरबूज काटने लगे किंतु चाकू में कम धार होने से तरबूज कट न सका। बड़े भाई ने एक भाई को चाक पर धार करने, दूसरे को तरबूज पकड़ने का काम सौंपा और स्वयं सबके आराम करने के लिए जमीन साफ करने लगा। 

बरगद का पेड़ बहुत पुराना था। उस पर एक भूत रहता था। वह रात भर इधर-उधर घूमता और दिन में पेड़ पर आ जाता और पेड़ पर पड़ा-पड़ा सोता रहता। अंधेरा होते ही उठता और घूमने-फिरने निकल जाता। यही उसका नित्य नियम था। 

 अभी अंधेरा होने में देर थी, लेकिन पेड़ के नीचे की आवाज सुनकर भूत की नींद खुल गई। कुछ देर तक वह आंखें मलता रहा, फिर नीचे देखा तो देखता ही रह गया। बरगद के पेड़ के ठीक नीचे तीन हृष्ट-पुष्ट युवक खड़े थे। उनमें से एक के पास चाकू था। 

भूत घबरा गया। उसने सोचा, शायद मेरी चोटी काटना चाहते हैं। भागने का भी कोई रास्ता नहीं है। चलो, नीचे चलकर देखा जाए कि ये लोग कौन हैं और क्या करने आए हैं? डरते-डरते भूत नीचे उतरा। 

“तुम लोग कौन हो और यहां क्या करने आए हो?” भूत की आवाज में घबराहट थी। अचानक एक अजनबी को अपने सामने पाकर तीनों भाई डर गए, लेकिन  बड़े भाई ने हिम्मत की। दोनों छोटे भाई अपनी आदत के अनुसार बड़े भाई के पीछे हिम्मत बांधकर खड़े हो गए। 

“पहले तुम बताओ कि तुम कौन हो?” बड़े भाई ने हिम्मत करके अपनी आवाज को कठोर बनाते हुए पूछा। 

“मैं भूत हूं। इसी बरगद पर रहता हूं। अगर मुझसे कोई गलती हो गई हो तो माफ करना भाई।” भूत ने अत्यंत दयनीय स्वर में कहा। 

बड़े भाई की कड़क आवाज सुनकर वह समझ गया कि अवश्य कोई खतरा है। इसके साथ ही दोनों भाई इस प्रकार खड़े हो गए कि भूत को दाल में कुछ काला नजर आने लगा। 

भूत का नाम सुनते ही तीनों भाइयों के होश उड़ गए। लेकिन भूत की बात सुनकर समझ गए कि वह उनसे डर रहा है। शीघ्र ही बड़े भाई ने अपनी घबराहट पर काबू पा लिया और फिर अपनी आवाज को और अधिक कठोर बनाते हुए बोला, “अच्छा, तो तुम ही हो बरगद वाले भूत जिसकी चोटी काटने के लिए हमारे गांव के तांत्रिक ने हमें चाकू और कुछ मंत्र बताकर भेजा है। कहते हैं भूत की जान उसकी चोटी में होती है।” इसीलिए भूत चोटी के कटने से डर रहा था। 

“हां महाराज, मैं ही बरगद वाला…,” भूत की आवाज चोटी के काटे जाने के डर से निकल नहीं रही थी। 

फिर बड़ा भाई मंत्र पढ़ने का नाटक करते हुए बोला, “लाओ चाकू मुझे दो, मैं अभी इसकी चोटी काटता हूं।” बड़े भाई ने छोटे भाई की तरफ चाकू लेने के लिए हाथ बढ़ाया। वह सोच रहा था कि चोटी काटने के डर से भूत भाग जाएगा और हम इस मुसीबत से बच जाएंगे। 

“नहीं महाराज, मेरी चोटी मत काटो, मैं तुम्हें धनवान बना दूंगा, लेकिन मेरी चोटी मत काटो।” भूत गिड़गिड़ाने लगा। 

“अगर तुम हमें खुश कर दो तो हम तुम्हारी चोटी नहीं काटेंगे।” बड़े भाई का स्वर थोड़ा नरम हो गया। 

भत उन्हें एक गुफा में ले गया, जिसमें सोने, चांदी, हीरे, जवाहरातों के ढेर होथे। तीनों भाइयों ने एक गठरी बांधी और भूत को धन्यवाद देते हुए अपने गांव आ गए। 

अब वे बड़े आराम से रहने लगे। उनके पास शानदार भवन व ऐशो-आराम के सभी साधन हो गए थे। धीरे-धीरे यह बात जमींदार के तीनों लड़कों ने भी सुनी। वे निर्धन रामधन के धनी होने का राज जानने के लिए उसके पास पहुंचे। वृद्ध रामधन ने बात बता दी। 

अगले दिन जमींदार के तीनों बेटे भी जंगल की ओर चल दिए। शाम उसी बरगद के पेड़ के नीचे पहुंच गए। तीनों का भूख-प्यास और थकान से बा हाल था। अंधेरा होने लगा था। तभी बड़े भाई ने तरबूज काट लिया। वह तरबज की फांकें काटकर देने लगा।

किंतु अंधेरे के कारण किसी भाई को कम किसी को ज्यादा तरबूज जाने से वे लड़ पड़े। लड़ाई में उनका चाकू भी वहीं-कहीं अंधेरे में खो गया। इतने में वही भूत बरगद के पेड़ से फिर नीचे उतरा। उन तीनों भाइयों को अलग-अलग देखकर वह भूत उन पर हावी हो गया। उसने कड़ककर कहा, “तुम कौन हो?” 

तीनों भाइयों ने कहा, “हम भूत के बाप हैं। तुझे मजा चखाएंगे।” भतर उनसे भी कड़कती आवाज में कहा, “तुम तो पहले ही आपस में लड़ रहे हो लड़ते-लड़ते तुमने अपना हथियार (चाकू) भी खो दिया है। तुम मुझे क्या मजा चखाओगे? तुम उन तीनों भाइयों का मुकाबला नहीं कर सकते। उनमें एकता है, वे ईमानदार हैं, अपने हाथों से मेहनत करना जानते हैं।

वे स्वार्थी भी नहीं हैं। उन्होंने अपने पिता की आज्ञा का पालन भी किया है। उनकी इसी ताकत के कारण मुझे उनकी सहायता करनी पड़ी मगर तुम! तुम्हें तो फूटी कौड़ी भी नहीं मिलेगी।” यह कहकर भूत ने उन तीनों को मार-मारकर अधमरा कर दिया। उनके कपड़े फाड़ दिए। हताश तीनों भाई किसी तरह अपने घर वापस लौट आए। 

वास्तव में, शुद्ध कर्मशील, प्रभु भक्त लोग किसी न किसी बहाने से प्रभु के आशीर्वाद के भागीदार बन जाते हैं। 

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