ज्ञानवर्धक प्रेरक कहानियां-बाबा का कंबल

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ज्ञानवर्धक प्रेरक कहानियां-बाबा का कंबल

बुद्धिवर्धक कहानियां-समझ को तराशने वाला अनूठा कहानी

बरसों पहले की बात है, किसी राज्य में राजा नीरज सिंह राज्य करते थे। वे बहुत ही नेक और दरियादिल थे। प्रजा उनके गुण गाए नहीं थकती थी। पर उनके बेटे करण का स्वभाव विपरीत था। वह बहुत ही बिगडैल था। बचपन से ही नीरज सिंह और रानी निर्मला के लाड़-प्यार ने उसे इस कदर बिगाड़ दिया कि वे भी अपने बेटे के कर्मों को देखकर पछताते। उसे समझाते, पर वह सुनता नहीं था। लोग उसके कर्मों से परेशान थे। पर राजदरबार में जाकर शिकायत नहीं करते थे। 

एक दिन करण सुबह उठकर नित्यकर्म से निपटकर भोजन करने के पश्चात अपने दोस्तों की टोली के साथ निकल पड़ा, वह और उसके दोस्त घोड़ों पर सवार थे। सभी राज्य से दूर जंगल में पहुंच गए। वहां एक सुंदर हिरण का पीछा करते हुए करण अपने साथियों से बिछड़ गया। बहुत देर ढूंढ़ने के पश्चात भी उसका कोई साथी नहीं मिल पाया। रात का अंधेरा धीरे-धीरे गहराने लगा। जंगल में सांय-सांय की आवाजें होने लगीं। अपने घोड़े के साथ डरते हुए करण महल लौटने के लिए चल पड़ा।

अचानक किसी जानवर की आवाज से घोड़ा जोर से हिनहिनाया और अपनी लगाम छुड़ाकर भाग गया। करण ने थोड़ी दूर तक उसका पीछा किया पर घोड़ा जाने किधर जाकर गुम हो गया। करण मन ही मन सोचने लगा-अब तो किसी का भी सहारा नहीं रहा। किसी जानवर की नजर मुझ पर पड़ गई तो बेमौत मारा जाऊंगा। सभी दोस्त और घोड़ा भी गुम हो गए। अब अकेला कैसे महल जाऊं…हे भगवान! तू ही कोई रास्ता दिखला। 

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। जंगल में जानवरों की भयंकर गूंजती आवाजें उसे बेचैन कर रही थीं। ठंड के दिन होने से तन में ठिठुरन हो रही थी। क्योंकि महल से जो कंबल वह लेकर चला था, वह घोड़े पर ही रह गया था। ठिठुरते हुए आगे बढ़ा। धीरे-धीरे अंधेरा गहरा गया और ठंड भी बढ़ गई। अंधेरे में कुछ सूझ नहीं रहा था। बहुत दूर एक जगह रोशनी देखकर करण उधर ही बढ़ गया। वहां पहुंचने पर उसने देखा, मिट्टी की झोंपड़ी बनी है। बड़ा-सा कंदील जल रहा है। उसकी रोशनी दूर तक फैल रही है। अंदर झांककर देखा।

एक बाबा खाट रोदे बैठे भगवान के भजन गा रहे हैं। आहट सुनकर उन्होंने पूछा कौन हैं|करण डर कर भागने लगा। वे बाहर आए और बोले, “बेटे! इधर आओ। मैं चोर डाक या लुटेरा नहीं हूं। बेधड़क होकर मेरे पास आओ।” करण उनके पर पहंचा, वे उसे अंदर ले गए। उसे ठिठुरते देख उन्होंने अपना ओढा कंबल उसारकर उसे दे दिया। करण उन्हें कंबल वापस देते हुए बोला, “बाबा! यह आप क्या कर रहे हैं? आपको ठंड लगेगी।” 

बाबा हंसते हुए बोले, “मुझे तो यहां बरसों हो गए हैं। ठंड से मुकाबला करने की शक्ति मुझमें है।” और उन्होंने कंबल करण को दे दिया। फिर उन्होंने पडा, “बेटे, तुम कौन हो और यहां कैसे पहुंचे।” 

करण ने असली बात छुपा ली, क्योंकि उसे मालूम था कि अगर असली बात इन्हें मालूम हो गई तो ये मुझे धक्के देकर निकाल सकते हैं। बाबा ने उससे भोजन के लिए पूछा, उसने ना-नुकुर की। पर वे नहीं माने। उन्होंने चूल्हा जलाया, चावल-दाल में मसाले मिलाकर पतीली में चढ़ाकर ढक्कन ढक दिया। करण को भी चूल्हे के पास बुला लिया और बातें करने लगे। 

खिचड़ी तैयार होने पर बाबा ने एक थाली में रखकर करण को दी। पहले तो करण उसे देखकर मन में सोचने लगा-राजसी भोजन के आगे यह कहां अच्छी लगती है? पर बाबा का मन रखने के लिए वह खाने लगा। खाने पर बहुत अच्छी और स्वादिष्ट लगी। राजसी भोजन के लिए मन में सोचा-इसके आगे वह कुछ भी नहीं है। 

खिचड़ी खाने के पश्चात बाबा और वह बहुत देर तक चूल्हे के पास अग्नि की गरमाहट में बातें करते रहे। जाने कब उनकी आंख लग गई। सुबह होने पर करण ने बाबा से कहा, “आपने रात में मुझे आश्रय देकर बहुत कृपा की है। अब मैं जाना चाहता हूं।” उसने बाबा के चरण छुए और जाने लगा। बाबा ने उससे ठिकाने के बारे में पूछा। उसने झूठ बोल दिया कि मेरा कोई ठिकाना नहीं है। 

बाबा उसे कंबल देते हुए बोले, “बेटे! मैं तुम्हें जोर देकर रोक नहीं सकता। पर यह कंबल अपने साथ ले जाओ। ठंड के दिन हैं, तुम्हारे काम आएगा।” 

उसने इनकार करना चाहा। पर बाबा ने जबरदस्ती दे दिया। वह चल पड़ा। बाबा बोले, “कभी इधर आओ तो मिलना नहीं भूलना।” 

करण कंबल लेकर चला गया। बहुत समय तक चलने के बाद जंगल खत्म हुआ। राज्य का रास्ता आया। उसने कंबल को फेंकना चाहा पर उसकी अंतरात्मा ने जैसे उसे धिक्कारा कि उस बूढ़े ने अपनी फिक्र न करते हुए तुम्हें अपना कंबल दिया और तुम हो कि इसे फेंकना चाहते हो। करण कंबल लेकर महल पहुंचा। उसे देखकर पिता नीरज सिंह और माता निर्मला देवी खुश हो गए। उन्होंने उसे गले लगाया। 

रानी करण से बोली, “बेटे! रात से हम जाग रहे हैं। कल तेरे दोस्तों ने आकर सारी बात बतलाई। तब से हम बेचैन हैं। हमने जंगल में अपने आदमी भी भेजे थे पर वे निराश ही लौटे। तब से हमें नींद नहीं आई है। बेटा चाहे कैसा भी हो, माता-पिता के लिए तो वह आंखों का तारा ही रहता है।” 

करण भी रोते हुए बोला, “मां, तुम सच कह रही हो।आज मुझे समझ में आ गया है।” 

उसके हाथ में कंबल देखकर राजा-रानी ने कारण पूछा। उसने सारी बात बतलाई और बोला, “बाबा के लिए गरम कपड़े और जरूरत का सामान पहुंचाएं पर उन्हें मेरे बारे में कुछ नहीं बताएं।” 

राजा नीरज सिंह ने बाबा के पास सारा सामान पहुंचा दिया। उनके पूछने पर झूठ बोल दिया कि हमें आपके बारे में मालूम हुआ था। हमसे रहा नहीं गया और हमने सामान पहुंचा दिया। 

उस दिन के पश्चात करण का स्वभाव ही बदल गया। वह राज-काज के काम में अपने पिता का हाथ बंटाने लगा। बुरी संगत भी छोड़ दी। राजा नीरज सिंह और रानी निर्मला समझ गए कि यह सब बाबा और बाबा द्वारा दिए गए कंबल का ही कमाल है। वे मन ही मन बाबा को दुआएं देते थे।