ज्ञानवर्धक प्रेरक कहानियां-चतुरी चाचा की चौपाल 

ज्ञानवर्धक प्रेरक कहानियां-चतुरी चाचा की चौपाल 

ज्ञानवर्धक प्रेरक कहानियां-चतुरी चाचा की चौपाल 

बुद्धिवर्धक कहानियां-समझ को तराशने वाला अनूठा कहानी

चतुरी चाचा का असली नाम कोई नहीं जानता। उनकी सूझ-बूझ, बुद्धि और के कारण वे चतुरी चाचा के नाम से ही अधिक प्रसिद्ध हैं। कठिन से कठिन समस्या का समाधान वे बड़ी सरलता से कर देते हैं। इसलिए उनकी चौपाल में या कोई न कोई अपनी समस्या लेकर बैठा ही रहता है। दूर-दूर से लोग उनकी चौपाल में आते हैं। 

एक दिन की बात है। चाचा अपनी चौपाल में बैठे हुक्का पी रहे थे। तभी पास के गांव के तीन भाई आए। उनके साथ ग्यारह बैल थे। बडे भाई ने प्रार्थना की, “चाचा जी, हमारे बैलों का बंटवारा कर दीजिए।” “समस्या क्या है?” चतुरी चाचा ने पूछा। 

“हमारे पिताजी का स्वर्गवास हो गया है। उनकी इच्छानुसार हमने जमीन जायदाद का बंटवारा तो कर लिया है, लेकिन बैलों का बंटवारा हमसे नहीं हो रहा है।” मझला भाई बोला। “कठिनाई क्या है?” चाचा ने प्रश्न किया। 

“पिताजी की इच्छा थी कि आधे बैल बड़े भैया लें। बड़े भैया को जितने बैल मिलें उनके आधे मझले भैया लें और एक तिहाई मैं लूं। हमारी समझ में नहीं आ रहा है कि यह बंटवारा हम कैसे करें। बैलों को काट कर तो बंटवरा कर नहीं सकते।” छोटे भाई ने कहा। 

चतुरी चाचा ने पलभर सोचा। फिर बोले, “कोई बात नहीं, हम तुम्हारे पिताजी की इच्छा के अनुसार अभी बंटवारा किए देते हैं।” चतुरी चाचा ने अपना एक बैल खोलकर उनके ग्यारह बैलों के पास खड़ा कर दिया। फिर पूछा, “बोलो, अब कुल कितने बैल हैं?” “बारह!” सब एक साथ बोले। 

“ठीक! बारह के आधे हुए छः। तुम छ: बैल ले लो।” चाचा ने बड़े भाई से कहा। उसने छ: बैल ले लिए। “बडे भैया के हिस्से के छ: बैलों के आधे तीन हुए। मझला भाई तीन बैल ले ले।” चाचा बोले। “छ: बैलों के दो तिहाई हुए दो बैल। तुम अपना हिस्सा ले लो।” चाचा ने छोटे भाई से कहा। उसने दो बैल ले लिए। “अब बचा हुआ अपना एक बैल मैं लिए लेता हूं।” 

तीनों भाई संतुष्ट होकर चले गए, जो लोग बंटवारे का तमाशा देखने के लिए जमा हो गए थे, वे चाचा की सूझबूझ और चतुराई देखकर दंग रह गए। उन लोगों के जाने के कुछ देर बाद ही एक सज्जन आए और हाथ जोडकर बोले, “चाचा जी, मेरी इज्जत बचाइए।” 

“क्या बात है? कुछ बताओ तो।” चाचा ने पूछा। “मैं अपनी बेटी का रिश्ता लेकर पास के गांव में गया था। लड़का शहर में पढ़ता है। घर बहुत अच्छा है। बात-बात पर मैंने लड़के की उम्र पूछ ली। बस लड़के के दादा उखड़ गए। बोले, “मेरा बेटा मुझसे बीस साल छोटा है। पौत्र मेरे बेटे से तीस साल छोटा है। मेरे बेटे और पौत्र की उम्र का योग मेरी उम्र के बराबर है। जाइए, सोचकर बताइए आपकी बेटी का रिश्ता हो सकता है या नहीं। चाचा जी, मेरी समझ में तो यह पहेली आई ही नहीं। आप ही हल करके मेरी मदद करें।” 

चाचा जी कुछ देर आंखें बंद करके सोचते रहे। फिर बोले, “दादा की उम्र है सत्तर साल, पिता की पचास साल और पौत्र की बीस साल।” “मेरी बेटी अठारह साल की है। तब तो रिश्ता हो सकता है।” सज्जन प्रसन्न होकर बोले। “दादा को पहेली का हल भी बता देना।” चाचा ने हंसकर कहा, “बल्कि अच्छा तो यह होगा कि पहेली का जवाब पहेली से दिया जाए। आपकी उम्र क्या है?” “चौवन साल!” 

“ठीक! तो उनसे कहना कि मेरी उम्र आपके बेटे की उम्र से चार साल अधिक है और मेरी बेटी की उम्र मेरी उम्र की तिहाई है। मेरी समझ से तो संबंध हो सकता है। लेकिन अंतिम फैसला तो आपको ही करना है।” 

“वाह! क्या रहेगा नहले पर दहला।” कहकर वे सज्जन चतुरी चाचा का गुणगान करते हुए चले गए।