ज्ञानवर्धक कथा-पहले मैं खाऊंगा

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ज्ञानवर्धक कथा-पहले मैं खाऊंगा

बुद्धिवर्धक कहानियां-समझ को तराशने वाला अनूठा कहानी

एक गांव में शंभु नाम का एक ब्राह्मण रहता था। शंभु बहुत दरिद्र था। रोज सुबह उठकर वह भिक्षा मांगने निकल जाता और जो कुछ भी मिलता उसी से पेट भर लेता। 

एक बार एक यजमान को उस पर दया आ गई। यजमान ने सोचा कि क्यों न मैं इसे एक बैलों की जोड़ी दान कर दूं। बैलों की देखरेख में उसका अकेलापन भी दूर हो जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर वह उन्हें बेच भी सकेगा। यही सोचकर उसने शंभु को बैलों की जोड़ी दान कर दी। शंभु तो खुशी से फूला न समाया। उसकी दिनचर्या ही बदल गई।

सुबह उठकर वह पहले बैलों के स्थान की सफाई करता। उन्हें तालाब में नहलाने-धुलाने ले जाता। फिर भिक्षा से प्राप्त अन्न में से काफी बड़ा हिस्सा बैलों को खिलाकर स्वयं भोजन करता। दिन चढ़ते ही वह भिक्षा मांगने के लिए निकल पड़ता। संध्या को जब वह घर लौटता तो खूब थका होता, फिर भी बैलों को घास चराने नदी के किनारे ले जाता। बैल भी उसके लाड प्यार और देखभाल के कारण कुछ ही दिनों में हृष्ट-पुष्ट हो गए, जो भी बैलों की जोड़ी को देखता, बस देखता ही रह जाता। 

एक दिन ब्राह्मण बैलों को तालाब में नहला रहा था कि एक चोर की दृष्टि उन पर पड़ी। ऐसे हृष्ट-पुष्ट बैलों को देखकर चोर की लार टपकने लगी। उसने निश्चय किया कि वह बैलों को चुरा लेगा और फिर उन्हें हाट में बेच देगा। रात को जब वह बैल चुराने निकला तो एक वृक्ष के पास उसकी भेंट एक भयंकर आदमी से हुई, जिसके लंबे-लंबे दांत थे, लाल आंखें थीं, देह पर कांटों-से बाल उगे हुए थे। 

“तुम कौन हो?” चोर ने डरते-डरते पूछा। 

“मैं ब्रह्मराक्षस हूं, तुम कौन हो और इतनी रात को कहां जा रहे हो?” ब्रह्मराक्षस ने पूछा। 

“बगल के गांव में एक दरिद्र ब्राह्मण रहता है। उसके पास बैलों की एक सुंदर जोड़ी है। मैं उन्हीं को चुराने जा रहा हूं। लेकिन तुम कहां जा रहे हो?” 

ब्रह्मराक्षस बोला, “मैं तीन दिनों में एक बार भोजन करता है। आज का मेरा योजन वही ब्राह्मण है, जिसके घर तुम बैल चुराने जा रहे हो।” चोर ने प्रसन्न नोकर कहा, “वाह ! तब तो अच्छा साथ रहेगा। हम एक ही नाव के यात्री हैं।” 

वे दोनों ब्राह्मण के घर पहुंचे और छिपकर बैठ गए। फिर बाट जोहने लगे कि कब ब्राह्मण सोए और वे अपना काम करें। जब ब्राह्मण गहरी नींद सो गया तो ब्रह्मराक्षस उसे खाने के लिए आगे बढ़ा। 

चोर ने उसे टोका, “मित्र यह न्याय संगत नहीं है। पहले मैं बैल चुरा लूं फिर तुम ब्राह्मण को खाना।” 

ब्रह्मराक्षस बोला, “बैलों को चुराते हुए खटका होगा। वह जाग गया तो मैं भूखा रह जाऊंगा। तुम मुझे पहले ब्राह्मण को खा लेने दो।” 

चोर बोला, “जब तुम ब्राह्मण को खाओगे तो उसे पीड़ा होगी सो वह कराहेगा और कराह सुनकर आसपास के लोग एकत्र हो जाएंगे। फिर मैं बैलों को नहीं चुरा पाऊंगा। इसलिए पहले मुझे बैलों को चुराने दो।” 

दोनों में जमकर तू-तू-मैं-मैं होने लगी। न राक्षस चोर की बात मानने को तैयार हुआ न ही चोर उसकी। थोड़ी देर बाद दोनों झगड़ पड़े। शोरगुल सुनकर ब्राह्मण जाग गया। उसे देखकर चोर ने बात बनाई, “ब्राह्मण यह राक्षस तुझे खाना चाहता है। पर शोर मचाकर मैंने तुझे बचा लिया।” 

ब्रह्मराक्षस ने चोर की बात काटी, “यह चोर सरासर झूठ बोल रहा है। यह तुम्हारे बैलों को चुराने आया था। मैंने शोर मचाकर तुझे लुटने से बचा लिया।” 

ब्राह्मण तुरंत उनके नीच इरादों को भांप गया। वह मन ही मन अपने इष्ट देव को याद करने लगा। इष्ट देव को याद करते ही ब्रह्मराक्षस फौरन घर से भाग निकला। ब्रह्मराक्षस के भागते ही ब्राह्मण ने लपककर लाठी उठा ली और लगा चोर की पिटाई करने। चोर भी किसी प्रकार से अपने प्राण बचाकर भागा। 

तब से किसी को ब्राह्मण को तंग करने का साहस नहीं हुआ। 

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