ज्ञानवर्धक कहानियां-साधु की सीख 

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बुद्धिवर्धक कहानियां-समझ को तराशने वाला अनूठा कहानी

किसी गांव में एक किसान रहता था। उसके दो बेटे थे। बड़ा बेटा चालाक था। छोटा भोला था। एक दिन किसान चल बसा। बड़े ने कहा, “देख भाई पिताजी तो रहे नहीं। आओ हम घर व सामान का बंटवारा कर लें। छोटा सहमत हो गया। सारा बंटवारा बड़े ने किया। अंत में तीन चीजें बची रहीं। जिसका बंटवारा संभव नहीं था। एक कंबल, एक आम का पेड़ और एक गौरा गाय। 

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बड़ा बोला, “देख छोटे, इन तीनों का बंटवारा भी मैं कर दूंगा। बोलो है मंजूर?” 

छोटा बोला, “मैं क्या कहूं, तुम जो ठीक समझो!” 

बड़ा बोला, “देख छोटे, कंबल दिन के समय तेरा, रात को मेरा। पेड़ नीचे का तेरा, ऊपर का मेरा, गौरा गाय आगे की तेरी, पीछे की मेरी, ठीक?” छोटा बोला, “ठीक है!” 

समय बीतता गया। छोटा कंबल को झाड़कर साफ करता, तह लगाकर रखता। रात को बड़ा ओढ़ लेता। वह पेड़ में पानी डालता, रखवाली करता। फल बड़ा तोड़ लेता। वह गौरा गाय को घास खिलाता, पानी पिलाता, मगर दूध बड़ा निकाल लेता। इसी तरह छोटा इस बंटवारे को स्वीकार करके काम के बोझ तले दब गया और बड़ा मजे करता रहा। 

एक दिन छोटा घास काटता हुआ अपने साथ हुए अन्याय के बारे में सोच सोचकर रो रहा था। वहां से एक साधु गुजर रहा था। उसने बालक को रोते देखकर पूछा, “बेटा, तुम रो क्यों रहे हो?” 

छोटे ने अपने साथ घटी सारी घटना साधु बाबा को कह सुनाई। 

साधु बाबा बोला, “बस इतनी सी बात? इसका इलाज मैं एक पल में कर सकता हूं।” 

छोटा बोला, “वह कैसे महाराज?” 

“इधर आओ.” बाबा बोले, “मैं तुम्हारे कान में एक मंत्र बोलता हं। ध्यान से सुनो और जैसा मैं कहूं वैसा करना।” दो’ का देकर चला। 

साधु बाबा ने बालक के कान में कुछ कहा और सिर पर हाथ रखकर ‘सुखी रहो काआशीर्वाद  देकर चला गया। छोटा प्रसन्न होता हुआ घास लेकर आया। घास खिलाई, पानी पिलाया। बड़ा जब बाल्टी लेकर गौरा का दूध लगा तो छोटे ने गौरा के सींग पकड़कर हिला दिये। गौरा उछली, बडे को और दध की बाल्टी गिर गई। बड़ा क्रोध से बोला, “यह क्या किया तूने। सारा दूध बिखर गया।” 

छोटा बोला. “आगे की गाय मेरी है, चाहे मैं घास खिलाऊं, चाहे पीटं, सींग पकडूं, मेरी मरजी।” बड़ा चुप रहा। 

रात को बड़ा सोने लगा तो क्या देखता है, पूरा का पूरा कंबल पानी से भीगा हुआ था। 

“ये क्या किया छोटे,” बड़ा चिल्लाया। 

छोटा बोला, “कंबल दिन में मेरा है। चाहे मैं गीला करूं या सूखा रखू मेरी मरजी।” 

अगले दिन बड़ा आम तोड़ने के लिए पेड़ पर चढ़ा हुआ था। छोटे ने तना पकड़ा और जोर-जोर से हिलाना शुरू कर दिया। 

बड़ा घबराया और चीखा, “ये क्या कर रहे हो, तुम देखते नहीं, मैं पेड़ पर चढ़ा हुआ हूं। गिर जाऊंगा।” 

छोटा बोला, “मेरी बला से, पेड़ के नीचे का हिस्सा मेरा है, मैं तो ऐसे ही हिलाऊंगा। बंटवारा भी तो तुमने अपनी मरजी से किया था, अब भुगतो।” 

बड़ा समझ गया कि अब उसकी चालाकी के दिन पूरे हुए। अपनी दाल न गलती देख उसने कहा, “छोटे, चलो बंटवारा फिर से कर देता हूं। पेड़ के फल भी आधे आधे हम दोनों के, गाय का दूध भी आधा-आधा दोनों का और कंबल एक रात तुम ओढ़ लो और एक रात मैं ओढ लूंगा। घास भी दोनों मिलकर लाएंगे और पेड़ में पानी भी दोनों मिलकर देंगे।” 

इस प्रकार साधु बाबा की सीख से छोटे को अन्याय से मुक्ति मिली। 

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