ज्ञानवर्धक कहानियां-कीमती धन 

ज्ञानवर्धक कहानियां-कीमती धन 

ज्ञानवर्धक कहानियां-कीमती धन 

बुद्धिवर्धक कहानियां-समझ को तराशने वाला अनूठा कहानी

एक शहर में दो सुनार भाई साझे में दुकान चलाते थे। उनकी सोने-चांदी के आभषणों की दुकान थी। जब वे सोने-चांदी की वस्तुओं की खरीदारी के लिए बाहर जाते, तो दुकान में ताला लगाना पड़ता था। इस कारण पीछे से कई ग्राहकों को निराश होकर खाली हाथ लौटना पड़ता था। 

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इस समस्या से निपटने के लिए उन्होंने सोचा, क्यों न हम एक योग्य एवं अनभवी नौकर अपनी दुकान में काम करने के लिए रख लें। विचार करके उन्होंने एक योग्य, अनुभवी एवं परिश्रमी नौकर की खोज करके उसे अपने यहां रख लिया। नरोत्तम पढ़ा-लिखा एवं समझदार था। सोने-चांदी की दुकान पर काम करने का उसे अनुभव था। दूसरे दिन सुबह ठीक समय पर नौकर नरोत्तम दुकान पर हाजिर हो गया। दोनों भाइयों ने उसे आभूषणों एवं वस्तुओं के भाव तथा दुकानदारी करने का नजरिया समझा दिया। नरोत्तम तेज बुद्धि का था, इसलिए जल्दी ही सब समझ गया। 

पहले ही दिन एक कार आकर उनकी दुकान के आगे रुकी। उसमें से एक सेठ बाहर निकला। सेठ ने दुकान में सजी वस्तुओं एवं गहनों को देखा। तभी उसकी नजर मीने की बारीक कारीगरी वाली चूड़ियों पर पड़ी। 

सेठ ने नरोत्तम से पूछा, “ये चूड़ियां कितने की हैं?” नरोत्तम ने जवाब दिया, “सेठ जी ग्यारह हजार रुपये की।” 

सेठ ने नरोत्तम को दस हजार रुपये दिए, और कहा, “बाकी के एक हजार रुपये मैं अपने नौकर के हाथ भिजवा दूंगा। जल्दबाजी में भूल गया।” 

नरोत्तम ने दस हजार रुपये गिने और कहा, “ठीक है, भिजवा दीजिए।” 

जैसे ही सेठ कार मैं बैठकर रवाना हुआ, दोनों भाई नरोत्तम पर चिल्लाने लगे, “दुकान में पहला दिन, पहला ग्राहक और एक हजार रुपये का उधार? कौन चुकाएगा सेठ का बकाया धन?” 

तभी नरोत्तम मुस्कराया और कहने लगा, “सेठ जी चुकाएंगे अपना बकाया. धन। मैं भी उनकी आंखों की बेइमानी समझ गया था।” 

पहला भाई बोला, “सेठ जी! अब क्यों आएंगे, उन्हें तो आराम से हजार की कमाई हो गई। दुकान पर वस्तुएं बेचते-बेचते हमारे बाल सफेद हो आए हैं, ऐसे ग्राहक बस धोखा देने ही आते हैं। मैं यह रकम तुम्हारी तनख्वाह में से काटूंगा।” 

नरोत्तम बोला, “आप काट लीजिएगा, पर सेठ जी जरूर आएंगे। मेरा दांव उन्हें खींचकर वापस दुकान पर लाएगा और वह भी हजार रुपयों सहित, समझे।” 

दोनों भाइयों को नरोत्तम पर यकीन नहीं आया। सेठ जी के हजार रुपये कम देने और उनके चेहरे की चतुराई देखकर नरोत्तम ने तुरंत अपनी बुद्धि तथा अनुभव से काम लिया था। चूड़ियां आठ थीं उसने चार बांध कर दे दी। उसे मालूम था कि घर जाते ही सेठानी सेठ जी को चूड़ियों की संख्या कम बताएगी, तब सेठ जी सिर पर पांव रखकर भागे आएंगे। तब नहले पर दहला हो जाएगा। मालिक भी उसकी चतुराई का लोहा मान जाएंगे। सारा खेल नरोत्तम ने काफी सोच-विचार के साथ खेला था। अभी नरोत्तम सोच ही रहा था कि सेठ का नौकर आया। 

नरोत्तम का अनुमान सही निकला। नौकर ने हजार रुपये नरोत्तम को दिए नरोत्तम रुपये लेकर नौकर से बोला, “माफी चाहता हूं, जल्दबाजी में भूल हो गई।” फिर उसने शेष बची चार चूड़ियां दे दी। नरोत्तम ने नौकर से कहा, “सेठ जी को कह देना मैं पूरी चूड़ियां बांध न सका, इसके लिए मैं क्षमा मांगता हूं।” 

नौकर चला गया। तभी दोनों भाई एक साथ बोले, “वाह ! नरोत्तम तेरे अनुभव की तो दाद तेनी पड़ेगी। हमें जैसे व्यक्ति की तलाश थी, वह तुम ही हो।” 

नरोत्तम मन ही मन खुश होने लगा। उसने तुरंत कहा, “मालिक, जानते हैं दुनिया में सबसे कीमती धन क्या है?” 

दोनों ने एक साथ कहा, “नहीं!” 

नरोत्तम बोला, “दुनिया का सबसे कीमती धन अनुभव है, जिससे हम सामने वाले की असलियत पहचान सकते हैं।”

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