ज्ञानवर्धक कहानी-घमंडी को सबक 

ज्ञानवर्धक कहानी-घमंडी को सबक 

ज्ञानवर्धक कहानी-घमंडी को सबक 

बुद्धिवर्धक कहानियां-समझ को तराशने वाला अनूठा कहानी

घमंडी को सबक 

किसी गांव में एक लुहार रहता था। उसका नाम गबरू था। वह नित गांव-शहरों में घूम-घूमकर लोहे का सामान बनाता और बेचता था। बैलगाडी खींचने का काम बिल्लू बैल करता था। गबरू के पास एक काले रंग का कता भी था। कुत्ते का नाम कालू था।

गबरू जब कहीं जाता, सामान और परिवार सहित गाड़ी में बैठता। बिल्ल बैल को जोत दिया जाता। फिर गाड़ी चल पड़ती, वे नए गांव-शहर में पहुंचते। कोई उपयुक्त जगह ढूंढते और वहीं पड़ाव डाल देते। गाड़ी के सहारे, कुछ दिनों के लिए कच्चा-साधन बनाते और रहने लगते। वहीं भट्टी बनाकर लोहे का सामान बनाया जाता। पास में ही खूटा गाड़कर बिल्लू को बांध दिया जाता। कालू घूम फिरकर चौकसी करता। उसे जब भी समय मिलता, वह बिल्लू के पास बैठकर गपशप लड़ाता। बिल्लू और कालू में पक्की दोस्ती थी। 

एक बार की बात है, कालू की भेंट सुक्खू सियार से हो गई। सुक्खू अत्यंत मक्कार था। उसे सबको लड़ाने में मजा आता था। किसी की दोस्ती उसे फूटी आंख नहीं सुहाती थी। अबकी बार उसकी निगाह बिल्लू और कालू की दोस्ती पर थी। इसीलिए उसने मौका देखकर कालू के कान भर दिए। 

सुक्खू के सिखाए का असर तो होना ही था। कालू का व्यवहार एकदम से बदल गया। पहले की तुलना में वह अब घमण्डी बन गया था। वह यह मानने लगा था कि गबरू की गाड़ी उसके बलबूते ही चल रही है। यदि वह सहयोग नहीं करे. तो न गबरू का घर सुरक्षित रहे और न ही गाड़ी एक जगह से दूसरी जगह जा पाए। 

उसकी इस गलतफहमी का एक कारण था। बात यह थी कि जब गबर अपनी यात्रा शुरू करता, बिल्लू बैलगाड़ी खींचता। उसका परिवार सामान सहित उस पर बैठ जाता। कालू के चलने का ढंग निराला था। बैलगाडी ऊंची और बड़ी तो थी ही। वह उसके नीचे ठंडी छाया में चला करता था। इससे उसे लगने लग था कि गाडी उसकी पीठ पर है। इसीलिए जहां-कहीं ऊबड़-खाबड़ रास्ता होता वह गाड़ी के नीचे से भौंककर कहता, “बिल्लू, जरा संभल के। घबराना नहीं 

उसकी बात सुनकर बिल्लू मन ही मन हंसता। वह भी मजाक में रंभार कर कहता. “देख कालू, सारा बोझ मुझ पर ही नहीं छोड़ देना। तनिक अपनी पीठ पर भी उसे उठाए रखना।”

कालु का यह भम्र और भी पक्का हो गया था। इसका प्रमाण एक दिन मिला। वे लंबी यात्रा करके नए शहर में पहुंचे थे। पूरे दिन थका देने वाली यात्रा थी। 

गबरू ने झोंपड़ीनुमा घर बनाया। उसकी पत्नी ने झटपट खाना पकाया। खा पीकर सब सो गए। सोने से पहले गबरू ने बिल्लू को चारा डाला और कालू को खाना खिलाया। वे दोनों भी आराम कर रहे थे। 

थकान से बिल्लू बेहाल था। वह सोना चाहता था। मगर कालू गप्प लड़ाना चाहता था। बिल्लू बोला, “कालू मैं थका हुआ हूं। मुझे सोने दो। बातें कल करेंगे।” 

“ऐसी भी क्या थकान कि मित्र से बातें भी न करो। मैं भी थका हुआ हूं तमसे कहीं अधिक। तुम तो बड़े मजे से गले की घंटी हिलाते, बजाते चलते हो। मझे पीठ पर पूरी गाड़ी का बोझ उठाना पड़ता है।” कालू ने गंभीरतापूर्वक कहा। 

यह सुनकर बिल्लू को आश्चर्य हुआ। सचमुख कालू गहरी गलतफहमी का शिकार था। उसने कहा, “चल बे कलुए! बड़ा आया गाड़ी का बोझ उठाने वाला। तम चलते हो गाड़ी के नीचे ठंडी छाया में। यदि धूप में सचमुच गाड़ी खींचनी पड़ जाए, तो नानी याद आ जाए।” 

इस तरह दोनों में विवाद हो गया। बिल्लू ने बहुत समझाया पर उसे अक्ल नहीं आई। आखिर उसने मन ही मन निश्चय कर लिया कि वह उसे पाठ पढ़ाएगा। 

कुछ दिनों में ही यह अवसर आ गया। गबरू वहां से नए स्थान की ओर चल पड़ा था। सदा की तरह बिल्लू गाड़ी खींच रहा था। कालू गाड़ी के नीचे चल रहा था। इस तरह वे आगे बढ़ रहे थे। 

आगे पहाड़ी रास्ता था। एकदम ऊबड़-खाबड़। गाड़ी के नीचे से कालू हिम्मत बंधा रहा था, “चिंता मत करो, मैंने गाड़ी को पीठ पर थाम रखा है।” 

बस एक क्षण के लिए बिल्लू ने तनिक घुटने मोड़ दिए। जैसे वह थक कर बैठ जाने वाला हो। वह कालू से बोला, “मैं बहुत थक गया, तनिक दो-पांच मिनट सुस्ता लूं। तब तक तुम गाड़ी को अपनी पीठ पर संभाले रखना।” 

वाकई गाड़ी कालू की पीठ पर टिकने लगी। गाड़ी का बोझ उस पर आने लगा। वह मारे बोझ के बिलबिला उठा। उसके मुंह से चीख निकल गई। वह बोल रहा था, “बिल्लू चाचा, यह क्या कर रहे हो मैं मर जाऊंगा।” 

बिल्लू बोला, “रोज ही गाड़ी तुम्हारी पीठ पर टिकी रहती है अब क्या हो गया। तनिक गाड़ी को संभालो और खींचो।” 

कालू का तो कचूमर निकला जा रहा था। बोला, “मेरी जान निकलने वाली है। तुम मेरे चाचा हो। यह गाड़ी तुम खींचते हो, मेरी गलतफहमी दूर हो गई। मुझे क्षमा करो और गाड़ी संभालो और खींचो।” 

गबरू भी घबरा गया था। वह और परिवार के लोग गाड़ी से नीचे उतरे। उन्होंने प्यार से बिल्लू को समझाया। बिल्लू वापस पहले की तरह खड़ा हो गया। कालू की जान में जान आई। 

वह फिर क्षमा मांगते हुए बोला, “मित्र मेरा भम्र टूट गया। मेरा घमंड चूर चूर हो गया। मैं इसे नहीं खींच रहा हूं। मैं तो बस लुहारिये का कुत्ता हूं। मेरा दिमाग सुक्खू ने खराब कर दिया था।”

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