ज्ञानवर्धक कहानी-किस्सा दो ठगों का

ज्ञानवर्धक कहानी-किस्सा दो ठगों का

ज्ञानवर्धक कहानी-किस्सा दो ठगों का

बुद्धिवर्धक कहानियां-समझ को तराशने वाला अनूठा कहानी

किस्सा दो ठगों का बहुत समय पहले की बात है। बनारस और अयोध्या में दो मशहूर ठग रहते थे। एक का नाम राकेश और दूसरे का सोहन। राकेश बनारस का रहने वाला और सोहन अयोध्या के लोगों को ठगता था। दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे। वैसे दोनों ही ठगी में माहिर और लालची इंसान थे। इनके किस्से भी दूर-दूर तक मशहूर थे।

एक बार की बात है। हरिद्वार में कचौड़ीमल सेठ की मृत्यु हो गई और उसकी सारी जायदाद उसके पोते अवनीश चौधरी को मिली। यह खबर राकेश ने भी सुनी और सोहन के कानों तक भी पहुंची। दोनों ने अपना-अपना सामान बांधा और निकल पड़े हरिद्वार अवनीश चौधरी को ठगने। दोनों की रेलवे स्टेशन पर मुलाकात हुई और कुछ ही देर में दोनों अच्छे दोस्त बन गए। 

एक दिन बातों-बातों में राकेश ने सोहन से कहा, “क्यों न अवनीश चौधरी को ठगा जाए?” राकेश, जो खुद भी इसी काम के लिए आया था, झट से मान गया। फिर क्या था, दोनों ने उसी रात ठगी का उपाय सोचना शुरू कर दिया। दोनों के बीच यह तय हुआ कि जो पैसा मिलेगा, उसे आपस में बांट लेंगे। 

अगले दिन राकेश निकल पड़ा अपने मिशन पर और भेष बदलकर पहुंच गया अवनीश चौधरी के पास। वहां जाकर बोला, “बेटा, तुम्हारे दादा जी ने एक बार मुझसे व्यापार के लिए एक लाख रुपये उधार लिए थे, और वही रुपये आज मैं तुमसे लेने आया हूं।” इस पर अवनीश ने कहा, “मैं तुम्हारी बात पर कैसे विश्वास करूं?” यह सुनकर राकेश झट से बोला, “तो चलो अपने दादा की समाधि के पास, उन्हीं से पूछ लेना।” 

वहां पहुंचकर राकेश ने समाधि से यह सवाल किया तो पीछे से आवाज आई, “हां, बेटा यह आदमी सच बोल रहा है। इसके रुपये लौटा दो, वरना मेरी आत्मा को कभी शांति नहीं मिलेगी।” यह आवाज थी समाधि के पीछे छिपकर बैठे सोहन की। समाधि को बोलते देख अवनीश चौधरी घबरा गया और फौरन घर आकर राकेश को एक लाख रुपये दे दिए। इतने सारे रुपये देख राकेश को लालच आ गया। उसने सोचा, ‘सारी मेहनत तो मैंने की है, तो फिर आधा हिस्सा सोहन को क्यों दूं?

 बैठा रहने दो सोहन को वहीं समाधि के पीछे।’ यह सोचकर राकेश चुपचाप बनारस वापस आ गया। घर पहुंचकर राकेश ने सारा रुपया चूल्हे के नीचे दबा दिया और अपनी पत्नी रानी से बोला, “अगर कोई अनजान व्यक्ति मझसे मिलने आए तो कह देना कि मैं मर गया।” 

उसके बाद वह घने जंगल में एक अंधेरे कुएं में जाकर छिप गया। उसकी पत्नी रानी रोज सुबह-शाम उसे खाना देने आती। 

इधर सोहन को जैसे ही राकेश की ठगी का एहसास हुआ तो वह तुरंत राकेश के घर बनारस के लिए निकल पड़ा। वहां पहुंचा तो रानी उसके सामने रो-रोकर कहने लगी, “उन्हें मरे तो तीन-चार महीने हो गए हैं।” सोहन भांप गया कि रानी झठ बोल रही है और उसने भी रोने का नाटक शुरू कर दिया। 

दिन पर दिन बीतते जा रहे थे, लेकिन सोहन, राकेश के घर से जाने का नाम नहीं ले रहा था। इस बीच वह यह भी जान गया कि रानी सुबह-शाम कहीं खाना लेकर जाती है। एक शाम सोहन रानी का पीछा करते हुए कुएं के पास पहुंच गया। अगले दिन जब रानी खरीदारी करने बाजार गई तो सोहन खाना लेकर पहुंच गया राकेश के पास। और आवाज बदलकर बोला, “सुनते हो जी, आपका दोस्त घर में कुछ न कुछ ढूंढ़ता रहता है। घर में कुछ छिपा रखा है क्या?” 

कुएं में से राकेश की आवाज आई, “तू चिंता न कर, लेकिन इतना ध्यान रखना कि चूल्हे के पास न जाए।” सोहन ने इतना सुना और खुशी से उछल पड़ा। घर आते ही उसने चूल्हे के आसपास की जमीन खोदी और सारा धन लेकर वहां से भाग गया। जब रानी खाना लेकर राकेश के पास गई तो वह बोला, “क्या बात है आज दो-दो बार खाना लेकर आ गई।” 

इस पर रानी ने कहा, “मैं तो पहली बार खाना लाई हूं।” अब क्या था, राकेश सब समझ गया और घर की तरफ भागा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अगले दिन सुबह-सुबह राकेश, सोहन के घर के लिए चल पड़ा। वहां पर बहुत भीड़ जमा थी। उसने अंदर जाकर देखा कि सोहन कफन ओढ़े लेटा था। राकेश ने भी रोने का नाटक शुरू कर दिया और जोर-जोर से कहने लगा, “मैं अपने दोस्त के बिना नहीं रह सकता।” यह कहकर वह गिर गया। 

लोग दोनों की लाश कब्रिस्तान की ओर ले जाने लगे। तभी अचानक वहां डाकू आ गए। डर के मारे सारे लोग लाशें वहीं छोड़कर भाग खड़े हुए। कफन के नीचे लेटे राकेश और सोहन को भी डर महसूस हुआ तो दोनों खड़े हो गए। 

अपनी लूट का माल वहीं छोड़, डाकू भूत-भूत कहकर दौड़ पड़े। दोनों खूब हंसे और चोरी का माल व एक लाख रुपये बराबर बांटकर अपने-अपने घर लौट आए।

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