ज्ञानवर्धक कथा-सलीका 

ज्ञानवर्धक कथा-सलीका 

ज्ञानवर्धक कथा-सलीका 

बुद्धिवर्धक कहानियां-समझ को तराशने वाला अनूठा कहानी

एक किसान था। उसके खेत में अनाज नहीं हुआ था। राजा को कर देने के पास पैसा नहीं था। उसने सोचा कि राजा से मिलकर प्रार्थना करनी चाहते हो? मेरे पास किसलिए आए हो?” बहत ही विनम्रतापूर्वक किसान बोला, “महाराज, मैं विधवा हो गया हूं।” राजा जोर से हंस पड़ा। पूछा, “तुम विधवा हो गए हो? इसका क्या मतलब?” 

किसान ने कहा, “आपके पिता मर जाएं तो आपकी मां विधवा हो जाएगी उसी तरह।” यह उत्तर सुनकर राजा को क्रोध आ गया। उसने किसान को कारागार में डलवा दिया। उसका अपराध था-अशुभ वचन कहना। 

किसान के घरवालों को यह बात मालूम हुई। किसान का बड़ा भाई बोला, “छोटा भाई मूर्ख है। राजा को ऐसे नहीं कहना चाहिए था। उसे बात कहने का सलीका नहीं आता। मैं उसे छुड़वा लाता हूं।” 

बड़ा भाई राजा के पास गया। राजा ने पूछा, “क्या चाहते हो? मेरे पास किसलिए आए हो?” किसान का बड़ा बेटा बोला, “महाराज! मेरे छोटे भाई को अपने कारागार में बंद करवा रखा है। वह तो मूर्ख है। उसे बोलने का सलीका नहीं मालूम है। ऐसे मूर्ख को क्षमा कर देना चाहिए, क्योंकि मूर्ख को सजा देने वाला भी मूर्ख समझा जाता है।” 

राजा को इस भाई की बात पर गुस्सा आ गया। इसने मुझे मूर्ख कहा! उसे भी कारागार में बंद करवा दिया। उसका अपराध था, ‘उसने राजा को मूर्ख कहा था।’ 

बड़े भाई का पुत्र बोला, “मेरे पिताजी और चाचा जी को बोलना नहीं आया। राजा को ऐसा नहीं कहना चाहिए था। मैं जाकर दोनों को छुड़वा लाता हूं।” और उस किसान के भाई का पुत्र राजा के पास गया। राजा ने पूछा, “क्यों आए हो?” बटे ने बड़ी विनम्रतापूर्वक राजा से कहा, “महाराज! मेरे चाचा जी और पिता जी चार कारागार में बंद हैं। उन्हें बात करने का सलीका नहीं आता।  जैसा आदमी हो, वैसी बात करनी चाहिए। क्योंकि राजा, बाजा और बंदर चढ़ाने से चढ़ते हैं, यह बात वे भूल गए।”

इस बार फिर राजा को गुस्सा आ गया। इस लड़के ने राजा की तुलना बंदर से कर दी। लड़के को भी कारागार में बंद कर देने की आज्ञा राजा के सिपाहियों को दी। अब सारा गांव जमा हुआ। मुखिया ने कहा, “उन मूरों को राजा ने कारागार में बंद करवा दिया है। अब हम राजा से प्रार्थना करें कि उन मूर्यों को छोड़ दें।” गांव के लोग तैयार हुए। गांव में एक साधु-महात्मा रहते थे। वह समझ गए कि गांव के सारे लोग वही मूर्खता करेंगे और उन सबको राजा कारागार में बंद करवा देंगे। साधु-महात्मा ने गांव वालों को समझाया कि आप राजा के पास न जाएं। मैं राजा को समझाकर सबको छुड़वा लाता हूं। कहीं ऐसा न हो कि आप सभी लोग कारागार में बंद हो जाएं। और साधु-महात्मा राजा के पास गए।

राजा ने पूछा, “कैसे पधारे महाराज?” साधु ने कहा, “महाराज! हमारे गांव के तीन किसान आपके कारागार में बंद हैं। ऐसी मूर्खता करने वालों को मौत की सजा दी गई होती तो भी कम समझी जाती। लेकिन राजा प्रजा का पालक माना जाता है। प्रजा बालक के समान होती है। बालक बहुत बार मूर्खता करता है तब बड़े उन्हें प्रेम से समझाते हैं। एकाध थप्पड़ मार भले दें, लेकिन घर से निकाल नहीं देते। उन तीनों को अपनी भूल का थप्पड़ लग गया है। आप बड़े हैं। वे तीनों मूर्ख बालक के समान हैं। तीनों को आप छोड़ दें। यही आपसे मेरी विनम्र प्रार्थना है।” 

राजा को बात उचित लगी और उसने तीनों को छोड़ देने की आज्ञा दे दी। साधु-महात्मा का सत्कार किया और भेंट देकर विदा किया। सच है, बात करने का भी एक सलीका होता है। 

 

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