ज्ञानवर्धक हिंदी कहानी-कड़वा सच

ज्ञानवर्धक हिंदी कहानी-कड़वा सच

ज्ञानवर्धक हिंदी कहानी-कड़वा सच

एक राजा था। उसका इकलौता बेटा पांच वर्ष का हो चुका था। उसकी इच्छा थी कि उसका बेटा बड़ा होकर राजपाट कुशलतापूर्वक संभाले। बेटा भी शादी के कई सालों बाद हुआ था। वह उसके भविष्य के बारे में भी जानना चाहता था-बेटा उसकी तरह पराक्रमी, शक्तिशाली सम्राट बनेगा या नहीं? उसने अपने राज्य के विद्वान ज्योतिषी को बुला लिया। भविष्यवक्ता राजदरबार में आ पहुंचा। राजा ने बेटे की जन्मपत्री दिखाते हुए राजकुमार का भविष्य बताने की प्रार्थना की। 

विद्वान ज्योतिषी रामानंद ने जन्मपत्री को गौर से तीन-चार बार देखा। ग्रहों, नक्षत्रों की गणना की तो चेहरे का रंग बदल गया। दिलो-दिमाग उदासी विषाद से भर गया। राजकुमार जिस लगन-ग्रहों के प्रभाव में पैदा हुआ था उसके जीवन पर क्रुद्ध ग्रह राहु की कुदृष्टि पड़ रही थी। 

राजकुमार की शादी के दो साल बाद पुत्र होगा और राजकुमार भरी जवानी में देह त्याग देगा। ज्योतिषी रामानंद दुखदायी, व्यथित करने वाली भविष्यवाणी राजा को सुनाना नहीं चाहता था लेकिन झूठ बोलकर राजा को अंधेरे में भी नहीं रखना चाहता था। भारी उलझन में था-कडुवा सत्य कैसे कहे? 

राजा जिज्ञासावश बार-बार सत्य बताने की प्रार्थना कर रहा था। आखिर सोच-विचार कर रामानंद ने सत्य बात बता दी कि राजकुमार भरी जवानी में दुनिया से चला जाएगा। 

सच्चाई इतनी कड़वी दुख देने वाली थी कि राजा सहन नहीं कर सका तुरंत ज्योतिषी रामानंद को कारागार में बंद करने का आदेश दे दिया। कड़वा सच हर एक इंसान सुन नहीं सकता। उस राजा में भी सच सुनने की हिम्मत नहीं थी। राजा परेशान व दुखी हुआ। दिल में पुत्र मोह की भावना बलवती हो रही थी। रामानंद पुत्र वियोग की बात बता रहा था। राजा के प्रचंड क्रोध का शिकार ज्योतिषी हो गया। 

राजा बेटे से अत्यधिक प्यार करता था। साथ ही उसे अपने राज्य का शक्तिशाली, पराक्रमी उत्तराधिकारी चाहिए था। कुछ दिनों बाद राजा ने दूसरा ज्योतिषी बुलाया और उससे पूछा-दूसरे ज्योतिषी ने जन्मपत्री देखी, ग्रहों की गणना की तो परिणाम दुखद ही निकल रहा था। उसने भी राजकुमार की अल्पाय की घोषणा की तो उसे भी कारागार में डाल दिया गया। राजा अपनी मनचाही बात सुनना चाहता था। समय-समय पर ज्योतिषियों को बुलाता रहा, कड़वी सच्चाई जानकर कारागार में बंद कर देता। 

उसकी कारागार में संत-महात्मा किस्म के अनगिनत विद्वान कैद कर लिए गए। राज्य में हा-हाकार मच गया। पापी राजा कितने अत्याचार कर रहा है ? राज्य में संत-महात्मा, ज्ञानी, विद्वान सभी घबरा उठे। कुछ धर्मगुरुओं ने राजा को समझाया भी मगर उनकी समझ में यह बात नहीं आई। 

बहुत पुराना समय था-राजतंत्र का युग था। उस समय राजा का निर्णय गलत हो या सही, अंतिम माना जाता था। कोई भी चुनौती देने का साहस नहीं कर पाता था। 

 ऐसे ही दिन बीतते चले गए। एक दिन हरिद्वार से आचार्य मुनिराज आए। बड़े पहुंचे हुए संत और ज्योतिषी थे। राज्य में प्रवचन कर रहे थे। एक दिन राजा का संदेश मिला कि राज दरबार में हाजिर हुआ जाए। 

आचार्य मुनिराज ने सम्मानपूर्वक जवाब दिया कि राजदरबार में उपस्थित नहीं हो सकते। क्योंकि उनके गुरु का आदेश है केवल साधारण प्रभ के सामने ही ज्ञान चर्चा करूं-यदि आप कुछ पूछना चाहें तो सत्संग में आएं। 

राजा ने सुना तो करो से भर उठा उसे मालूम था उसका एक ही सवाल था उसका जवाब अगर पहले वाले ज्योतिषियों जैसे दिया गया तो मुनिराज को कारागार में नहीं सरेआम फांसी लगवाएगा  ऐसा सोचकर अपने मंत्री दरबारियों के साथ रामानंद ने से मिलने सत्संग में आ पहुंचा

 

आचार्य मुनिराज ने सम्मानपूर्वक राजा और उसके सहयोगियों को साधारण जनता क साथ बैठने को कहा और आने का कारण पछा। राजा ने बेटे की जन्मपत्री दिखाकर भविष्य जानना चाहा। आचार्य ने राजकुमार की जन्मपत्री ध्यान से देखी-ग्रहों की स्थिति का अध्ययन किया तो चौंक पड़े। 

राजकुमार तो अल्पायु हैं- भरी जवानी में मर जाएगा-वो भी शादी के दो वर्ष बाद। उसके बाद राजकुमार के मित्र ग्रहों का अध्ययन किया तो बड़ी आश्चर्यजनक बात सामने आ रही थी। जिस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया था। आगे का परिणाम बेहद सुखद और सूर्य की तरह ओजपूर्ण था। 

आचार्य पूरी जन्मपत्री का अध्ययन करके अभी खामोश बैठे थे, मगर उनके तेजस्वी चेहरे पर आश, की चमक फैल गई थी। आचार्य को खामोश बैठा देख राजा ने बैचैन स्वर में पूछा, “मेरे बदनसीब बेटे के भाग्य में क्या लिखा है कुदरत ने? सत्य और स्पष्ट बताएं।” 

“राजन! अपने बेटे को बदनसीब न कहें तो बेहतर है। आपके बेटे के वंश और आपके पोते का भाग्य सात पीढ़ियों से भी सर्वश्रेष्ठ है-आपको दुखी होने की आवश्यकता नहीं।” आचार्य ने बताया तो राजा के चिंतित चेहरे पर आशाओं के तारे चमक उठे। 

 “महाराज, आप जो कुछ बताना चाहते हैं, जल्दी बताएं-अपने बेटे के खुशहाल भविष्य और समृद्धिशाली वंश के बारे में सुनने को व्याकुल हूं। केवल आप ही मेरी जिज्ञासाओं की प्यास बुझा सकते हैं।” 

“राजन, इंसान उम्र तो जितनी लेकर आता है, उसे बढ़ाना किसी के वश में नहीं। समूची दुनिया प्रभु की मरजी से चलती है। आपके बेटे का पुत्र महान योद्धा, पराक्रमी, चक्रवर्ती सम्राट बनेगा। उसकी प्रसिद्धि सात समुद्र पार तक जाएगी। इतनी धन-संपदा जोड़ेगा, जितनी आपने देखी भी न होगी। शत्रु राजा आपके महानायक पोते से थर-थर कांपेंगे।” मुनिराज ने कड़वे सत्य को सलीके से बताया। 

इतनी बात सुनते ही राजा आचार्य मुनिराज के कदमों में गिर गया। हाथ जोड़ कर दक्षिणा मांगने को कहा। आचार्य ने राजा को आशीर्वाद दिया और आदेश दिया कि कारागार में बंद साधु-संतों, ज्योतिषियों को मुक्त कर दे। 

भविष्य का गहरा रहस्य भी आचार्य ने पहले वाले ज्योतिषियों वाला बताया था। मगर अपनी बात कहने का सलीका इतना श्रेष्ठ था कि कड़वे सच का कड़वापन महत्वहीन हो गया। मधुर जुबान से विचार करके कही गई बात युगों युगों तक अपनी महक लुटाती है। 

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