गुब्बारा का आविष्कार किसने किया था-gubbare ka aavishkar kisne kiya tha

गुब्बारा का आविष्कार किसने किया था

गुब्बारा का आविष्कार किसने किया था-gubbare ka aavishkar kisne kiya tha

गुब्बारा पक्षियों की तरह उड़ान भरने की इच्छा ने वैज्ञानिकों को गुब्बारा बनाने के लिए प्रेरित किया और इसी कल्पना को साकार करने के लिए पेरिस के एनोनय शहर में रहने वाले दो भाइयों जोसफ माइकल और जैक्स एटीनी मोंट गोल्फियर ने गुब्बारे का निर्माण किया, वह सिल्क से तैयार किया गया था। चूंकि दोनों भाइयों को हवा में उड़ने का काफी शौक था, इसलिए एक दिन उनके दिमाग में विचार आया कि यदि कागज के एक बड़े थैले में वाष्प भरकर उसे हल्का कर दिया जाए तो वह हवा में तैर सकता है। 5 

जून, 1783 को उन्होंने एक ऐसा ही एक प्रयोग किया जिसे देखने के लिए काफी भीड़ एकत्र थी। उन दोनों ने कागज का एक दस मीटर व्यास का गोल थैला एक लंबे खंबे के ऊपर वाले हिस्से पर बांध दिया। थैले के खुले हुए मुंह के नीचे उन्होंने भूसा और लकड़ी का ढेर लगा दिया और उस ढेर में आग लगा दी। आग का धुआं थैले में भर गया। जिससे थैला हवा में तेजी से उठता हुआ दस मिनट से भी कम समय में 800 मीटर की ऊंचाई पर पहुंच गया लेकिन शीघ्र ही अंगूर के एक बाग में जा गिरा। चार्ल्स ने दो भाइयों द्वारा किए गए प्रयोग में थोड़ा बदलाव लाते हुए गरम हवा और धुएं के स्थान पर हाइड्रोजन गैस को इस्तेमाल करने का निश्चय किया।

गुब्बारा  का आविष्कार किसने किया था

इस लिए उसने 4 मीटर व्यास का रेशम का एक खोखला गोला बनाया और उसके भीतर की तरफ चारों ओर गोंद लगा दिया ताकि उसमें से गैस बाहर न निकल सके। 23 अगस्त, 1783 को इस प्रयोग को देखने के लिए काफी लोग जुट गए। भीड़ इतनी अधिक हो गई थी कि गुब्बारे को तीन किलोमीटर दूर एक स्थान पर ले जाकर रात के समय उड़ाया गया।

चार्ल्स को उम्मीद थी कि गुब्बारा हवा में 20-25 दिन तक उड़ता रहेगा लेकिन करीब 45 मिनट तक उड़ने के पश्चात गुब्बारा पेरिस से 15 मील दूर एक गांव के खेत में जा गिरा। चूंकि गुब्बारा छः हजार मीटर की ऊंचाई पर चला गया था और इतनी ऊंचाई पर हवा का दबाव कम होने से गुब्बारे की हाइड्रोजन फैलने लगी, जिससे गुब्बारा फट गया। 

गुब्बारे को गिरता देखकर गांव वाले काफी डर गए थे। किसी ने उस गुब्बारे को उड़ने वाला पक्षी समझा तो किसी ने उसे दूसरी दुनिया का दैत्य बताया। कोई भी उस गुब्बारे के पास जाने का साहस नहीं कर रहा था क्योंकि गुब्बारे में हवा होने के कारण वह हिलडुल रहा था। जब गुब्बारा सिकुड़ने लगा तो गांववासी साहस बटोरकर उसके समीप आए और उन्होंने उस गुब्बारे को फाड़ डाला। 

मोंट गोल्फियर बंधुओं ने एक बार फिर गुब्बारे पर अपना प्रयोग दोहराया। इस बार उन्होंने एक रंग-बिरंगे गुब्बारे में कुछ जानवरों को बिठाकर उड़ाया 

और यह साबित कर दिया कि गुब्बारे की सहायता से मनुष्य को भी उड़ाया जा सकता है। 19 नवम्बर, 1783 को उन्होंने एक बड़े गुब्बारे में दो व्यक्तियों को बिठाकर उड़ाने का सफल सामूहिक प्रदर्शन किया। ये दो व्यक्ति करीब आधे घंटे तक हवा में उड़ते रहे और 5 मील तक उड़ने के बाद सकुशल धरती पर उतर आए। अबकी बार जोसफ मोंट गोल्फियर ने यह निश्चय किया कि वह स्वयं गुब्बारे में बैठकर उड़ेगा।

10 जनवरी, 1787 को उसने लकड़ी के धुएं से एक गुब्बारा फुलाया जिसमें वह सात व्यक्तियों के साथ खुद भी बैठा। वह गुब्बारा तीन हजार फीट की ऊंचाई तक ऊपर उठा। दूसरे विश्व युद्ध में जापान ने अमेरिका पर बम गिराने के लिए गुब्बारे का ही प्रयोग किया था। इसके बाद तो गुब्बारे का कई रोचक तरीकों से उपयोग होने लगा। शुभ अवसरों पर भी गुब्बारे छोड़े जाने लगे।

सन् 1810 में नेपोलियन को दसरी शादी के अवसर पर बहत ही अनोखा गुब्बारा हवा में छोड़ गया था। कुछ लोग तो घोड़ों पर बैठकर ही गुब्बारे की सवारी किया करते थे। सन् 1817 में एक व्यक्ति ने हिरण पर बैठकर गुब्बारे की सवारी की थी। सन् 1803 में बनाया गया फ्रांस का मिनर्वा गुब्बारा तो कई खोजों के लिए प्रासद्ध हुआ। सन् 1801 में एक ऐसा गुब्बारा बनाया गया, जिसे गरुड़ों की सहायता से खींचा गया था। हेनरी गिफर्ड नामक एक व्यक्ति ने ऐसा गुब्बारा तैयार किया जिसमें 3500 व्यक्ति बैठकर सवारी कर सकते थे। है न अपने आप में एक आश्चर्य।

इस गुब्बारे का प्रदर्शन सन् 1878 में पेरिस में किया गया था। सन् 1854 में एक ऐसा गुब्बारा बनाया गया जिसे भाप का जहाज कहा जाता था। इस गुब्बारे का निर्माण एटलांटिक महासागर पार करने के लिए किया गया था। मौसम की जानकारी प्राप्त करने के लिए भी लंबे समय से गुब्बारे का ही प्रयोग किया जाता रहा है। 

मनुष्य द्वारा हिमालय पर्वत पर चढ़ने में विजय हासिल करने से पहले गुब्बारों को ही उड़ाया गया था। पृथ्वी की सतह पर एरियल चित्र सबसे पहले गुब्बारों की सहायता से ही लिए गए थे। कास्मिक किरणों का पता भी गुब्बारों के द्वारा ही लगाया गया। 

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