ग्रामपंचायत पर निबंध-Grampanchayat par nibandh

ग्रामपंचायत पर निबंध-Grampanchayat par nibandh

ग्रामपंचायत पर निबंध-Gram Panchayat par nibandh

भारत गाँवों का देश है, किंतु इसे जो स्वतंत्रता मिली, वह नगरों की जटिलता में ही अटककर रह गई। बापू के रामराज्य का स्वप्न कभी पूरा नहीं होगा, जब तक हम गाँवों को हर प्रकार से आत्मनिर्भर न कर दें। 

आज चोरी, डकैती, खेत के झगड़ों इत्यादि के कारण जो अभियोग होते हैं, उनके निर्णय में बहुत अधिक समय लगता है, बहुत पैसों की आवश्यकता होती है। भारत जैसे निर्धन देश में न्याय अत्यधिक अर्थसाध्य हो गया है। आज झूठी तुलाओं का आदर हो गया है, न्याय पैसे पर बिक रहा है। इतना ही नहीं, न्याय में इतना विलंब होता है कि बालक अभियुक्त निर्णय सुनते-सुनते वृद्ध हो जाता है और वृद्ध तो परलोक ही सिधार जाता है।

यह न्याय की स्वीकृति नहीं, वरन् अस्वीकृति है। ग्लैडस्टोन ने ठीक ही कहा था कि न्याय में विलंब करना न्याय को अस्वीकार करना है (Justice delayed is justice denied.)। आज के मुकद्दमे का यह हाल है कि जो जीतता है, वह हारता है और जो हारता है, वह मरता ही है। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि यदि घटनास्थल पर ही न्याय-व्यवस्था हो जाए, तो हमारे समय, शक्ति और संपत्ति सभी की बचत होगी। इसलिए, भारत सरकार ने लगभग दो हजार जनसंख्यावाले प्रत्येक गाँव में ग्रामपंचायत की व्यवस्था की है और, अब तो लोक-न्यायालयों या लोक-अदालतों की भी स्थापना की जा रही है। 

ग्रामपंचायत में एक मुखिया होता है। इसका चुनाव प्रायः 5 वर्ष पर हुआ करता है। प्रत्येक ग्रामपंचायत को चार वार्डों में बाँट दिया जाता है। प्रत्येक वार्ड से एक-एक सदस्य मुखिया के साथ ही निर्वाचित होते हैं। निर्वाचित मुखिया अन्य चार सदस्यों को मनोनीत (nominate) करता है। इस प्रकार, मुखिया की मंत्रिपरिषद के चार निर्वाचित, चार मनोनीत तथा एक स्वयं मुखिया-कुल नौ सदस्य हो जाते हैं।

इस प्रकार, यह पंचायतन (अर्थात् पाँच पंचों का समुदाय) नहीं रहता, वरन् नवायतन हो जाता है। से ग्रामपंचायत की इस आमसभा के सदस्य ग्राम के सभी वयस्क स्त्री-पुरुष होते हैं। 

ग्रामपंचायत में एक कचहरी, यानी न्यायपालिका भी होती है। इसका प्रधान सरपंच कहलाता है। ग्राम के चारों वार्डों से सरपंच के साथ-साथ चार पंच भी निर्वाचित होते हैं। ये चार निर्वाचित पंच तथा मुखिया परिषद के चार निर्वाचित सदस्य तथा सरपंच-नौ मिलकर और चार पंचों को चुनते हैं। इस प्रकार, सरपंच की परिषद के भी ‘सरपंच को लगाकर’ नौ सदस्य हो जाते हैं। जब मुखिया और सरपंच की परिषद (केबिनेट) बन जाती है, तब फिर उपमुखिया और उपसरपंच का चुनाव हो जाता है। 

निर्वाचित मुखिया का शपथग्रहण किसी राजपत्रित पदाधिकारी, विधानसभा या लोकसभा के सदस्य अथवा प्रांतीय पंचायत परिषद के अध्यक्ष के द्वारा कराया जाता है। शपथग्रहण के पश्चात् मुखिया अपना कार्यारंभ करता है। 

ग्रामपंचायत के दो भाग होते हैं—कार्यपालिका और न्यायपालिका। कार्यपालिका का प्रमुख मुखिया होता है तथा न्यायपालिका का सरपंच-इसे हम जानते हैं। कार्यपालिका के मुख्य कार्य ग्रामविकास से संबद्ध हैं। कार्यपालिका का उद्देश्य ग्रामकल्याण है। गाँव की सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, पेय जल का प्रबंध, सिंचाई इत्यादि इसके मुख्य कार्य हैं। अच्छे बीज का प्रबंध, खाद की व्यवस्था, पशुओं की नस्ल सुधारना तथा बीमारी से उनकी रक्षा, कुएँ, पोखरे आदि की मरम्मत-ये सब इसी कार्यपालिका के अंतर्गत हैं।

इतना ही नहीं, गाँव में यातायात के लिए राहों, सड़कों एवं पुलों का निर्माण भी इसे करना होता है। ग्रामपंचायत में एक रक्षादल भी होता है। यह गाँव के तरुण सदस्यों से बनता है। इस रक्षादल का प्रमुख कार्य चोरों-डकैतों से गाँव की रक्षा करना तथा गाँव में शांति बनाए रखना है। इस प्रकार, स्पष्ट है कि गाँव को पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर, सुखी, निरापद एवं सुविधासंपन्न बनाने के लिए ग्रामपंचायत की बहुत बड़ी आवश्यकता है। 

न्यायपालिका की परिषद का कार्य गाँव के झगड़ों का निबटारा है। 100 रुपए तक के मूल्यवाले दीवानी मुकदमे तय करने का इसे अधिकार प्राप्त है। सरपंच को तृतीय श्रेणी के दंडाधिकारी के समान अधिकार हैं। गाँव में शांति बनाए रखने के लिए सरपंच किसी दोषी या उइंड को हिरासत में भी भिजवा सकता है। उसे जुर्माना करने का भी अधिकार प्राप्त है। इस प्रकार, न्यायपालिका का कार्य है कि वह गाँव के झगड़ों को बढ़ने न दे, फुसी को फोड़े में न बदलने दे, गाँव के रुपए को शहरी कचहरियों में बर्बाद न होने दे, निर्माण, उपजवृद्धि और लघु उद्योग-धंधे में लगनेवाले बहुमूल्य समय का अपव्यय न होने दे। 

किंत. गाँव में रहनेवाला या उससे संबंध रखनेवाला प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि आज वस्तस्थिति क्या है। आज का हमारा न्याय बुरी तरह बेजुबान और खुलेआम अंधा है। बेकसी की लंबी मार से वह पीड़ित है—जैसा रस्किन ने कहा है। गाँव के गरीबों और दुर्बलों को न्याय कहाँ मिलता है। वे तो संपन्नों और शक्तिशालियों के दासानुदास बने रहते हैं। वे उनकी इच्छा के विरुद्ध कुछ कर ही नहीं पाते। सताए व्यक्ति और सताए जाते हैं। ये पंच गाँवों में केवल प्रपंच फैला रहे हैं। गरीबों के जुर्माने से अपनी जेबें गरम कर रहे हैं। ये पंच परमेश्वर नहीं, वरन् दानवेश्वर हैं। 

यह तो हई न्याय की बात। मुखिया और सरपंच के चुनाव के समय तो गाँव का वातावरण बिलकुल विषाक्त हो जाता है। झड़प, मारपीट तो मामूली बात है। दो दलों में अब भाले-गडाँसे तक निकलने लगे हैं, बँदूकें छूटने लगी हैं। अपने राज्य केस पंचायत-निर्वाचन में सैकड़ों हत्याएँ हुई हैं; निर्वाचन के समय जो वैमनस्य का विषबीज बोया जाता है, उसके घातक फल वर्षों तक ग्रामजीवन को विमूर्च्छित किए रहते हैं। एक पंचायत ने ग्रामसुधार जितना नहीं किया है, उससे कहीं अधिक सत्यानाश किया है। हमारे सारे आदर्श धूलिसात् हुए हैं, हमारे सारे स्वप्न भूलुण्ठित हुए हैं। 

तो क्या यह निराशा की निशीथिनी कभी समाप्त नहीं होगी? क्या कभी प्रजातांत्रिक पद्धति में शासन के विकेंद्रीकरण का लक्ष्य पूरा नहीं होगा? क्या कभी ग्रामराज्य का निर्माण नहीं होगा? क्या कभी बापू का रामराज्य साकार नहीं होगा? ये अनेक जलते प्रश्न हमें जलाते ही हैं, कोई शमनकारी समाधान प्रस्तुत नहीं करते।

पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीवगाँधी के शासनकाल में पंचायती राज व्यवस्था को और गतिशील बनाने तथा स्थानीय स्वशासन के ढाँचे को अमली जामा पहनाने के उद्देश्य से पंचायती विधेयक पारित हुआ। इस विधेयक के पारित होने से ग्राम-स्वावलंबन की दिशा में आशातीत प्रगति हुई है। जवाहर योजना के अंतर्गत गाँव के मुखिया को अपने पंचायत के उन्नयन के लिए राशि सरकार से प्रत्यक्ष रूप से आबंटित की जाती है। वही ग्राम विकास का मूल केंद्र है।

इसी तरह इंदिरा आवासीय योजना का कार्यान्वयन भी ग्राम विकास की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। गृहविहीन लोगों को अपना घर देने का यह राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इन योजनाओं का लाभ आम जनता को तभी मिल सकता है जबकि नागरिकों में राजनीतिक जागरूकता हो। इन योजनाओं के कार्यान्वयन का भार जिन व्यक्तियों पर है, उन्हें भी नैतिकता एवं ईमानदारी का परिचय अपने व्यक्तिगत एवं प्रशासकीय जीवन में देना होगा। 

 

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