Good thoughts in hindi-अपने अलावा सबकी प्रशंसा कीजिए,ज्यादातर जवाब मौन रहकर ही दिये जा सकते हैं

Good thoughts in hindi

Good thoughts in hindi- अपने अलावा सबकी प्रशंसा कीजिए (Appriciate Everyone, Except Yourself) 

1.आदमी अपनी प्रशंसा के लिए सब कुछ दाव पर लगा देता है, फिर भी कभी सन्तुष्ट नहीं हो पाता है. वह जो कुछ भी करता है, प्रशंसा पाने के लिए ही करता है, किन्तु अफसोस कि उसे अपेक्षित प्रशंसा नहीं मिल पाती है. इसका प्रमुख कारण यही है कि व्यक्ति अपनी प्रशंसा पाने की उत्सुकतावश दूसरों की प्रशंसा करना ही भूल जाता है. जरा दूसरों की प्रशंसा करके तो देखें, बदले में प्रशंसा ही प्रशंसा मिलेगी, जिसके लिए कुछ भी दाव पर लगान की आवश्यकता नहीं पड़ेगी.

2. यह सच है कि विश्व का हर व्यक्ति स्वयम् की प्रशंसा सुनना पसंद करता है. प्रशंसा से प्रसन्नता और प्रसन्नता से ऊर्जा ग्रहण करता है, याद रखें, यहाँ कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है. बिना प्रशंसनीय कार्य किये, बिना प्रशंसा दिये, आप प्रशंसा पाने की आशा कैसे कर सकते हैं ? अतः देना सीखें, पाने की अपेक्षा न करें, तब आप अपनी पात्रतानुसार स्वतः ही प्राप्त करते चलेंगे.

3. किसी से असहमत होते हुए भी प्रकटतः सहमति प्रकट करना दूसरों से कार्य करवाने का सबसे आसान तरीका है. किसी के विचारों से सहमत होना, परोक्षत: उसकी प्रशंसा करना ही है. यूं हर व्यक्ति में कुछ न कुछ गुण अवश्य होते हैं और प्रशंसा से गुणों में आशातीत अभिवृद्धि होती है, इसलिए सम्पर्क में आने वाले हर व्यक्ति की उचित वक्त पर उचित प्रशंसा कीजिए. उचित तथ्य की उचित वक्त पर अनुशंसा कीजिए. यही लोकाचार का सर्वमान्य सलीका है.

Good thoughts in hindi

4. याद रखें, प्रशंसा सबके सामने करें और बुराई अकेले में. किसी के द्वारा कही गई अच्छी बात को अथवा किसी के द्वारा किये गये अच्छे कार्य को याद रखें और सही अवसर पर तारीफ करें, तब अगला भी आपके लिए सब कुछ करने को तैयार रहेगा. व्यक्ति सदा उसे प्यार करता है, जो उसकी प्रशंसा करता है.

5. आत्म प्रशंसा में लीन व्यक्ति अहंकारी माने जाते हैं. ऐसे लोग घमण्डी और पाखण्डी माने जाते हैं. ऐसे लोग धीरे-धीरे मुख्य धारा से कटते चले जाते हैं, क्या आप मुख्य धारा से कटना चाहेंगे ? क्या आप घमण्डियों और पाखण्डियों की श्रेणी में आना चाहेंगे ? शायद नहीं. तो आत्म प्रशंसा छोड़िए. आत्म प्रशंसा में संलग्न रह कर आप किसी की ठीक से प्रशंसा कर भी नहीं पायेंगे.

6. ‘प्रशंसा’ हर व्यक्ति की सबसे बड़ी कमजोरी होती है. हर व्यक्ति अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है. और प्रशंसा करने वाले हर व्यक्ति को पसंद करता है. जो इस मानवीय कमजोरी का सदुपयोग करना जानता है, वह इसे अपनी सफलता में बदल लेता है, समझदार व्यक्ति दूसरों की प्रशंसा उन्मुक्त स्वर में करता है और निन्दा धीमे स्वर में करता है. प्रशंसा सुनकर जब कोई व्यक्ति कहता है कि वह किसी प्रशंसा के योग्य नहीं है, इसका अर्थ यही होता है कि वह अधिक प्रशंसा’ सुनना चाहता 

7.जिस प्रकार बड़ी से बड़ी लकड़ी को खोखला करने के लिए एक छोटा सा दीमक ही पर्याप्त होता है, उसी प्रकार जिन्दगी को खोखला करने के लिए आत्म प्रशंसा रूपी छोटा सा कीड़ा ही पर्याप्त होता है. ‘कृतज्ञता’ बहुत ही मेहनत से उगाया जाने वाला फल होता है, जो अहम् से भरे और सच्चाई से परे लोगों को कतई सुलभ नहीं होता. इसलिए ईश्वर, जीव और जगत सबके प्रति सदा कृतज्ञ रहिए.

Good thoughts in hindi

8. अच्छा या बुरा बनना आपके खुद के हाथ में है. जब तक आप दूसरों की प्रशंसा करते हैं, तब तक उनकी नजरों में आप अच्छे हैं. और जब केवल अपनी प्रशंसा करते हैं, अपनी प्रशंसा सुनना पसंद करते हैं और दूसरों की बुराई करते रहते हैं, तब आप बुरे हैं. और यह बुराई आपकी अच्छी आदतों को भी दुषित कर देती है, याद रखें, कोई भी व्यक्ति इस तरह अपने को विभक्त करके दूसरों की निन्दा करते हुए कभी चैन से नहीं रह सकता. इसलिए निन्दा की बजाय प्रशंसा ही करें, जितनी प्रशंसा करेंगे, उससे कई गुना लौट कर आयेगी.

9. दूसरों को सदैव यथा योग्य पहचान देते चलें. सबको पात्रतानुसार सम्मान देते चलें. जब आप लोगों को महत्व देना सीख जायेंगे, तब आप स्वतः ही महत्वपूर्ण लोगों में सम्मिलित हो जायेंगे. यह सही है कि जब भी किसी की बुराई की जाती है, किसी पर कीचड़ उछाला जाता है, अक्सर सम्बन्धित की अनुपस्थिति में ही उछाला जाता है, याद रखें, तब यह कीचड़ आपके ऊपर ही गिरेगा, आपके आस पास ही गिरेगा और हाथ आपके ही गंदे होंगे. जीभ आपकी ही गन्दी होगी. इसलिए यदि किसी की प्रशंसा न कर सकें, तो न सही, लेकिन किसी की बुराई तो न करें. बुराई करनी ही है तो उसके सामने अकेले में करें, वह आपका प्रशंसक हो जायेगा.

दृष्टान्त- हमारे देश के जाने-माने इंजिनियर ‘विश्वेश्वरैया’ ने अपनी आत्मकथा में उन सिद्धान्तों का उल्लेख किया है, जिनके आधार पर वे अपने जीवन में प्रगति कर सके. उनके अनुसार-‘1. पूरी लगन से काम करो, परिश्रम से मत घबराओ. कड़ी मेहनत के बाद ही आराम अच्छा लगता है. 2. कार्यों के सम्पादन हेतु समायावधि निर्धारित करो. समय पर कार्य करने पर कार्य अधिक भी होता है और अच्छा भी होता है. 3. यह सोचते रहो कि किसी कार्य को और अच्छी तरह किस प्रकार किया जा सकता है. जो कुछ सीख चुके, वह कुछ भी नहीं है. इसलिए निरन्तर सीखते चलो. 4. कभी अहंकारी न बनो. नम्रता को अपने स्वभाव का आवश्यक अंग बना लो. साथियों के साथ मिलजुल कर रहने की आदत डालो. भूलकर भी अपनी प्रशंसा मत करो. यह काम दूसरों को ही करने दो.’ 

Motivational quotes in hindi for successज्यादातर जवाब मौन रहकर ही दिये जा सकते हैं (Silence Answers Several Questions) 

Good thoughts in hindi

1.बोलने की योग्यता प्राप्त करना श्रेष्ठता प्राप्ति का एक छोटा रास्ता हो सकता है, किन्तु बड़ा रास्ता है ‘मौन’. ‘मौन’ जिसका ध्यान से वास्ता है, गहराई और गंभीरता से वास्ता है, ‘मौन’ रहकर ही कोई अधिक सम्प्रेषित हो सकता है. ओशो ने कुछ ऐसा ही कहा था-‘काश, लोग मेरे मौन की भाषा को समझ सकते, तो मुझे बोलने की आश्यकता ही नहीं थी.’ अर्थात् मौन रहकर अधिक सार्थक संदेश दिये जा सकते हैं.

2. यह सही है कि जीभ की बजाय शारीरिक भाषा (Body Language) के माध्यम से अपनी बात अधिक प्रभावी ढंग से कही जा सकती है. अर्थात् अधिकांश संदेश बिना बोले ही दिये जा सकते हैं. तो अधिक बोलकर शब्द और शक्ति को नष्ट करते रहने का कोई औचित्य नहीं है. कम से कम बोलकर बचाई गई ऊर्जा को अन्य सृजनात्मक कार्यों में लगाना चाहिए.

3. देखा जाय तो इस दुनिया में कुछ भी मौलिक नहीं है. केवल ‘मौन’ ही मौलिक है. लिखने और बोलने की भाषा कभी मौलिक नहीं हो सकती, ‘मौन’ की भाषा अवश्य मौलिक होती है. जरा शान्त रह कर तो देखिए, आपकी शान्ति आस-पास शान्त चांदनी बिखेर देगी. आपका मौन सामने वालों को भी शान्त रहने के लिए विवश कर देगा.

4. ‘मौन’ एक महान् शिक्षक होता है. जिस प्रकार बहते पानी पर कोई बिम्ब नहीं ठहर सकता, उसी प्रकार लगातार बोलते रहने पर व्यक्ति का चित्त एक विषय-वस्तु पर नहीं ठहर सकता. जिस प्रकार किसी दौड़ती ट्रेन पर ध्यान नहीं ठहर सकता, उसी प्रकार चलती जीभ पर कोई विचार नहीं ठहर सकता. इसलिए शान्ति, गंभीरता, विचारशीलता एवम् महानता के लिए कम से कम बोलना चाहिए.

5. ‘मौन’ हृदय की वाणी है, हृदय का स्पन्दन है. यह स्पन्दन ही व्यक्ति को जगत से जोड़े रखने में सहायक है. ‘मौन’ मन का गुंजन है. मौन रहकर ही हम विचारशील हो सकते हैं. मौन में उतरकर ही हम सही निर्णय ले सकते हैं, लोगों को प्रभावी जवाब दे सकते हैं. मौन रहकर ही हम अपनी सुरक्षा कर सकते हैं, क्योंकि मौन कभी हमारे साथ विश्वासघात नहीं कर सकता. वस्तुतः मौन हमारा सर्वोत्तम मित्र है. ‘मौन’ में उतरते ही हम एकान्तवासी हो जाते हैं, भले ही हमारे आसपास कितनी ही भीड़ हो.

6. शरीर में आत्मा है, आत्मा में ऊर्जा है. यह ऊर्जा समय-समय पर ईश्वरीय ऊर्जा से मिलती रहती है, किन्तु यह मिलन केवल मौन में ही संभव है. इसलिए कम से कम बोलें, ताकि यह मिलन अधिक से अधिक संभव हो सके. जब बड़े से बड़े प्रश्न का प्रत्युत्तर कम से कम शब्दों में दिया जा सकता है, तब अधिक बोल कर ऊर्जा, शब्द और समय का अपव्यय क्यों किया जाए. याद रखें, परमात्मा सारी भाषाओं से ऊपर है. उसने तो मनुष्य का सृजन किया है. इसलिए परमात्मा मनुष्य की किसी भाषा को नहीं समझता, किन्तु मनुष्य के मौन की भाषा को अवश्य समझता है. क्योंकि मौन का सृजन परमात्मा ने ही किया है.

7. हमारे समस्त वार्तालापों का वास्तविक प्रयोजन हृदय में प्रेम एवम् मौन को उपलब्ध करवाना है. यदि यह प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है तो हमारे शब्द अर्थहीन हो जाते हैं. अर्थात् मौन के माध्यम से ही शब्दों को सही अर्थ दिये जा सकते हैं. ‘मौन’ के वृक्ष पर ही शान्ति के फूल खिल सकते हैं. याद रखें, जहाँ नदी गहरी होती है, वहाँ जल प्रवाह अत्यधिक शान्त एवम् गंभीर होता है.

8. आपके धीर-गंभीर रहने एवम् कम से कम बोलने पर सामने वाला भी आपकी व्यस्तता को समझ जायेगा और कम से कम सवाल करेगा. इससे दोनों की ऊर्जायें बचेंगी, कीमती समय बचेगा. आवश्यकता से अधिक बोलने पर आपकी पोल खुल जाती है और कम बोलने पर आपकी कमजोरियाँ ढकी रह जाती हैं. अधिक बोलने पर आपके पास रिजर्व में कुछ भी नहीं बचेगा. आपकी असलीयत सामने आ जायेगी और लोगों का विश्वास उठ जायेगा. याद रखें, जिसके पास जितना कम होता है, वही सबसे अधिक बोलता है.

9. केवल बहस से किसी समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता. जितनी अधिक बहस की जाती है, उतनी ही समस्या उलझती चली जाती है. याद रखें, समस्या का सार्थक समाधान तो शान्त रहने पर ही सामने आ सकता है. मौन समझदारी का लक्षण है. मौन सर्वोत्तम भाषण है. जो अपनी वाणी पर नियन्त्रण करना सीख जाता है, वह सब पर नियन्त्रण कर सकता है. इसलिए खामोश रहो और बोलना पड़े तो ऐसी बात कहो, जो खामोशी से बेहतर हो.

निष्कर्ष- अपने शरीर को जरा ध्यान से देखिए. प्रकृति ने व्यक्ति को दो आँखें, दो कान, दो नाक, दो हाथ और दो पैर दिये हैं, किन्तु जीभ एक ही दी है और वह भी मुँह के अन्दर दाँतों के पीछे छिपाकर दी है. इसका सीधा सा अर्थ यही है कि हम अधिक देखें, अधिक सुनें, अधिक सूंघे, अधिक ऑक्सीजन लें, अधिक से अधिक काम करें, किन्तु कम से कम बात करें, बात करें भी तो इस तरह कि खुद को भी कम से कम सुनाई दे. आपके एक हाथ में क्या है, यह दूसरे हाथ को पता नहीं लगना चाहिए. यही गोपनीयता है. इसी तरह बोलने में भी गोपनीयता रखना आवश्यक है. याद रखें, हम उन्हीं लोगों को पसन्द करते हैं, जो कम से कम बोलते हों, हम उन्हीं स्थानों को पसंद करते हैं, जहाँ अधिक से अधिक शांति हो. हम प्रकृति के उसी स्वरूप को पसंद करते हैं, जिसमें मधुर संगीत तो हो, पर शोर गुल न हो. हम तो परमात्मा की मूरत को भी ‘मौनस्थ’ ही देखना पसन्द करते हैं, तब हमें दूसरों से अधिक बोलने का अधिकार कैसे हो सकता है ? 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

13 + six =