Golden thoughts of life in hindi-जो कुछ होता है, अच्छा ही होता है (Whatever Happens, Happens in Our Favour) 

Golden thoughts of life in hindi

Golden thoughts of life in hindi-जो कुछ होता है, अच्छा ही होता है (Whatever Happens, Happens in Our Favour) 

1.जीवन यात्रा के दौरान जो कुछ भी होता है, हमारे भले के लिए ही होता है. बुरा भी भले के लिए ही होता है. इसलिए जो भी घटे, स्वीकारते चलें. अथक परिश्रम करने एवम् सदैव सतर्क रहने के बावजूद भी यदि परिणाम हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप प्राप्त नहीं हों, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि हम आगे काम करना ही छोड़ दें. जो हो चुका, उसे दोहराया नहीं जा सकता. केवल भविष्य के लिए सतर्क रहा जा सकता है.

2. जिन्हें आप बदल नहीं सकते, उन्हें स्वीकारते चलें. जिन्हें आप बदल सकते हैं, उन्हें बदलते चलें. इन दोनों में अन्तर करने की क्षमता विकसित करें. अपनी नकारात्मक ऊर्जाओं को पहचान कर सकारात्मक ऊर्जाओं में बदल लेने की क्षमता अर्जित करें. ‘जो भी होगा, अच्छा ही होगा’ को आदर्श वाक्य मानते हुए जीने की कला विकसित करें, तब सब कुछ अच्छा ही होगा. बकौल डा. हरिवंश राय बच्चन-‘मन का हो तो अच्छा, ना हो तो और भी अच्छा है.’

3. अपमान, असफलता, नुकसान, अस्वस्थता, धोखा, पदावनति, दुर्घटना, कानूनी कार्यवाही जैसी अनचाही घटनायें भी घट ही जाती हैं. मानकर चलें, ऐसी घटनायें स्वाभाविक ही हैं और हमारे लिए ही हैं. यदि हम यह धारणा बना लें कि ऐसी कोई घटना हमारे साथ घटित हो ही नहीं सकती, तो यह हमारी ना समझी ही है, अर्थात् जो भी घटना या दुर्घटना घटित होती है, हमारे हित में ही होती है. हर घटना में कहीं न कहीं हमारी भलाई अवश्य छिपी होती है..

4. जब भी हम प्राकृतिक नियमों एवम् प्रचलित सामाजिक व्यवस्थाओं के विरूद्ध कार्य करते हैं, तब हमें प्रत्यक्षतः अथवा परोक्षतः कोई न कोई कष्ट अवश्य उठाना पड़ता है. हकीकत तो यही है कि जीने के लिए जिन्दगी को ऐसे ही कष्टों से हँसते-गाते सजाना पड़ता है. अर्थात् कष्ट भी आते हैं, अव्यवस्थायें भी होती हैं, कभी-कभी अनहोनी भी हो जाती है, किन्तु इन सबके पीछे हमारे लिए कोई न कोई सीख अवश्य छिपी होती है.

5. जरा सोचिए, क्या आपने भगवान के लट्ठ मारा है ? क्या भाग्य के बाप को मारा है ? नहीं, तो फिर सदा ही विपदाओं में क्यों रहना पड़ रहा है ? आपने किसी का क्या बिगाड़ा है ? पर यह मत भूलिए कि आपके साथ जो कुछ भी हो रहा है, किसी कारणवश एवम् निश्चित प्रयोजनार्थ ही हो रहा है. जब आपको यह बुधत्व प्राप्त हो जायेगा तब सब कुछ अच्छा एवम् उपयोगी ही नजर आयेगा.

6. यह भी मत सोचिए कि आपको पिछले जन्मों के कर्मों को भोगना पड़ रहा है. प्रथम तो पुनर्जन्म का सिद्धान्त ही समझ से परे है. द्वितीय यह कि कर्मों के फल को अगले जन्म के लिए टाला नहीं जा सकता. आज दी गई परीक्षा का परिणाम क्या अगले जन्म में सुनाया जा सकता है ? हर्गिज नहीं, आप जो कुछ भी करेंगे, उसके फल आपको इसी जन्म में, यहीं पर तत्काल ही मिलेंगे. यदि कुछ बुरा हो रहा है तो उसके लिए कहीं न कहीं हम स्वयम् उत्तरदायी हैं. इसलिए हमें हर अच्छी और बुरी स्थिति से कुछ न कुछ सीखते हुए ही आगे बढ़ना चाहिए, वरना पछताने के अलावा कुछ भी नहीं बचेगा.

7. भाग्य हाथ की लकीरों में नहीं होता, भाग्य तो उनका भी होता है, जिनके हाथ ही नहीं होते. हाथ की लकीरों में भाग्य तलाशना एक चालाकी भरा कार्य है. क्योंकि- ‘कुछ भी तो नहीं लिखा उसने, हाथ की लकीरों में, फिर भी आदमी ने अपने-अपने, अर्थ निकाल डाले.’

8. प्रारब्ध, भाग्य, किस्मत, तकदीर, नसीब, Fortune, Luck आदि शब्द तथाकथित चालाक लोगों ने गढ़ लिए हैं, ताकि आम लोगों को बेवकूफ बनाया जा सके और अपना भाग्य चमकाया जा सके. ऐसे लोगों से सावधान रहें. जो कुछ होता है, उसे सहज रूप से स्वीकारते हुए अच्छे से अच्छे के लिए योजना बनाते हुए आगे बढ़ते रहें.

9. मान लें कि जो कुछ हो रहा है, अच्छा ही हो रहा है. लेकिन यह भी देखें कि इसमें आपका योगदान कितना है ? जितना अधिक आपका योगदान होगा, उतना ही आपको अच्छा लगेगा. जो कुछ हो रहा है, उससे यदि आप संतुष्ट नहीं हैं, तो आपको कुछ भी अच्छा नहीं लगेगा, तब एक नकारात्मक सोच विकसित होगा, तब फूल भी शूल की तरह चुभेगा. इसलिए हर परिस्थिति में सकारात्मक रहिए. जो कुछ हो रहा है, उसे और अच्छा बनाइए.

दृष्टान्त- एक दिन एक राजा ने नगर में मुनादी करवा दी कि-‘कल सुबह सूर्योदय से पहले प्रत्येक पशुपालक द्वारा एक-एक लीटर दूध महल के द्वार पर रखे गये बर्तन में डाला जायेगा.’ राजा बेगार लेने का आदी था. अगले दिन महल में बड़ी मात्रा में खीर बनवाई जानी थी. मुनादी के अनुसार सभी पशुपालकों ने एक-एक लीटर दूध सूर्योदय से पूर्व ही महल के दरवाजे पर रखे गये बड़े बर्तन में डाल दिया. जब दूध का बर्तन राजा के समक्ष प्रस्तुत किया गया, तो उसमें अस्सी प्रतिशत पानी निकला, केवल पाँच प्रतिशत लोगों ने ही शुद्ध दूध डाला था. पच्चीस प्रतिशत ने पानी मिला दूध डाला था और शेष सत्तर प्रतिशत ने शुद्ध पानी ही डाला था. इनमें से हर व्यक्ति ने यही सोचा कि जब सब ही दूध डालेंगे तो उसके पानी का तो पता ही नहीं चलेगा, किन्तु राजा के लिए यह एक सबक था. उस दिन के बाद राजा ने बेगार लेना बन्द कर दिया. अर्थात् जो हुआ, अच्छा ही हुआ. 

मैं भला तो जग भला (Good Mind, Good Find) 

Golden thoughts of life in hindi

1.जगत अच्छा है या बुरा ? यह आपकी विचारधारा पर निर्भर करता है. सामने वाला अच्छा है या बुरा ? यह महज आपके व्यवहार पर निर्भर करता है. देखा जाय तो यहाँ न कुछ अच्छा है, न कुछ बुरा है, केवल आदमी ही अच्छा या बुरा हो सकता है. आदमी चाहे तो अपने संसार को स्वर्ग बना सकता है और चाहे तो नरक बना सकता है..

2. दुनिया नहीं बदलती, व्यक्ति की मनस्थिति बदलती रहती है. इसीलिए उसे दुनिया कभी बुरी लगती है, कभी भली लगती है. यदि आपके मन में कोई पाप नहीं है तो आपको सभी निष्पाप नजर आयेंगे. यदि आपके मन में कोई मेल नहीं है तो आपको सभी पाक-साफ नजर आयेंगे. यदि आपके मन में कोई चोर बसा है, तो आपको सभी चोर नजर आयेंगे. कमजोर को सब ताकतवर और ताकतवर को सब कमजोर नजर आयेंगे..

3. यदि आप परिश्रमी हैं तो आपको सभी परिश्रमी लगेंगे. यदि आप निठल्ले हैं तो आपको सभी फालतू लगेंगे. यदि आप मन, कर्म और वचन से किसी का बुरा नहीं चाहेंगे तो दूसरे चाहकर भी आपका बुरा नहीं कर पायेंगे. यदि आप किसी का बुरा चाहेंगे तो अगले का तो कुछ भी नहीं बिगड़ेगा, किन्तु आपका अवश्य बिगड़ जायेगा. इसमें सारा दोष आपके मन का है, आपके नजरिये का है.

4. यदि कोई भला होने का नाटक करेगा तो सर्वप्रथम अपने साथ ही कपट करेगा. यदि कोई लोगों को कौसता ही रहेगा तो वह अपनी विफलता ही प्रकट करेगा. याद रखें, भला होने और भला दिखने में बहुत बड़ा अन्तर होता है. भला होने पर जगत भी भला ही लगेगा और भला होने का नाटक करने पर हर व्यक्ति चालाकी से भरा लगेगा. अर्थात् जगत को आप जिस नजर से देखेंगे, जगत भी आप को उसी नजर से देखेगा.

5. हर व्यक्ति को हर व्यक्ति के साथ काम करने के लिए तैयार रहना चाहिए. हर व्यक्ति को हर व्यक्ति के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए तैयार रहना चाहिए. अनजान से अनजान व्यक्ति से भी ऐसे मिलें, जैसे उसे पहले से ही जानते हों. जिसे आप नहीं जानते, उसे मिलने पर ही तो जान पाओगे. जब जानना ही है तो पहले जानें या बाद में जानें, कोई फर्क नहीं पड़ता. इसलिए अनजान व्यक्ति के साथ इस प्रकार व्यवहार करें, जैसे आप उसे पहले से ही जानते हों. पूर्व परिचित के साथ ऐसा व्यवहार करें, जैसे नयी-नयी मुलाकात हो. तब आप पूर्वाग्रहों से बचे रहेंगे.

6. जो व्यक्ति भलाई से प्रेरित होकर भलाई करता है, वह न तो प्रंशसा का आंकाक्षी होता है और न पुरस्कार का. यह अलग बात है कि ऐसे व्यक्ति को ये सब अन्त में स्वतः ही मिल जाता है. जो दूसरों की जितनी भलाई करेगा, उसको ईश्वरीय व्यवस्था से उतना ही आनन्द मिलेगा. हमारी श्रेष्ठता का चरम बिन्दु है, ‘बन्धुत्व की भावना’, और बन्धुत्व की भावना का अधार है ‘भलाई’. 

7.अपने आपको अधिक चालाक मानकर आप धोखा खा सकते हैं. दूसरों को अधिक चालाक मानकर भी आप धोखा खा सकते है. दोनों ही स्थितियों में धोखा आपको ही खाना है. इसलिए न तो अपने आपको चालाक समझो और न दूसरों को चालाकी दिखाने के अवसर दो. स्पष्ट और दो टूक बात करने पर आप धोखा खाने से बचे रहेंगे. लोगों को उतना चालाक अवश्य समझो, जितना आप अपने आपको समझते हो.

8. हर चालाक व्यक्ति धोखेबाज हो, यह जरूरी नहीं है, परन्तु हर धोखेबाज का चालाक होना जरूरी है. हर धोखेबाज आपको धोखा दे, यह जरूरी नहीं है, परन्तु आपके व्यवहार का निर्णायक होना जरूरी है. ध्यान रहे, धोखा दिया नहीं जाता, खाया जाता है. इसलिए चालाकी और धोखेबाजी से ऊपर उठिए, सबके साथ निष्कपट व्यवहार करिए, तब आपको कोई धोखा नहीं दे पायेगा.

9. जितना हमारा ‘अहम्’ कम होगा, अज्ञान कम होगा, उतना ही हमारा मन उज्जवल होगा. भला होने के लिए ‘अहम्’ को गलाना जरूरी है, दूसरों की आलोचना न करें, अपनी आलोचना से न डरें. न क्रोधित हों, न उत्तेजित हों. यदि आप लोगों का दिल दुखा कर अपना काम बना लेंगे, तो निश्चित मानिए, लोग भी आपके साथ ऐसा ही करेंगे.

दृष्टान्त- एक शिष्य ने गुरुजी से पूछा-‘संसार में किस तरह रहना चाहिए ?’ गुरुजी ने कहा-‘मेरे व्यवहार को ध्यान से देखते रहना, उत्तर मिल जायेगा. थोड़ी देर बाद एक श्रद्धालु मिठाई लेकर आया. गुरुजी ने भेंट ली, पीठ फेरी और सारी मिठाई खा गये. धन्यवाद् तक नहीं दिया. श्रद्धालु नाराज होकर चला गया. दूसरे दिन एक व्यक्ति भेंट लेकर आया. गुरुजी ने उसे पीछे कचरे में फेंक दिया और लाने वाले से बड़े प्यार से बातें करते रहे. वह व्यक्ति भी दुःखी होकर चला गया. तीसरे दिन एक और श्रद्धालु प्रसाद लेकर आया. सन्त ने उसे आदरपूर्वक ग्रहण किया. कुछ खुद ने खाया और शेष को लाने वाले एवम् वहाँ उपस्थित लोगों में बँटवा दिया. भेंट लाने वाले से सन्त ने स्नेहपूर्वक चर्चा की. श्रद्धालु प्रसन्न होकर लौटा. इस पर गुरुजी ने शिष्य को समझाया-‘तीन प्रकार के व्यवहारों में आखिरी व्यवहार ही ठीक लगता है. भगवान भावनाओं के साथ हमें बहुत कुछ देता है. यदि हम दाता के उपकार को मानते हुए सम्पदाओं का सही ढंग से उपयोग करते हैं तो हमारा यही व्यवहार सर्वोत्तम है. जगत् में जीने का यही तरीका उत्तम है.’ 

Golden thoughts of life- रोग से योग भला (Meditation is Better Than Medication) 

Golden thoughts of life in hindi

१.यदि रोगों को अपने से दूर रखना हो अथवा अपने आपको रोगों से दूर रखना हो, यदि रोगों का स्थायी उपचार करना हो और प्राणों में शक्ति का संचार करना हो तो योग के अतिरिक्त दूसरा कोई उपाय नहीं है. सचमुच योग सम्पूर्ण आरोग्य की गारन्टी है और आरोग्य सफलता की प्रथम शर्त है.

2. प्रकृति की सबसे बड़ी देन है, ‘व्यक्ति’ और व्यक्ति की सबसे बड़ी खोज है ‘योग’. वस्तुतः हम कितने भाग्यशाली हैं कि यह खोज सबसे पहले हमारे यहाँ की गई. दुनिया को भारत की सबसे बड़ी देन ‘योग’ ही है. योग उतना ही प्राकृतिक है, जितना कि व्यक्ति है. व्यक्ति उतना ही दुखी रहता है, जितना वह योग से दूर रहता है. योग हमारे देश का प्राचीनतम परम्परागत बहुउपयोगी एवम् सर्व सुलभ दर्शन है.

3. योग के मूलतः आठ अंग माने गये हैं-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवम् समाधि. यदि किसी को वस्तुतः योगी बनना हो तो ‘अष्टांग योग’ सीखना ही पड़ेगा. किन्तु सामान्यतः प्राणायाम, ध्यान, छोटे-मोटे योगाभ्यास एवम् सूक्ष्म व्यायाम से ही काम चल जायेगा. अपनी अन्तर्निहित शक्तियों का विकास योग से ही संभव है और इन शक्तियों के विकास से ही सफलता संभव है..

4. योग में प्राणायाम का प्रमुख स्थान है. प्राणायाम का तात्पर्य श्वास-प्रश्वास की गति को यथाशक्ति नियन्त्रित करना है. पदमासन, सिद्धासन अथवा सुखासन में बैठकर प्रातः खाली पेट नियमित रूप से प्राणायाम करने वाला व्यक्ति सदा स्वस्थ रहता है, प्रसन्न रहता है, उत्साहित रहता है. प्राणायाम के कुछ प्रमुख लाभ हैं-मन की चंचलता का दूर होना, मन, बुद्धि एवम् इन्द्रियों पर नियन्त्रण होना, जठराग्नि का प्रदीप्त होना, बुद्धि का सूक्ष्म एवम् तीव्र होना, फैफड़ों का स्वस्थ रहना, शरीर में शक्ति, कान्ति एवम् शान्ति का संचार होना, प्राणों पर नियन्त्रण होना, पुरूषार्थ में अभिवृद्धि होना, शारीरिक एवम् मानसिक अस्वस्थता का उपचार होना, सदा स्वस्थ रहना आदि. वस्तुतः मानसिक, शारीरिक, बौद्धि क एवम् आध्यात्मिक आरोग्यता का आधार है प्राणायाम.

5. हर व्यक्ति को आवश्यकतानुसार कुछ यौगिक क्रियायें नियमित रूप से करनी चाहिए. प्राणायाम एवम् आवश्यक यौगिक क्रियाओं के लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम आधा घण्टा अवश्य देना चाहिए. आँख, दिमाग, गर्दन, पीठ, हृदय, पेट, कमर, पैर और घुटनों आदि सभी शारीरिक अंगो के लिए अलग-अलग यौगिक क्रियायें निर्धारित हैं. वज्रासन जैसे आसन को हर आयु का व्यक्ति किसी भी वक्त कर सकता है. वज्रासन तो भोजन के तुरन्त बाद भी किया जा सकता है.

6. योग हमारी काफी पुरानी विद्या रही है. भौतिकवाद की चकाचौंध में लोग धीरे-धीरे योग से कटते चले गये, फलतः हर तरह से दुखी रहने लगे और अपने आप से कटते चले गये. किन्तु अब लोग पुनः योग से जुड़ने लगे हैं. आज तो समूचे विश्व में लोग योग कर रहे हैं. योग सिखाना आज का बहुत बड़ा व्यवसाय बन चुका है, भारतीय महर्षियों की विश्व में पहचान योग के कारण ही है. यदि स्वस्थ रहना है तो योग को अपनाना ही पड़ेगा.

7. याद रखें, सफलता के लिए मानसिक, शारीरिक एवम् आध्यात्मिक स्वास्थ्य आवश्यक है. इस त्रिस्तरीय स्वास्थ्य के लिए ‘योग’ के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है. योग से ही चेतना का बोध होता है. यौगिक क्रियाओं के माध्यम से ही हमारी सुप्त चेतना शक्ति का विकास हो पाता है. सुप्त तन्तुओं का पुनर्जागरण होता है, नयी कोशिकाओं का निर्माण होता है, जिससे रक्त का परिभ्रमण ठीक से हो पाता है. ऑक्सीजन की पूर्ति होती है और हम सदैव प्रसन्न एवम् स्वस्थ रहते हैं.

8. यह अच्छी तरह समझ लें कि स्वस्थ रहने और रोग मुक्त रहने में बहुत बड़ा अन्तर है. कोई रोग न होने पर आप स्वस्थ’ हों ही, यह अपेक्षित नहीं है. रोग मुक्त तो आप किसी दवा से भी हो सकते हैं, किन्तु ‘स्वस्थ रहने के लिए कोई दवा नहीं है. ‘स्वस्थ’ तो आप केवल योग के माध्यम से ही रह सकते हैं. ‘स्वस्थ’ अर्थात् ‘स्व + स्थ’ अर्थात् अपने आप में स्थिर होना, स्वस्थता का सम्बन्ध मन से है और निरोग्यता का सम्बन्ध तन से है. यदि आप स्वस्थ होंगे तो निरोग तो स्वतः ही रहेंगे.

9. हमारी आन्तरिक वृतियों के कारण ही मन चंचल रहता है. मन की चंचलता के कारण ही जीवन में हर उपद्रव घटता है. इसलिए मन पर नियन्त्रण रखना ही हमारी असली सफलता है. यूं मन को पकड़ना आसान नहीं है, किन्तु योग द्वारा मन को साधा जा सकता है. मन को साध लेने पर जग को जीता जा सकता है.

सारांश- जिस प्रकार पंखे का स्विच ऑफ कर देने पर थोड़ी ही देर में पंखा शान्त व स्थिर हो जाता है, उसी प्रकार ‘मन’ का स्विच ऑफ कर देने पर मन भी शान्त व स्थिर हो जाता है. याद रखें, मन का स्विच केवल योग द्वारा ही ऑफ हो सकता है. योग के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर देखता है, अपनी वृत्तियों एवम् चेतनाओं को भीतर समेटता है. सफलता-विफलता, सिद्धि-असिद्धि, जय-पराजय, अनुकूलता-प्रतिकूलता आदि समस्त भावों में आत्मस्थ रहते हुए ‘सम’ रहने को ही योग कहा जाता है. 

मानसिक, शारीरिक एवम् आध्यात्मिक स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा सुख है (The Mental, Physical & Spiritual Health is The Biggest Pleasure) 

1.कहते हैं, जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड में है. इसलिए प्राकृतिक नियमों का पालन करना आवश्यक है. यदि हम सदा ‘स्वस्थ रहना चाहते हैं तो हमें प्रकृति के साथ समन्वय स्थापित करके ही चलना पड़ेगा. हम प्रकृति से श्वास ले रहे हैं और प्रकृति को ही वापस दे रहे हैं. प्रकृति कितनी महान है जो हर परिस्थिति का सदुपयोग कर लेती है। ऑक्सीजन देकर कार्बन डाई ऑक्साइड ले लेती है. इसलिए समन्वय भी अपेक्षित है.

2. तन, मन एवम् जीवन की पवित्रता से व्यक्ति का आचरण सुधरता है. आचरण शुद्धि से आरोग्य एवम् आरोग्य से तन-मन निखरता है. हर सफलता के लिए तन-मन की प्रसन्नता अनिवार्य है और प्रसन्नता के लिए आरोग्यता अनिवार्य है. अर्थात् आरोग्यता ही प्रसन्नता है और प्रसन्नता ही आरोग्यता है. जिसके पास स्वास्थ्य है, उसके पास आशा है और जिसके पास आशा है, उसके पास सब कुछ है.

3. यह अटल सत्य है कि यह शरीर एक दिन राख या खाक में बदल जाता है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि हम इसे वक्त से पहले ही राख या खाक बना दें. हमें याद रखना चाहिए कि जब तक यह शरीर है, तब तक ही हम हैं. जब यह राख या खाक बनेगा, तब हम नहीं रहेंगे, जो कार्य हमारी अनुपस्थिति में होगा, उसके लिए चिन्तित रहना समझदारी की बात नहीं है, इसलिए शरीर को सदा सजा कर रखना चाहिए, सदा स्वस्थ रखना चाहिए. यही जिन्दगी का सबसे बड़ा सुख है.

4. याद रखें, मानव शरीर परमात्मा का एक अनुपम उपहार है. शरीर में मन, चित्त, आत्मा, हृदय, विवेक, अहम्कार आदि का एक अद्भुत संसार है. शरीर की स्वस्थता-अस्वस्थता मन पर निर्भर करती है, किन्तु व्यक्ति जरा उल्टा चलता है. सर्वप्रथम वह शरीर को स्वस्थ रखने की चेष्टा करता है और फिर मन की स्थिरता के प्रयास करता है. यहाँ आत्मा की तो परवाह करता ही कौन है. यदि सीधी ओर से चलते हुए सर्वप्रथम अध्यात्म द्वारा आत्मा को सुदृढ़ कर लिया जावे, फिर योग द्वारा मन को साध लिया जावे, फिर शरीर को स्वस्थ रखने के प्रयास किये जावे तो व्यक्ति के अस्वस्थ होने की संभावना ही नहीं रहेगी.

5. यहाँ सबसे बड़ा कोई मन्दिर हो सकता है तो वह शरीर ही है. शरीर से अलग कोई मन्दिर हो भी नहीं सकता. शरीर के बाहर जितने भी मन्दिर हैं, उन सबको हमने बनाया है, किन्तु हमारे शरीर रूपी मन्दिर को परमात्मा ने बनाया है. बाहरी मन्दिर का संचालन व्यक्ति करता है, जबकि शरीर रूपी मन्दिर का संचालन स्वयम् परमात्मा करता है. शरीर में आत्मारूपी परमात्मा विराजमान हैं. तो क्या परमात्मा के इस असली मन्दिर को आप अपवित्र, अस्वस्थ या कमजोर रखना चाहेंगे ? हरगिज नहीं.

6. जिस प्रकार परमात्मा को कुछ नहीं चाहिए, उसी प्रकार आत्मा को भी कुछ नहीं चाहिए. जो चाहिए, शरीर और मन को ही चाहिए. इसलिए जो भी ग्रहण करें, परमात्मा का प्रसाद समझकर ही ग्रहण करें. ऑक्सीजन, भोजन, पानी, काम और नींद शरीर के लिए आवश्यक हैं, इसलिए इन सबको भगवान के प्रसाद के रूप में ही ग्रहण करना चाहिए. इन सबको प्रसाद की तरह ही पवित्र समझें, पर्याप्त समझें, ग्रहण करने से पहले माथे से लगायें, पूर्ण तृप्ति के साथ ग्रहण करें, इन की बुराई न करें, झूठन न छोड़े, नीचे न गिरायें, अपवित्र न करें. सदैव प्रसन्न, तृप्त और स्वस्थ रहने के लिए सबसे प्रमुख एवम् महत्वपूर्ण उपाय यही है.

7. अपने दिमाग का कम से कम दसवाँ हिस्सा सदैव खाली रखें और अपने पेट का पच्चीसवाँ हिस्सा खाली रखें. अर्थात् पेट को दिमाग की अपेक्षा अधिक खाली रखें. याद रखें, एक अच्छे रात्रि विश्राम के बाद ही एक अच्छे दिन की शुरूआत हो सकती है. सूर्योदय से पहले उठना, प्रातःकालीन भ्रमण, व्यायाम, प्राणायाम, सन्तुलित एवम् पौष्टिक आहार करना, पर्याप्त व शुद्ध पानी पीना, अल्पाहार-भोजन समय पर करना, कम से कम चार घण्टे का अन्तराल रखना, सदैव प्रसन्नचित्त रहना, सदा सकारात्मक सोच रखना स्वस्थ रहने के लिए प्रमुख सूत्र हैं.

8. भौतिकता और आध्यात्मिकता के समन्वय के बिना स्वास्थ्य, समृद्धि एवम् सुखद संसार की परिकल्पना नहीं की जा सकती. प्रकृति और अध्यात्म से दूर रहना ही अस्वस्थता का सबसे बड़ा कारण है, जो शरीर एवम् मन से भी आगे जाकर आत्मतत्व की पहचान कर लेता है, वह मन व शरीर के साथ अपने संसार को भी साध लेता है.

9. हर सफलता का प्रथम सोपान है, स्वास्थ्य। स्वास्थ्य का प्रथम सोपान है, संयम, संयम की प्रथम आवश्यकता है, समयबद्धता. और समयबद्धता की प्रथम व अन्तिम आवश्यकता है, इच्छा शक्ति की दृढ़ता. अर्थात् आरोग्य मजबूत इच्छा शक्ति पर ही निर्भर करता है.

निष्कर्ष- शांकुतल ने एक बार अपने गुरु महर्षि मुद्गल से पूछा-‘गुरुदेव, पृथ्वी पर रहने वाले, वृक्षों पर रहने वाले, जलचर तथा नभचर प्राणी सदैव स्वस्थ रहते हैं. दुर्घटनावश कोई चोट लग जाय तो बात अलग है, वरना जुखाम, खांसी, ज्वर जैसे सामान्य रोग भी इन्हें नहीं होते हैं. मनुष्य द्वारा पालतू बनाये गये जानवर कभी-कभी सामान्य रोगों से ग्रसित हो जाते हैं, किन्तु मनुष्य तो अक्सर अस्वस्थ ही रहता है. इसका कारण क्या है ? गुरुदेव ने समझाया-‘मनुष्य को यह दण्ड प्राकृतिक नियमों के उल्लंघन के कारण मिलता है. अन्य जीव प्रकृति के साथ सामन्जस्य बनाये रखते हैं. किसी रोग का संकेत मिलते ही सहजवृत्ति से प्रेरित मर्यादा में आ जाते हैं और शीघ्र ही स्वस्थ हो जाते हैं.’ अर्थात् हम जितने प्रकृति के सम्पर्क में रहेंगे, प्राकृतिक नियमों की अनुपालना करते रहेंगे, उतने ही स्वस्थ रहेंगे. प्रकृति ने हमारे लिए पर्याप्त खाद्य सामग्री की व्यवस्था की हुई है, किन्तु हमने हमारे भोजन में अप्राकृतिक/ कृत्रिम वस्तुओं की भरमार कर रखी है. अखाद्य पदार्थ भी खा रहे हैं. पर्यावरण को दिनों-दिन दूषित कर रहे हैं. प्राण वायु की कमी होती जा रही है. पृथ्वी का पर्यावरणीय सन्तुलन बिगड़ता जा रहा है. पृथ्वी-तल का तापमान बढ़ता जा रहा है. महामारियों का प्रकोप एवम् नयी-नयी बीमारियों का आविर्भाव हो रहा है. इसलिए सम्पूर्ण मानव जाति को इस ओर ध्यान देना होगा, वरना मानव जाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा.

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