Golden Rules For Successful Life-सदैव समझौतावादी रहें (Always Be Submissive) 

Golden Rules For Successful Life

Golden Rules For Successful Life-सदैव समझौतावादी रहें (Always Be Submissive) 

1.कैसी भी स्थिति हो, कैसी भी परिस्थिति हो, कैसा भी कष्ट हो, कैसा भी संकट हो, कैसा भी अवसर हो, कैसा भी सफर हो, यदि आप सबसे समझौता करके चलेंगे तो इन सबसे आसानी से लड़ सकेंगे. सफलता के लिए लड़ना जरूरी है और लड़ने के लिए समझौता जरूरी है. याद रखें, दूसरों के साथ समझौता करने से पहले खुद के साथ समझौता करना जरूरी है.

2. सबसे बड़ा आश्चर्य तो यही है कि इस दुनिया में कोई भी अपनी गलती मानने के लिए आसानी से तैयार नहीं हो पाता है. हर व्यक्ति अपनी बात को अथवा अपने कार्य को ही सही मानकर चलता है, और इस प्रकार वह सबसे अधिक अपने आपको ही छलता है. यदि कोई उसकी बात को अथवा उसके कार्य को गलत ठहरा दे तो उसे एकदम गुस्सा आ जाता है और वह व्यर्थ की बहस में उलझ जाता है. अपने आपको सही साबित करने के चक्कर में अपना कीमती समय, सद्भाव और अपनी ऊर्जा नष्ट कर देता है. इसलिए व्यर्थ की बहस से बचें. गलती को गलती ही मानें. अपनी कार्यप्रणाली एवम् व्यवहार में तदानुसार सुधार करें, तब शायद ही कोई आपसे असहमत होगा.

3. बहस किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती, बहस तो महज विलासिता होती है. बहस तो अहम् पर टिकी होती है. हर बहस अहम् के साथ शुरू होती है और पछतावे के साथ खत्म होती है. बहस में उलझा हर व्यक्ति अपने कथन को सही सिद्ध करने के लिए अपनी तमाम तार्किक शक्ति दाव पर लगा देता है. जब कोई भी पक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं होता, तब बहस अनिर्णय के दौर में पहुँच जाती है. यदि आप किसी बहस को किसी निर्णय पर पहुँचाना चाहते हैं तो सामने वाले के उचित तर्कों को समुचित महत्व देते हुए सर्व सम्मति पर समाप्त कर दें. जब आप दूसरों के तर्को को महत्व देंगे तो दूसरे भी आपके तर्कों का सम्मान करेंगे.

4. देखा जाय तो जिन्दगी एक समझौता ही है. समझौतों का नाम ही जिन्दगी है. परिवार, समाज, एवं संसार में रहना है तो समझौते तो करने ही पड़ेंगे. जंगल में अकेले रहने पर भी स्वयम् के प्रति एवम् प्रकृति के प्रति कुछ समझौते तो करने ही पड़ेंगे. आप कहीं भी रहें बगैर समझौतों के आप जिन्दा नहीं रह सकते. याद रखें, जितने जल्दी समझौते करते चलेंगे, उतने ही लाभ में रहेंगे.

5. जहाँ आवश्यकता हो, वहाँ बहस करें, तर्क सहित करें, किन्तु वितर्क या कुतर्क न करें, व्यर्थ की बहस करके सामने वाले को सतर्क न करें, बहस के लिए बहस करने से निर्णय में अनावश्यक विलम्ब होता है. इसलिए केवल सार्थक बहस करें. याद रखें, कुतर्क करने वाले से सभी पीछा छुड़वाना चाहते हैं. इसलिए निरर्थक बहस से अपने आप को दूर रखें और अपने समय एवम् अपनी शक्ति का सृजनात्मक कार्यों में सदुपयोग करें. 

6.जब हम खराब से खराब परिस्थिति को स्वीकार कर लेते हैं, तब हमारे पास खोने को कुछ भी नहीं बचता, किन्तु पाने के लिए बहुत कुछ बचा रहता है. जब हम किसी ‘अस्वीकृत’ को अंगीकार कर लेते हैं, तब उससे अधिक बुरा होने की संभावना समाप्त हो जाती है. जब किसी परिस्थिति से लड़ने की शक्ति चुक जाय तो बेहतर है, खुद को परिस्थिति के हवाले कर दें और परिस्थिति का समुचित आनन्द उठायें.

7. यदि आप डर, चिन्ता, नफरत, स्वार्थ, नफा, नुकसान और दुनिया की हकीकत के साथ तालमेल बिठा पाने में नाकामयाब रहेंगे तो निश्चित रूप से आप टूटते चले जायेंगे. यदि आप इन सब के साथ आवश्यकतानुसार समझौते करते चलेंगे, तो ये सभी नकारात्मक भूत अपने आप छूटते चले जायेंगे. इसलिए न पयालनवादी रहें, न भाग्यवादी रहें, बस समझौतावादी रहें. किन्तु परिश्रम, कर्तव्यनिष्ठा एवम् सकारात्मक सोच के साथ कभी समझौता न करें.

8. किसी बीमारी का या तो उपचार हो सकता है या नहीं हो सकता. हो सकता है तो तत्काल उचित उपचार लें. यदि नहीं हो सकता तो बीमारी से समझौता कर लें और बीमारी का भी आनन्द उठायें. तब बहुत संभव है, बीमारी खुद ही विदा हो जाय, बशर्ते कि आप आशावादी रहें. 9. सही समय पर किया गया सही समझौता कई महायुद्धों को टाल सकता है. खुद के साथ किया गया समझौता, हर हाल में आपको संभाल सकता है. समझौता किसी के भी साथ करें, समझौता तो वस्तुतः खुद के साथ ही करना पड़ता है. जो खुद के साथ समझौता नहीं कर सकता, वो किसी के भी साथ समझौता नहीं कर सकता. सफलता का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र यही हो सकता है कि सब कुछ जानते हुए भी मूर्ख बने रहने का ढ़ोंग करते रहो.

दृष्टान्त- एक जेल में कैदियों को रोटियाँ गिन कर दी जाती थीं. प्रत्येक कैदी को सुबह चार और शाम को तीन बड़ी रोटियाँ मिलती थीं. इस व्यवस्था में किसी को कोई शिकायत नहीं थी. एक दिन जेलर ने इस नियम में हल्का सा परिवर्तन कर दिया. कैदियों को सुबह तीन और शाम को चार रोटियाँ दी जाने लगी. दिन भर में दी जाने वाली रोटियों की संख्या वही थी, फिर भी कैदियों ने विद्रोह कर दिया. अपनी आदत को यकायक बदल पाना कैदियों के लिए संभव नहीं था. जेलर ने समझौता करते हुए वापस पुरानी व्यवस्था लागू कर दी. पूर्व की भांति सुबह चार और शाम को तीन रोटियाँ मिलने लगी. इससे सबको बड़ी राहत मिली. इस समझौते से जेल प्रबन्धन को खोना कुछ नहीं पड़ा, पाया बहुत कुछ. अब यहाँ प्रश्न यह उठता है कि नयी व्यवस्था से कैदियों ने समझौता क्यों नहीं किया ? क्योंकि कैदी समझौतावादी नहीं थे. यदि कैदी समझौतावादी रहे होते तो जेल में ही क्यों आते. इसलिए यदि जेल से बचना हो तो समझौतावादी तो होना ही पड़ेगा. 

अपना रोना कम से कम रोयें (Do Not Expose Yourself Before Others) 

1.देखा जाय तो इस दुनिया में कोई भी व्यक्ति पूर्णतः सन्तुष्ट एवम् सुखी नहीं है. परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति सबके सामने अपना दुखड़ा रोता ही रहे. दिल से पूछा जाय तो यहाँ कोई भी व्यक्ति उतना निराश एवम् दुःखी नहीं है, जितना कि वह दूसरों के समक्ष दिखावा करता है. वस्तुतः कोई भी व्यक्ति न तो उतना सुखी है और न ही उतना दुःखी है, जितना कि वह प्रकटतः दिखाई पड़ता है.

2. जरा सोचिए, जब हर व्यक्ति अपनी समस्यायें बताने लगेगा, तब सुनने के लिए कौन बचेगा? यहाँ तो हर व्यक्ति पहले से ही दुःखी है, तब आपका दुखड़ा कौन सुनेगा ? यदि समस्त व्यक्तियों के दुर्भाग्यों का योग करते हुए उसमें कुल व्यक्तियों की संख्या का भाग लगा दिया जाय और सबको समान मात्रा में दुर्भाग्य बाँट दिये जायें तो संभवतः कोई भी इस बंटवारे से सहमत नहीं होगा. हर व्यक्ति अपना ही दुर्भाग्य वापस लेना पसंद करेगा.

3. इस बात की चिन्ता न करें कि लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं ? वे तो खुद ही इस चिन्ता में हैं कि उनके बारे में आप क्या सोचते हैं ? तब ऐसे लोगों के सामने रोना, अपनी ही आँखें खोना है. रोना ही हो तो खुद पर रोयें, अकेले में रोयें और तरोताजा होकर वापस अपने काम पर लग जायें.

4. यहाँ हर व्यक्ति अपने आपको दूसरों की तुलना में अधिक व्यस्त एवम् अधिक समस्याग्रस्त समझता है, तब आपकी समस्यायें सुनने के लिए भला कौन तैयार होगा ? जिसको भी सुनाओगे, वह पहले अपनी समस्याओं का रोना रोयेगा. कोई सुनेगा भी तो आधे-अधूरे मन से ही सुनेगा और आपके प्रति सहानुभूति नहीं, बल्कि अपनी उत्कृष्टता प्रदर्शित करेगा और आपको हीन समझेगा.

5. जरा अपने दिल से पूछिए, अब तक आपने कितने लोगों के दुख दर्द दिल से सुने हैं ? कितनों की मदद की है ? कितनों के घाव भरे है ? तब आप दूसरों से सहयोग की अपेक्षा किस अधिकार से कर सकते हैं ? सहानुभूति की साइकिल कभी एक पहिए पर नहीं चल सकती. इसलिए पहले सहानुभूति दो, फिर सहानुभूति लो. बिना दिये, कुछ भी पाने की उम्मीद मत करो. कुछ लोगों को तो बस रोने की ही आदत होती है, कोई भी मिला, अपनी राम कहानी शुरू. जरा गहराई से देखा जाय तो पता चलेगा कि यहाँ हर व्यक्ति जहर से भरा हुआ है. हर व्यक्ति का कोई न कोई जख्म हरा है. तो बेहतर है, आँसुओं की बजाय आशाओं की फसल बोयी जाय. रोने-धोने की बजाय अपने होने की सार्थकता संजोयी जाय. भाग्य को कोसते रहने की बजाय भाग्य का निर्माण किया जाय,

6. आदमी सोचता है, दूसरों के सामने अपना दुखड़ा रोने से वह जरा हल्का हो जायेगा. अगला मदद नहीं कर पायेगा, तब भी सहानुभूति तो जतायेगा ही. किन्तु ऐसा होता नहीं है. सुनने वाला प्रकटतः 

तो सहानुभूति प्रकट कर देता है, किन्तु पीछे हँसता है और मजे ले लेकर दूसरों को सुनाता है. अर्थात् आपकी समस्या को जल्दी ही सार्वजनिक कर देता है. इसलिए अपनी समस्यायें कम से कम बतायें, बतानी ही हो तो केवल सुपात्र को ही बतायें. अपनी बजाय दूसरों की समस्यायें अधिक सुनें. यदि आप ध्यान से सुनेंगे तो आपकी समस्याओं के समाधान भी उन्हीं में मिल जायेंगे.

7. अपने पीछे वालों को जरा गौर से देखिए. उनके दुःख-दर्दो के सामने आपके दुःख-दर्द काफी बौने नजर आयेंगे. याद रखें, सुख और दुःख, अमीरी और गरीबी साक्षेप है. एक दूसरे की तुलना पर निर्भर है. सलाह ऐसे लोगों से लें, जो विषम परिस्थितियों में भी अपने सिद्धान्तों पर टिके हुए हैं.

8. ज्ञान और कर्म का समन्वय आवश्यक है. कर्म न करने पर व्यक्ति का चिन्तन निराशावादी, नकारात्मक और अनिर्णायक हो जाता है, इसलिए उपलब्ध जानकारी के आधार पर कर्म करते रहें. जैसे कर्म करते रहेंगे, अधिक से अधिक जानकारी अर्जित करते रहेंगे. यदि आप रोते रहेंगे तो उपलब्ध जानकारी भी खोते रहेंगे.

9. जब कोई चुनौतीपूर्ण समस्या आये या किसी कार्य में सफलता न मिल सके, तब घबरायें नहीं, विचलित न हों, स्वाभाविक प्रतिक्रिया भी प्रकट न करें, दूसरों को सुनाने की बजाय अपने आप को परखें. अपने सकारात्मक विचारों को ठोस धरातल पर पुष्ट करें और पुनः काम पर लग जायें, तब आपको पता चलेगा कि हर समस्या का कोई न कोई समाधान भी अवश्य होता है. जब आपको किसी समस्या से पहले उसका समाधान नजर आने लगे, तब समझ लें कि आपको सफलता सम्बन्धी बुधत्व की प्राप्ति हो गयी है.

दृष्टान्त- एक निराशावादी व्यक्ति किसी महात्मा के पास पहुंचा और कहने लगा-‘महाराज, जीवन तो बहुत छोटा है. छोटा हो तब भी ठीक, पर नितान्त ही अनिश्चित है, इस अल्प समय में क्या-क्या करें? बचपन में जानकारी नहीं होती. जवानी भागदौड़ में ही चली जाती है. और बुढ़ापा बीमारी, अनिंद्रा, अपमान और उपद्रवों से भरा होता है. इतना कहते-कहते वह रोने लगा, उसे रोते देखकर महात्मा भी रोने लगे. इस पर निराशावादी ने पूछा-‘महाराज, आप क्यों रोते हैं ?’ महात्मा कहने लगे-‘क्या करूँ बच्चा ! खाने को अन्न नहीं है. अन्न के लिए मेरे पास जमीन नहीं है. परमात्मा के एक अंश में माया है. माया के एक अंश में तीन गुण है. गुणों के एक अंश में आकाश है. आकाश में थोड़ी सी वायु है, वायु में आग है. आग के एक भाग में पानी है. पानी का शंताश पृथ्वी है. पृथ्वी के आधे हिस्से पर जंगल-पर्वत हैं. जो कृषि भूमि है, उस पर लोगों का आधिपत्य है. मेरे लिए तो परमात्मा ने जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं छोड़ा. बताओं मैं क्या करूँ ?’ इस पर निराशावादी ने कहा-‘महाराज, फिर भी आप जिन्दा तो हैं. फिर रोते क्यों हैं ?’ महात्मा ने तुरन्त बताया-‘तुम भी तो जिन्दा हो, तुम्हें भी अनमोल जीवन मिला है. जीवन के साथ ही अपना बहुमुल्य समय भी मिला है. फिर भी रोते हो? जीवन और समय का सदुपयोग करो, जो कुछ भी तुम्हारे पास है, उसका पूरा-पूरा उपयोग करो, तब जो नहीं है, वह भी उपलब्ध होता चला जायेगा.’ 

अच्छे की आशा करें, बुरे से बुरे के लिए तैयार रहें (Hope For The Good & Be Prepared For The Worst) 

1.प्रत्येक कदम उठाने से पहले सोचें कि बुरा से बुरा क्या हो सकता है ? यदि आप मानसिक रूप से तैयार रहेंगे तो हर समस्या का समाधान आसानी से कर लेंगे. संभावित समस्याओं पर हर कोण से विचार करें, उनके समाधान पर विचार करें और समस्या के आने से पहले उसका समाधान तैयार रखें, तब समस्यायें अपने आप सुलझती चली जायेंगी. याद रखें, हर अच्छाई में बुराई और हर बुराई में अच्छाई छिपी होती है.

2. जो होना तय है, जो अवश्यम्भावी है, उसे स्वीकार करें. हो सकता है, स्वीकार करते ही परिस्थितियाँ बदल जायें, सब कुछ अच्छा ही हो. याद रखें, अच्छे के साथ बुरा भी जुड़ा हुआ है और बुरे से बुरे में से भी कुछ अच्छा निकल सकता है. उस अच्छे की आशा करें, हो सकता है, सब कुछ अच्छा ही अच्छा निकलता चला जाय,

3. हर व्यक्ति के जीवन में खराब से खराब वक्त भी आता है. किन्तु यह मत भूलिए कि खराब वक्त से पहले और खराब वक्त के बाद में अच्छा वक्त भी आता है. अर्थात् खराब के आगे पीछे ‘अच्छा’ ही लगा होता है. फिर बुरे वक्त का रोना क्यों रोया जाय, हर वक्त का स्वागत किया जाय. वक्त तो वक्त होता है, न अच्छा होता है, न बुरा होता है. हम ही उसे अच्छा या बुरा सिद्ध करते रहते हैं. यदि हम हर वक्त के स्वागत के लिए तैयार रहेंगे तो हमारे लिए वक्त अच्छा ही होगा.

4. जीवन वस्तुतः इतना आसान नहीं होता, जितना हम समझते हैं. जीवन इतना दुष्कर भी नहीं होता, जितना हम समझते हैं. जीवन तो समझ से परे होता है, जिसे समझ के आधार पर आसान बनाया जा सकता है. अर्थात् जीवन से समझ को और समझ से जीवन को बदला जा सकता है. आशा और विश्वास जीवन के दो अनमोल एवम् अचूक अस्त्र हैं. धैर्य और साहस दूर तक मार करने वाले दो टूक शस्त्र हैं. अपने अस्त्रों एवम् शस्त्रों के सदुपयोग हेतु सदा तैयार रहें. तब बुरा वक्त आयेगा ही नहीं, आयेगा भी तो आपको सतायेगा नहीं.

5. जब भी आपको उधार लेना पड़े या देना पड़े तो कुछ संभावित तिथियों एवम् परिस्थितियों पर पहले से ही विचार कर लें. जब आप उधार चुकाने की स्थिति में न रहें या कर्जदार आपको उधार लौटाने की स्थिति में न रहें, तब आप क्या करेंगे? मान कर चलें कि ऐसी स्थितियाँ आ सकती है. इसलिए हर स्थिति से निपटने के लिए पहले से ही मानसिक रूप से तैयार रहें. हर संभव वैकल्पिक समाधानों की परिकल्पना तैयार रखें, ताकि विकट से विकट परिस्थिति से निपटा जा सके. बिना पूर्व तैयारी के तो आप न सफलता को सहन कर सकेंगे, न विफलता को ही.

6. छोटी-छोटी दैनिक समस्याओं को हाथों-हाथ सुलझाते चलें. देखा जाय तो छोटी समस्यायें ही असली समस्यायें हैं, बड़ी समस्या कभी अचानक नहीं आती, बल्कि अनसुलझी छोटी-छोटी समस्याओं के योग से ही बड़ी समस्या खड़ी होती है और एक दिन अचानक विस्फोटक बन जाती 

है. इसलिए जब भी समस्या उत्पन्न हो, उसे तत्काल प्रभावी ढंग से सुलझाते चलें. 7. देखा जाय तो दुनिया में कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं होता, बस हमारी विचारधारा के कारण 

ही अच्छा या बुरा होता है. जब हम प्राकृतिक नियमों का पालन नहीं कर पाते, या प्राकृतिक सन्तुलन नहीं रख पाते, तब ही हमें कष्ट उठाने पड़ते हैं, अच्छे और बुरे के मापदण्ड भी सबके अलग-अलग ही होते हैं, जो मेरे लिए अच्छा है, वह आपके लिए बुरा हो सकता है और जो आपके लिए अच्छा है, वह मेरे लिए बुरा हो सकता है. इसलिए हमें अपनी अपनी धारणायें बदलनी होगी.

8. आपने परीक्षा दी है, परिणाम आने वाला है. यदि आप थर्ड डिवीजन में पास होते हैं तो फेल होने से लाख दर्जा अच्छा है. यदि आप सेकिण्ड डिवीजन में पास होते हैं तो थर्ड डिवीजन से बेहतर है. यदि आप फर्स्ट डिवीजन में पास होते है तो सेकिण्ड डिवीजन से बढ़िया है. यदि आप निष्काम भाव से सतत् प्रयत्नशील रहेंगे तो किसी भी परीक्षा में कभी फेल नहीं होंगे, दुर्भाग्यवश यदि फेल हो भी गये तो इसे अच्छे डिवीजन से पास होने की तैयारी ही समझनी चाहिए.

9. जब आप कोई बड़ा व्यवसाय या कोई बड़ा उद्योग आरम्भ करते हैं, तब यह तय नहीं हैं कि हर चीज आपकी अपेक्षाओं के अनुरूप ही चले. कदम-कदम पर कठिनाइयाँ आती हैं, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि आप व्यवसाय या उद्योग को बीच में ही बन्द कर दें, अनेक विफलताओं के बाद ही आशातीत सफलतायें मिलती हैं. सफलताओं के लिए तैयारी तो करें,

दृष्टान्त- एक पुरानी कहानी के अनुसार राजद्रोह के किसी मुकदमें में कोई पचास नागरिकों को आशा के विपरीत मौत की सजा सुना दी गई. उनमें एक लोहार भी था. सजा सुनकर सब रोने लगे, किन्तु लोहार हँसने लगा. सबको आश्चर्य हुआ. राज्य की परम्परानुसार सजायाप्ताओं के हाथ-पैरों में लोहे की जंजीरे डालकर उन्हें दूर घने जंगल में फिकवा दिया गया, जंजीरों के कारण चल फिर नहीं सकते थे. पास से जंगली जानवरों की आवाजें आ रही थीं. मौत का इन्तजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था. किन्तु लोहार तब भी हँस रहा था. लोहार ने सबको अपने पास आने का संकेत दिया. रेंगते हुए सब लोहार के इर्द-गिर्द एकत्रित हो गये. लोहार ने धीरे से बताया कि जंजीरे उसी की बनाई हुई हैं. जो बना सकता है, वो तोड़ भी सकता है. लोहार ने अपने दाँतों में छिपाकर लाई गई छोटी सी आरी निकाली और एक-दूसरे की मदद से जंजीरें काटना शुरू कर दिया. लोहार जानता था कि जंजीर जोड़ के स्थान पर ही सबसे कमजोर होती है. इसलिए सबसे कमजोर कड़ी की तलाश करते हुए एक-एक करके सभी जंजीरें तोड़ डाली गईं. और सभी जान बचाकर अपने-अपने घर लौट गये. यह सब लोहार की पूर्व तैयारी के कारण ही संभव हुआ. 

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