वैश्वीकरण पर निबंध | Globalization Essay In Hindi | वैश्वीकरण Drishti IAS

वैश्वीकरण पर निबंध

वैश्वीकरण पर निबंध | Globalization Essay In Hindi | वैश्वीकरण : अर्थ और प्रभाव 

वैश्वीकरण के प्रभावों पर चर्चा करने से पूर्व यह जान लेना उचित रहेगा कि वैश्वीकरण कहते किसे हैं। सरल शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ जडना ही वैश्वीकरण है। यह प्रक्रिया अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के माध्यम से संपन्न होती है। इस प्रक्रिया में हम आर्थिक रूप से वैश्विक अथवा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पारस्परिक रूप से निर्भर होते हैं। इसके तहत कोई भी देश, किसी भी देश में बिक्री करने अथवा निर्यात करने के लिए उत्पादन कर सकता है। यह विस्तार की वह प्रक्रिया है, जिसमें आर्थिक-सामाजिक संबंधों का विस्तार संपूर्ण विश्व तक होता है तथा इसके तहत उदारीकरण की नीति अपनाई जाती है। वस्तुतः वैश्वीकरण की अवधारणा को मार्शल मैक्लुहान ने प्रस्तुत करते हुए यह प्रतिपादित किया था कि वैश्वीकरण उस कॉस्मोपोलिटन (Cosmopolitan) जीवन पद्धति के उद्भव का आधार है, जो वैश्विक सांस्कृतिक व्यवस्था तथा विश्व गांव की अवधारणा को साकार कर रहा है। 

वैश्वीकरण के चार मुख्य अवयव हैं। ये हैं—(1) वस्तुओं का आदान-प्रदान बिना रुकावट सुनिश्चित कराने के उद्देश्य से व्यापार अवरोधकों में कमी लाना (2) ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करना, जिनमें विभिन्न राज्यों में पूंजी का स्वतंत्र रूप से प्रवाह हो सके (3) टेक्नोलॉजी के निर्बाध प्रवाह के उपाय एवं (4) ऐसा वातावरण कायम करना कि दूसरे देशों से श्रमिकों का आदान-प्रदान हो सके। यही चार वैश्वीकरण के मुख्य घटक हैं। जहां इसके चार घटक हैं, वहीं चार विशेषताएं भी हैं। ये हैं—विश्व व्यापार, अंतर्राष्ट्रीय श्रम विभाजन, बहुराष्ट्रीय उद्यम एवं श्रमिक वर्गों का अंतर्राष्ट्रीयकरण। 

वस्तुतः वैश्वीकरण की नीति का उदय 1980 के दशक में हआ। लगभग यही वह समय था, जब उदारीकरण एवं गैर-सरकारीकरण यानी निजीकरण की अवधारणाओं का सूत्रपात हुआ था। यही कारण है कि वैश्वीकरण की नीति को उदारीकरण एवं निजीकरण के तार्किक परिणाम (Logical Conclusion) के रूप में अभिहित किया जाता है। भारत में भी वैश्वीकरण की प्रक्रिया उदारीकरण एवं निजीकरण से ही जुड़ी हुई है, जिसकी शुरुआत वर्ष 1991 से मानी जाती है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके तहत आर्थिक गतिविधियों की क्षमता एवं कुशलता को बढ़ाने के उद्देश्य से इस प्रकार से छूट दी जाती है कि किसी भी देश की अर्थव्यवस्था वैश्विक आर्थिक गतिविधियों के साथ सहजता से जुड़ सके। यानी इससे एकल विश्व व्यवस्था का मार्ग प्रशस्त होता है। इस व्यवस्था के तहत जहां विश्व के किसी हिस्से से सस्ता माल हासिल कर सकते हैं, वहीं जहां का श्रम सस्ता हो, उसका उपयोग कर सकते हैं। यही बात पूंजी, संयंत्र एवं बाजार जैसे आर्थिक घटकों पर लागू होती है। साथ ही उत्पादन, विपणन एवं सेवाओं का वैश्विक संजाल बनाने में भी सहजता रहती है। यहां यह रेखांकित करना समीचीन रहेगा कि सूचना एवं संचार की अभिनव तकनीकों ने वैश्वीकरण को परवान चढ़ाने में केंद्रीय भूमिका निभाई है। 

“वैश्वीकरण की अवधारणा को मार्शल मैक्लुहान ने प्रस्तुत करते हुए यह प्रतिपादित किया था कि वैश्वीकरण उस कॉस्मोपोलिटन (Cosmopolitan) जीवन पद्धति के उद्भव का आधार है, जो वैश्विक सांस्कृतिक व्यवस्था तथा विश्व गांव की अवधारणा को साकार कर रहा है।” 

चूंकि वैश्वीकरण में सभी देशों की अर्थव्यवस्थाओं को मिलाकर एक ही प्रणाली के रूप में विकसित किए जाने के उपाय किए जाते हैं, अतएव इसका विशेष आर्थिक महत्त्व है, क्योंकि इस प्रक्रिया से विश्व का आर्थिक समाकलन (Economic Integration) होता है। आर्थिक दृष्टि से इसका सबसे बड़ा लाभ ये है कि यह न सिर्फ उपभोक्ता के हितों को संरक्षित करता है, बल्कि उपभोक्तावाद को भी प्रोत्साहित करता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसके तहत उपभोक्ता सरोकारों को ध्यान में रखकर उसे न्यूनतम संभव लागत पर गुणवत्तापूर्ण उत्पाद उपलब्ध कराए जाने के उपाय सुनिश्चित किए जाते हैं। वैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जो स्पर्धा को बढ़ाती है तथा इस स्पर्धा में आगे बने रहने के लिए उपभोक्ता का समर्थन हासिल करना आवश्यक होता है। यह समर्थन उपभोक्ता को तुष्ट कर के ही हासिल किया जा सकता है। इस प्रकार उपभोक्ता का हित संवर्धित होता है। 

वैश्वीकरण के कारण जहां धन का मुक्त प्रवाह होने से आर्थिक लाभ बढ़ता है, वहीं आर्थिक क्रियाकलापों में सरकार के न्यूनतम हस्तक्षेप के कारण आर्थिक विस्तार को गति एवं लय मिलती है। आर्थिक दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि वैश्वीकरण से  विकासशील देशों को अपनी-अपनी अर्थव्यवस्थाओं में ऐसा संरचनात्मक समायोजन (Structural Adjustment) करने का प्रोत्साहन मिलता है. जिससे वे विकसित देशों के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का रुख अपनी ओर कर पाते हैं। इससे विकासशील देश की अर्थव्यवस्थाओं को बल मिलता है। इससे जहां क्षेत्रीय आर्थिक समाकलन (Regional Economic Integration) की प्रकिया बढ़ने से वाणिज्यिक-व्यापारिक गतिविधियां बढ़ती हैं, वहीं बहुराष्ट्रीय निगमों का विस्तार बढ़ने से आर्थिक विकास भी बढ़ता है। 

वैश्वीकरण के अनेक प्रभाव परिलक्षित हो रहे हैं। चूंकि वैश्वीकरण में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय अंतःक्रियाओं का पर्याप्त समावेश रहता है, अतः इसका पहला प्रभाव तो इस रूप में सामने आया है कि भौगोलिक सीमाएं बौनी पड़ने एवं स्थानीय दबाव और बंधन शिथिल पड़ने से ‘विश्व गांव’ की अवधारणा साकार हुई है, जिसमें सब कुछ खुला हुआ है और सभी के लिए समान अवसर हैं। वैश्वीकरण के कारण हम राष्ट्रीय सीमाओं के बंधनों से मुक्त होकर विश्व बाजार से जुड़ गए हैं। इस प्रकार इसका एक प्रभाव यह भी है कि इसने बाजार को वृहद और व्यापक बनाया है। इतना ही नहीं, बाजार के लिए नई नीतियां, नए मानक एवं संस्थाओं आदि का विकास किए जाने से यह बाजार उन्नतशील भी हुआ है। वैश्वीकरण के कारण जहां सूचना एवं धन का प्रवाह बढ़ा है, वहीं नई प्रौद्योगिकियों का लाभ सभी को मिलना शुरू हुआ है। 

वैश्वीकरण ने सिर्फ व्यापार, बाजार एवं वाणिज्य से संदर्भित भान ही नहीं दिखाए हैं, बल्कि वैचारिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर भी उसके प्रभाव दिख रहे हैं। मसलन, वैचारिक एवं सांस्कृतिक आदान पदान पर्व की अपेक्षा अधिक गतिमान एवं त्वरित हुआ है, वहीं सामाजिक ज्ञान एवं शैक्षणिक विकास को भी बल मिला है। हम एक दसरे के अधिक निकट आए हैं। हमारा परिचय प्रगाढ़ हुआ है। यानी अब हम एक अंतर्राष्ट्रीय परिवार का हिस्सा बन चुके हैं। इससे बड़ी बात और क्या होगी। 

“वैश्वीकरण का दुष्प्रभाव इस रूप में भी सामने आया है कि इसमें औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र को वरीयता दिए जाने से कृषि क्षेत्र की उपेक्षा बढ़ी है। यह स्थिति भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए विशेष रूप से घातक है।” 

वैश्वीकरण ने वैश्विक प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ाया है। इस स्पर्धा में बने रहने के लिए गुणवत्ता में वृद्धि एवं कीमतों पर नियंत्रण आवश्यक है। फलतः जहां उत्पादों की गुणवत्ता पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है, वहीं इन्हें कम से कम कीमतों पर बाजार में उतारने की होड़ भी मची है। यह स्थिति ‘प्राइज वार’ जैसी है, जिसका लाभ उपभोक्ताओं को मिल रहा है। इससे जहां गुणवत्ता बढ़ी है, वहीं स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी अस्तित्व में आई है। वैश्वीकरण का एक प्रभाव यह भी है कि बहुराष्ट्रीय निगमों के विस्तार से रोजगार के अवसर बढ़े हैं। 

अभी तक स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व एवं मानवाधिकारों के प्रसार, कल्याण, स्वायत्तता एवं प्रतिनिधित्व में बढ़त, सूचना-जनसंचार साधनों के विस्तार, रंगभेद एवं निर्योग्यताओं पर नियंत्रण, नवीन सामाजिक आंदोलनों के उदय, सिविल सोसायटी आंदोलनों में वृद्धि, कौशल एवं ज्ञान के प्रसार, विश्व सामाजिक मंच के उदय एवं लगिक संवेदनशीलता में वृद्धि के रूप में भी वैश्वीकरण के अनेक सकारात्मक प्रभाव सामने आए हैं। 

वैश्वीकरण के दुष्प्रभाव भी कम नहीं हैं। डॉ. वी. सुंदरम ने वैश्वीकरण को उपनिवेशवादी नीति का परिणाम बताते हुए अपने एक शोध में यह रेखांकित किया है कि वैश्वीकरण, ब्रिटिश की साम्राज्यवादी नीति का ही रूपान्तरण है। उनका यह कहना है कि उपनिवेशों को छोड़ने के बाद भी पश्चिम के साम्राज्यवाद का अंत नहीं हआ था. बल्कि यह सक्ष्म रूप और अधिक हानिकारक रूप से परिवर्तित होकर अब वैश्वीकरण के रूप में सामने आया है। 

वैश्वीकरण का दुष्प्रभाव इस रूप में भी सामने आया है कि इसमें औद्योगिक एवं सेवा क्षेत्र को वरीयता दिए जाने से कृषि क्षेत्र की उपेक्षा बढ़ी है। यह स्थिति भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए विशेष रूप से घातक है। वैश्वीकरण के कारण जहां विदेशी प्रौद्योगिकी, विदेशी कर्ज एवं सहायता पर निर्भरता बढ़ती है, वहीं इसमें निजीकरण पर विशेष बल दिये जाने के कारण लोक-स्वामित्व से निजी-स्वामित्व की तरफ रूपांतरण में वृद्धि होती है। इस वजह से सामाजिक कल्याण एवं सामाजिक न्याय जैसे पुनीत उद्देश्य बाधित होते हैं। वैश्वीकरण का दुष्प्रभाव जहां विलासिता की वस्तुओं के उत्पादन के रूप में सामने आया है, वहीं बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विस्तार के कारण कुटीर उद्योग प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुए हैं। छोटे काम-धंधे कर जीविका कमाने वालों को ‘माल संस्कृति’ ने व्यापक क्षति पहुंचाई है। 

वैश्वीकरण के कारण हम भूमण्डलीय संस्कृति (Global Culture) से आच्छादित हो चुके हैं। इसका दुष्प्रभाव यह है कि हमारी स्थानीयता छिन्न-भिन्न हुई है, विकासशील देशों की स्थानीय संस्कृतियों को क्षति पहुंची है एवं पहचान का संकट बढ़ा है। वैश्वीकरण रूपी बहुलवादी प्रक्रिया ने स्वयं में संपूर्ण विश्व की विशिष्टताओं एवं भिन्नताओं को समाविष्ट कर लिया है। इसका दुष्प्रभाव बाजारवाद के उस विकृत रूप में भी सामने आया है, जिसमें बाजार-विकास तो मुखर हो गया है, जबकि इसके सम्मुख मानव-विकास गौण एवं प्रभावहीन हो चुका है। बाजारू मानसिकता, निजी लाभ की स्पर्धा एवं बाजार को अधिक कुशल एवं असरदार बनाने के आगे मानवीय मूल्य एवं संवेदनाओं का कोई अस्तित्व ही नहीं रह गया है। वैश्वीकरण के दुष्प्रभाव के कारण अब शिक्षा को भी उत्पाद (Product) की शक्ल में बिकाऊ बनाया जा रहा है। सामर्थ्यवान इसे खरीद रहे हैं, तो जो सामर्थ्यवान और सक्षम नहीं हैं, वे मायूस एवं निराश हैं। इससे आर्थिक विषमता भी बढी है। सबसे बडा दष्प्रभाव यह है कि वैश्वीकरण के कारण विकासशील देशों पर विकसित देशों का प्रभुत्व बढ़ा है, क्योंकि पूंजी पर पश्चिमी देशों का ही नियंत्रण है। यह बात वैश्विक संतुलन को बिगाड़ सकती है और तमाम प्रयासों के बावजूद ‘तीसरी दुनिया’, ‘पहली दुनिया के समकक्ष नहीं पहुंच सकती। 

अपने तमाम सकारात्मक-नकारात्मक परिणामों और प्रभावों के बीच स्थानीय सीमाओं को बौना बनाते हुए वैश्वीकरण ने गति पकड़ रखी है। यह पश्चिम के नव-उपनिवेशवाद की एक युक्ति है अथवा विश्व को संवारने-सजाने एवं उन्नत बनाने का एक उपक्रम इस बार में अंतिम रूप से अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। हमें सही राय कायम करने के लिए अभी और इंतजार करना पड़ेगा। 

Click here -HINDI NIBANDH FOR UPSC

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा.

5 × five =